मंगलवार, 12 मई 2020

वार से फलित कथन अवैज्ञानिक

var in hindi

वार से फलित कथन अवैज्ञानिक

(लेखक - श्री विद्या सागर महथा)


मैं प्रत्येक मंगलवार को शैव करने या बाल बनाने के लिए सैलून जाता हूं , या कभी-कभी सैलूनवाले को ही घर पर बुलवा लेता हूं। सेलून में जो नाई रहता है , वह गंवई रिश्ते में मुझे चाचाजी कहता है। विगत दो वषोZं से मैं उससे लागातर प्रत्येक मंगलवर को शैव करवाता आ रहा हूं। एक दिन सैलूनवाला मुझसे कहता है-`चाचाजी एक प्रश्न पूछूं ?´ 

मैंने कहा -` क्यों नहीं ? खुशी से पूछ सकते हो । ´
` लोग कहते हैं , आप बहुत बड़े ज्योतिषी हो ,
,लोग कहते हैं तो मैं हो सकता हूं , पर तुझे कोई संशय है क्या ? ´
` इतने बड़े ज्योतिषी होने के बावजूद आप मंगलवार को बाल या दाढ़ी बनवाते हैं। कई लोगों का कहना है कि बृहस्पतिवार को बाल बनवाने से लक्ष्मी दूर भागती है और शनिवार मंगलवार को लागातार बाल बनवाने से बहुत ही अनिष्ट होता है। एक राजा लागातार कुछ दिनों तक इन्हीं दिनों में हजामत बनवाया करता था , जिससे कुछ दिनों बाद उसकी हत्या हो गयी थी। ´

var in hindi


वह बोलता ही जा रहा था। उसकी बातों को सुनने के बाद मैंने कहा-` किस राजा महाराजा के साथ कौन सी घटना घटी थी , यह तो मुझे मालूम नहीं और न ही मैं मालूम करना चाहता हूं। मैने मंगलवार का दिन इसलिए चयन किया क्योंकि इस दिन अंधविश्वास के चक्कर में पड़ने से लोगों की भीड़ तुम्हारे पास नहीं होती और इसलिए तुम फुर्सत में होते हो। मुझे काफी देर तक तुम्हारा इंतजार नहीं करना होता है। मेरा काम शीघ्र ही बन जाता है। आज से बहुत दिन पहले सप्ताह के दूसरे दिनों में भी तुम्हारे पास आया था। उस समय तुम्हें फुर्सत नहीं थी , तब काफी देर मुझे अखबार पढ़कर समय काटना पड़ा था। इस तरह मेरे कीमती समय की कुछ बर्वादी हो गयी थी। अब मुझे मंगलवार को बाल कटवाने में सुविधा हो जाती है। इसलिए इस दिन के साथ समझौता कर चुका हूं , सप्ताह के दूसरे दिनों में मुझे असुविधा होती है। सुयोग उसे ही कहते हैं , जब काम आसानी से बन जाए। इन कायोZं के लिए मेरे लिए बुधवार शुभ नहीं है , क्योंकि इस दिन समय की अनावश्यक बर्वादी हो जाती है , रुटीन में व्यवधान उपस्थित होता है , काम करनें का सिलसिला बिगड़ जाता है।

समाज में देखा जाए , तो अधिकांश लोग मंगलवार और शनिवार को इस तरह के कायोZं या अन्य दिनों को अन्य किसी प्रकार के कायोZं के लिए अशुभ मानते हैं। उनका ऐसा विश्वास है कि गलत दिनों में किया गया कार्य अनिष्टकर फल भी प्रदान कर सकता है। इसे कोरा अंधविश्वास ही कहा जा सकता है , क्योंकि भले ही ग्रहों के नाम पर इन वारों का नामकरण हो गया हो ,किन्तु सच्ची बात यह है कि ग्रहों की स्थिति से इन वारों का कोई संबंध है ही नहीं। न तो रविवार को सूर्य आकाश के किसी खास भाग में होता है ,और न ही इस दिन सूर्य की गति में कोई परिवत्र्तन होता है , और न ही रविवार को सूर्य केवल धनात्मक या ऋणात्मक फल ही देता है। जब ऐसी बाते है ही नही तो फिर रविवार से सूर्य का कौन सा संबंध है ? 

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि रविवार से सूर्य का कोई संबंध है ही नहीं । रविवार से सूर्य का संबंध दिखा पाना किसी भी ज्योतिषी के लिए न केवल कठिन वरन् असंभव कार्य है। सुविधा के अनुसार किसी भी बच्चे का कुछ भी नाम रखा जा सकता है , परंतु उस बच्चे में नाम के अनुसार गुण भी आ जाएं , ऐसा नििश्चत नहीं है। यथानाम तथागुण लोगों की संख्या नगण्य ही होती है , इस संयोग की सराहना की जा सकती है पर किसी व्यक्ति का कोई नाम रखकर उसके अनुरुप ही विशेषताओं को प्राप्त करने की इच्छा रखें तो यह हमारी भूल होगी । इस बात से आम लोग भिज्ञ भी हैं , तभी ही यह कहावत मशहूर है ` ऑख का अंधा , नाम नयनसुख ´ । 

इसी तरह कभी-कभी पृथ्वीपति नामक व्यक्ति के पास कोई जमीन नहीं होती तथा दमड़ीलाल के पास करोड़ों की संपत्ति होती है। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि किसी नामकरण का कोई वैज्ञानिक अर्थ हो या नाम के साथ गुणों का भी संबंध हो , यह आवश्यक नहीं है। कोई व्यक्ति अपने पुत्र का नाम रवि रख दे तथा उसमें सूर्य की विशेषताओं की तलाश करे , उसकी पूजा कर सूर्य भगवान को खुश रखने की चेष्टा करे तो ऐसा संभव नहीं है। इस तरह न तो रविवार से सूर्य का , न सोमवार से चंद्र का , मंगलवार से मंगल का , बुधवार से बुध का , बृहस्पतिवार से बृहस्पति का , शुक्रवार से शुक्र का और न ही शनिवार से शनि का ही संबंध होता है।

इसी तरह मंगलवार का व्रत करके सुखद परिस्थितियों में मन और शरीर को चाहे जिस हद तक स्वस्थ , चुस्त , दुरुस्त या विपरीत परिस्थितियों में शरीर को कमजोर कर लिया जाए , हनुमानजी या मंगल ग्रह का कितना भी स्मरण कर लिया जाए , हनुमान या मंगल पर इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रभाव नहीं पड़ता। पूजा करने से ये खुश हो जाएंगे , ऐसा विज्ञान नहीं कहता , किन्तु पुजारी ये समझ लें और बहुत आस्था के साथ पूजापाठ में तल्लीन हो जाएं , तो मनोवैज्ञानिक रुप से इसका भले ही कुछ लाभ उन्हें मिल जाए , वे कुछ क्षणों के लिए राहत की सॉस अवश्य ले लेते हैं।


कभी कभी नामकरण विशेषताओं के आधार पर भी किया जाता है और कभी कुछ चित्रों और तालिकाओं के अनुसार किया जाता है। ऋतुओं का नामकरण इनकी विशेषताओं की वजह से है , इसे हम सभी जानते हैं। ग्रीष्मऋतु कहने से ही प्रचंड गमीZ का बोध होता है , वषाZऋतु से मूसलाधार वृिष्ट का तथा शरदऋतु कहने से उस मौसम का बोध होता है , जब अत्यधिक ठंड से लोग रजाई के अंदर रहने में सुख महसूस करें। इसी तरह माह के नामकरण के साथ भी कुछ विशेषताएं जुड़ी हुई है। आिश्वन महीने का नामकरण इसलिए हुआ , क्योंकि इस महीने में अिश्वनी नक्षत्र में पूणिZमा का चॉद होता है। बैशाख नाम इसलिए पड़ा , क्योंकि इस महीने में विशाखा नक्षत्र में पूणिZमा का चॉद होता है। 

इस तरह हर महीने की विशेषता भिन्न-भिन्न इसलिए हुई ,क्योंकि सूर्य की स्थिति प्रत्येक महीने आकाश में भिन्न-भिन्न जगहों पर होती है। ज्योतिषीय दृिष्ट से भी हर महीने की अलग-अलग विशेषताएं हैं। इसी तरह शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में उजाले और अंधेरे का अनुपात बराबर बराबर होने के बावजूद एक को कृष्ण और दूसरे को शुक्ल पक्ष कहा गया है। दोनों पक्षों के मौलिक गुणों में कोई भी अंतर नहीं होता है। बड़ा या छोटा चॉद दोनो पक्षों में होता है। अष्टमी दोनों पक्षों में होती है। किन्तु ये नाम अलग ही दृिष्टकोण से दिए गए हैं । जिस पक्ष में शाम होने के साथ ही अंधेरा हो , उसे कृष्ण पक्ष और जिस पक्ष में शाम पर उजाला रहे , उसे शुक्ल पक्ष कहते हैं। 

शुक्ल पक्ष के आरंभ में चंद्रमा सूर्य के अत्यंत निकट होता है। प्रत्येक दिन सूर्य से उसकी दूरी बढ़ती चली जाती है और पूर्णमासी के दिन यह सूर्य से सर्वाधिक दूरी पर पूर्ण प्रकाशमान देखा जाता है। इस समय सूर्य से इसकी कोणिक दूरी 180 डिग्री होती है। इस दिन सूर्यास्त से सूयोZदय तक रोशनी होती है। इसके बाद कृष्ण पक्ष का प्रारंभ होता है। प्रत्येक दिन सूर्य और चंद्रमा की कोणिक दूरी घटने लगती है। इसका प्रकाशमान भाग घटने लगता है और कृष्ण पक्ष के अंत में अमावश तिथि के दिन सूर्य चंद्रमा एक ही विन्दु पर होते हैं। सूयोZदय से सूर्यास्त तक अंधेरा ही अंधेरा होता है। 

इस तरह ऋतु , महीने और पक्षों की वैज्ञानिकता समझ में आ जाती है। भचक्र में सूर्य , चंद्रमा और नक्षत्र - सभी का एक दूसरे के साथ परस्पर संबंध है , किन्तु सप्ताह के सात दिनों का नामकरण ग्रहों के गुणों पर आधारित न होकर याद रख पाने की सुविधा से प्रमुख सात आकाशीय पिंडों के नाम के आधार पर किया गया लगता है , महीनें को दो हिस्सों में बॉटकर एक-एक पखवारे का शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष बनाया गया है। दोनो ही पक्ष सूर्य और चंद्रमा की वििभ्न्न स्थितियों के सापेक्ष हैं , किन्तु एक पखवारे को दो हिस्सों में बॉटकर दो सप्ताह में समझने की विधि केवल सुविधावादी दृिष्टकोण का परिचायक है। जब सप्ताह का निर्माण ही ग्रहों पर आधारित नहीं है , तो उसके अंदर आनेवाले सात अलग अलग दिनों का भी कोई वैज्ञानिक अर्थ नहीं है।

सौरमास और चंद्रमास दोनों की परिकल्पनाओं का आधार भिन-भिन्न है। पृथ्वी 365 दिन और कुछ घंटों में एक बार सूर्य की परिक्रमा कर लेती है। इसे सौर वषZ कहतें हैं, इसके बारहवें भाग को एक महीना कहा जाता है। सौरमास से अभिप्राय सूर्य का एक रािश में ठहराव या आकाश में 30 डिग्री की दूरी तय करना होता है। चंद्रमास उसे कहते हैं , जब चंद्रमा एक बार पूरी पृथ्वी की परिक्रमा कर लेता है। यह लगभग 29 दिनों का होता है । बारह महीनों में बारह बार सूर्य की परिक्रमा करने में चंद्रमा को लगभग 354 दिन लगते हैं। इसलिए चंद्रवषZ 354 दिनों का होता है। सौर वष्र और चंद्रवषZ के सवा ग्यारह दिनों के अंतर को प्रत्येक तीन वषोZं के पश्चात् चंद्रवषZ में एक अतिरिक्त महीनें मलमास को जोड़कर पाट दिया जाता है। 

सौर वषZ में भी 365 दिनों के अतिरिक्त के 5 घंटों को चार वषे बाद लीप ईयर वषZ में फरवरी महीने को 29 दिनों का बनाकर समन्वय किया जाता है , किन्तु सप्ताह के सात दिन , जो पखवारे के 15 दिन , महीने के 30 दिन , चांद्रवषZ के 354 दिन और सौर वषZ के 365 दिन में से किसी का भी पूर्ण भाजक या अपवत्र्तांक नहीं है , के समन्वय या समायोजन का ज्योतिष शास्त्र में कहीं भी उल्लेख नहीं है , जिससे स्वयंमेव ही ज्योतिषीय संदर्भ में सप्ताह की अवैज्ञानिकता सिद्ध हो जाती है। अत: मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि रविवार को सूर्य का , सोमवार को चंद्र का , मंगलवार को मंगल का , बुधवार को बुध का , बृहस्पतिवार को बृहस्पति का , शुक्रवार को शुक्र का तथ शनिवार को शनि का पर्याय मान लेना एक बहुत बड़ी गल्ती है। ग्रहों का सप्ताह के सातो दिनों से कोई लेना-देना नहीं है।

सात दिनों का सप्ताह मानकर पक्ष को लगभग दो हिस्सों में बॉटकर सात दिनों के माध्यम से सातो ग्रहों को याद करने की चेष्टा की गयी होगी। लोग कभी यह महसूस नहीं करें कि ग्रहों का प्रभाव नहीं होता ।शायद इसी शाश्वत सत्य के स्वीकर करने और कराने के लिए ऋषि मुनियो द्वारा सप्ताह के सात दिनों को ग्रहों के साथ जोड़ना एक बड़े सूत्र के रुप में काम आया हो। एक ज्योतिषी होने के नाते सप्ताह के इन सात दिनों से मुझे अन्य कुछ सुविधाएं प्राप्त हैं। आज मंगलवार को चंद्रमा सिंह रािश में स्थित है , तो बिना पंचांग देख ही यह अनुमान लगाना संभव है कि आगामी मंगलवार को चंद्रमा वृिश्चक रािश में , उसके बाद वाले मंगलवार को कुंभ रािश में तथ उसके बादवाले मंगलवार को वृष रािश में या उसके अत्यंत निकट होगा।

इस दृिष्ट से चंद्रमा की भचक्र में 28 दिनों का चक्र मानकर इसे 4 भागों में बॉट दिया गया हो तो हिसाब सुविधा की दृिष्ट से अच्छा ही है। मंगलवार को स्थिर रािश में चंद्रमा है तो कुछ सताहों तक आनेवाले मंगलवार को चंद्रमा स्थिर रािश में ही रहेगा। कुछ दिनों बाद चंद्रमा द्विस्वभाव रािश में चला जाएगा तो फिर कुछ सप्ताहों तक मंगलवार को चंद्रमा द्विस्वभाव रािश में ही रहेगा।

मैं वैज्ञानिक तथ्यों को सहज ही स्वीकार करता हूं। पंचांग में तिथि , नक्षत्र , योग और करण की चर्चा रहती है। ये सभी ग्रहों की स्थिति पर आधारित हैं। किसी ज्योतिषी को बहुत दिनों तक अंधेरी कोठरी में बंद कर दिया जाए , ताकि महीने और दिनों के बीतने की कोई सूचना उसके पास नहीं हो । कुछ महीनों बाद जिस दिन उसे आसमान को निहारने का मौका मिल जाएगा , केवल सूर्य और चंद्रमा की स्थिति को देखकर वह समझ जाएगा कि उस दिन कौन सी तिथि है , कौन से नक्षत्र में चंद्रमा है , सामान्य गणना से वह योग और करण की भी जानकारी प्राप्त कर सकेगा , किन्तु उसे सप्ताह के दिन की जानकारी कदापि संभव नहीं हो पाएगी , ऐसा इसलिए क्योंकि सूर्य , चंद्रमा या अन्य ग्रहों की स्थिति के सापेक्ष सप्ताह के सात के दिनों का नामकरण नहीं है।


राहू-केतु का फलित पर कोई प्रभाव नहीं

rahu ketu astrology
राहू-केतु का फलित पर कोई प्रभाव नहीं




भौतिक विज्ञान किसी पिंड के सापेक्ष या उसके अस्तित्व के कारण गुरुत्वाकषZण , विद्युत-चुम्बकीय-क्षेत्र , या अन्य रुपांतरित शक्ति के स्वरुपों की व्याख्या करता है। जहॉ पिंड नहीं है , किसी प्रकार कीे शक्ति के अस्तित्व में होने की बात कही ही नहीं जा सकती। राहू-केतु आकाश में किसी पिंड के रुप में नहीं हैं। अत: इसमें अंतिर्नहित और उत्सर्जित शक्ति को स्वीकार किया ही नहीं जा सकता है । फलित ज्योतिष में राहूकेतु को कष्टकारक ग्रह कहा गया है , इससे लोग पीिड़त होते हैं। ज्योतिषियों ने इसके भयावह स्वरुप का वर्णन कर धर्मशास्त्र में उिल्लखित भगवान विष्णु की तरह ही इनके साथ उचित न्याय नहीं किया है। 


