गुरुवार, 21 अगस्त 2008

फलित ज्योतिष की सीमाएं

एक ज्योतिषी से लोगों की अपेक्षाएं बहुत होती हैं

आज कोई भी व्यक्ति जब एक ज्योतिषी के पास पहुंचता है तो उस व्यक्ति की ज्योतिषी से बहुत सारी अपेक्षाएं होती हैं। आम लोग यही समझते हैं कि ज्योतिषी को किसी के भविष्य की पूरी जानकारी होती है , अत: वह उस व्यक्ति के भविष्य की सारी बाते बता देगा। दूसरी ओर तरह-तरह के ज्योतिषी होते हैं , सभी के दावे एक से बढ़कर एक होते हैं । शरीर के रंग , कद ,स्वरुप , धन की मात्रा ,भाई-बहनों की संख्या , शैक्षणिक योग्यता , बाल-बच्चों की संख्या , शादी की तिथि , शादी की दिशा, मृत्यु का समय , लॉटरी से धन प्राप्त करने का समय ,व्यक्ति का नाम , पिताजी का नाम , हस्तरेखा से कुंंडली निर्माण आदि के दावे किसी ज्योतिषी की ज्योतिषीय योग्यता को प्रचारित करने के लिए विज्ञापन का काम भले ही कर जाए , उपरोक्त सभी संदभोZ की जानकारियॉ अभी तक का विकासशील फलित ज्योतिष किसी भी हालत में प्रदान नहीं कर सकता। इस प्रकार की जिज्ञासा को लेकर कोई भी व्यक्ति किसी ज्योतिषी के यहॉ पहुंचे तो उसे निराशा ही मिलेगी। ज्योतिषी से लोगों की अपेक्षाएं बहुत अधिक होती हैं। एक सज्जन पूछ रहें हैं- मेरी पुत्री की शादी किस दिशा में कब और कितनी दूरी पर होगी ? क्या इस प्रश्न का उत्तर सचमुच फलित ज्योतिष से दिया जा सकता है ?

वैदिक काल , पौराणिक काल , प्राक् ऐतिहासिक काल में स्वयंवर हुआ करते थे । उस समय वर-वधू अपने जोडे का खुद चयन किया करते थे । किन्तु उसके पश्चात् भारत में विदेशी आक्रमण होते चले गए और प्रतिष्ठा बचा पाने का भय इतना प्रबल हो गया कि लोगों ने अपनी पुति्रयों का विवाह जन्म लेने के साथ ही तय करना शुरु कर दिया। कहीं कहीं ऐसा भी उदाहरण देखने को मिला कि दो गर्भवती सहेलियॉ परस्पर यह तय करती थी कि एक दूसरे को पुत्र-पुति्रयॉ हुईं तो उनकी शादी कर दी जाएगी। सौ वषZ पूर्व तक बालक बालिकाओं की शादी शैशवकाल में की जाती थी। आज से 50 वषZ पूर्व शादियॉ उस समय होती थी जब लड़के लड़कियॉ क्रमश: पंद्रह और दस वषZ के हुआ करते थे। पच्चीस वषZ पूर्व बालिग होने पर ही विवाह का प्रचलन था , पर इस समय जब इक्कीसवीं सदी का आरंभ हो रहा है ,कोई भी जागरुक लड़का या लड़की तबतक शादी के पक्ष में नहीं होते , जबतक वे स्वावलम्बी नहीं बन जाते। इस समय वैवाहिक बंधन में बंधनेवालों की उम्र कभी-कभी 25-30 वषोZं से भी अधिक होती है।

किसी संदर्भ की इतनी अपेक्षा क्यों ?


ध्यान देने की बात यह है कि एक ही ग्रह भिन्न भिन्न काल में कभी बाल्यावस्था में , कभी किशोरावस्था में ,और कभी युवावस्था में विवाह का योग उत्पन्न करता है। 15वी शताब्दी से 19वी शताब्दी तक सभी के लिए वैवाहिक योग शैशवावस्था में , 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में किशोरावस्था के आरंभ में ,20वीं शताब्दी के अंत में किशोरावस्था के अंत में तथा इक्कीसवी सदी के प्रारंभ में युवावस्था के मध्य में वैवाहिक योग उत्पन्न होता है । क्या इन बातों से ग्रह की प्रकृति और कार्यशैली में एकरुपता दिखाई पड़ती है ? यदि नही तो ज्योतिषी विवाह के समय के उल्लेख का दावा किस प्रकार करतें हैं ? ज्योतिष पर विश्वास करने वाले लोग इस संदर्भ में इतनी अपेक्षाएं क्यों रखते हैं ? यह बात दूसरी है कि देश काल के अनुसार सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए ग्रह की स्थिति और उसकी गत्यात्मकता से वैवाहिक काल की संभावनाओं पर परिचर्चा भले ही कर ली जाए।


20वीं शताब्दी के प्रारंभ या मध्य तक यातायात की बड़ी सुविधा नहीं थी , संपर्क-सूत्र भी महत्वपूर्ण नहीं थे , अत: शादी-विवाह आसपास निकटस्थ ग्राम में होते थे। जैसे-जैसे यातायात की सुविधाएं बढ़ती गयी , संपर्क-सूत्र बढते चले गए , सभ्यता का विकास होता गया , लोग िशक्षित होते गए , अन्तर्जातीय , अन्तप्राZंतीय , दूरस्थ , यहॉ तक कि अब देश-देशांतर तक की शादियॉ प्रचलित हो गयी हैं। वही ग्रह पहले सीमित जगहों में शादियॉ करवाते थे , अब दम्पत्ति पृथ्वी के दो छोर के भी हो सकते हैं। विवाह-सूत्र में बंधनेवाले अब किसी दूरी की परवाह नहीं करते हैं । अत: संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि कुंडली के ग्रहों को देखकर यह कदापि नहीं बतलाया जा सकता है कि जातक की शादी कहीं निकट स्थल में होनेवाली है या फिर काफी दूर। इसका कारण है , लोगों की मनोवृत्ति में आया बदलाव। पहले लोग अपने गॉव या आसपास के गॉवों में बसनेवाले अपनी जाति के लोगों को ही असली बिरादरी समझते थे , दूर की अपनी ही जाति के लोगों की कुलीनता पर संशय किया जाता था। अत: उनसे संबंध करके अपनी प्रतिष्ठा को दॉव पर से लोग बचते थे।