हमारे धर्मग्रंथों में जैसा उल्लेख है , छल से देवताओं की पंक्ति में बैठकर अमृतपान करते हुए राक्षस का वध श्रीविष्णु ने सुदशZनचक्र से कर दिया राक्षस के गर्दन का उपरी भाग राहू और नीचला भाग केतु कहलाया। भगवान नें ऐसा करके राक्षसी गुणों का प्रकारांतर में वध ही कर दिया था। किन्तु ज्योतिषी आज भी उसे जीवित समझते हैं और उसके भयावह स्वरुप का वर्णन करके यजमानों को भयभीत करते हैं। सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण के समय ही इनके असाधारण स्वरुप को देखकर लोगों के मस्तिष्क में यह बात कौध गयी हो कि सूर्य और चंद्रमा जैसे प्रभावशाली , प्रकाशोत्पादक , आकाशीय पिंडों के देदीप्यमान स्वरुप को निस्तेज करनेवाले ग्रहों की दुष्टता और विध्वंसात्मक प्रवृत्ति को कैसे अस्वीकार कर लिया जाए , किन्तु मेरा दृिष्टकोण यहॉ बिल्कुल ही भिन्न है। 

rahu ketu astrology


दो मित्र परस्पर टकराकर लहुलूहान हो जाएं , घायल हो जाएं ,तो इसमें उस जगह का क्या दोष , जहॉ इस प्रकार की घटना घट गयी हो। सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण यदि असाधारण घटनाएं हैं , तो इसके समस्त फलाफल की विवृत्ति सूर्य चंद्र तक ही सीमित हो , क्योंकि ये शक्तिपृंज या शक्ति के स्रोत हैं। चंद्रग्रहण के समय पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ती है और सूर्यग्रहण के समय चंद्रमा के कारण सूर्य आंिशक तौर पर या पूर्ण रुप से नहीं दिखाई पड़ता है। इस प्रकार के ग्रहण राहू केतु रेखा पर सूर्यचंद्र के पहुंचने के कारण होते हैं। इस प्रकार के ग्रहणों से किसकी शक्ति घटी और किसकी बढ़ी ,उसका मूल्यांकण किया जाना चाहिए। राहू केतु जैसे विन्दुओं को शक्ति का स्रोत समझ लेना , उन परिकल्पित विन्दुओं की शक्ति और विशेषताओं को भचक्र के किसी भाग से जोड़ देना तथ व्यक्तिविशेष के जीवन के किसी भाग से इसके मुख्य प्रतिफलन काल को जोड़ने की परिपाटी वैज्ञानिक दृिष्ट से उचित नहीं लगती। 

चंद्रमा का परिभ्रमणपथ पृथ्वी के चतुिर्दक बहुत ही छोटा है। इसकी तुलना में सूर्य के चतुिर्दक पूथ्वी का परिभ्रमणपथ बहुत ही विशाल है। यदि पृथ्वी को स्थिर मान लिया जाता है , तो चंद्रपथ की तुलना में सूर्य का काल्पनिक परिभ्रमण पथ नििश्चत रुप से बड़ा हो जाएगा। परिकल्पना यह है कि चंद्रमा और सूर्य के परिभ्रमण पथ एक दूसरे को काटते हैं , उसमें से एक विन्दु उत्तर की ओर तथा दूसरा दक्षिण की ओर झुका होता है। दोनों के परिभ्रमणपथ परिधि की दृिष्ट से एक दूसरे से काफी छोटे-बड़े हैं ,अत: इनके परस्पर कटने का कोई प्रश्न ही नहीं उपस्थित होता है , किन्तु दोनो के परिभ्रमण पथ को बढ़ाते हुए नक्षत्रों की ओर ले जाया जाए तो दोनो का परिभ्रमणपथ आकाश में दो विन्दुओं पर अवश्य कटता है। इस तरह चंद्रसूर्यपथ के कटनेवाले दोनो विन्दुओं उत्तरावनत् और दक्षिणावनत् का नाम क्रमश: राहू और केतु है।

इस तरह येे काल्पनिक विन्दु आकाश में कितनी दूरी पर है , इसका भी सही बोध नहीं हो पाता। पुन: अस्तित्व की दृिष्ट से विन्दु विन्दु ही है , इसकी न तो लंबाई है , न चौड़ाई और न ही मोटाई , इसलिए पिंड के नकारात्मक अस्तित्व तथा दूरी की अनििश्चतता के कारण फलित में राहू केतु का महत्व समीचीन नहीं लगता। किन्तु ये सूर्य और चंद्रग्रहण काल को समझने में सहायक हुए , इसलिए इन्हें ग्रह का दर्जा दे दिया गया। सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण को सूर्य चंद्रमा की युति और वियुति से अधिक महत्व नहीं दिया जा सकता। यह युति वियुति खास इसलिए मानी जा सकती है या तीव्रता में वृिद्ध की संभावना रहती है , क्योंकि यह राहूकेतु रेखा पर होती है , जो पृथ्वी के केन्द्र से होकर गुजरती है , किन्तु इस प्रकार की आकाशीय घटनाएं बहुत बार घटती हैं। सूर्य बुध और सूर्य शुक्र के ग्रहणों को भी देख चुका हूं , किन्तु इसके विशेष फलित की चर्चा युति से अधिक कहीं भी नहीं हुई है। यदि इन विशेष युतियों पर भी बात हो , इनके फलित को उजागर करने की बात हो तो आकाश में राहू केतुओ की संख्या ग्रहों से भी अधिक हो जाएगी। आकाशीय पिंडों से संबंधित भौतिक विज्ञान जिन शक्तिसिद्धांतों पर काम करता है , उन्हीं का उपयोग करके सही फल प्राप्त किया जा सकता है। राहू केतु परिकल्पित आकाशीय विन्दु हैं , अत: आकाशीय िंपड की तरह इसके फल को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

राहू केतु को ग्रह न मानकर फलित ज्योतिष से इनकी छुट्टी कर दी जाए तो विंशोत्तरी पद्धति में वणिZत राहू केतु के महादशा और अंतर्दशा का क्या होगा ? ठंडे दिमाग से काम लें तो जो राहू केतु सूर्य और चंद्र का भक्षण कर रहा था , एस्ट्रोफिजिक्स के सिद्धांत आज उसी का भक्षण कर रहें हैं। जिस प्रकार सूर्य और चंद्रमा के परिभ्रमणपथों के दो विन्दुओं पर कटने से उन परिकल्पित विन्दुओं के नाम राहू केतु पड़े , इस तरह सूर्य बुध , सूर्य शुक्र , सूर्य मंगल , सूर्य बृहस्पति , सूर्य शनि , पुन: चंद्र बुध , चंद्र मंगल , चंद्र शुक्र ,चंद्र बृहस्पति , चंद्र शनि , के परिभ्रमण पथ भी दो विन्दुओं पर कट सकते हैं , इन परिस्थितियों में इन परिकल्पित विन्दुओं के नाम राहू1 , राहू2 ,राहू3 ,,,,,,,,,,,,,,तथा केतु1 , केतु2 , केतु3 ,,,,,,,,,,,,,पड़ते चले जाएंगे। सूर्यपथ के साथ सभी ग्रहों के परिभ्रमण पथ के कटने से 9 राहू केतुओं का , चंद्रपथ के साथ अन्य ग्रहों के कटने से 8 राहू केतुओं का , इस तरह बुध के परिभ्रमण पथ पर 7 , मंगल के परिभ्रमण पथ पर 6,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,।

rahu-ketu-astrology


इस तरह यह सिद्ध हेा जाता है कि सूर्य चंद्रमा के एक ही तल में युति-वियुति ,जो पृथ्वी तल के समकक्ष होती है , की ही तरह शेष ग्रहों की युति-वियुति की संभावनाएं 44 बार बनती है। इस तरह अनेकानेक यानि 45 राहू केतुओं का आविभाZव हो जाएगा। यहॉ ध्यान देने योग्य बात ये है कि इन विशेष परिस्थितियों में युति या वियुति बनानेवाले ग्रह तत्काल या कालान्तर में अपने दशाकाल में सचमुच असाधारण परिणाम प्रस्तुत करते हैं। इन विशेष विन्दुओं के ठीक 90 डिग्री की दूरी पर दोनो तरफ दोनो के परिभ्रमणपथ सर्वाधिक दूरी पर होंगे। उस समय संबंधित दोनो ग्रहों की युति या वियुति का अर्थ ग्रहण काल की युति-वियुति के विपरीत किस प्रकार का फल प्रदान करेंगे , यह परीक्षण का विषय होना चाहिए। हर दो ग्रहों के विभिन्न परिभ्रमणपथ परस्र एक दूसरे कों काटे तो उन विन्दुओं पर उनकी युति-वियुति के फलित से 90 डिग्री की दूरी पर युति-वियुति के फलित की विभिन्नता को समझने और परीक्षण करने का दायित्व ज्योतिषियों के समक्ष उपस्थित होता है। तब ही राहू केतु विन्दुओं पर ग्रहों की युति-वियुति की विशेषताओं की पकड़ की जा सकती है। 

पृथ्वी सूर्य के चतुिर्दक परिक्रमा करती है , किन्तु जब पृथ्वी के सापेक्ष सूर्य की परिक्रमा को गौर से देखा जाए तो इसका कभी उत्तरायण और कभी दक्षिणायण होना बिल्कुल ही नििश्चत है। इसी तरह सभी ग्रहों के परिभ्रमणपथ की नियमावलि प्राय: सुनििश्चत है। ये सभी ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं , अपने पथ पर थिरकते हुए भले ही ये उत्तर-दक्षिण आवर्ती हो जाएं , क्योंकि पृथ्वी के सापेक्ष सूर्य स्वयं उत्तरायन-दक्षिणायन होता प्रतीत होता है । सभी ग्रहों की गति भिन्न-भिन्न होती है अत: विभिन्न ग्रहों के पथ मेंं विचलन परिभाषित होता रहता है। इस प्रकार किसी भी दो ग्रहों की युति-वियुति पृथ्वी तल समानांतर एक तल में एक विंदु पर या 180 डिग्री पर होती रहती है। 

सूर्य और चंद्रमा कब राहू केतु विंदु पर युति या वियुति करेंगे , इसकी नियमितता की जानकारी प्राप्त हे चुकी है , किन्तु शेष ग्रहों से संबंधित राहू केतु विंदुओं की गति की नियमितता की जानकारी गणित ज्योतिष के मर्मज्ञ ही दे सकते हैं । जनसामान्य तक इसकी जानकारी की आवश्यकता इसलिए महसूस नहीं की गयी क्योंकि शेष ग्रहों के ग्रहण न तो आकषZक होते हैं और न ही दृिष्टपटल में आ ही पाते हैं। फलित ज्योतिष में भी इसकी चर्चा युति के रुप में ही होती है , ग्रहण के रुप में नही। पृथ्वी के बहिर्कक्षीय ग्रह मंगल , बृहस्पति , शनि , यूरेनस , नेपच्यून और प्लूटो सूर्य से ग्रहण के बावजूद सूर्य के पृष्ठतल में ही रहेंगे , अत: ये पृथ्वी से दृष्ट नहीं हो सकते। अनेक राहू केतुओं की चर्चा करके मैं यही सिद्ध करना चाह रहा हूं कि फलित ज्योतिष में वणिZत इसके भयानक स्वरुप को लोग भूल जाएं। 

किसी भी दो ग्रहों के लिए ये ऐसे परिकल्पित विन्दु हैं , जहॉ पहुंचने पर इन दोनों आकाशीय पिंडों के साथ ही साथ पृथ्वी एक सीधी रेखा में होता है। इन विन्दुओं पर संबंधित ग्रहों के एक बार पहुंच जाने पर उन ग्रहों की शक्ति में भले ही कमी या वृिद्ध देखी जाए , किन्तु इस परिप्रेक्ष्य में राहू केतु के प्रभाव को अलग से दर्ज करना कदापि उचित नहीं लगता। पहले एक राहू और एक केतु से ही लोग इतने भयभीत होते थे , अब 45 राहू और केतु की चर्चा कर मैं लोगों को डराने की चेष्टा नहीं कर रह हूं , वरन् इसके माध्यम से असलियत को समझाने की चेष्टा कर रहा हूं , इस विश्वास के साथ कि इसकी जानकारी के बाद इसके जानकार इसका दुरुपयोग नहीं करेंगे। अब वे दिन लद गए , जब राहू केतु के गुणों के आधार पर भचक्र के रािशयों या नक्षत्रों पर इसके स्वामित्व की चर्चा होती थी। इनके उच्च या नीच रािश की चर्चा की जाती थी। इनके नाम पर महादशा और अंतर्दशा की चर्चा होती थी। 

सभी प्रकार की दशापद्धतियों में इनके प्रभाव की हिस्सेदारी सुनििश्चत की जाती थी। राहू केतु के सही स्वरुप कों समझ लेने के बाद यह दायित्व हम ज्योतिषियों के समक्ष उपस्थित होता है कि विभिन्न दशापद्धतियों , चाहे वह विंशोत्तरी हो या अष्टोत्तरी या परंपरागत , राहू केतु के महादशा के काल भिन्नता 18 वषZ और 7 वषZ के साथ ही साथ महादशा और अंतर्दशा आदि से संबंधित त्रुटियों को कैसें समाप्त किया जा सकेगा ? पंचांग निर्माणकत्र्ताओं को यह स्मरण होगा कि श्री संवत् 2050 शक 1915 कार्तिक कृष्ण सप्तमी शनिवार 6 नवंबर 1993 को सूर्य-बुध की भेद-युति हुई थी। इसे सूर्य बुध का ग्रहण कहा जा सकता है। भला राहू केतु के अभाव में कोई ग्रहण संभव है ?

रविवार, 10 मई 2020

ज्योतिष का वैज्ञानिक स्वरुप होना आवश्यक

Jyotish jara hatkeभविष्य की सटीक जानकारी के लिए एकमात्र विधा फलित ज्योतिष( लेखक - विद्या सागर महथा )



निस्संदेह फलित ज्योतिष वैदिक कालीन सबसे पुरानी विधा है। जिस समय कल्प , व्याकरण , छन्द , निरुक्त आदि महज कुछ ही विधा थी , फलित ज्योतिष को वेदों का नेत्र कहा जाता था। आज सभी विश्वविद्यालयों में हजारों विषयों का प्रवेश हो चुका है , अन्य विषयों की तरह गणित ज्योतिष की खगोल विज्ञान के रुप में पढ़ाई हो रही है , किन्तु फलित ज्योतिष को विश्वविद्यालय के बाहर कर दिया गया है। तर्क यह दिया जा रहा है कि करोड़ों मील दूर रहकर ग्रह पृथ्वी के जड़-चेतन को कैसे प्रभावित कर सकता है ? अगर वह प्रभावित करे भी , तो एक ही ग्रह करोड़ो व्यक्तियों पर अपना भिन्न-भिन्न प्रभाव कैसे प्रस्तुत कर सकता है ? ज्योतिषी इसे विज्ञान कहते हैं , कुछ लोग शास्त्र , तो कुछ अवैज्ञानिक कहकर इसपर भरोसा नहीं करने की सलाह देते हैं। कुछ लोगों को इस विधा से आक्रोश या चिढ़ इस बात से है कि यह लोगों को भाग्यवादी बनाता है और यथास्थितिवाद और अकर्मण्यता को बढ़ावा देता है। 


फलित ज्योतिष के पक्षधरों के अनुसार आत्मज्ञान के लिए ज्योतिष ज्ञान से बड़ा संसाधन और कुछ हो ही नहीं सकता। सभी विधाएं भूतकाल और वर्तमान काल की जानकारी दे सकती है , भविष्य की सटीक जानकारी के लिए एकमात्र विधा फलित ज्योतिष ही है । पक्ष-विपक्ष में बहुत सारी बातें हो सकती हैं , किन्तु विश्व के किसी भी विश्वविद्यालय में इसे समुचित स्थान नहीं मिलने से इसका पलड़ा कमजोर पड़ गया है। प्रगतिशील विचारधारा के लोग , जो अपने को आधुनिक समझते हैं , इसे अंधविश्वास कहने से भी नहीं चूकते। दूसरी ओर यह जानते हुए भी कि एक रािश के अंदर पृथ्वी के पचास करोड़़ लोग आते हैं , मामूली रािशफल को पढ़ने के लिए पचास प्रतिशत आबादी बेचैन रहती है। फिर वे इसे बकवास या मनोरंजन का साधन बताते हैं। आखिर ऐसी कौन सी कमजोरी है , जो फलित ज्योतिष को विश्वसनीय बनायी हुई है ?






भौतिक विज्ञान में विभिन्न प्रकार की शक्तियों का उल्लेख है। हर प्रकार की शक्ति की माप के लिए वैज्ञानिक सूत्र या शक्तिमापक इकाई है। शक्ति की माप के लिए एक संयंत्र या उपकरण है , ताकि शक्ति के स्वरुप या तीव्रता का आकलन स्पष्ट तौर पर किया जा सके। स्पीडोमीटर से बस ,ट्रेन या यान की गति का स्पष्ट बोध हो जाता है। थर्मामीटर से ताप , बैरोमीटर से हवा का दवाब , अल्टीमीटर से उड़ान के समय वायुयान की ऊंचाई ,ऑडियोमीटर से ध्वनि की तीव्रता के बारे में कहा जा सकता है। बड़ी मात्रा की विद्युत-धारा को मापने के लिए इलेक्ट्रोमीटर तथा छोटी को मापने के लिए गैल्वेनोमीटर का व्यवहार किया जाता है। लैक्टोमीटर दूध की शुद्धता को मापता है तथा रेनगेज किसी विशेष स्थान में हुई वषाZ की मात्रा की सूचना देता है। स्टॉप वाच से सूक्ष्म अवधि को रिकार्ड किया जा सकता है। उपरोक्त सभी प्रकार के वैज्ञानिक प्रकरण या संयंत्रों का निर्माण वैज्ञानिक सूत्रों पर आधारित हैं। अत: ये नििश्चत सूचना प्रदान करने में सक्षम हैं। इनसे प्राप्त होनेवाली सभी जानकारियॉ वैज्ञानिक और विश्वसनीय हैं। 

लेकिन यदि हम फलित ज्योतिष के विद्वानों से पूछा जाए कि हम ग्रह की किस शक्ति से प्रभावित हैं तथा हमारे पास उस शक्ति की तीव्रता को मापने का कौन सा वैज्ञानिक सूत्र या उपकरण है , तो इन प्रश्नों का समुचित उत्तर देना काफी कठिन होगा। पर यह सच है कि हम जबतक इन प्रश्नों के उत्तर नहीं दे सकेंगे , फलित-ज्योतिष का अनुमान का विषय मानने की बाध्यता जनसमुदाय में बनी ही रहेगी। भैतिक विज्ञान में वणिZत सभी शक्तियॉ अनुभव में भिन्न-भिन्न प्रकार की हो सकती हैं , वस्तुत: उनके मूल स्वरुप में कोई भिन्नता नहीं होती। हर घर में विद्युत-आपूर्ति हो रही है , वही विद्युत बल्ब में प्रकाश , हीटर में ताप , पंखे में गति , टेपरिकॉर्डर या स्टीरियो में संगीत का रुप धारण करता है। इस प्रकार भौतिक विज्ञान में गति , ताप , प्रकाश , चुम्बक , विद्युत घ्वनि आदि शक्ति के विभिन्न स्वरुप हैं , जिन्हे एक-से दूसरे में आसानी से परिवर्तित किया जा सकता है। संयोग से फलित-ज्योतिष के अनुसार भी आकाशीय पिंडों की जिस शक्ति से हम प्रभावित होते हैं , वे सारी शक्तियॉ भौतिक विज्ञान में वणिZत शक्तियॉ ही हैं।

सूर्य के प्रकाश और ताप को तथा चंद्रमा के प्रकाश को पृथ्वीवासी घटते-बढ़ते क्रम में महसूस करते ही हैं । सूर्य के कारण ऋतु-परिवर्तन का होना तथा दिन-रात का होना सबको मान्य है। अमावश और पूणिZमा का प्रभाव समुद्र में भी देखा जाता आ रहा है। पूणिZमा के दिन आत्महत्या या पागलपन की प्रवृत्तियों में वृिद्ध को भी लोगों ने महसूस किया है। किन्तु जब शेष ग्रहों के प्रभाव को सिद्ध करने की बारी आती है , तो ज्योतिषी प्रत्यक्ष तौर पर प्रमाण जुटा पाने में असमर्थ दिखाई देते हैं। यही बात वैज्ञानिकों , बुिद्धजीवी वर्ग के लोगों और आम लोगों के ज्योतिष पर अविश्वास करने का कारण बन जाता है। लेकिन अब वैसी बात नहीं रह गयी है , क्योंकि मुझे सभी ग्रहों के गतिज और स्थैतिज ऊर्जा के गणना की जानकारी हो चुकी है , जिससे ये पृथ्वीवासी को प्रभावित करते आ रहे हैं । 

सभी ग्रह गतिशील हैं , पृथ्वी भी गतिशील है। सभी सूर्य की परिक्रमा कर रहे हैं। अत: कोई भी ग्रह कभी पृथ्वी से काफी निकट , तो कभी काफी दूरी पर चला जाता है। पृथ्वी से ग्रहों की दूरी के घटने-बढ़ने के कारण पृथ्वी के सापेक्ष उसकी गति में भी निरंतर बदलाव होता रहता है। कोई ग्रह पृथ्वी से बहुत अधिक दूरी पर हो , तो वह अधिक गतिशील होता है। पुन: वही ग्रह पृथ्वी के जितना अधिक निकट होता है , उतना ही विपरीत गति में होता है। पृथ्वी से ग्रहों की दूरी में जबर्दस्त परिवर्तन हो , तो ग्रह की गति में भी आमूल-चूल परिवर्तन हो जाता है। अधिक गतिशील और विपरीत गति के एक ही ग्रह के जातक उस ग्रह के काल में बहुत ही आक्रामक तो दूसरा बहुत ही दैन्य परिस्थितियों से संयुक्त होता है। संक्षेप में पृथ्वी से ग्रह की दूरी के बदलने से गति में बदलाव आता है और गति के बदलने से विद्युत-चुम्बकीय परिवेश में स्वत: ही बदलाव आता है।

एक साधारण उदाहरण से इस असाधारण तथ्य को समझने की चेष्टा की जा सकती है। सूर्य से मंगल की दूरी 22.7 करोड़ किलोमीटर है और पृथ्वी से सूर्य की दूरी 15 करोड़ किलोमीटर। पृथ्वी और मंगल दोनो ही सूर्य की परिक्रमा करते हैं। जब सूर्य के एक ही ओर पृथ्वी और मंगल दोनों होते हैं , तो दोनों के बीच की दूरी 22.7–15 = 7.7 करोड़ किलोमीटर होती है। किन्तु जब सूर्य पृथ्वी और मंगल के बीच हो अथाZत् सूर्य के एक ओर पृथ्वी तथा दूसरी ओर मंगल हो , तो पृथ्वी से मंगल की दूरी बढ़ जाती है और यह दूरी 22.7+15=37.7 करोड़ किलोमीटर हो जाती है। इस तरह पृथ्वी से मंगल की न्यूनतम और अधिकतम दूरी का अनुपात 1:5 हो जाता है। पहली अवस्था में मंगल अत्यधिक वक्र गति में , तो दूसरी अवस्था में अत्यधिक गतिशील मार्गी गति में होता है। मंगल की तरह ही कोई भी ग्रह पृथ्वी से अधिकतम नजदीक होने पर अधिकतम वक्र गति में तथा अधिकतम दूरी पर स्थित होने पर अतिशीघ्री मार्गी गति में होगा। गति में बदलाव होते रहने से पृथ्वी के परिवेश में ग्रहों के विद्युतचुम्बकीय क्षेत्र और इसकी तीव्रता में बदलाव आता रहता है।

जैसा कि मैंने पहले ही कहा है , सभी प्रकार की शक्तियॉ मूल रुप से एक ही हैं अत: ग्रहों के अधिक दूरी पर होने या अधिक नजदीक होने पर भिन्न-भिन्न प्रकार की शक्ति तरंगों की उत्पत्ति होती है , उसका वैज्ञानिक नामकरण जैसे भी किया जाए। पृथ्वी से अधिक दूरी पर रहनेवाला ग्रह अधिक गतिशील होता है , अत: इस प्रकार के ग्रह में गतिज उर्जा अधिक होती है। पुन: पृथ्वी के अधिक निकट रहनेवाला ग्रह वक्र गति में होता है , अत: वह ऋणात्मक गतिज उर्जा से संयुक्त होता है। किन्तु पृथ्वी से औसत दूरी पर रहनेवाले ग्रह औसत गर्ति में होते हैं। इनमें गतिज उर्जा की कमी तथा स्थैतिज ऊर्जा की अधिकता होती है। कोई भी ग्रह वक्री या मार्गी तिथि के आसपास शत-प्रतिशत स्थैतिज ऊर्जा से संयुक्त होता है। 

गतिज उर्जा के ग्रहों से संयुक्त जातक उस ग्रह के काल में सहज-सुखद परिस्थितियों के बीच से गुजरता है उस समय उनमें किसी प्रकार की जवाबदेही नहीं होती , परिवेश उसे भाग्यवान सिद्ध कर देता है। इस प्रकार के जातक सिर्फ अधिकार को समझते हैं , कर्तब्य से उन्हें कोई मतलब नहीं होता। ऋणात्मक गतिज उर्जा वाले ग्रहों से संयुक्त जातक उस ग्रह के काल में विपरीत कठिन परिस्थितियों के बीच से गुजरते हैं , ग्रहों से संबंधित भावों की जवाबदेही में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं होती , परिवेश से ही दैन्य होते हैं , हर समय किंकर्तब्यविमूढ़ता की स्थिति होती है। किन्तु स्थैतिक उर्जा से संयुक्त जातक निरंतर काम करने में विश्वास रखते हैं , फल की चिन्ता कभी नहीं करतें , समन्वयवादी होते हैं , अपने सुख आराम की चिन्ता कभी नहीं करतें , दृिष्टकोण में व्यापकता और विराटता होती है।

उपरोक्त विवेचना से यह स्पष्ट हो जाता है कि भौतिक विज्ञान में उिल्लखित सभी प्रकार की शक्तियॉ ही वस्तुत: ग्रहों की शक्तियॉ हैं। किन्तु जिस समय फलित ज्योतिष विकसित हो रहा था , उस समय भौतिक विज्ञान में ऊर्जा से संबंधित सिद्धांतों का विकास नहीं हो पाया था। अत: फलित ज्योतिष को विकसित करनेवाले चिन्तक , ऋषि ,महर्षि , ग्रहों की शक्ति को उसकी विभिन्न स्थितियों में ढंूढ़ने की चेष्टा कर रहें थे। ग्रहों की शक्ति को समझने के लिए आज तक भौतिक विज्ञान के नियमों का इस्तेमाल नहीं किया जा सका , अत: फलित ज्योतिष अभी तक अनुमान का विषय बना हुआ है।

मुझे यह सूचित करते हुए हषZ हो रहा है कि ग्रहबल को समझने की इस वैज्ञानिक विधि की सूझ अकस्मात् कुछ घटनाओं के अवलोकन के पश्चात् सन् 1981 में मेरे मस्तिश्क में कौंधी और सन् 1987 तक विभिन्न ग्रहों के विभिन्न प्रकार की शक्तियों को समझने की चेष्टा करता रहा। इसके पूर्व एक नई गत्यात्मक दशा पद्धति, जिसकी बुनियाद सन् 1975 में रखी गयी थी , में ग्रहशक्ति की तीव्रता को इसमें सिम्मलित कर देनें से पूर्णता आ गयी। किसी भी व्यक्ति के जीवन की सफलता-असफलता , सुख-दुख , बढ़ते-घटते मनोबल तथा व्यक्ति के स्तर को लेखाचित्र में जीवन के विभिन्न भागों में अनायास दिखाया जाना संभव हो सका। इस पद्धति से किसी विशेष उम्र में जातक की मन:स्थिति , उसके कार्यक्र्र्र्रम और उसके समस्त परिवेश को आसानी से समझा जाना भी संभव हो सका। 

लेख के आरंभ में मैनें ग्रहशक्ति को मापने के लिए एक संयंत्र या उपकरण की आवश्यकता की चर्चा की थी , इसके लिए मुझे बहुत अधिक भटकना नहीं पड़ा। संपूर्ण ब्रह्मांड की बनावट अपने आपमें परिपूर्ण है। ग्रहों की शक्ति को निधािZरत करने का यंत्र भी मुझे यहीं दिखाई पड़ा। मैनें देखा कि जब सूर्य चंद्र अमावश के दिन युति कर रहे होते हैं , चंद्रमा के पूर्ण अप्रकािशत भाग को ही हम देख पाते हैं , मतलब चंद्रमा नहीं दिखाई पड़ता है। जब सूर्य चंद्रमा परस्पर 30 डिग्री का कोण बनाते हैं , उसके छठे भाग को ही हम प्रकािशत देख पाते हैं। जब सूर्य-चंद्र परस्पर 90 डिग्री का कोण बनाते हैंं , तब चंद्रमा का आधा भाग प्रकाशमान होता है। जब दोनो 180 डिग्री का कोण बनाते हेैं , उसका शत-प्रतिशत भाग ही प्रकाशमान हो जाता है। इस तरह सूर्य से चंद्रमा की दूरी जैसे-जैसे बढ़ती है , उसका प्रकाशमान भाग भी उसी अनुपात में बढ़ता जाता है। ठीक इसके विपरीत मैंने पाया कि मंगल , बृहस्पति , शनि , यूरेनस , नेप्च्यून और प्लूटो सूर्य से युति कर रहे होते हैं , तो उनकी गति सबसे अधिक होती है , जबकि ये सूर्य से 180 डिग्री की दूरी पर हो तो सर्वाधिक वक्र गति में होते हैं। 

इस तरह इन ग्रहों की गतिज उर्जा , सूर्य से कोणिक दूरी बढ़ने पर कम होती चली जाती है। निष्कषZ यह निकला कि चंद्रमा के प्रकाश से उसकी शक्ति की जानकारी प्राप्त करना हो या अन्य ग्रहों की गतिज ऊर्जा को निकालना हो , उस ग्रह की सूर्य से कोणिक दूरी को निकालने की आवश्यकता पड़ेगी। इसी कोणिक दूरी के अनुपाती या व्युत्क्रमानुपाती ग्रह की शक्ति होगी। सभी ग्रहों की गतिज और स्थैतिज ऊर्जा को निकालने के लिए सूत्रों की खोज की जा चुकी है। सूर्य से ग्रहों की कोणिक दूरी को जानने के लिए किसी उपकरण की कोई आवश्यकता नहीं है। पंचांग में वणिZत ग्रहों के अंश को ही जान लेना काफी होगा , इसकी जानकारी के बाद गतिज ऊर्जा और स्थैतिज ऊर्जा को सूत्र के द्वारा निकाला जा सकेगा। बंदूक की गोली में शक्ति है , इसे हर कोई महसूस करता है।


बंदूक की गोली काफी छोटी होती है , गतिरहित होने पर इसमें किसी प्रकार की शक्ति का बोध नहीं होता , किन्तु अत्यधिक गतिशीलता के कारण ही गोली की मारक क्षमता बढ़ जाती है। हथेली पर पत्थर का टुकड़ा रखकर कोई भी व्यक्ति अपने को शक्तिशाली समझता है , क्योकि उसे मालूम है कि पत्थर को गति देकर उसे शक्तिशाली बनाया जा सकता है। इस प्रकार किसी भी पिंड में गति का महत्व तो अनायास समझ में आता है , किन्तु ग्रहों के भीमकाय पिंड में अप्रत्यािशत रुप से अत्यधिक गति होने के बावजूद ग्रहों की शक्ति को अन्यत्र ढूंढ़ने की कोिशश की जाती रही है। जिस पृथ्वी का व्यास आठ हजार मील है , जिसकी परिधि 25 हजार मील है , जिसका वजन 5.882´1021 टन है , लगभग एक मिनट में हजार मील की रतार से परिभ्रमण-पथ पर आगे बढ़ रही है , की तुलना में बृहस्पति कई गुणा बड़ा है , इसकी रफतार प्रति मिनट लगभग 500 मील है । इनकी तेज गति की तुलना लाखों हाडाªेजन बम या अणुबम से की जा सकती है। इस प्रकार की विराट शक्ति से विद्युत-चुम्बकीय शक्ति तरंगों से पृथ्वीवासी प्रभावित होते हैं।ग्रहों की स्थैतिज ऊर्जा और गतिज ऊर्जा का प्रभाव किसी भी व्यक्ति पर भिन्न-भिन्न प्रकार से पड़ता है। हजारों प्रकार की कुंडलियों में ग्रहों के इस भिन्न प्रभाव को मैं महसूस करता हंू। सभी गह गति-नियमों के आधार पर ही अपना फल प्रस्तुत करते हैं , गति ही इनकी शक्ति हैं।

किसी भी व्यक्ति के जन्मकाल में सभी ग्रहों की गति और स्थिति भिन्न-भिन्न तरह की होती हें तथा उसके लग्न से सूर्य की कोणिक दूरी उस समय के जातक को विश्व के सभी मनुष्यों से भिन्न बनाती है। विश्व को देखने का उसका नजरिया भिन्न होता है। वह एक भिन्न बीज की तरह हो जाता है। हर व्यक्ति बदले हुए कोण से ब्रह्म की प्रतिछाया या प्रतीक है। ग्रह इस शरीर में ब्रह्म में ग्रंथि के रुप में होते हैं। वे समय-समय पर अपना फल प्रस्तुत करते हैं। 