आज परिस्थितियॉ बिल्कुल भिन्न हैं। जाति और खून की पवित्रता गौण हो गयी है। धन अर्जित करने की क्षमता , कर्म और चरित्र ही प्रतिष्ठा के मापदंड बनते जा रहें हैं। वैवाहिक संबंध में दूरी अब बाधा नहीं रह गयी है। किसी भारतीय नारी या पुरुष की शादी अमेरिका या ब्रिटेन निवासी के साथ हो तो इसे शान और प्रतिष्ठा की बात समझी जाती है। दाम्पत्य जीवन में दो-चार वषोZं का वियोग हो , पत्नी 2-4 वषZ बड़ी भी हो तो इसे सहज स्वीकार कर लिया जाएगा। इस प्रकार के बदलते सामाजिक परिवेश में ग्रह के आधार पर यह निर्णय करना काफी कठिन होगा कि किसी की शादी निकट या दूर या फिर किस उम्र में होनेवाली है।

भूतप्रेत सिद्ध कर भविष्यवाणी करना ज्योतिष नहीं


एक बार अति सामान्य और अतिवििशष्ट एक ही व्यक्ति से मिलने का मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ। अति सामान्य इसलिए क्योंकि वे वेश-भूषा और रुप-रंग से अतिसामान्य , वस्त्र के नाम पर लाल रंग का एकमात्र मामूली अंगोछा पहने हुए थे, मालूम हुआ , वे बाहर से आए हुए थे , अपने ही वेश-भूषा के अनुरुप कई दिनों से हरिजनों की बस्ती में मेल-मिलाप से रह रहें थे। मुझे शैशवकाल से ही ज्योतिष विद्या में रुचि है। मै मिलने के लिए उनके पास गया। उन्होने मुझे देखते ही कहा-आइए विद्यासागरजी , बैठिए। मै उनकी ज्योतिष विद्या से अवाक् था। मै अच्छी तरह जान रहा था कि इस ज्योतिषी को मेरा नाम किसी ने नहीं बताया है। फिर भी ऐसा समझते हुए कि मै इस क्षेत्र का महत्वपूर्ण विद्यार्थी हंू , मुझे आते हुए देखकर किसी ने मेरा नाम फुसफुसाकर बता दिया हो , मैने कहा- मेरे साथ जो हैं , उन्हे आपने बैठने को नहीं कहा । मैने जानबूझकर ज्योतिषी की परीक्षा लेने के लिए ये बातें कही , क्योंकि मेरे साथ जो व्यक्ति था , वह मेरे इलाके के लिए अजनबी था , उसका नाम लोग नहीं जानते थे , अत: ज्योतिषी को इसकी खबर नहीं हो सकती थी। ज्योतिषीजी मेरा इशारा समझ चुके थे। उहोेनें इस अजनबी का नाम हकलाते हुए ` अभ्यान , अभ्यान ,अभ्याननजी , बैठिए ´- कहा । वे अभ्यानन के नाम को ऐसे दूहरा रहे थे , मानो बहुत धीमी आवाज में कोई उन्हें अभ्यानन कह रहा हो और वे अंतिम `न´ को सुनने में कठिनाई महसूस कर रहें हों। इसके बाद उन्होने धारा प्रवाह बोलना शुरु कर दिया , हम कितने भाई-बहन हैं , बड़े भाई की शादी हो चुकी है , एक पुत्री है , बहन की दो पुति्रयॉ और एक पुत्र हैं। मेरे संबंध में उन्होने बताया- मै परीक्षा दे चुका हूं और परीक्षाफल का इंतजार है। अपेक्षित रिजल्ट में मामूली बाधा है। ज्योतिष की चाहे जिस विधा पर उनका पूर्ण नियंत्रण था या वे सििद्धप्राप्त पुरुष थे , उस दिन की उनकी सारी बाते जो घट चुकी थी , अक्षरश: सही थी , यहॉ तक कि कुछ दिनों बाद मेरा रिजल्ट भी निकला , मैंने मात्र एक अंक से प्रथम श्रेणी खो दी थी , परंतु मेरे सिवा बहुत लोगों के लिए बहुत सारी भविष्यवाणियॉ थी ,जो सभी गलत निकली। जो दम्पत्ति निकट भविष्य में संतान प्राप्त करनेवाले थे, उनके पुत्र-पुति्रयों से संबंधित भविष्यवाणियॉ, नौकरी प्राप्त करने की भविष्यवाणियॉ और निकट भविष्य में ही लाभ प्राप्त करने की भविष्यवाणियॉ गलत साबित हुईं। एक व्यक्ति मारकेश के प्रबल योग में पड़ा हुआ है , कहकर उसे काफी ठगा भी गया , परंतु उसे मामूली बुखार भी न हुआ।


इस पूरे प्रसंग पर गौर किया तो मेरे सामने जो निष्कर्ष आए , वह यह कि वह आदमी भूतात्मा सिद्ध किए हुए था। वह सिद्ध आत्मा ही उस व्यक्ति को वत्र्तमान तक की सारी बातें अक्षरश: बताया करता था और उसे ही वह तोते की तरह बोलता था। इस कारण भूत और वत्र्तमान की सारी बातें बिल्कुल सही थी , परंतु अधिकांश भविष्यवाणियॉ गलत थी , क्योंकि भविष्यकथन अनुमान पर आधारित था। वह व्यक्ति भूत और वत्र्तमान की सटीक चर्चा करके दूसरों का विश्वास प्राप्त करता था , परंतु भविष्य की जानकारी के लिए समुचित विद्या उसने अर्जित नहीं की थी।
दूसरी एक बात और थी कि वह सामनेवाले को हिप्नोटाइज करता था और उसके मन की सारी बातों को बता देता था। तारीखों सहित भूत और वर्तमान की चर्चा किसी व्यक्ति को हिप्नोटाइज करके बतायी जा सकती है, किन्तु हिप्नोटिज्म विद्या के जानकार को ज्योतिषी कदापि नहीं कहा जा सकता , क्योकि भविष्य की जानकारी भूत विद्या या हिप्नोटिज्म से कदापि संभव नहीं है।

गुणात्मक पहलू बतलाना संभव,संख्यात्मक नहीं


इस प्रसंग का उल्लेख करना इसलिए आवश्यक समझा, क्योंकि मुझे भी पहले यही भ्रम हुआ था कि ज्योतिषी भाई-बहनों की संख्या बता सकता है , संतान की संख्या बता सकता है, यहॉ तक कि कितने पुत्र और कितनी पुति्रयॉ होंगी , इसे भी बतलाया जा सकता है , परंतु आज फलित ज्योतिष के चालीस वषीZय अध्ययन-मनन के बाद इस निष्कषZ पर पहुंचा हूं कि फलित ज्योतिष मानव-मन की मन:स्थिति , सुख-दुख आदि प्रवृत्तियों या उसकी तीव्रता का बोध कराता है न कि किसी संख्या का।