जन्म-कुंडली में राजयोग

raj yog in janam kundali

जन्म-कुंडली में राजयोग 

फलित ज्योतिष में ग्रह या ग्रहों की विशेष स्थितियों का विवरण राजयोग या ज्योतिषयोग प्रकरण में मिलता है। राजयोग ज्योतिष में प्रयुक्त होनेवाला वह शब्द है , जिसका अर्थ सामान्यतया राजा होने या राजा की तरह सुख , संसाधन या प्रतिष्ठा प्राप्त करने की भविष्यवाणी की पुिष्ट करता है। राजयोगों की विवेचना या उल्लेख करते हुए सामान्यतया ज्योतिषी या ज्योतिषप्रेमी अपने मस्तिष्क मे भावी उपलब्धियों की बहुत बड़ी तस्वीर खींच लेने की भूल करते हैं। चूंकि आज का युग राजतंत्र का नहीं है , कई लोग इसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं कि राजयोग का जातक मंत्री , राज्यपाल , राष्ट्रपति , कमांडर , जनप्रतिनिधि या टाटा ,बिड़ला जैसी कम्पनियों का मालिक होना है। लेकिन जब इस प्रकार के योगों की प्राप्ति बहुत अधिक दिखलाई पड़ने लगी , यानि राजयोगवाली बहुत सारी कुंडलियॉ देखने को मिलने लगीं , तो ज्योतिषी फलित कहते वक्त कुछ समझौता करने लगे और राजयोग का अर्थ गजेटेड अफसरो से जोड़ने लगें। 


1965 के आसपास अधिकांश ज्योतिषियों के दृिष्टकोण लगभग ऐसे ही थे। जब भी किसी कुंडली में कोई राजयोग दिखाई पड़ता , मै भी शीघ्र इस निर्णय पर पहुंच जाता कि संबंधित जातक को असाधारण व्यक्तित्व का मालिक होना चाहिए। कालांतर में यानि 1970 तक जब बहुत सी कुंडलियो को गौर से देखने का मौका मिला , तो राजयोग से संबंधित मेरी धारणाएं धीरे-धीरे बदलने लगी। गाणितिक दृिष्ट से राजयोग की संभावनाओं पर मेरा ध्यान केिन्द्रत हुआ। इस अनुक्रम में मेरा पहला लेख 1971 में शक्तिनगर दिल्ली से प्रकािशत होनेवाली ज्योतिषीय पति्रका ` भारतीय ज्योतिष´ में प्रकािशत हुआ , जिसका शीषZक था - ` चामर योग की संभावनाएं और इसका मूल्यांकण ´ । इस लेख को लिखते हुए मैनें ग्रह योग की संभावनाओं को गणित में वणिZत संभावनावाद की कसौटी पर रखने की कोिशश की। दूसरा लेख जयपुर से निकलनेवाली ज्योतिष पति्रका ` ज्योतिष मार्तण्ड ´ में नवंबर 1974 में प्रकािशत हुआ , जिसका शीषZक था--` विपर्यय योग और इंदिरा गॉधी ´ । 

श्रीमती इंदिरा गॉधी की कुंडली में कोई भी ग्रह स्वक्षेत्रीय या उच्च का नहीं था , किन्तु सूर्य-मंगल , बृहस्पति-शु्रक्र तथा शनि-चंद्र का परस्पर विपर्यय था । इस लेख में भी योगों की संभावनाओ की गाणितिक व्याख्या थी। प्रकाशन के समय ये लेख काफी चर्चित थें। इस तरह ज्योतिष की प्राचीन पुस्तकों में वणिZत अधिकांश राजयोगों की गाणितिक व्याख्या के बाद मैं इस निष्कषZ पर पहुंचा कि इस प्रकार के योग बहुत सारे कुंडलियों में भरे पड़े हैं , जिनका कोई विशेष अर्थ नहीं है। अब तो मैं दृढतापूर्वक इस बात को कह सकता हूं कि राजयोगों की तालिका में ऐसे बहुत सारे राजयोग हैं , जो किसी कुंडली में 5-7 की संख्या में होने के बावजूद भी जातक को वििशष्ट नहीं बना पाते हैं।

यदि आपको ज्योतिष में रुचि है , तो कई बार आप पढ़ ही चुके होंगे कि किसी कुंडली में तीन ग्रह उच्च के हों तो जातक नृपतुल्य होता है। जब प्रारंभ में इस योग की जानकारी हुई थी , तो अपनी कुंडली में उच्चस्थ ग्रहों को गिनने की कोिशश की , जैसा हर कोई करते ही होंगे , ऐसा मेरा मानना है। मेरी कुंडली में उच्चस्थ ग्रह सिर्फ मंगल था। श्रीमती इंदिरा गॉधी की कुंडली में ढंूढ़ने की कोिशश की तो एक भी नहीं मिला , पुन: यह सोंचते हुए कि यह सचमुच उच्च कोटि का राजयोग है , इंदिरा गॉधी से भी अधिक प्रभुतासंपन्न कुंडली में मिल सकता है , उनके पिता श्री जवाहरलालजी की कुंडली को देखा । वहॉ भी तीन उच्चस्थ ग्रहों को नहीं पाया। किन्तु एक दिन ऐसा भी आया , जब मैं तीन उच्चस्थ ग्रहों की तलाश में नहीं था , फिर भी एक दुकानदार की कुंडली में सहसा तीन उच्चस्थ ग्रह दिखाई पड़े। उस दुकानदार की मासिक आय परिवार के भरण-पोषण के बाद दो सौ से अधिक की नहीं थी।

raj yog in janam kundali


उक्त कुंडलीवाले सज्जन के जीवन का पूर्वार्द्ध बहुत ही संघषZमय था। ये अपने जीवन के अंतिम क्षणों को सुख्सपूर्वक तो व्यतीत कर रहे थे , पर अधिक सुधार की गुंजाइश नहीं थी। इस कुंडली को देखने के बाद मैं सोचने लगा--इस कुंडली में सूर्य , बृहस्पति और शनि उच्च के हेैं। इस जातक के जन्म के समय के आसपास जब तक मेष रािश में सूर्य रहा होगा , तीन उच्चस्थ ग्रहों का योग एक महीने के लिए कायम होगा और इस एक महीने के अंदर जितने भी बच्चों ने जन्म लिया होगा , सभी की कुंडली में तीन ग्रह उच्चस्थ ही रहे होंगे। किन्तु वे सभी जातक नृपयोग मे जन्म लेकर भी वास्तव में राजा नहीं हुए होंगे। इनमें से एक व्यक्ति मामूली दुकानदार के रुप में मुझे मिल गया , शेष के बारे में भगवान ही जाने , कहॉ , कौन किस स्थिति में है। 

उपरोक्त व्याख्या से इतनी बात तो स्पष्ट हो गयी कि अभी तक राजयोगों का सही मूल्यांकण नहीं हुआ है और न ही आधुनिक ज्योतिषी इस दिशा में कोई ठोस कदम ही उठा पाए हैं। जिस राजयोग में एक राजा को पैदा होना चाहिए , उसमें एक मामूली दुकानदार पैदा हो जाता है और जब श्रीमती इंदिरा गॉधी जैसे सर्वगुणसंपन्न प्रधानमंत्री की कुंडली की व्याख्या करने का अवसर मिलता है , तो बड़े से बड़े ज्योतिषी उनकी कुंडली में बुधादित्य राजयोग ही उनके प्रघानमंत्री बनने का कारण बताते हैं , जबकि संभावनावाद के अनुसार 50 प्रतिशत से अधिक लोगों की कुंडली में बुधादित्य योग के होने की संभावना होती है। एक महान ज्योतिषी ने अपनी पुस्तक में लिखा है , बुधादित्य योग यद्यपि प्राय: सभी कुंडलियों में पाया जाता है , फिर भी इसे कम महत्वपूर्ण नहीं समझना चाहिए। इस तरह राजयोगों का विश्लेषण क्या असमंजस में डालनेवाला पेचीदा , अस्पष्ट और भ्रामक नहीं है ? इस तरह के पेचीदे वाक्य राजयोग के विषय में ही नहीं , वरन् ज्योतिष के समस्त नियमों के प्रति बुिद्धजीवी वर्ग की जो धारणा बनती है , उससे फलित ज्योतिष का भविष्य उज्जवल नहीं दिखाई पड़ता है।



आज कम्प्यूटर का जमाना है , अपने समस्त ज्योतिषीय नियमों , सिद्धांतो को कम्प्यूटर में डालकर देखा जाए , कुंडली निर्माण से संबंधित गणित भाग का काम संतोषजनक है , परंतु फलित भाग बिल्कुल ही स्थूल पड़ जाता है , इससे किसी को संतुिष्ट नहीं मिल पाती है। एक मामूली प्राथ्मिक स्कूल के िशक्षक और बसचालक की कुंडली में अनेक राजयोग निकल आते हैं और अमेरिका के राष्ट्रपति बिल िक्लंटन की कुंडली में एक दरिद्र योग का उल्लेख इस तरह होता है , मानो वह अति वििशष्ट व्यक्ति न होकर भिखारी हो। वास्तव में फलित ज्योतिष से संबंधित नियम बहुत ही उलझनपूर्ण और अस्पष्ट हैं। यदि कोई यह कहे कि एक रुपये में सौ आम खरीदकर तो लाया गया है , परंतु इसे कम महत्वपूर्ण नहीं समझा जाए , एक आम का दाम दस रुपये है , तो इस प्रकार के दुविधापूर्ण तथ्यो को कम्प्यूटर में डालने के बाद आम की कीमत के बारे में पूछा जाए , तो कम्प्यूटर भी सदैव दुविधापूर्ण उत्तर ही देगा। अभी बाजार में राजयोगों से संबंधित कई पुस्तकें उपलब्ध है , किन्तु आजतक के विद्वानों के विश्लेषण की पद्धति मौलिक या वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित नहीं है।



ईस प्रकार की दुविधापूर्ण पुस्तकों के बाजार में भरे होने के कई कारण हो सकते हैं। वैज्ञानिक दृिष्टकोणों का अभाव हो या व्यावसायिक सफलता में अधिक रुचि होने के कारण परंपरागत भूलों को नजरअंदाज किया जा रहा हो। कारण जो भी हो , लेकिन सभी पुस्तको ंमें परंपरागत राजयोगों को महत्वपूर्ण समझा गया है और उसका मात्र हिन्दी अनुवाद कर दिया गया है। इन राजयोगों की पुिष्ट में सिर्फ एक महापुरुषों की जन्मकुंडली को उद्धृत कर दिया गया है। ऐसा ही होता आया है , सोंचकर पाठक के दिमाग में राजयोगों की गलत धारणाएं आ जाती हैं । जब भी वे किसी कुंडली में राजयोग को पा लेते हैं , फलित की चर्चा करते तनिक भी नहीं हिचकिचाते कि अमुक जातक मंत्री या पदाधिकारी होगा , जबकि तथ्य अनुमान के विपरीत असमंजस में डालनेवाले होते हैं। मैंने राजयोगों के सभी नियमों का भली-भॉति अध्ययन किया है और सर्वदा इसी निष्कषZ पर आया हूं कि इनका न तो सही क्रम है और न ही नििश्चत मूल्य। इन योगों की सहायता से योगों की तीव्रता की अभिव्यक्ति नहीं की जा सकती है। राजयोग में पैदा होनेवाले व्यक्तियों को वर्गीकृत नहीं किया जा सकता। राजयोग के शािब्दक अर्थ या निहित अर्थ को कायम नहीं रखा जा सकता , वरन् राजयोगों को समझने के क्रम में उलझनें ही सामने आएंगी। इन योगों को सटीक बनाने के क्रम में ज्योतिषी गणित के संभावनावाद और ग्रहगति में सबसे महत्वपूर्ण मंदगति मंद गति की उपस्थिति को राजयोगों में सिम्मलित कर संभावनाओं को विरल बनाने की कोिशश करें , नही ंतो इन योगों का कोई अभिप्राय नहीं रह जाएगा। 


कई राजयोगों की विफलता को प्रस्तुत करती कुंडली हमनें देखा है, जो एक ऐसे व्यक्ति की है , जो अपने माता-पिता और अपने पूरे परिवार को परेशान करता हुआ अपनी सारी संपत्ति खो बैठा है। इश्कमिजाज , फिजूलखर्च और शराबी है , चाकू रखता है , दूसरों को परेशान करना , धमकी देना और ब्लैकमेलिंग करना इसका काम है। पुलिस की निगाह सदैव इसपर बनी रहती है। इस प्रकार प्रशासन की दृिष्ट में भी यह एक संदिग्ध व्यक्ति है। टी बी का मरीज है , इसकी कुंडली में चामर योग , नीचभंग महायोग , रुचक योग बुधादित्य योग -- सभी विद्यमान है। लगनेश मंगल दशम भाव में दिक्बली है। किन्तु राजयोग से संबंधित किसी भी फल का जीवन में घोर अभाव है।

शनिवार, 9 मई 2020

विकसित विज्ञान नहीं , विकासशील विद्या या शास्त्र है

Siddhant jyotish

विकसित विज्ञान नहीं , विकासशील विद्या या शास्त्र है

(लेखक - विद्या सागर महथा )


फलित ज्योतिष अभी विकसित विज्ञान नहीं , विकासशील विद्या या शास्त्र है , किन्तु इसके विकास की पर्याप्त संभावनाएं विद्यमान हैं । इसे अनिश्चत से निश्चत की ओर आसानी से ले जाया जा सकता है। इस शास्त्र को विज्ञान में रुपांतरित किया जा सकता है। गणित ज्योतिष विज्ञान है , क्योंकि आकाश में ग्रहों की स्थिति , गति आदि से संबंधित नििश्चत सूचना प्रदान करता है। सैकड़ो वर्षों बाद लगनेवाले सूर्यग्रहण , चंद्रग्रहण की अवधि की सूचना घंटा , मिनट और सेकण्ड तक शुद्ध रुप से प्रदान करता है। यह भी सूचित करता है कि पृथ्वी के किस भाग में यह दिखाई पड़ेगा। किन्तु हम फलित ज्योतिष को विज्ञान नहीं कह पाते ,क्योंकि ग्रहों के फलाफल का स्पष्ट उल्लेख हम नहीं कर पाते। धनेश धन स्थान में स्वगृही हो तो व्यक्ति को धनवान होना चाहिए परंतु इस योग से कोई करोड़पति , कोई लखपति और कोई सहस्रपति है तो कोई केवल अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति ही जोड़-तोड़ से कर पा रहा है। लग्नेश , लाभेश और नवमेश धन स्थान में हो तो जातक को इस योग से बहुत ही समृद्ध और धनवान होना चाहिए परंतु इस योग में उत्पन्न हुए व्यक्ति को भी दरिद्रता के दौर से गुजरते हुए देखा जाता है। मेरे पास ऐसे कई उदाहरण हैंं - कम्प्यूटर जिस कुंडली में अधिक से अधिक धन योग की चर्चा करता है , वह व्यक्ति धनी नहीं है तथा जिस कुंडली में कुछ दरिद्र योगों की चर्चा है , वह सर्वाधिक संपन्न देश का राष्टपति है। ऐसी परिस्थिति में ग्रहों की स्थिति के अनुसार उससे उत्पन्न प्रभाव या फलाफल की समरुपता का क्या सही पता चल पाता है ? ग्रहों की शक्ति , उसकी तीव्रता या उत्पन्न प्रभाव के मूल स्रोत या असली कारणों तक क्या हम पहुंच चुके हैं ? क्या ग्रह की शक्ति , तीव्रता या कार्यक्षमता को मापने का सही उपाय हमारे पास है। 