भाई-बहन , सहयोगी , शक्ति , पुरुषार्थ , पराक्रम की चर्चा फलित ज्योतिष में तीसरे भाव से की जाती है। इंदिरा गॉधी का कोई सहोदर भाई या बहन नहीं था , परंतु उनके सहयोगियों की कोई कमी नहीं थी ,उनके पुरुषार्थ और पराक्रम पर भी किसी को संदेह नहीं था। भाई-बहन की संख्या का यहॉ कोई प्रयोजन नहीं है , जिनके सहयोग के लिए सहयोगी हाथों की संख्या लाखों और करोड़ों में थी।

आप कितने शक्तिशाली हैं , आपके कितने सहयोगी हैं ,इसकी चर्चा से कहीं उत्कृष्ट चर्चा यह होगी कि सहयोगी तत्वों के सृजन और उसे बनाए रखने की क्षमता आपमें कितनी है ? आपके पुरुषार्थ और पराक्रम से प्रभावित होकर आपके अनुयायियों की संख्या कितनी हो सकती है ? आपके सहयोगी या अनुयायी भी समय और स्थान के सापेक्ष कभी सैकड़ों , कभी हजारों और कभी लाखों में हो सकते हैं , परंतु ये सभी सहयोगी विपरित परिस्थितियों के उत्पन्न होने पर सहयोगी सिद्ध नहीं हो सकते हैं। हो सकता है , भाइयों की संख्या पॉच होने के बावजूद कोई काम न आए। अत: फलित ज्योतिष के लिए किसी भी परिस्थिति में संख्या बताना बहुत ही कठिन , कुछ हद तक असंभव है। जो संख्या बताने का दावा करते हैं , वे किसी न किसी प्रकार से लोगों को बेवकूफ बनाकर उसे विश्वास में लेने की चेष्टा करते हैं। इस तरह धनवान होने की बात कही जा सकती है , किसी भी हालत में नोटों की संख्या नहीं बतलायी जा सकती। स्पेकुलेशन से धन कमाने की बात कही जा सकती है , लेकिन लॉटरी के टिकट नंबर को नहीं बतलाया जा सकता । जो लॉटरी का नंबर बतलाकर लोगों को गुमराह करते हैं, वे अपने भाग्योदय के लिए लॉटरी का नंबर क्यो नहीं खोज पाते ? इसी तरह संपत्ति से संबंधित सुख और नाम यश की भविष्यवाणी की जा सकती है ,मकानों, दुकानों , सवारियों , खेतों , बागों की संख्या बता पाना फलित ज्योतिष की सीमा के अंदर नहीं आता ।
20वीं शताब्दी के मध्य में जब हमलोग हेाश ही रहें थे ,कई बार ऐसे सुयोग आए , 45-50 की उम्र के दंपत्ति को बाजे-गाजे के साथ वैवाहिक बंधन में बंधते देखा। बात समझ में हीं आ रही थी क्योंकि उस समय लोग किशोरावस्था के प्रारंभ में ही वैवाहिक बंधन में बंध जाते थे। मैने कौतुहलवश जब किसी से पूछा तो मुझे बताया गया कि वे शादी नहीं कर रहें हैं वरन् वैवाहिक जीवन की सफलता पर उत्सव मना रहे हैं। मैेने जब उनसे वैवाहिक जीवन के सफल होने के आधार के बारे में पूछा तो मालूम हुआ कि उक्त दम्पत्ति के पुत्र-पुति्रयों की संख्या 21 हो गयी है। उन दिनों उस इलाके में वैवाहिक जीवन की सफलता का मापदण्ड यही था। बाद में जब कुछ बड़ा हुआ तो पाया कि मेरे कई हमउम्रो के कुल भाई-बहन 11-12 की संख्या में थे। किसी को हमलोग फुटबॉल टीम या फिर पूरा दर्जन कहते थे ,क्योंकि आधे दर्जन की तो भरमार थी और इस सिलसिले को बहुत हद तक हमलोगों ने भी ढोया।

किन्तु इस जनसंख्या-वृिद्ध के दुष्प्रभाव को सबने महसूस किया और 20वीं शताब्दी के चतुर्थ चरण के प्रारंभ में श्रीमती इंदिरा गॉधी द्वारा परिवार नियोजन की आवाज को बुलंद किया गया। जोर-जबर्दस्ती से इस कार्यक्रम को चलाने के आरोप में उनकी सरकार भले ही ध्वस्त हो गयी हो , परंतु सीमित परिवार की आवश्यकता को धीरे-धीरे सभी ने स्वीकार किया। आज भारत की आबादी एक अरब से अधिक है तथा विश्व की 7 अरब के लगभग , अधिकांश देश अपनी मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने में अक्षम दिखाई दे रहें हैं। विकासशील देशों की सबसे बडी समस्या उसकी बढ़ती हुई आबादी है। विकसित और अविकसित सभी देशों में `हम दो : हमारे दो´ का नारा बुलंद है। जो इससे भी अधिक प्रगतिशील विचारधारा के हैं , वे `हम दो : हमारे एक´ की बात को चरितार्थ कर रहें हैं।

उपरोक्त परिप्रेक्ष्य को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि ग्रहों के साथ संतान की संख्या को जोड़ने की कोिशश निरर्थक सिद्ध होगी। आज भी कई ग्रह संतान स्थान में स्थित हो सकते हैं और अपनी क्षमता के अनुसार सिद्धांतत: संतान प्रदान करने की बात को सही सिद्ध करना चाहे तो अतीत के लिए कुछ जोड़-तोड़ के साथ ये नियम सही भी हो सकते थे परंतु आज ग्रह-बल के अनुरुप संतान-प्राप्ति की संख्या की बात निष्फल हो जाएगी। अत: इस संदर्भ में यही कहना उचित होगा कि अधिक से अधिक ग्रह सतंान भाव में मौजूद हो तो उस व्यक्ति को संतान सुख की प्राप्ति होती रहेगी । उसकी संतान का बहु-आयामी विकास होगा और हर काल में संतान-सुख की प्राप्ति होती रहेगी। वास्तव में सुख के साथ संतानसंख्या का कोई संबंध नहीं है। ` एकश्चन्द्रस्तमो हन्ति नच तारागणोपिच। ´
इसी प्रकार सप्तम भाव में स्थित ग्रहों को देखकर बहुत से पंडित एकभार्या , द्विभार्या या बहुभार्या योग की चर्चा करते हैं। इस पद्धति को भी गलत समझा जाना चाहिए। बहुत अधिक बलवान धनात्मक ग्रह की सप्तम भाव में उपस्थिति भोग-विलास ,सहवास की तीव्रता, तदनुरुप कार्यकलाप , कामकला में निपुणता , इससे संबंधित भावाभिव्यक्ति , नृत्यकला , अभिनय कला आदि का संकेतक होती है। कोई जरुरी नहीं है कि विलासिता की संतुिष्ट के लिए पित्नयों या भार्याओं की संख्या अधिक हो।

भगवान श्रीकृष्ण की जन्मकुंडली में सप्तम भाव में एक भी ग्रह नहीं हैं या कुछ ग्रंथों में इनकी जन्मकुंडली में एकमात्र ग्रह स्वक्षेत्रीय मंगल सप्तम भाव में विराजमान है। फिर भी हजारों गोपियॉ उनकी प्रेमिका थी। राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन की जन्मकुंडलियों में सप्तम भाव में बहुत सारे ग्रह स्थित हैं । राजेश खन्ना को एक ही पत्नी मिली और ंउसके साथ भी सार्वकालीक निर्वाह नहीं हो सका। अमिताभ बच्चन एक पत्नी से ही सुखी दाम्पत्य जीवन जी रहें हैं , हालॉकि यह माना जा सकता है कि अभिनेता होने के नाते उन दोनों ने बहुत सुंदरियों के साथ भोग-विलास किया हो । उपरोक्त चर्चा से भी यह स्पष्ट होता है कि फलित ज्योतिष प्रवृत्तियों का विज्ञान है। किसी खास प्रवृत्ति की तीव्रता की चर्चा की जा सकती है , उसकी संख्या या मात्रा को निर्धारित नहीं किया जा सकता ।

फलित ज्योतिष से मनुष्य की इच्छा-शक्ति , बौिद्धक शक्ति , मंत्रणा-शक्ति , साहस , सूझ-बूझ , तेज , बड़प्पन , विश्वास , साख , दृढ़ता , पराक्र्रम , संघषZ-क्षमता , प्रभाव , मानवीय पक्ष , भाग्यवादी दृिष्टकोण , सामाजिक-राजनीतिक वातावरण , पद-प्रतिष्ठा प्राप्ति की संभावनाओं , धन-लाभ और आय-व्यय की प्रवृत्तियों की तीव्रता की चर्चा की जा सकती है , उसकी मात्रा का शािब्दक विवरण प्रस्तुत किया जा सकता है , किन्तु संख्या का उल्लेख कदापि नहीं किया जा सकता। ग्रहों के विद्युत-चुम्बकीय किरणों या कॉिस्मक तरंगों से हम प्रभावित हैं , उसकी तीव्रता की माप ग्रेड या श्रेणी में की जा सकती है । तत्संबंधित प्रवृत्तियों की तीव्रता की जानकारी अधिक से अधिक प्रतिशत में निकाली जा सकती है , किन्तु इनकी प्रतिशत तीव्रता को देखकर किसी भी संख्या का आकलण करना मूर्खता ही होगी । एक व्यक्ति में धन-संचय की प्रवृत्ति अपनी पराकाष्ठा पर हो तो इसका मतलब यह कदापि नहीं कि वह व्यक्ति विश्व का सबसे धनाढ्य आदमी है और हर काल में वह धनाढ्य ही बना रहेगा। पराकाष्ठा की तीव्रता से संबंधित योग भिन्न-भिन्न ग्रहों के साथ सैकड़ों बार बनेगा और भिन्न-भिन्न ग्रहों से उसके संपर्क को देखते हुए भिन्न-भिन्न काल में उसके स्वरुप में धनात्मक या ऋणात्मक परिवत्र्तन हो सकता है। संख्या की चर्चा फलित ज्योतिष में वैज्ञानिक प्रतीत नहीं होता।

शुक्रवार, 15 अगस्त 2008

ज्योतिषियों से विनम्र निवेदन

केवल शब्दजाल या अंधविश्वास नहीं

सभी व्यक्तियों को भविष्य की जानकारी की इच्छा होती है, अतः फलित ज्योतिष के प्रति जिज्ञासा और अभिरुचि अधिसंख्य के लिए बिल्कुल स्वाभाविक है। फलित ज्योतिष एकमात्र विद्या है , जिससे समययुक्त भावी घटनाओं की जानकारी प्राप्त की जा सकती है, इसी विश्वास के साथ जहा एक ओर आधी आबादी राशिफल पढ़कर संतुष्ट होती है, वहीं दूसरी ओर बुद्धिजीवी वर्ग फलित ज्योतिष में इसके वैज्ञानिक स्वरुप को नहीं पाकर इसकी उपयोगिता पर संशय प्रकट करते हैं। फलित ज्योतिष परंपरागत ढंग से जिन रहस्यों का उद्घाटन करता है , उनका कुछ अंश सत्य को कुछ भ्रमित करनेवाला पहेली जैसा होता है। इस कारण लोग एक लम्बे अर्से से फलित ज्योतिष में अंतर्निहित सत्य और झूठ दोनो को ढोते चले आ रहे हैं।

यह भी ध्यातब्य है कि जो विद्या वैदिककाल से आज तक लोगों को आकर्षित करती चली आ रही है , वह केवल शब्दजाल या अंध-विश्वास नहीं हो सकती। निष्कर्षतः अभी भी फलित-ज्योतिष विकासशील विद्या है , इसका पूर्ण विकसित स्वरुप उभरकर सामने तो आ रहा है परंतु अभी भी विकास की काफी संभावनाएं विद्यमान हैं। विकास के मार्ग में कदम-कदम पर भ्रांतियां हैं। बुद्धिजीवी वर्ग ग्रहों के प्रभाव का स्पष्ट प्रमाण चाहता है , ज्योतिषी इसकी वैज्ञानिकता को सिद्ध नहीं कर पाते हैं। ग्रह-स्थिति से संबंधित कुछ नियमों का हवाला देते हुए अपने अनुभवों की अभिव्यक्ति करते हैं। एक ही प्रकार के ग्रह-स्थिति का फलाफल विभिन्न ज्योतिषी विभिन्न प्रकार से करते हैं , जो संदेह के घेरे में होता है। आम लोग फलित ज्योतिष से कब, कैसे, कौन, कितना का उत्तर स्पष्ट रुप से चाहते हैं , किन्तु ज्योतिष से प्राप्त उत्तर अस्पष्ट, छायावादी और प्रतीकात्मक होता है। पारभाषक जानकारी आज के प्रतियोगितावादी युग में नीति.निर्देशक नहीं हो सकती ।