ज्‍योतिष में ग्रहों की शक्तिमापक फार्मूला आवश्‍यक है

भौतिक विज्ञान में विभिन्न प्रकार की शक्तियों का उल्लेख है। प्रत्येक शक्ति की माप के लिए वैज्ञानिक सूत्र हैं , शक्तिमापक इकाई है। शक्ति की माप के लिए शक्तिमापक संयंत्र या उपकरण है , ताकि उसकी तीव्रता का आकलण स्पष्ट रुप से किया जा सके। स्पीडोमीटर से बस , रेल और यान की गति का स्पष्ट बोध हो जाता है। थर्मामीटर से तापमान का स्पष्ट बोध होता है। बैरोमीटर से हवा के दबाब की जानकारी होती है । अल्टीमीटर से उड़ान के समय वायूयान की ऊंचाई का पता चलता है। ऑडियोमीटर से ध्वनि की तीव्रता का पता चलता है। विद्युत की मात्रा को मापने के लिए इलेक्टोमीटर का व्यवहार होता है। गैल्वेनोमीटर से कम मात्रा की विद्युतधारा कों मापा जाता है। लैक्टोमीटर दूध की शुद्धता को मापता है। रेनगेज किसी विशेष स्थान पर हुई वषाZ की मात्रा को मापता है। सेक्सटेंट से आकाशीय पिंडों की कोणिक ऊंचाई की माप की जाती है। स्टॉप वाच से सूक्ष्म अवधि को रिकार्ड किया जाता है। उपरोक्त सभी प्रकार के यंत्र वैज्ञानिक सूत्रों पर आधारित नििश्चत सूचना देने का काम करते हैं , अत: ये सभी जानकारियॉ वैज्ञानिक और विश्वसनीय हैं। यदि हम ज्योतिषियों से पूछा जाए कि ग्रह-शक्ति की तीव्रता को मापने के लिए हमारे पास कौन सा वैज्ञानिक सूत्र या उपकरण है तो मै समझता हूं कि इस प्रश्न का उत्तर देना काफी कठिन होगा ,लेकिन जबतक इस प्रश्न का सही उत्तर नहीं मिलेगा , फलित ज्योतिष अनुमान का विषय बना रहेगा। अब ग्रहों के बलाबल को निर्धारित करने से संबंधित कुछ सूत्रों की खोज कर ली गयी है। इसकी चर्चा थोड़ी देर बाद होगी , सबसे पहले हम एक बार उन सभी परंपरागत ज्योतिषीय नियमों पर दृिष्टपात करें , जो ग्रह बलाबल निर्धारण के सूत्र के रुप में विद्यमान हैं -

siddhant jyotish



1 स्थान-बल- स्वगृही , उच्च , मूल ति्रकोण , मित्र रािश में स्थित या उिल्लखित द्रेष्काण ,नवमांश ,सप्तमांश , आदि ‘ाडवर्ग में अधिक वर्ग प्राप्त होने पर या अन्य ग्रहों के सापेक्ष अष्टक वर्ग नियम से चार रेखाओं से ऊपर होने पर ग्रह बलवान होता है । 


2 दिक्बल- बुध , बृहस्पति लग्न में , शुक्र , चंद्र चतुर्थ भाव में , शनि सप्तम भाव में तथा सूर्य , मंगल दशम भाव में दिक्बली होते हैं। 


3 कालबल- कालबल के अंतर्गत चंद्र , शनि , मंगल राति्र में , सूर्य , गुरु , शुक्र दिन में तथा बुध सदैव बलि होता है। 


4 नैसगिZकबल- शनि , मंगल , बुध , गुरु , शुक्र , चंद्र और सूर्य उत्तरोत्तर आरोही क्रम में बलवान होते हैं। शायद इस प्रकार के ग्रह बल की परिकल्पना इनके प्रकाश की तीव्रता को ध्यान में रखकर की गयी थी। 


5 चेष्टाबल- मकर से मिथुनपर्यन्त किसी भी रािश में सूर्य , चंद्र की स्थिति हो तो उनमें चेष्टाबल होगा तथा अन्य सभी ग्रह चंद्रमा के साथ होने से चेष्टाबल प्राप्त कर सकेंगे। 


6 दृिष्टबल- किसी ग्रह को शुभग्रह देख रहा हो तो शुभदृिष्टप्राप्त ग्रह बलवान हो जाता है। 


7 आत्मकारक ग्रहबल - आत्मकारक ग्रहबल की स्थिति के सापेक्ष ग्रहबल या जैमिनी सूत्र से ग्रहबल आत्मकारक ग्रह के साथ या उससे केन्द्रगत रहनेवाले ग्रह पूर्णबली , दूसरे , पॉचवे आठवें और एकादश में रहनेवाले अर्द्धबली तथा तीसरे , छठे , नवें और द्वादश भाव में रहनेवाले निर्बल होते हैं। 


8 अंशबल- किसी रािश के प्रारंभिक अंशो में स्थित रहनेवाला ग्रह बाल्यावस्था में होता है तथा रािश के अंतिम भाग में रहनेवाला ग्रह वृद्धावस्था में होता है। रािश के मध्य में रहनेवाले ग्रहों को बलवान कहा जाता है। 


9 योगकारक-अयोगकारक बल - संहिताओं में ग्रह फलाफल की विवृत्ति जिस ढंग से मिलती है , उसके अनुसार योगकारक ग्रहों को शुभफलदायक ,बलवान तथा अयोगकारक ग्रहों को अशुभफलदायक और निर्बल समझा जाता है। 


10 पक्षबल- कृष्णपक्ष में पापग्रह एवं शुक्लपक्ष में शुभग्रह बलवान होते हैं। 


11 अयण बल- उत्तरायण में शुभग्रह और दक्षिणायण में पापग्रह बलवान होते हैं। 

इस प्रकार ग्रह के बलाबल निर्धारण के लिए परंपरा से ग्यारह नियमों की खोज हो चुकी है। स्थान बल के अंतर्गत आनेवाले दो नियमों ‘ाडवर्ग बल और अष्टकवर्गबल को अलग-अलग कर दिया जाए तो ग्रह शक्ति की जानकारी के लिए कुल तेरह प्रकार के नियम परंपरा में प्रचलित हैं। हो सकता है कि ज्योतिष के अन्य ग्रंथों में कुछ और नियमों का भी उल्लेख हो। इन परिस्थितियों में ग्रह बलाबल से संबंधित कई गंभीर प्रश्न एक साथ उपस्थित होते हैं - 
1 ग्रह बल निर्धरित करने का एक भी नियम सही होता तो दूसरे , तीसरे , ```````````````````````` बारहवें , तेरहवें नियम की बात क्यों आती ? 


2 सभी नियम ऋषि-मुनियों की ही देन हैं। यदि कोई एक नियम सही है तो शेष की उपयोगिता क्या है ? 


3 यदि ग्रह बलाबल निर्धारण में सभी नियमों का उपयोग करें तो क्या ग्रहबल की वास्तविक जानकारी हो पाएगी या ग्रहबल नियमों के बीच ज्योतिषी उलझकर ही रह जाएंगे ? 


4 कम्प्यूटर में ग्रह बलाबल से संबंधित सभी नियमों को डालकर बारी बारी से या एक साथ इनकी सत्यता की जॉच की जाए तो क्या सफलता मिलने की संभावना हैं ? 


5 क्या ग्रह बलाबल से संबंधित सभी नियम एक दूसरे के पूरक हैं ? 

आप कुछ उत्तर देंगे , इसे पहले मैं ही उत्तर देता हूं कि उपरोक्त नियमों में एक भी नियम ग्रहबल निर्धारण के लिए आंिशक रुप से भी सही नहीं हैं। शायद इसीलिए फलित ज्योतिष अनुमान का विषय बना हुआ है। यदि कोई एक नियम काम करता तो दूसरे नियम की आवश्यकता ही नहीं महसूस होती। एक नियम के पूरक नियमों के रुप में शेष नियमों को मान भी लिया जाए तो व्यावहारिक तौर पर इसकी पुिष्ट नहीं हो पा रही है। ऐसे कई उदाहरण मेरे पास हैं , ग्रह बलाबल से संबंधित अधिकांश नियमों के अनुसार ग्रह बलवान होने के बावजूद ग्रह का फल कमजोर है। निष्कषZत: इन परंपरागत सभी नियमों के संदर्भ में यही कहना चाहूंगा कि इन सभी नियमों को कम्प्यूटर में डालकर विभिन्न महत्वपूर्ण कुंडलियों में इसकी सत्यता की जॉच की जाए तो परिणाम कुछ भी नहीं निकलेगा । यह फलित ज्योतिष की सबसे बड़ी कमजोरियों में से एक है।

siddhant jyotish


फलित ज्योतिष के प्रणेता हमारे पूज्य ऋषि-मुनियों , पूर्वजों और फलित ज्योतिष के विद्वानों के समक्ष ग्रहशक्ति के रहस्यों को समझने की गंभीर चुनौती, हर युग में उपस्थित रही है । इसलिए उन्होनें विभिन्न दृिष्टकोणों से ग्रह शक्ति के रहस्य को उद्घाटित करने का भरपूर प्रयास किया। संभवत: इसलिए ग्रह-शक्ति को समझने से संबंधित इतने सूत्रों का उल्लेख विभिन्न पुस्तकों में दर्ज है। 

आज भौतिक विज्ञान पिंड की शक्ति को उसकी गति , ताप , प्रकाश , चुम्बक , विद्युत और ध्वनि के सापेक्ष उसके अस्तित्व को स्वीकार करता है। विज्ञान यह भी कहता है कि किसी भी शक्ति को उसके दूसरे स्वरुप में परिवर्तित किया जा सकता है। ग्रह में गति और प्रकाश है , परस्पर गुरुत्वाकषZण के कारण प्रत्येक ग्रह का अपना एक विद्युत-चुम्बकीय क्षेत्र होता है। सभी आकाशीय पिंड परस्पर गुरुत्वाकषZण बल और गति से इतने सशक्त बंधे हुए हैं कि करोड़़ों वषZ व्यतीत हो जाने के बाद भी अपने नियमों का पालन यथावत कर रहें हैं। सूर्य से पृथ्वी 15 करोड़ किलोमीटर दूर रहकर सूर्य के चारो ओर 365 दिन , 5 घ्ंाटे , 48 मिनट और कुछ सेकण्ड में एक परिक्रमा कर लेती है। करोडों वषोZं के बाद भी एक परिक्रमा की अवधि में मिनट भर का अंतर नहीं पड़ा। स्मरण रहे , पृथ्वी अपने परिभ्रमण पथ में एक मिनट में लगभग हजार मील की गति से सूर्य के चारो ओर परिक्रमा करते हुए अग्रसर है। बृहस्पति जैसा भीमकाय ग्रह सूर्य की परिक्रमा 80 करोड़ किलोमीटर की दूरी पर रहते हुए प्रतिमिनट लगभग 500 मील की गति से कर रहा है। ग्रहों की गति और पृथ्वी पर उसकी सापेक्षिक गति का प्रभाव पृथ्वी के परिवेश में अणु-परमाणुओं पर किस विधि से पड़ता हे , यह वैज्ञानिकों के लिए शोध का विषय भले ही हो , हम ज्योतिषियों को यह समझ लेना चाहिए कि ग्रह-शक्ति का सारा रहस्य उसकी गति में तथा उस आकाशीय पिंड की सूर्य के साथ पृथ्वी पर बन रही कोणिक दूरी में ही छिपा हुआ है। 

बंदूक की गोली बहुत छोटी होती है, पर उसकी शक्ति उसकी गति के कारण है। हाथ में एक पत्थर का टुकड़ा रखकर लोग अपने को बलवान समझ लेते हैं , क्योंकि पत्थर को गति देकर शक्तिशाली बनाया जा सकता है। इसी परिप्रेक्ष्य में ग्रहों की शक्ति को समझने की चेष्टा करें , बंदूक की गोली में गति के कारण उसकी शक्ति को समझने में कठिनाई नहीं होती , किन्तु भीमकाय ग्रहों में उसकी तीव्र गति को देखते हुए भी उसकी शक्ति को अन्यत्र तलाशने की चेष्टा की जाती रही है। गति में शक्ति के रहस्य को न समझ पाने के कारण ही परंपरागत ज्योतिष में ग्रह-शक्ति के निर्धारण के लिए गति से संबंधित किसी सूत्र की चर्चा नहीं की गयी केवल रािश स्थिति में ही ग्रहों की शक्ति को ढूंढ़ने का बहुआयामी निष्फल प्रयास किया गया, जबकि ग्रहों के भीमकाय पिंड और उसकी तीव्र गति की तुलना लाखों -करोड़ों परमाणु-बमों से की जा सकती है। 

ग्रहों के विभिन्न प्रकार की गतियों का ज्ञान हमारे पूज्य ऋषि-मुनियों , ज्योतिषियों को पूरा था। सूर्य-सिद्धांत में ग्रहों की विभिन्न गतियों - अतिशीघ्री , शीघ्री , सम , मंद , कुटीला , वक्र और अतिवक्र आदि का उल्लेख है , किन्तु इन गतियों का उपयोग केवल ज्योतिष के गणित प्रकरण में किया गया है। पंचांग-निर्माण , ग्रहों की स्थिति के सही आकलण सूर्य-ग्रहण एवं चंद्र-ग्रहण की जानकारी के लिए ग्रहों की इन गतियों का प्रयोग किया गया परंतु फलित ज्योतिष के विकास में इन गतियों का उपयोग नहीं हो सका , क्योंकि ज्योतिषियों को यह जानकारी नहीं हो सकी कि ग्रह-शक्ति का सारा रहस्य ग्रह-गति में ही छिपा हुआ है । पृथ्वी के सापेक्ष ग्रहों की विभिन्न गतियों के कारण ही उनकी गतिज और स्थैतिज ऊर्जा में सदैव परिवत्र्तन होता रहता है , तदनुरुप जातक की प्रवृत्तियों और स्वभाव में परिवत्र्तन होता है। यह भी ध्यातव्य है कि किसी आकाशीय पिंड और सूर्य के बीच पृथ्वी पर जो कोण बनेगा , वह आकाशीय पिंड की ग्रह-गति के साथ सदैव व्युत्क्रमानुपाती संबंध बनाएगा। 

इस तरह चंद्रमा के प्रकाशमान भाग को मापना हो या अन्य ग्रहों की गति को समझना हो , सूर्य से उस पिंड की पृथ्वी पर बन रही कोणिक दूरी को समझ लेना पर्याप्त होगा । इस तरह ग्रह की शक्ति की जानकारी के लिए अलग से किसी उपकरण को बनाने की आवश्यकता नहीं है। विभिन्न ग्रहों की शक्ति के आकलण के लिए इस आधार पर विभिन्न सूत्रों का प्रयोग किया जा सकता है। इसका पूरा प्रयोग कर ही फलित ज्योतिष को इसकी पहली कमजोरी से छुटकारा दिलाया जा सकता है। इसकी पूरी जानकारी अगले किसी पुस्तक मेें फलित ज्योतिष के विज्ञान प्रकरण के किसी अध्याय के अंतर्गत की जाएगी , जिससे किसी ग्रह-शक्ति की तीव्रता को प्रतिशत में जाना जा सकता है। इसके बाद इस प्रश्न का उत्तर मिल जाएगा कि किस व्यक्ति के लिए किस ग्रह की भूमिका सर्वोपरि है , कोई व्यक्ति किस संबंध में अधिकतम ऊंचाई पर जाने की क्षमता रखता है तथा उस ऊंचाई को प्राप्त करने का उसे कब मौका मिलेगा , इसके लिए नई दशा-पद्धति का एक नया सूत्र भी अलग से विकसित किया गया है।

ग्रह और राशीश की सापेक्षिक गति जातक को सकारात्मक या नकारात्मक दृिष्टकोण प्रदान करती है। ग्रह की गति और ग्रह की सूर्य से कोणिक दूरी का परस्पर गहरा संबंध है , किन्तु किसी भी हालत में ग्रह-शक्ति को समझने के लिए परंपरागत नियमों में एक भी नियम ग्रह-शक्ति के मूल स्रोत से संबंधित नहीं हैं। 

जब किसी एक ग्रह की शक्ति का सही मूल्यांकण नहीं किया जा सकता तो बहुत से ग्रहों की युति , वियुति और सापेक्षिक ग्रहों की स्थिति का मूल्यांकण कदापि नहीं किया जा सकता। इस तरह विभिन्न राजयोग , दरिद्र योग , मृत्युयोग , या अनिष्टकर योगों का कोई विशेष अर्थ नहीं रह जाता। सभी योगों की व्याख्या अनुमान पर आधारित हो जाती है। यह फलित ज्योतिष की दूसरी बड़ी कमजोरी है। यही कारण है कि एक ही कुंडली विभिन्न ज्योतिषियों की नजर में भिन्न-भिन्न तरह से परिलक्षित होती है। सभी का निष्कषZ एक नहीं होता। सभी राजयोगों को सचमुच महत्वपूर्ण बनाने के लिए स्थैतिज धनात्मक ग्रहों को योग में भागीदार बनाना आवश्यक शर्त होगी । उच्च गणित के संभावनावाद का प्रयोग करके इसे अपेक्षाकृत विरल बनाना होगा। तभी फलित ज्योतिष की दूसरी बड़ी कमजोरी से छुटकारा पाया जा सकता है। 

फलित ज्योतिष की तीसरी और सबसे बड़ी कमजोरी ` विंशोत्तरी दशा पद्धति ´ है , जिसपर भारतीय ज्योतिषियों को नाज है तथा जिसकी जानकारी के बाद ही वे महसूस करते हैं कि वे पाश्चात्य ज्योतिषियों से अधिक जानकारी रखते हैं , क्योंकि पाश्चात्य ज्योतिषियों कों केवल गोचर के ग्रहों का ही ज्ञान होता है , जबकि भारत के ज्योतिषियों को गोचर के अतिरिक्त ऐसे सूत्रों की भी जानकारी है , जिससे विभिन्न ग्रहों का फलाफल जीवन के किस भाग में होगा , की स्पष्ट व्याख्या की जा सकती है यानि कोई ग्रह जीवन में कब फल प्रदान करेंगे , भारत के ज्योतिषी विशोत्तरी पद्धति से इसकी स्पष्ट व्याख्या कर सकते हैं। 

किन्तु मेरा मानना है कि विंशोत्तरी पद्धति से दूरस्थ भविष्यवाणी की ही नहीं जा सकती है। निकटस्थ भविष्यवाणियॉ अनुमान पर आधारित होती हैं और घटित घटनाओं को सही ठहराने के लिए विंशोत्तरी पद्धति बहुत ही बढ़िया आधार है , क्योंकि विंशोत्तरी पद्धति में एक ग्रह अपनी महादशा का फल प्रस्तुत करता है , दूसरा अंतर्दशा का , तीसरा प्रत्यंतरदशा का तथा चौथा सूक्ष्मदशा का । कल्पना कीजिए , ज्योतिषीय गणना में महादशावाला ग्रह काफी अच्छा फल प्रदा करनेवाला है , अंतर्दशा का ग्रह बहुत बुरा फल प्रदान करने की सूचना दे रहा है । प्रत्यंतर दशा का ग्रह सामान्य अच्छा और सूक्ष्म महादशा का ग्रह सामान्य बुरा फल देने का संकेत कर रहा हो , इन परिस्थितियों में किसी के साथ अच्छी से अच्छी और किसी के साथ बुरी से बुरी या कुछ भी घटित हो जाए , हेड हो जाए या टेल, किसी भी ज्योतिषी के लिए अपनी बात , अपनी व्याख्या , अपनी भविष्यवाणी को सही ठहरा पाने का पर्याप्त अवसर मिल जाता है। लेकिन इतना तो तय है कि कोई भी ज्योतिषी संसार के लिए कितनी भी भविष्यवाणी क्यो न कर ले , विंशोत्तरी पद्धति से अपने लिए कोई भविष्यवाणी नहीं कर पातें। इस दशा-पद्धति के जानकार के लिए इससे बड़ी दुर्दशा और क्या हो सकती है ? 