संभवतः यही कारण है कि आजतक विश्व के विश्व-विद्यालयों में फलित-ज्योतिष को समुचित स्थान नहीं मिल सका है। फलित ज्योतिष का सम्यक् विकास कई कारणों से नहीं हो सका। ज्योतिषयों को भ्रांति है कि यह वैदिककालीन सर्वाधिक पुरानी विद्या या ब्रह्म विद्या है , इसमें वर्णित समग्र नियम पुराने ऋषि-मुनियों की देन है , इसलिए फलित ज्योतिष पूर्ण विज्ञान है तथा इन नियमों में किसी प्रकार के संशोधन की कोई आवश्यकता नहीं है। अतः ये फलित ज्योतिष की कमजोरियों को ढूढ़ नहीं पाते हैं। यदि कोई व्यक्ति इसकी कमजोरियों की ओर इशारा करता है तो ज्योतिषी इसे स्वीकार नहीं कर पाते हैं। ज्योतिष की कमजोरियों की अनुभूति होने पर उसकी क्षति-पूर्ति ज्योतिषी सिद्ध पुरूष बनकर करते हैं, मौलिक चिंतन और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का वे सहारा नहीं ले पाते। फलतः विकसित गणित या विज्ञान की दूसरी शाखाओं के सहयोग से वे वंचित रह जाते हैं।

दूसरी ओर भविष्य के प्रति जिज्ञासु एक ज्योतिष-प्रेमी इस विद्या को पूर्ण विकसित समझते हुए ऐसी अपेक्षा रखता है कि ज्योतिषी के पास जाकर भविष्य की भावी घटनाओं की न वह केवल जानकारी प्राप्त कर सकता है ,वरन् अनपेक्षित अनिष्टकर घटनाओं पर नियंत्रण प्राप्त करके अपने बुरे समय से छुटकारा भी प्राप्त कर सकता है। किन्तु ऐसा न हो पाने से लोगों को निराशा होती है , ज्योतिष के प्रति आस्था में कमी होती है, फलित ज्योतिष वैदिककालीन स्वदेशी विद्या है, भारतीय संस्कृति , दर्शन और आध्यात्म की जननी है, इसके विकास के लिए सरकारी कोई व्यवस्था नहीं है । प्रशासक और बुद्धिजीवी वर्ग ज्योतिष की अस्पष्टता को अंधविश्वास समझते हैं । जिन मेधावी , कुशाग्र बुद्धि व्यक्तियों को ज्योतिष के विकास में अतिशय रुचि होती है , अर्थाभाव होने से “शोध-कार्य में पूर्ण समर्पित नहीं हो पाते। इस कारण मौलिक लेखन का अभाव है , इसलिए ज्योतिष बहुत दिनों से यथास्थितिवाद में पड़ा हुआ है।

मै इसके वर्तमान स्वरूप का अंधभक्त नहीं
मुझे फलित ज्योतिष में गहरी अभिरुचि है ,परंतु मै इसके वर्तमान स्वरुप का अंधभक्त नहीं हूं । इसकी यथास्थितिवादिता वैज्ञानिक स्वरुप प्राप्त करने में सबसे बड़ी बाधा बन गयी है। मै ज्ञानपूर्वक इसमें अंतर्निहित सत्य और असत्य को स्वीकार करने का पक्षधर हूं । मै इस विषय में सत्य के साक्षात्कार से इंकार नहीं करता, इसे उभारने की आवश्यकता है , किन्तु इससे संश्लिष्ट भ्रांतियों का उल्लेख कर मैं इनका उन्मूलन भी चाहता हूं, ताकि यह निःसंकोच बुद्धिजीवी वर्ग को ग्राह्य हो, इसे जनसमुदाय का विश्वास प्राप्त हो सके। कुछ भ्रांतियों की वजह से फलित ज्योतिष की लोकप्रियता घट रही है , यह उपहास का विषय बना हुआ है।
ज्योतिषियों से विनम्र निवेदन

ब्लाग को पढ़ाने से पूर्व ही प्रबुद्ध ज्योतिषियों से विनम्र निवेदन करना चाहूंगा कि एक ज्योतिषी होकर भी मैने फलित ज्योतिष की कमजोरियों को केवल स्वीकार ही नहीं किया , वरन् आम जनता के समक्ष फलित ज्योतिष की वास्तविकता को यथावत रखने की चेष्टा की है। मेरा विश्वास है कि कमजोरियों को स्वीकार करने पर जटिलताएं बढ़ती नहीं , वरन् उनका अंत होता है। फलित ज्योतिष की कमजोरियों को उजागर कर ज्योतिष के इस अंग को मै कमजोर नहीं कर रहा हं , वरन् इसके द्रुत विकास और वैज्ञानिक विकास के मार्ग को प्रशस्त करने की कोिशश कर रहा हूं। बहुत सारे ज्योतिषी बंधुओं को कष्ट इस बात से पहुंच सकता है कि परंपरागत बहुत सारे ज्योतिषीय नियमों को अवैज्ञानिक सिद्ध कर देने से ज्योतिष-शास्त्र में अकस्मात् शून्य की स्थिति पैदा हो जाएगी।

केवल ज्योतिष कर्मकाण्ड में लिप्त रहनेवाले विद्वानों को घोर असुविधाओं का सामना करना पड़ेगा , कुछ आर्थिक क्षति भी हो सकती है , किन्तु यदि हम सचमुच ही फलित ज्योतिष का विकास चाहते हैं , तो इस प्रकार के नुकसान का कोई अर्थ नहीं है। आम ज्योतिषियों के लिए यह काफी अपमान का विषय है कि जिस विषय पर हमारी आस्था और श्रद्धा है , जिस विषय पर हमारी रुचि है , उसे समाज का बुिद्धजीवी वर्ग अंधविश्वास कहता है। दो-चार की संख्या में पदाधिकारीगण ज्योतिष पर विश्वास भी कर लें, इसपर अपनी रुचि प्रदिशZत कर ले , इससे भी बात बननेवाली नहीं है , क्योकि वे सार्वजनिक रुप से इस विद्या की वकालत करने में कहीं-न-कहीं से भयभीत होते हैं। अत: आज विश्व के विश्वविद्यालयो में इसे उचित स्थान नहीं प्राप्त है। इसकी वैज्ञानिकता पर लोगों को विश्वास नहीं है। प्रबुद्ध ज्योतिषी भी इसकी वैज्ञानिकता को सिद्ध नहीं कर पाते हैं। ऐसी स्थिति में इस विद्या के प्रति संदेह अनावश्यक नहीं है।

आज आवश्यक है , हम ज्योतिष की कमजोरियों को सहज स्वीकार करते हुए इसके वैज्ञानिक पहलू का तेज गति से विकास करें। बहुत ही निष्ठुर होकर मैं फलित ज्योतिष की कमजोरियों को जनता के समक्ष रख रहा हूं । परंपरागत ज्योतिषी इसका भिन्न अर्थ न लें। ऐसा करने का उद्देश्य केवल यही है कि मै फलित ज्योतिष में किसी प्रकार की कमजोरी नहीं देखना चाहता हंं। विश्वविद्यालय इसकी वैज्ञानिकता को कबूल करे , इसे अपनाकर इसके प्रति सम्मान प्रदिशZत करें । जबतक इसे वैज्ञानिक आधार नहीं प्राप्त हो जाता, तबतक इसके अध्ययेता और प्रेमी आदर के पात्र हो ही नहीं सकते। अत: अवसर आ गया है कि सभी ज्योतिषी इसके वैज्ञानिक और अवैज्ञानिक अध्याय पर ठंडे दिमाग से सूझ-बूझ के साथ विचार करें तथा इसे विज्ञान सिद्ध करने में कोई कसर न रहने दें। अपनी कमजोरियों को वही स्वीकार कर सकता है , जो बलवान बनना चाहता है। अकड़ के साथ कमजोरियों से चिपके रहने वाले व्यक्ति को अज्ञात भय सताता है। वे ऊंचाई की ओर कदापि प्रवृत्त नहीं हो सकते।

यह ब्लाग ज्योतिष-प्रेमियों को फलित ज्योतिष की कमजोरियों की ओर झॉकने की प्रवृत्ति का विकास करेगी तथा साथ ही साथ उनके उत्साह को बढ़ाने के लिए फलित ज्योतिष के कई नए वैज्ञानिक तथ्यों की जानकारी भी प्रदान करेगी । इस पुस्तक के माध्यम से मै विश्व के समस्त ज्योतिष प्रेमियों को यह संदेश देना चाहता हंू कि वे फलित ज्योतिष की त्रुटियों से छुटकारा पाने में अपने अंत:करण की आवाज को सुनें। ज्योतिषीय सिद्धांतों और नियमों को ऋषि-मुनियों या पूर्वजों की देन समझकर उसे ढोने की प्रवृत्ति का त्याग करें। जो सिद्धांत विज्ञान पर आधारित न हो , उसका त्याग करें तथा जो नियम विज्ञान पर आधारित हों, उनको विकसित करने में तल्लीन हो जाएँ


विश्वविद्यालयों द्वारा स्वीकृति पाना आवश्यक

भौतिक विज्ञान , रसायन विज्ञान , गणित या अन्य विज्ञानों के विभाग में लाखों विद्यार्थी नियमपूर्वक पढ़ाई कर रहें हैं और इसे सीखने में गर्व महसूस कर रहें हैं। ऐसा इसलिए हो पा रहा है कि इन विषयों को विश्वविद्यालय में मान्यता मिली हुई है। फलित ज्योतिष विश्वविद्यालयों द्वारा स्वीकृत नहीं है इसलिए इसे कोई पढ़ना नहीं चाहता । इसे पढ़कर इस भौतिकवादी युग में किस उद्देश्य की पूर्ति हो पाएगी ? केवल अंत:करण के सुख के लिए इसे पढ़ने का कार्यक्रम कबतक चल सकता है ? कबतक ज्योतिषियों कों फलित ज्योतिष की वैज्ञानिकता को प्रमाणित करने के लिए तर्क-वितकोZ के दौर से गुजरना होगा ? आज भी संसार में ऐसे लोगों की कमी नहीं , जो नि:स्वार्थ भाव से फलित ज्योतिष के विकास और इसे उचित स्थान दिलाने की दिशा में कार्यरत हैं ,किन्तु जाने-अनजाने उनकी सारी शक्ति ` विंशोत्तरी दशा पद्धति ´ में उलझकर रह गयी है। ग्रह-शक्ति के सही सूत्र को भी प्राप्त कर पाने में वे सफल नहीं हो सके हैं। मेरा विश्वास है कि यदि आप यह ब्लाग गंभीरतापूर्वक पढ़ेंगे तो नििश्चत रुप से समझ पाएंगे कि फलित ज्योतिष का विकास अभी तक क्यों नहीं हो सका ?

झाड़झंखाड़ों को काटकर बनाया गया है एक सुंदर पथ

इस दिशा में शौकिया काम करनेवालों को यह जानकर अत्यधिक प्रसन्नता होगी जब उन्हें मालूम होगा कि फलित ज्योतिष के सिद्धांत , नियम और उपनियमों के घने बीहड़ जंगलों में जहॉ वे भटकाव की स्थिति में थे , अब झाड़-झंखाड़ों को काटकर एक सुंदर पथ का सृजन किया जा चुका है , लेकिन मै भयभीत हंू यह सोंचकर कि कहीं अतिपरंपरावादी ज्योतिषी जो भटकावपसंद थे , कहीं मुझपर आरोप न लगा बैठे कि मैने उनके सुंदर जंगलों को नष्ट कर दिया है क्योकि मेरे एक लेख को पढ़कर एक विद्वान ज्योतिषी ने मेरे ऊपर इस प्रकार का आरोप लगाया था।-
वह नहीं नूतन , जो पुरातन की जड़ हिला दे।
नूतन उसे कहूंगा , जो पुरातन को नया कर दे।
ज्योतिषी बंधुओं , पुरातन को हिलाना मेरा उद्देश्य नहीं है , लेकिन कुछ नियमों और सिद्धांतों को ढोते-ढोते आप स्वयं हिलने की स्थिति में आ गए हैं , आप थककर चूर हैं , आप हजारो बार इस निष्कषZ पर पहुंचते हैं कि इन नियमों में कहीं न कहीं त्रुटियॉ हैं , फलित ज्योतिष के विकास में ठहराव आ गया है। इससे बचने के लिए पुराने का पुनमूZल्यांकण और नए नियमों का सृजन करना ही होगा ,अन्यथा हम सभी उपेक्षित रह जाएंगे। प्रस्तुत पुस्तक इस दिशा में काफी सहयोगी सिद्ध होगी। अंत में मै पुन: सभी ज्योतिषियों से क्षमा मॉगता हंू । सही समीक्षा के द्वारा फलित ज्योतिष का ऑपरेशन किया गया है , इससे कई लोगों की भावनाओं को चोट भी पहुंच सकती है , किन्तु मेरी कलम से लोग आहत हों ,यह उद्देश्य कदापि मेरा नहीं है। मुझे आप सबों के सहयोग की आवश्यकता है। इस पढ़ने के बाद किसी बिन्दु पर संशय उत्पन्न हो तो निस्संकोच पत्राचार करें .

शनिवार, 9 अगस्त 2008

ज्योतिषियों के लिए चुनौती भरे कुछ प्रश्न

ज्योतिषियों के समक्ष निम्नांकित प्रश्न पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से चुनौतियों के रुप में अक्सर रखे जाते हैं , जिनका समुचित उत्तर दिए बिना फलित ज्योतिष को कदापि विश्वसनीय नहीं बनाया जा सकता है।

राशि या लग्‍नफल का औचित्‍य

विश्व की आबादी छः अरब है ,एक राशि के अंतर्गत 50 करोड़ व्यक्ति आते हैं। क्या एक राशि या लग्न के लिए लिखे गए फल करोड़ों व्यक्तियों के लिए सही हैं ? अगर लिखा गया फल सही है तो एक ही राशि के एक व्यक्ति का जिस दिन अच्छा होता है , उसी राशि के दूसरे व्यक्ति के लिए वह दिन बुरा क्यों होता है ? अगर फल सही नहीं है तो इतनी बड़ी आबादी को राशि-फल में उलझाए रखने का औचित्य क्या है ?