किसी ग्रह की शक्ति कितनी है , उसके राशीश की शक्ति कितनी है , वह पृथ्वी से कितनी दूरी पर स्थित है , वह किस उम्र का प्रतीक ग्रह है , इन सब बातों से विंशोत्तरी दशा पद्धति का कोई संबंध नहीं है। जन्मकालीन चंद्रमा पुष्य नक्षत्र में स्थित हो , तो वृद्धावस्था के ग्रह शनि को काम करने का अवसर बाल्यावस्था में ही प्राप्त हो गया , फिर विंशोत्तरी क्रम से अविशष्ट ग्रह अपना काम करते रहेंगे। 

सभी ज्योतिषी इस बात से भिज्ञ हैं कि बृहस्पति सभी ग्रहों में सबसे बड़ा है , एक रािश में एक वषZ रहता है। कल्पना करें , किसी वषZ मेंष रािश में बृहस्पति स्थित हो तो उस वषZ मेष लग्न के जितने भी व्यक्ति पैदा होंगे , सभी की कुंडली में लग्न में बुहस्पति होगा। सभी कुंडलियों में नवमेश और व्ययेश बृहस्पति लग्न में स्थित होने से इस ग्रह की नैसगिZक और भावाधिपत्य विशेषताएं एक जैसी होंगी। प्रत्येक दिन नौ दिनों तक उसी लग्न की उसी डिग्री में बच्चे पैदा होते चले जाएं , जो बिल्कुल असंभव नहीं , सभी जातकों के जीवन में बृहस्पति के प्रतिफलन काल की जानकारी देनी हो तो चूंकि बृहस्पति के सापेक्ष अन्य ग्रहों की स्थिति में बड़ा परिवत्र्तन नहीं होगा तो फलाफल में भी हर बच्चे में समानता मिल जाएगी। किन्तु बृहस्पति के फलप्राप्ति का मुख्य काल विंशोत्तरी दशा का के अनुसार उछल-कूद करता हुआ मिल जाएगा , जिसे निम्न प्रकार दिखाया जा सकता है -- 

जातक का जन्म यानि जन्म के समय चंद्रमा बृहस्पति के मुख्य काल का आरंभ 


अिश्वनी नक्षत्र के आरंभ में आसमान के 0 डिग्री में हो 68 वषZ की उम्र के बाद 


भरणी नक्षत्र के आरंभ में आसमान के 13 डिग्री में हो 61 वषZ की उम्र के बाद 


कृतिका नक्षत्र के आरंभ में आसमान के 27 डिग्री में हो 41 व‘ाZ की उम्र के बाद 


रोहिणी नक्षत्र के आरंभ में आसमान के 40 डिग्री में हो 35 वषZ की उम्र के बाद 


मृगिशरा नक्षत्र के आरंभ में आसमान के 53 डिग्री में हो 25 वषZ की उम्र के बाद 


आद्रा नक्षत्र के आरंभ में आसमान के 67 डिग्री में हो 18 वषZ की उम्र के बाद 


पुनर्वसु नक्षत्र के आरंभ में आसमान के 80 डिग्री में हो जन्म के तुरंत बाद 


पुष्य नक्षत्र के आरंभ में आसमान के 93 डिग्री में हो 104 वषZ की उम्र के बाद 


अश्लेषा नक्षत्र के आरंभ में आसमान के 107 डिग्री में हो 85 वषZ की उम्र के बाद 


यहॉ गौर करने की बात यह है कि आज जिस समय पुनर्वसु के चंद्र में जिस समय बच्चे का जन्म हुआ , ठीक 24 घंटे बाद कल इसी समय दूसरे बच्चे का जन्म हो , तो इन दोनो कुडलियों में लग्न के साथ साथ सभी भावों में ग्रहों की वही स्थिति होगी। केवल चंद्रमा दूसरी कुंडली में 13 डिग्री 20 मिनट की अधिक दूरी पर होगा । इतने ही अंतर के कारण बृहस्पति एक जातक के लिए अपना मुख्य फल बाल्यावस्था में ही प्रदान करेगा , तो दूसरे जातक को वह फल अतिवृद्धावस्था में प्रदान करने के लिए बाध्य होगा । इससे भी अधिक गंभीर परिस्थिति तब उत्पन्न हाोगी , जब दो बच्चे एक ही लग्न में पुनर्वसु और पुष्य नक्षत्र के संधिकाल में जन्म लेंगे । जिस जातक का जन्म पुनर्वसु नक्षत्र में होगा , एक ही लग्न और एक ही ग्रह स्थिति के बावजूद पहले बचे को बृहस्पति से संबंधित फल की प्राप्ति जन्मकाल में होगी तथा कुछ ही क्षणों बाद जन्म लेनेवाले जातक को बृहस्पति का मुख्य फल 104 वषZ के बाद प्राप्त होगा। यह नियम केवल बृहस्पति के लिए ही लागू नहीं होगा , शेष ग्रहों के काल में भी बदलाव आएगा , क्योंकि शेष ग्रह भी अपना फल प्रदान करने के लिए क्यू में खड़े हैं। स्थान परिवत्र्तन सिर्फ चंद्रमा का हुआ , पर फल प्रदान करनेवाले सभी ग्रहों के दशाकाल में भारी उलटफेर हो गया। इस प्रकार के चमत्कार को कोई भी विज्ञानसम्मत नहीं मान सकता । जब संपूर्ण विंशोत्तरी पद्धति ही वैज्ञानिकता के दायरे से बाहर निकल जाती है , तो इसी पद्धति पर आधारित कृष्णमूर्ति पद्धति की वैज्ञानिकता भी स्वत: संदिग्ध हो जाती है। 

ग्रहों की वक्रता के संबंध में बहुत सारे लेख विभिन्न पत्र-पति्रकाओं में देखने को मिले , किन्तु एक भी लेखक आत्मविश्वास के साथ निर्णयात्मक स्वर में , बेहिचक यह कहने में सक्षम नहीं हैं कि वक्री ग्रह अच्छा फल देतें हैं या बुरा। यदि ये अच्छा फल देते हैं तो कब और यदि बुरा फल देते हैं तो कब ? संपूर्ण जीवन में किन परिस्थितियों में इनका केवल बुरा फल ही प्राप्त होता है। किन परिस्थितियों में वक्री ग्रह का जीवन के अधिकांश समय में अच्छा फल प्राप्त होता है ? इस प्रश्न के उत्तर देने में हमें कोई कठिनाई नहीं है , क्योंकि हमें सही दशा पद्धति की जानकारी है , परंतु जिसे नहीं है , वे इस प्रश्न का उत्तर देने में अवश्य ही कठिनाई महसूस करेंगे।


इस प्रकार के आलोचात्मक बातों से फलित ज्योतिष के ऐसे भक्तों को बहुत बार कष्ट पहुंचा चुका हंंू , जो फलित ज्योतिष के स्वरुप में कोई परिवत्र्तन नहीं चाहते। वे इन आलोचनाओं को ऋ़षि पराशर और जैमिनी की अवमानना से जोड़ देते हैं। किन्तु मेरी दृिष्ट में फलित ज्योतिष के नियमों की प्रामाणिकता या वैज्ञानिकता को सिद्ध करने के लिए किसी साक्ष्य की कोई आवश्यकता नहीं है। फलित ज्योतिष में वही नियम सही माने जा सकते हैं , जिनसे भविष्यवाणियॉ खरी उतरती रहे। जबतक फलित ज्योतिष के अनुपयोगी नियमों को हटा नहीं दिया जाए , इसे विज्ञान का दर्जा नहीं दिलाया जा सकता। साथ ही सही नियमों की खोज में संलग्न रहना होगा। फलित ज्योतिष के विकास में गणित और भौतिक विज्ञान के साथ धनात्मक सहसंबध स्थापित करना होगा। सन् 1975 जुलाई के `ज्योतिष-मार्तण्ड ´ पति्रका मे मेरा एक लेख ` दशाकाल निरपेक्ष अनुभूत तथ्य ´ प्रकािशत हुआ था , जिसमें कारणों सहित यह उल्लेख किया गया था कि जन्म से 12 वषZ की उम्र तक चंद्रमा , 12 से 24 वषZ की उम्र तक बुध , 24 से 36 वषZ की उम्र तक मंगल , 36 से 48 वषZ की उम्र तक शुक्र , 48 से 60 वषZ की उम्र तक सूर्य , 60 से 72 वषZ की उम्र तक बृहस्पति , 72 से 84 वषZ की उम्र तक शनि , 84 से 96 वषZ की उम्र तक यूरेनस , 96 से 108 वषZ की उम्र तक नेपच्यून और 108 से 120 वषZ की उम्र तक प्लूटो अपनी शक्ति के अनुसार मानवजीवन पर अपना अच्छा या बुरा प्रभााव डालते हैं। देश-विदेश के प्रबुद्ध पाठकों का समुदाय इस उद्घोषित नयी दशा-पद्धति की संपुिष्ट में निम्न सत्य का अवलोकण करें---- 

1 जिन कुंडलियों में चंद्रमा अमावस्या के निकट का होता है , वे सभी जातक 5-6 वषZ की उम्र में मनोवैज्ञानिक रुप से कमजोर होते हैं। उनके बचपन में मन को कमजोर बनानेवाली घटनाएं घटित होती हैं 


2 जिन कुंडलियों में बुध बहुत वक्र है , उन जातकों का 17-18वॉ वषZ कष्टकर होता है। 


3 जिन कुंडलियों में मंगल बहुत वक्र है , उन जातकों का 29-30वॉ वषZ कष्टकर होता है। 


4 जिन कुंडलियों में शुक्र बहुत वक्र है , उन जातकों का 41-42 वॉ वषZ कष्टकर होता है। 


5 जिन कुंडलियों में सूर्य अतिशीघ्री ग्रह की रािश में स्थित होता है , उनका 53-54 वॉ वषZ कष्टप्रद होता है। 


6 जिन कुंडलियों में बृहस्पति बहुत वक्र हो , उन जातकों का 65-66 वॉ वषZ कष्टकर होता है। 


7 जिन कुंडलियों में शनि बहुत वक्र हो , उन जातकों का 77-78 वॉ वषZ कष्टकर होता है। 


मै समझता हंू कि उपरोक्त वैज्ञानिक तथ्य इतने सटीक हैं कि एक भी अपवाद आप प्रस्तुत नहीं कर पाएंगे। 


परंपरागत फलित ज्योतिष की आलोचना या समीक्षा से किसी को भी परेशान होने की जरुरत नहीं है , क्योंकि अनावश्यक नियमों की खुलकर आलोचना करते हुए वैकल्पिक व्यवस्था के रुप में वैज्ञानिक नियमों पर आधारित फलित ज्योतिष के नए नियमों को भी मैने प्रस्तुत किया है। मै गत्यात्मक दृिष्टकोण से भविष्यवाणी करते हुए पूर्ण आश्वस्त रहता हंू किन्तु अभी भी ऐसे बहुत सारे पहलू हैं ,जिन्हें विकसित करने के लिए वैज्ञानिक दृिष्टकोण की आवश्यकता है। इसके लिए लम्बी अवधि तक लाखों लोगों को अनुसंधान में संलग्न रहना होगा । ग्रह की संपूर्ण शक्ति उसके प्रकाशमान भाग , उसकी गति और सूर्य से इसकी कोणिक दूरी में अंतिर्नहित है , अन्यत्र कहीं नहीं , इस बात को समझना होगा। हर व्यक्ति के जन्मकाल से ही चंद्रमा के काल का आरंभ हो जाता है , इसके बाद बुध , फिर मंगल , शुक्र , सूर्य , बृहस्पति और शनि का काल आता है। प्रत्येक का काल 12 वषोZं का होता है। प्रत्येक ग्रह अपनी शक्ति के अनुसार ही अपने काल में फल प्रदान करता है। मानव-जीवन में ग्रहों के प्रतिफलन काल को समझने के लिए गत्यात्मक दशा पद्धति फलित ज्योतिष को वैज्ञानिक आधार प्रदान कर रहा है , इसमें किसी प्रकार का संशय नहीं।


'गत्यात्मक ज्योतिष' टीम से मुलाक़ात करें।



ज्योतिषी महामानव या भगवान का अवतार नहीं

bhagya se
ज्योतिषी महामानव या भगवान का अवतार नहीं 

(लेखक -विद्या सागर महथा )


हर जिले में अनिवार्यत: एक जिलाधीश होता है , किन्तु कई जिलों में भटकने के बाद भी दुर्भाग्य से एक सही ज्योतिषी से भेंट नहीं हो पाती , ऐसा लोगों का मानना है। इस विरलता का यह अर्थ कदापि नहीं कि ज्योतिषी कोई महामानव या भगवान का अवतार होता है , जैसा कि लोग सोंचते हैं और ज्योतिषी से बहुत अधिक अपेक्षा करते हैं। वे समझते हैं कि ज्योतिषी को न सिर्फ सभी बातों की जानकारी होती है , वरन् वे सभी जटिलताओं का इलाज भी कर सकते हैं। लेकिन वास्तव में ऐसी कोई बात नहीं होती। मै यह स्वीकार करता हूं कि भविष्य की जानकारी के लिए फलित ज्योतिष के सिवा कोई दूसरी विद्या सहायक नहीं हो सकती और किसी व्यक्ति का यह बड़ा सौभाग्य है कि इसकी जानकारी उसे होती है , किन्तु किसी भी हालत में वह सर्वज्ञ नहीं हो सकता। 



अभी तक फलित ज्योतिष विकासशील विद्या ही है , पूर्ण विकसित या विज्ञान का स्वरुप प्राप्त करने में अभी काफी विलम्ब है। ऐसी स्थिति में इसका सहारा लेकर वांछित निष्कर्ष प्राप्त कर लेना काफी कठिन कार्य है। हमारा दुर्भाग्य है कि एक ज्योतिषी को भी किसी निष्कर्ष तक पहुंचने में अपने अंत:करण की आवाज या अनुमान का आंशिक तौर पर सहारा लेना ही पड़ता है। 