राहू और केतु क्‍या हैं

राहू-केतु आकाश में कोई आकाशीय पिंड या ग्रह नहीं हैं । ये दोनो महज दो विन्दु हैं ,जिनपर सूर्य और चंद्रमा का वृत्ताकार यात्रा-पथ एक-दूसरे को काटता है। ये पिंड नहीं होने के कारण ग्रहों की तरह शक्ति उत्सर्जित करनेवाले शक्ति-स्रोत नहीं हैं , फिर भी आजतक ज्योतिषी लोगों के बीच इसके भयानक प्रभाव की चर्चा करते क्यों चले आ रहें हैं ? लोग राहू-केतु को पाप-ग्रह समझकर इनसे क्यों डरते हैं ?

क्‍या ग्रह सचमुच प्रभावी है ?

करोड़ों-अरबों मील की दूरी पर स्थित ग्रह सचमुच जड़-चेतन पर प्रभाव डालता है ? अगर प्रभावित करता है तो किस विधि से प्रभावित करता है ? अगर इस दिशा में किसी प्रकार की खोज है तो उसका स्वरुप क्या है ? फलित ज्योतिष का वैज्ञानिक आधार क्या है ? क्या ग्रहों का मानव-जीवन पर प्रभाव है ?

क्‍या एक लग्‍न और समान ग्रह स्थिति में जन्‍म लेनेवालों का सबकुछ निश्चित होता है ?

क्या लग्न-सापेक्ष ग्रह-स्थिति के अनुसार जन्म लेनेवाले व्यक्ति की कार्यशैली, दृष्टिकोण, शील, स्वभाव, संसाधन और साध्य निश्चित होता है ? एक लग्न में जन्म लेनेवाले व्यक्तियों की संख्या हजारों में होती हैं, अगर सभी का स्वभाव ,कार्यक्रम और साध्य एक होता तो महात्मा गाधी और जवाहरलाल नेहरु के साथ पैदा होनेवाले व्यक्ति या व्यक्तियों से संसार अपरिचित क्यों है ?

भविष्‍य बनाया जाए या भविष्‍य देख जाए ?

गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कर्मवादी होने का उपदेश दिया है , जबकि फलित ज्योतिष भावी घटनाओं की जानकारी देकर अकर्मण्यता को बढ़ावा देता है। सवाल यह उठता है कि ग्रहों के प्रभाव और प्रारब्ध पर विश्वास किया जाए या कर्मवादी बना जाए ? उस जानकारी से क्या लाभ जो विश्व को अकर्मण्य बना दे ? भवितव्यता होकर रहेगी तो मनुष्य की इच्छाशक्ति और नैतिकता की क्या भूमिका होगी ? जो होना है, वही होगा , उसे हम बदल नहीं पाएंगे तो उस जानकारी से क्या लाभ हो सकता है ?

क्‍या भावी अनिष्‍टकर घटनाओं को टाला जा सकता है ?

क्या भावी अनिष्टकर घटनाओं को टाला जा सकता है ? राम और युधिष्ठिर को बनवासी बनकर रहना पड़ा , हरिश्चंद्र श्मशान-घाट में चैकीदारी करने को विवश हुए , महाराणा प्रताप बहुत दिनों तक जंगल में भटकते हुए घास की रोटी खाने को मजबूर हुए । अभिप्राय यह है कि बुरे ग्रह का प्रभाव हर व्यक्ति के जीवन में देखा गया। सभी के गुरु आध्यात्मिक स्तर पर काफी ऊंचाई के थे , निश्चित रुप से बुरे ग्रहों के अनिष्टकर प्रभाव से छुटकारा पाने के लिए तंत्र , मंत्र , यंत्र , पूजा-पाठ , प्रार्थना , रत्न-धारण , आदि का सहारा लिया गया होगा। आज के ज्योतिषी भले ही बुरे ग्रहों के प्रभावी समय की भविष्यवाणी करने में विफल हो जाएं , उनका इलाज करने में सफलता का दावा करते हैं। क्या ग्रहों के प्रभाव और रत्नों के प्रभाव के बीच परस्पर संबंध को सिद्ध करने के लिए एक प्रयोगशाला की आवश्यकता नहीं है ? कहीं तंत्र , मंत्र ,यंत्र , पूजा-पाठ , प्रार्थना की तरह रत्न-धारण भी स्वान्तः सुखाय मनोवैज्ञानिक इलाज तो नहीं है ?

सप्‍ताह के दिनों का ज्‍योतिष में महत्‍व

सप्ताह के अन्य दिनों की तरह रविवार को सूर्य की गति और स्थिति में कोई अंतर नहीं होता , फिर ज्योतिषी रविवार को रवि के प्रभाव से कैसे जोड़ देते हैं ? क्या सप्ताह के सात दिनों के नामकरण की ग्रहों के गुण-दोष पर आधरित होने की वैज्ञानिकता सिद्ध की जा सकती है ? यदि नही तो फिर दिन पर आधारित फलित और कर्मकाण्ड का औचित्य क्या है ?

शुभ मुहूर्त्‍त और यात्रा निकालने का महत्‍व

शुभ मुहूर्त और यात्रा निकालने के बाद भी किए गए बहुत सारे कार्य अधूरे पड़े रहते हैं या कार्यों की समाप्ति के बाद परिणाम नुकसानप्रद सिद्ध होते हैं । एक अच्छे मुहूर्त में लाखों विद्यार्थी परीक्षा में सम्मिलित होते हैं , किन्तु सभी अपनी योग्यता के अनुसार ही फल प्राप्त करते हैं , फिर मुहूर्त या यात्रा का क्या औचित्य है ?

शकुन अशकुन का औचित्‍य

बिल्ली के रास्ता काटने पर गाड़ी-चालक आकस्मिक दुर्घटना के भय से गाड़ी को कुछ क्षणों के लिए रोक देता है , किन्तु रेलवे फाटक पर चैकीदार के मना करने के बावजूद वह अपनी गाड़ी को आगे बढ़ा देता है । क्या यह उचित है ? क्या शकुन पद्धति या पशु-पक्षी की गतिविधि से भी भविष्य की जानकारी प्राप्त की जा सकती है ?

हस्‍तरेखा से भविष्‍य की जानकारी

हस्तरेखा पढ़कर भविष्य की कितनी जानकारी प्राप्त की जा सकती है ? क्या इसके द्वारा संपूर्ण जीवन की समययुक्त भविष्यवाणी की जा सकती है ? क्या हस्तरेखाओं को पढ़कर जन्मकुंडली-निर्माण संभव है या महज यह एक छलावा है ? क्या हस्ताक्षर से व्यक्ति की मानसिकता या चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डाला जा सकता है या उससे तिथियुक्त भविष्यवाणिया भी की जा सकती हैं ? क्या हस्ताक्षर बदलकर भविष्य बदला जा सकता है ?

वास्‍तुशास्‍त्र का महत्‍व

सभी व्यक्ति अपने भवन , संस्थान , औद्योगिक क्षेत्र के स्वरुप में वास्तुशास्त्र के अनुरुप परिवर्तन करने के बावजूद भाग्य के स्वरुप में कोई परिवर्तन नहीं कर पाता। आखिर वास्तुशास्त्र फलित ज्योतिष का ही अंग है या बुरे ग्रहों का इलाज या फिर प्राचीनकालीन भवन-निर्माण की विकसित तकनीक ?

प्रश्‍नकुडली से भविष्‍य

अथक परिश्रम से मूल कुंडली की व्याख्या करते हुए ज्योतिषी आजतक व्यक्ति के सही स्वरुप , चारित्रिक विशेषताओं और प्रतिफलन-काल को निर्धारित करने में सफल सिद्ध नहीं हो सके हैं। फिर प्रश्‍नकुंडली से वे किस कल्याण की अपेक्षा करते हैं ?

राजयोग का महत्‍व

फलित ज्योतिष में वर्णित राजयोग में उत्पन्न अधिकांश लोग न तो राजा होते हैं और न ही बड़े पदाधिकारी । अति सामान्य और गरीबी रेखा से नीचे रहनेवाले व्यक्तियों की कुंडलियों में कभी-कभी कई राजयोग दिखाई पड़ जाते हैं । ऐसी परिस्थितियों में इन राजयोगों का क्या महत्व रह जाता है ? इसका रहस्य कहीं अन्यत्र तो नहीं छिपा है ?

ग्रहशक्ति का असली रहस्‍य कहां छुपा है ?

ग्रहों के दशाकाल निर्धारण के लिए अनेक पद्धतियों का उल्लेख है। सभी पद्धतियां ऋषि-मुनियों की ही देन है। इनमें से किसे सही और किसे गलत समझा जाए ? इतनी सारी पद्धतियों के बावजूद क्या सालभर बाद घटनेवाली घटनाओं की तिथियुक्त भविष्यवाणी संभव है ? स्थान-बल, काल-बल, दिक-बल , नैसर्गिक-बल , चेष्टा-बल ,दृष्टि-बल , षडवर्ग-बल , अष्टकवर्ग-बल आदि विधियों से ग्रहशक्ति की पैमाइश किए जाने की व्यवस्था है। क्या सचमुच इन विधियों से किसी कुंडली में सबसे कमजोर और सबसे शक्तिवाले ग्रह को समझा जा सकता है या ग्रहशक्ति का रहस्य उसकी गतिज ऊर्जा ,स्थैतिज ऊर्जा तथा गुरूत्वाकर्षण-बल में अंतर्निहित हैं ?

जमाने के साथ ग्रह के प्रभाव में परिवर्तन

कुंडली के नवग्रह कभी बाल्यकाल में शादी का योग उपन्न करते थे, आज के युवा-युवती पूर्ण व्यस्क होने पर ही विवाह-बंधन में पड़ना उचित समझते हैं। ये ग्रह कभी बहुसंतानोत्पत्ति के लिए प्रेरित करते थे , आज भी वे ग्रह मौजूद हैं , किन्तु दम्पत्ति मात्र एक-दो संतान की इच्छा रखते हैं । पहले गर्भपात अवैध था ,आज इसे कानून का संरक्षण प्राप्त है। पहले लोग नौकरी करनेवालों को निकृष्ट समझते थे , आज लोग नौकरी के लिए लालायित रहते हैं । पहले वर्षा में नियमितता और प्रचुरता होती थी , आज अनिश्चिता और अनियमितता बनी हुई है। पहले लोगों का मेल-मिलाप और संबंध सीमित जगहों पर हुआ करता था , आज सभ्यता ,संस्कृति , राजनीति और बाजार का विश्वीकरण हो गया है। पहले लोग सरल हुआ करते थे , आज संत भी जटिल हुआ करते हैं। आखिर ग्रहों के प्रभाव में बदलाव है या अन्य कोई गोपनीय कारण है ?

इस ब्‍लाग में ज्‍योतिष के वास्‍तविक स्‍वरूप की चर्चा होगी

ज्योतिष से संबंधित उपरोक्त प्रश्न अक्सरहा पत्र-पत्रिकाओं में ज्योतिषियों के लिए चुनौतयों के रुप में उपस्थित होते रहते हैं । मैनें भी ऐसा महसूस किया है कि इन प्रश्न के उत्तर दिए बिना फलित ज्योतिष को प्रगति-पथ पर नहीं ले जाया जा सकता। मुझे किसी ज्योतिषी से कोई शिकायत नहीं है। सभी ज्योतिषी अपने ढंग से फलित ज्योतिष को विकसित करने की दिशा में निरंतर कार्यरत हैं , परंतु किसी की कार्यविधि से संसार को कोई मतलब नहीं है , उसे प्रत्यक्ष-फल चाहिए। ज्योतिष में ग्रहों के फलों को जिस ढंग से प्रस्तुत किया गया है , उसमें कार्य , कारण और फल में अधिकांश जगहों पर कोई समन्वय नहीं दिखाई पड़ता है। यही कारण है कि उपरोक्त ढेर सारे प्रश्न आम आदमी के मनमस्तिष्क में कौधते रहते हैं। इन प्रश्नो के उत्तर नहीं मिलने से ज्योतिषीय भ्रांतिया स्वाभाविक रुप से उत्पन्न हुई हैं। इस ब्लाग में विवेच्य प्रसंगों की सांगोपांग व्याख्या करके पाठकों को ज्योतिष के वास्तविक स्वरुप से परिचित कराने की चेष्टा होगी। ज्योतिष के वैज्ञानिक स्वरुप को उभारते हुए ग्रहशक्ति और दशाकाल निर्धारण से संबंधित नयी खोजों का संक्षिप्त परिचय दिया जाएगा। यह भी सिद्ध किया जाएगा कि ग्रहों का जड़-चेतन , वनस्पति, जीव-जन्तु और मानव-जीवन पर प्रभाव है। प्रस्तुत ब्लाग ज्योतिषयों ,बुद्धिजीवी वर्ग तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखनेवाले व्यक्तियों के लिए बहुत उपयोगी एवं सम्बल प्रदान करनेवाली सिद्ध होगी।