असाधारणत्व की रक्षा के लिए संदिग्ध आचरण 


अक्सर यह देखा गया है कि इस अनुमान की जगह ज्योतिषी धूर्त्तता का सहारा लेते हैं। यह सत्य है कि जिस तरह के साधन का उपयोग किया जाता है , साध्य भी उसी अनुरुप हो जाता है। फलित ज्योतिष की बहुत सारी त्रुटियो के कारण इस समय किसी लगनशील समर्पित ज्योतिषी द्वारा भी की जानेवाली भविष्यवाणी भी अविकसित आधार के कारण त्रुटिपूर्ण ही प्राप्त होगी। इस परिस्थिति में फलित ज्योतिष के जानकार सिद्ध पुरुष , महामानव या भगवान के अवतार हो ही नहीं सकते। इस प्रकार का ढोंग भी अच्छा नहीं लगता। फलित ज्योतिष के अध्येता इन कमजोरियों से भली-भॉति परिचित हैं। वे अन्य विद्याओं के जानकार की तरह ही फलित ज्योतिष के जानकार हैं। ग्रहों के फलाफल की जानकारी कुछ सूत्रों , सिद्धांतों और गणना के आधार पर प्राप्त कर लेते हैं। उन सिद्धांतों , सूत्रों या गणना की पद्धति की जिसे जानकारी हो जाएगी , वह वह भी सतत् अभ्यास से वांछित फल को प्राप्त कर सकता है। इस परिप्रेक्ष्य में कोई ज्योतिषी अपने को भिन्न समझे या लोग उसे असाधारण समझने लगें तो आमलोगों की अपेक्षाएं नििश्चत तौर पर बलवती हो जाएंगी।

bhagya ka khel



आमलोग ज्योतिषियों से अधिक अपेक्षा रखते हैं , इसीलिए इन्हें सिद्धपुरुष भी समझने लगते हैं। इधर ज्योतिषी भी इनके मनोभावों को समझकर अपनी वेश-भूषा , खान-पान , रहन-सहन , दिनचर्या , को असाधारण और भिन्न बनाकर लोगों की अपेक्षाओं में वृिद्ध ही करते हैं। किन्तु किसी की अधिक अपेक्षा करने से तथा उनकी मनोकामना की पूर्ति की दिशा में कोई मिथ्या आश्वासन देने के बीच एक बड़ी खाई बन जाती है। मजबूरन तथाकथित असाधारण व्यक्ति अपने असाधारणत्व की रक्षा के लिए तरह-तरह के झूठ-सच सबका सहारा लेते हैं और अंतत: उनका व्यक्तित्व संदिग्ध हो जाता है। किसी विज्ञान का विकास ऐसे महामानवों से कदापि नहीं हो सकता , जो बाबा या भगवान कहलाने में गर्व महसूस करते हों और फिर संदिग्ध आचरण को प्रस्तुत करते हों।


एक ज्योतिषी भी ग्रहों से संचालित होता है 


मै कहना चाहता हूं कि ज्योतिषी भी एक मनुष्य है , वह भी ग्रहों से संचालित है । किसी एक ग्रह की वजह से ज्योतिष प्रकरण की उसे विशेष सकारात्मक जानकारी हो गयी है। हो सकता है , अन्य ग्रहों का भी सहयोग इस विशेष दिशा में प्राप्त हो गया हो। निस्संदेह ऐसी परिस्थितियों में उसे ज्योतिष शास्त्र का विशेष ज्ञान प्राप्त हो गया हो और इसके विकसित होने की संभावना बढ़ेगी , जिससे लोगो का दृिष्टकोण में परिवत्र्तन हा़ेगा , लोग सत्य के अधिक निकट होंगे। ग्रह फलाफल की सही जानकारी से लोग अधिक सुखी हो सकते हैं , किन्तु व्यक्ति या महामानव कोई भी हो , सभी के लिए अच्छे या बुरे ग्रहों का काल उपस्थित होता रहता है।


संसार का निर्माण ही धनात्मकता और ऋणात्मकता के संयोग से हुआ है। अत: किसी ज्योतिषी को भविष्यद्रष्टा या दूरदर्शिता से संयुक्त एक मनुष्य से अधिक समझने की बात नहीं होनी चाहिए। संसार में इनकी भी बहुत सारी समस्याएं हो सकती हैं। इनके शरीर में किसी प्रकार की जटिलताएं आ जाएं तो इन्हें डॉक्टर के पास जाना पड़ सकता है। इनका भी अपना परिवार होता है , जिसके सदस्यो की देखभाल के लिए इनको धन की भी आवश्यकता होती है। इनके भी बंधु-बांधव होते हैं , जिनका ख्याल रखना पड़ता है। ये भी संपत्ति और स्थायित्व की अभिलाषा रखते हैं । इनकी भी संतानें होती हैं और वे इन्हें सुिशक्षित बनाकर अधिकारी बनाने का सपना देखते हैं। ये अपने अहं की रक्षा के लिए अपने प्रभाव को प्रदर्शित करने में तनिक भी संकोच नहीं करते हैं 


ज्योतिषी भी शरीरधारी हैं और इनके शरीर में सभी ग्रंथियॉ मौजूद हैं। स्वाभाविक है , इनकी सभी इंद्रियॉ सचेतन होंगी। अत: इनके लिए भी अच्छी गृहस्थी और विश्रामागार आवश्यक है। जनसामान्य की तरह ही काम , निद्रा , क्षुधा , नित्यकर्म में नियमितता इनके लिए आवश्यक हैं। समाज राज्य में अपने वर्चस्व , प्रभाव और प्रतिष्ठा को बनाए रखने की ये अभिलाषा रखते होंगे। मानवीय स्वभाव के अनुरुप ही यदि वे समाज को कुछ दे रहें होंगे , तो कुछ प्राप्ति की आशा भी मन में संजोए होंगे। इनके जीवन का भी कुछ अभीष्ट होगा , जिससे वे संयुक्त होना चाहते होंगे।


एक ज्योतिषी को भी उचित फी की आवश्यकता होती है .


ये ब्रह्मवेत्ता हैं , ये भविष्यद्रष्टा हैं , ये महामानव हैं , यहॉ तक कि ये भगवान हैं , अत: सांसारिकता से इन्हें कोई मतलब नहीं है , जब लोग किसी के प्रति ऐसी बातें सोंचने लगतें हैं तो वह व्यक्ति भी जाने अनजाने वैसा ही आचरण लोगों के सम्मुख प्रस्तुत करता है। सन्यासी की वेश-भूषा धारण कर वह यह सिद्ध करने की चेष्टा करता है कि उसके शरीर की रक्षा और साज-सजावट के लिए कम से कम वस्त्रों की आवश्यकता है। दाढ़ी-मूंछ और जटा-जूट रखकर वह प्रकृति के अधिक निकट होने की ढोंग करता हैं। वह सादे रहन-सहन और उच्च विचारधारा के प्रदशZन का स्वांग रचता है , भगवान का एजेंट होने का दावा करता है , किन्तु बहुत सारी कहानियों में आपने पढ़ा होगा कि ऐसे लिबास के अंदर बहुत ही क्रूर अमानवीय व्यक्ति छुपा होता है। ऊपर से सन्यासी की वेश-भूषा धारण करनेवाला व्यक्ति लुटेरा या डकैत होता है । लोग उसे ठगना चाहते हैं , वह लोगों को ठगकर चला जाता है। यहॉ न्यूटन का तीसरा नियम लागू होता है । किसी ज्योतिषी को मामूली दक्षिणा देकर वे अपनी ड्यूटी पूरी कर लेते हैं , यह सोंचते हुए कि ज्योतिषी को भला धन की क्या आवश्यकता , पर ज्योतिषी को लगता है , इस ब्रह्मज्ञान के बदले इतनी मामूली सी दक्षिणा , जिससे परिवार का भरण-पोषण भी ढंग से नहीं किया जा सकता। बाबा द्वारा निकाले गए दूसरे रास्ते में आप कर्मकांड में इस प्रकार उलझा दिए जाते हैं , कि उनकी जेब बढ़िया से कट जाती है। बाबा अच्छी तरह जानते हैं कि इस दुनिया में कम से कम पढ़ा-लिखा व्यक्ति भी अच्छी कमाई कर लेता है , जब उन्हें पैसे-पैसे के लिए ही मुहंताज रहना पड़े , तो फिर इस ब्रह्मविद्या की जानकारी से क्या लाभ ?


डॉक्टर , इंजिनियर , वकील अपेक्षाकृत कम जानकारी के बाद भी अधिक से अधिक धन अर्जित करने में सक्षम हैं। यही नहीं , उनके सहयोगी क्वैक डॉक्टर , चैनमैन या मुंशी भी नाजायज कमाई करके प्रचुर धन अर्जित कर लेते हैं। ऐसी परिस्थिति में मामूली दक्षिणा में कोई ज्योतिषी इस विद्या में किस प्रकार पूर्ण समर्पित हो सकता है ? सरकारी व्यवस्था भी ऐसी कि डिग्री , डिप्लोमा प्राप्त करनेवाले व्यक्ति को सरकारी नौकरी मिल भी सकती है , पर फलित ज्योतिष के जानकार को नहीं। अत: ब्रह्मविद्या के जानकार दैवज्ञ बाबा अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत करने में ठगी और धूत्र्तता का सहारा लेते हैं। जो ज्योतिषी सामान्य व्यक्ति की तरह अपने घर में रहकर फलित ज्योतिष के अध्ययन में जीजान से जुटा हो , उसे मामूली व्यक्ति समझकर पेश आया जाता है। यदि उसकी आर्थिक स्थिति कमजोर है और उसके समक्ष स्थायित्व का संंकट है तो उसे सही पारिश्रमिक देकर भी उसे उबारा नहीं जाता है , सबको लगता है कि उनके पैसे का दुरुपयोग न हो जाए । एक ज्योतिषी तो बाबाजी होता है , उसे स्थायित्व की क्या आवश्यकता ? उसे तो आश्रम में होना चाहिए , जहॉ घर-गृहस्थी का कोई झमेला न हो । वे आश्रम में रहकर इस विद्या को अधिक विकसित कर पाएंगे , ऐसा सबका मनोभाव होता है । इस मनोभाव को बाबा अच्छी तरह समझने लगे हैं , इसलिए वे आश्रम में ही रहने लगे हैं।


भीड़ भाड़ से दूर स्थित होता है बाबा का आश्रम 


हर आश्रम भीड़-भाड़ से दूर प्राकृतिक सुषमाओं से संयुक्त काफी विस्तृत जमीन पर होता है। एक समाजसेवी संस्था के रुप में इसके विकास का संकल्प होता है। इसके बहुत सारे विभाग होते हैं। इसके लिए बड़ी बड़ी इमारतों की जरुरत होती है। लोगों के सर्वांगीन विकास के साथ साथ बहुआयामी सुख-सुविधाओं का संकल्प होता है । यहॉ दैहिक , दैविक , भौतिक ताप किसी को नहीं होना चाहिए। नर-नारी का कोई भेद नहीं होता , सबके मनोवैज्ञानिक सुख और संतुिष्ट के लिए आश्रम उन्मुक्त , स्वच्छंद भोग विलास की पुष्पवाटिका होती है। सभी उच्च संगति का रसास्वादन करते हैं। ऐसे स्वर्गीय सुख को प्राप्त करने के लिए रमणीक स्थल का विकास किया जाता है , जिसके लिए पर्याप्त धन की आवश्यकता होती है। खास अवसरों पर यहॉ बड़े-बड़े उत्सव का आयोजन होता है। हजारो और लाखों की संख्या में भीड़ एकति्रत होती है। भक्त बहुत ही गदगद होकर बड़ी श्रद्धा के साथ क्षणभर में दान-दक्षिणा में लाखों करोड़ों एकति्रत कर देे हैं। आश्रमवाले बाबा विशेष उत्सव के अवसर पर साज-सजावट में जितना ही अधिक तामझाम प्रस्तुत करते हैं , जितने ही आधुनिक संसाधनों का उपयोग करते हैं , चंदे की रकम उसी के अनुपात में कई गुणा अधिक बढ़ते हुए क्रम में होती है। इस तरह भीड़-भाड़ , ताम-झाम और समृिद्ध ही उनके आध्याित्मक विकास और गुण-ज्ञान की गहराई का परिचायक बन जाती है , जबकि सच तो यह है कि प्रयोगशाला में तल्लीन खेजकत्र्ता के लिए भीड़-भाड़ , तामझाम या बड़े धन की आवश्यकता नहीं होती।


उपरोक्त व्याख्या का यह कदापि अर्थ नहीं कि मै बड़ी संस्था या आश्रम का पक्षधर नहीं हूं। विश्वकवि रविन्द्र नाथ टैगोर ने वोलपुर के आश्रम शांति-निकेतन को विश्वविद्यालय का स्वरुप प्रदान किया। श्रीराम शर्मा आचार्य ने मथुरा के अपने आश्रम को गायत्री मंत्र के माध्यम से जन-जागरण और आध्याित्मक विकास का उत्कृष्ट मंच बना दिया है। संसार के सभी विद्यालयों को चलाने के लिए बड़े पैमाने पर धन और संसाधन की आवश्यकता होती ही है , किन्तु संचालनकत्र्ता के गुण-अवगुण की परीक्षा करने में चूक हुई तो आश्रम वाले बाबा विराट स्तर पर व्याभिचार के साथ ही साथ राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय गिरोह के सरगना के रुप में कााम करना आरंभ कर देते हैं। किसी विश्वविद्यालय की पढ़ाई-लिखाई या प्रयोगशाला के प्रयोग में धनागम और खर्च का नियमित लेखा-जोखा होता है। आश्रम का लेखा-जोखा , हिसाब-किताब बाबा की इच्छा होती है। विश्वविद्यालय के उपकुलपति , प्राचार्य और हर विभाग के अध्यक्षों की शैक्षणिक और बौिद्धक योग्यता खुली किताब की तरह होती है, हो सकता है , यहॉ भी कुछ घपला हो , किन्तु आश्रम के मौनी बाबा और उनकी संपूर्ण कार्यवाही रहस्यात्मक होने के कारण संदेह के घेरे में होती है। वहॉ अच्छाइयों के साथ ही साथ बुराइयों के पनपने की पूरी संभावना होती है। अत: बहुत सारी विशेषताओं के बावजूद मानव को महामानव समझने की भूल न करें , किसी ज्योतिषी को बाबा , सृिष्टकत्र्ता , जन्मदाता या भगवान नहीं समझें। यदि आत्मा कहे तो गुरुजी या आचार्य कहना ही काफी होगा। 


मामूली भूल भी विरक्ति का कारण बन जाती है 


कहने का अभिप्राय यह है कि जिस बाबा में मानवीय गुणों का अत्यधिक विकास हो चुका है , जो अपने नैसगिZक गुणों के विकास के कारण लोक-मंगल की कामना और तद्नुरुप आचरण के लिए विख्यात है , जिन्हें ईश्वर के सही स्वरुप का बोध हो चुका है या जो ब्रह्मविद्या के जानकार हैं , वे भी शरीर धारण करने की वजह से संासारी है तथा संासारिक आवश्यताओं कोे महसूस करते हैं। अत: बाबा बनाकर उन्हें उनके अधिकारों से वंचित न करें , अन्यथा अपनी जरुरतों के लिए वे जो रास्ता अपनाएंगे , वह आपको नागवार लग सकता है।


किसी से अधिक अपेक्षाएं रखने से उसकी मामूली भूल भी विरक्ति का कारण बन सकती है। यही कारण है कि ज्योतिषी की एक भी भविष्यवाणी गलत होने पर लोग विक्षुब्ध हो जाते हैं , उनकी आस्था वहॉ पर घटने लगती है, उनका विद्रोहात्मक स्वरुप उभरने लगता है , जबकि सच तो यह है कि हर मनुष्य से भूल होती है , ज्योतिषी से भी भूल हो सकती है। अरबों रुपए खर्च करके वैज्ञानिक एक उपग्रह छोड़ता है ,कुछ ही देर बाद वह पृथ्वी पर गिर जाता है , उपग्रह के ध्वस्त होने से देश की बड़ी पूंजी नष्ट होती है , बहुत सारे वैज्ञानिकों का वषोZं का परिश्रम बर्वाद होता है, इस प्रकार के प्रयोग में कल्पना चावला जैसी मूल्यवान वैज्ञानिक मारी जाती हैं , किन्तु इसके लिए वैज्ञानिकों की योग्यता को चुनौती नहीं दी जा सकती। उनके दोषों को क्षमा कर दिया जाता हैं , यह सोंचते हुए कि वैज्ञानिक भगवान नहीं होते । क्या यही कम है कि अनंत आकाश में उड़ने की महत्वाकांक्षी योजना या प्रगतिशील और विकासोन्मुख विचारधारा उनके पास है ? प्राकृतिक नियमों के रहस्यों से पर्दा उठाकर उन शक्तियों का समुचित उपयोग मनुष्य की सुख-सुविधाओं के लिए कर रहें हैं। एक डॉक्टर चिकित्सा विज्ञान का विशेषज्ञ होता है । अपनी जानकारियों से मनुष्य या पशु के शरीर में उत्पन्न जटिलताओं को दूर करता है , किन्तु इलाज के क्रम में बहुत लोग मारे भी जाते हैं। इस तरह मनुष्य के पृथ्वी पर बने रहने के पीछे डॉक्टर का इलाज है , तो इलाज के दौरान मनुष्यों के मरने का अपयश भी उसके साथ है। लोगों की नजर में डाक्टर कसूरवार नहीं है , क्योंकि लोग उसे बाबा या भगवान के समकक्ष नहीं मानते। हर वकील मुकदमें की पैरवी करता है , सभी मुकदमा जीतने की इच्छा रखते हैं , लेकिन हर मुकदमें का निष्कषZ एक ही होता हैै , एक वकील जीतता है और दूसरा हारता है , किन्तु हारनेवाला मुविक्कल कभी भी किसी वकील पर दोषारोपण नहीं करता। वकील के हार-जीत की संभावनाएं 50 प्रतिशत होती है , किन्तु किसी ज्योतिषी की एक भी भविष्यवाणी गलत हो जाए तो उसपर चतुिर्दक आक्रमण होने लगता है ,क्योंकि बाबा की छोटी सी भूल को भी भक्तगण क्षमा नहीं कर पाते। 


आखिर ज्योतिषी का सामाजिक स्वरूप क्या हो 


एक बहुत ही गंभीर प्रश्न खड़ा होता है। क्या सचमुच ही बाबा के इसी रुप में लोग श्रद्धावनत होते हैं ? ज्योतिषी बाबा सरल वेश-भूषा में हो , उसे कम से कम संासारिक आश्यकताएं हों , उसे कम से कम पारिश्रमिक दिया जाए , उसे स्थायित्व प्राप्त न रहे , हर प्रकार की सुख-सुविधाओं से संयुक्त आवासीय सुविधा न हो , स्वयं सहनशील हो , उनकी संतान प्रगतिशील न हो। प्राचीनकाल में ऋषियों के साथ उनकी पित्नयॉ भी हुआ करती थी, परंतु आज के बाबा का जो स्वरुप लोगों के मस्तिष्क में उभरता है , वह यह कि उनके आध्याित्मक विकास के लिए उनका गृहस्थ आश्रम आवश्यक नहीं है। गृहस्थ होने मात्र से उनकी योग्यता को संदेह के घेरे में डाल दिया जाता है। आखिर जो विशुद्ध ज्योतिषी हैं , उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति कैसे होती होगी , यह ज्योतिषी के समक्ष उपस्थित होनेवाले लोग भी नहीं बता पाएंगे। सामान्य लोग उन्हें भगवान का दर्जा देकर मुक्त हो जाते हैं , जबकि मूर्धन्य लोग ज्योतिषी से मिलने की बात को छिपाने की पूरी कोिशश करते हैं। बड़े राजनेताओं की किसी ज्योतिषी से मिलने की चर्चा-परिचर्चा अखबारों पति्रकाओं में इतनी हो जाती है कि यही उनके पराभव का कारण बन जाती है। वत्र्तमान समाज में एक ज्योतिषी बाबा है या अछूत , यह बात तो हमारी समझ से परे है , किन्तु इतनी बात तो स्पष्ट है कि प्रगतिशील विचारधारा का कोई व्यक्ति ज्योतिषी से मिला , तो वह दकियानूसी हो गया। भला बताइए तो सही , उस ज्योतिषी बाबा के प्रति जनता का कौन सा भाव अच्छा है , जिसकी प्रशंसा की जा सके। नििश्चत रुप से बाबा कहकर जनता उसे ठगने की चेष्टा करती है , इसलिए वह खुद ही ठगी जाती है। अच्छा होगा , किसी ज्योतिषी की बौिद्धक क्षमता ,अर्जित गुण-ज्ञान के समानांतर उन्हें अपना हितैषी समझते हुए उसी के अनुरुप उनके साथ मानवीय व्यवहार प्रदिशZत किया जाए। 


वास्तव में ज्योतिषी एक समय विशेषज्ञ है 


एक ज्योतिषी समय विशेषज्ञ होता है। उसका काम अच्छे या बुरे समय की सूचना देना है। किन्तु अच्छा या बुरा समय बहु-आयामी हो सकता है। यदि समय अच्छा हुआ , तो कोई जरुरी नहीं कि आप सभी प्रकार के काम कर लेंगे , किन्तु इतना अवश्य होगा कि आपका कुछ काम इस ढंग से बनेगा कि कि आपका मनोबल ऊंचाई की ओर जाएगा। इस तरह बुरा समय हो तो कोई आवश्यक नहीं कि हर काम बुरा ही हो , परंतु कुछ घटनाएं इस ढंग से घटित होंगी , जिससे मनोबल गिरा हुआ महसूस होगा। अच्छा समय है तो कोई भी व्यक्ति अधिक से अधिक मनोवांछित फल की प्राप्ति के संदर्भ में बिल्कुल मस्त होता है। उसे किसी की परवाह नहीं होती , वह एक क्षण के लिए भी कदापि नहीं सोंच पाता कि इसकी निरंतरता में कभी कमी भी हो सकती है। उस समय किसी ज्योतिषी से राय-परामशZ करना भी उसकी शान के खिलाफ होता है। हर प्रकार के अच्छे फल को अपना कर्मफल मानता है , किन्तु बुरे समय के उपस्थित होने से उसकी घबराहट काफी बढ़ जाती है। बुरे समय की तीव्रता को कैसे कम किया जाए इसकी चिन्ता प्राय: सभी व्यक्ति को होती है। इसी अतिरिक्त प्रत्याशा के साथ प्राय: पूरा समाज किसी ज्योतिषी की ओर आकर्षित होता है , किन्तु बुरे समय को अच्छे समय में परिवर्तित करने के असफल प्रयास के कारण ही कोई ज्योतिषी बदनाम हो जाता है और पूरा समाज उससे विकर्षित होने लगता है। भला-बुरा कहने में भी लोगों को कोई हिचकिचाहट नहीं होती और ज्योतिषी के दिव्य या ब्रह्मज्ञान का कोई महत्व नहीं रह जाता।

कैसी विडम्बना है , एक ज्योतिषी आधुनिक वेश-भूषा , खान-पान का हिमायती हो तो उसके ज्योतिषीय ज्ञान पर संशय किया जाता है , वही ज्योतिषी किसी साधु-सन्यासी की वेश-भूषा में हो उसका खान-पान सन्यासियों की तरह हो , तो उसे लकीर का फकीर दकियानूस कहा जाता है , उसकें चरित्र को संदेह की दृिष्ट से देखा जाता है। इस परिस्थिति में एक प्रश्न बहुत ही महत्वपूर्ण है , ज्योतिषी का सामाजिक स्वरुप तांति्रक , यांति्रक , पुजारी , बाबा , सन्यासी या वैज्ञानिक - किसके जैसा हो ? ज्योतिषी एक सामान्य मनुष्य है , जिसे भविष्य की जानकारियॉ होती है। भविष्य की जानकारी देनेवाला व्यक्ति भविष्य को बदल नहीं सकता। भूकम्प या समुद्री तूफान की सूचना देनेवाला भूकम्प या समुद्री तूफान को रोक नहीं सकता , सिर्फ पूर्व सूचना से इससे प्रभावित होनेवाले लोग सावधानियॉ बरत सकते हैं। दो व्यक्ति राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार हैं , दोनो की जन्मकुंडली देखकर किसी के राष्ट्रपति चुने जाने की भविष्यवाणी की जा सकती है , परंतु दोनो के भाग्य या मंजिल को कैसे बदला जा सकता है ?

सूर्यग्रहण की भविष्यवाणी कर उससे पड़नेवाले प्रभाव को समझाया जा सकता है, परंतु इसे रोका नहीं जा सकता । जानकारी होने के बाद लोग क्या कर सकते हैं , वे अपनी बनावट के अनुसार , अपनी मानसिकता के अनुसार निर्णय लेंगे। आपके क्षेत्र में तूफान या भूकम्प हो , तो क्या करना होगा , सूर्यग्रहण के समय सूर्य को देखें या नही ? या फिर देखे तो किस प्रकार ? लोग अपनी कमजोरियों , असफलताओं और अदूरदर्शिता को किसी ज्योतषी पर नहीं थोपें , यही ज्योतिष के प्रति सच्ची श्रद्धा होगी । अपनी असफलताओं को छिपाने के लिए ग्रहों के जानकार के विवादास्पद स्वरुप को प्रस्तुत न करें।



शुक्रवार, 8 मई 2020

एक ज्योतिषी से लोगों की अपेक्षाएं बहुत होती हैं


एक ज्योतिषी से लोगों की अपेक्षाएं बहुत होती हैं 

आज कोई भी व्यक्ति जब एक ज्योतिषी के पास पहुंचता है तो उस व्यक्ति की ज्योतिषी से बहुत सारी अपेक्षाएं होती हैं। आम लोग यही समझते हैं कि ज्योतिषी को किसी के भविष्य की पूरी जानकारी होती है , अत: वह उस व्यक्ति के भविष्य की सारी बाते बता देगा। दूसरी ओर तरह-तरह के ज्योतिषी होते हैं , सभी के दावे एक से बढ़कर एक होते हैं । शरीर के रंग , कद ,स्वरुप , धन की मात्रा ,भाई-बहनों की संख्या , शैक्षणिक योग्यता , बाल-बच्चों की संख्या , शादी की तिथि , शादी की दिशा, मृत्यु का समय , लॉटरी से धन प्राप्त करने का समय ,व्यक्ति का नाम , पिताजी का नाम , हस्तरेखा से कुंंडली निर्माण आदि के दावे किसी ज्योतिषी की ज्योतिषीय योग्यता को प्रचारित करने के लिए विज्ञापन का काम भले ही कर जाए , उपरोक्त सभी संदभोZ की जानकारियॉ अभी तक का विकासशील फलित ज्योतिष किसी भी हालत में प्रदान नहीं कर सकता। इस प्रकार की जिज्ञासा को लेकर कोई भी व्यक्ति किसी ज्योतिषी के यहॉ पहुंचे तो उसे निराशा ही मिलेगी। ज्योतिषी से लोगों की अपेक्षाएं बहुत अधिक होती हैं। एक सज्जन पूछ रहें हैं- मेरी पुत्री की शादी किस दिशा में कब और कितनी दूरी पर होगी ? क्या इस प्रश्न का उत्तर सचमुच फलित ज्योतिष से दिया जा सकता है ?

वैदिक काल , पौराणिक काल , प्राक् ऐतिहासिक काल में स्वयंवर हुआ करते थे । उस समय वर-वधू अपने जोडे का खुद चयन किया करते थे । किन्तु उसके पश्चात् भारत में विदेशी आक्रमण होते चले गए और प्रतिष्ठा बचा पाने का भय इतना प्रबल हो गया कि लोगों ने अपनी पुति्रयों का विवाह जन्म लेने के साथ ही तय करना शुरु कर दिया। कहीं कहीं ऐसा भी उदाहरण देखने को मिला कि दो गर्भवती सहेलियॉ परस्पर यह तय करती थी कि एक दूसरे को पुत्र-पुति्रयॉ हुईं तो उनकी शादी कर दी जाएगी। सौ वषZ पूर्व तक बालक बालिकाओं की शादी शैशवकाल में की जाती थी। आज से 50 वषZ पूर्व शादियॉ उस समय होती थी जब लड़के लड़कियॉ क्रमश: पंद्रह और दस वषZ के हुआ करते थे। पच्चीस वषZ पूर्व बालिग होने पर ही विवाह का प्रचलन था , पर इस समय जब इक्कीसवीं सदी का आरंभ हो रहा है ,कोई भी जागरुक लड़का या लड़की तबतक शादी के पक्ष में नहीं होते , जबतक वे स्वावलम्बी नहीं बन जाते। इस समय वैवाहिक बंधन में बंधनेवालों की उम्र कभी-कभी 25-30 वषोZं से भी अधिक होती है। 

किसी संदर्भ की इतनी अपेक्षा क्यों ?


ध्यान देने की बात यह है कि एक ही ग्रह भिन्न भिन्न काल में कभी बाल्यावस्था में , कभी किशोरावस्था में ,और कभी युवावस्था में विवाह का योग उत्पन्न करता है। 15वी शताब्दी से 19वी शताब्दी तक सभी के लिए वैवाहिक योग शैशवावस्था में , 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में किशोरावस्था के आरंभ में ,20वीं शताब्दी के अंत में किशोरावस्था के अंत में तथा इक्कीसवी सदी के प्रारंभ में युवावस्था के मध्य में वैवाहिक योग उत्पन्न होता है । क्या इन बातों से ग्रह की प्रकृति और कार्यशैली में एकरुपता दिखाई पड़ती है ? यदि नही तो ज्योतिषी विवाह के समय के उल्लेख का दावा किस प्रकार करतें हैं ? ज्योतिष पर विश्वास करने वाले लोग इस संदर्भ में इतनी अपेक्षाएं क्यों रखते हैं ? यह बात दूसरी है कि देश काल के अनुसार सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए ग्रह की स्थिति और उसकी गत्यात्मकता से वैवाहिक काल की संभावनाओं पर परिचर्चा भले ही कर ली जाए।


20वीं शताब्दी के प्रारंभ या मध्य तक यातायात की बड़ी सुविधा नहीं थी , संपर्क-सूत्र भी महत्वपूर्ण नहीं थे , अत: शादी-विवाह आसपास निकटस्थ ग्राम में होते थे। जैसे-जैसे यातायात की सुविधाएं बढ़ती गयी , संपर्क-सूत्र बढते चले गए , सभ्यता का विकास होता गया , लोग िशक्षित होते गए , अन्तर्जातीय , अन्तप्राZंतीय , दूरस्थ , यहॉ तक कि अब देश-देशांतर तक की शादियॉ प्रचलित हो गयी हैं। वही ग्रह पहले सीमित जगहों में शादियॉ करवाते थे , अब दम्पत्ति पृथ्वी के दो छोर के भी हो सकते हैं। विवाह-सूत्र में बंधनेवाले अब किसी दूरी की परवाह नहीं करते हैं । अत: संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि कुंडली के ग्रहों को देखकर यह कदापि नहीं बतलाया जा सकता है कि जातक की शादी कहीं निकट स्थल में होनेवाली है या फिर काफी दूर। इसका कारण है , लोगों की मनोवृत्ति में आया बदलाव। पहले लोग अपने गॉव या आसपास के गॉवों में बसनेवाले अपनी जाति के लोगों को ही असली बिरादरी समझते थे , दूर की अपनी ही जाति के लोगों की कुलीनता पर संशय किया जाता था। अत: उनसे संबंध करके अपनी प्रतिष्ठा को दॉव पर से लोग बचते थे।


आज परिस्थितियॉ बिल्कुल भिन्न हैं। जाति और खून की पवित्रता गौण हो गयी है। धन अर्जित करने की क्षमता , कर्म और चरित्र ही प्रतिष्ठा के मापदंड बनते जा रहें हैं। वैवाहिक संबंध में दूरी अब बाधा नहीं रह गयी है। किसी भारतीय नारी या पुरुष की शादी अमेरिका या ब्रिटेन निवासी के साथ हो तो इसे शान और प्रतिष्ठा की बात समझी जाती है। दाम्पत्य जीवन में दो-चार वषोZं का वियोग हो , पत्नी 2-4 वषZ बड़ी भी हो तो इसे सहज स्वीकार कर लिया जाएगा। इस प्रकार के बदलते सामाजिक परिवेश में ग्रह के आधार पर यह निर्णय करना काफी कठिन होगा कि किसी की शादी निकट या दूर या फिर किस उम्र में होनेवाली है। 

भूतप्रेत सिद्ध कर भविष्यवाणी करना ज्योतिष नहीं


एक बार अति सामान्य और अतिवििशष्ट एक ही व्यक्ति से मिलने का मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ। अति सामान्य इसलिए क्योंकि वे वेश-भूषा और रुप-रंग से अतिसामान्य , वस्त्र के नाम पर लाल रंग का एकमात्र मामूली अंगोछा पहने हुए थे, मालूम हुआ , वे बाहर से आए हुए थे , अपने ही वेश-भूषा के अनुरुप कई दिनों से हरिजनों की बस्ती में मेल-मिलाप से रह रहें थे। मुझे शैशवकाल से ही ज्योतिष विद्या में रुचि है। मै मिलने के लिए उनके पास गया। उन्होने मुझे देखते ही कहा-आइए विद्यासागरजी , बैठिए। मै उनकी ज्योतिष विद्या से अवाक् था। मै अच्छी तरह जान रहा था कि इस ज्योतिषी को मेरा नाम किसी ने नहीं बताया है। फिर भी ऐसा समझते हुए कि मै इस क्षेत्र का महत्वपूर्ण विद्यार्थी हंू , मुझे आते हुए देखकर किसी ने मेरा नाम फुसफुसाकर बता दिया हो , मैने कहा- मेरे साथ जो हैं , उन्हे आपने बैठने को नहीं कहा । मैने जानबूझकर ज्योतिषी की परीक्षा लेने के लिए ये बातें कही , क्योंकि मेरे साथ जो व्यक्ति था , वह मेरे इलाके के लिए अजनबी था , उसका नाम लोग नहीं जानते थे , अत: ज्योतिषी को इसकी खबर नहीं हो सकती थी। ज्योतिषीजी मेरा इशारा समझ चुके थे। उहोेनें इस अजनबी का नाम हकलाते हुए ` अभ्यान , अभ्यान ,अभ्याननजी , बैठिए ´- कहा । वे अभ्यानन के नाम को ऐसे दूहरा रहे थे , मानो बहुत धीमी आवाज में कोई उन्हें अभ्यानन कह रहा हो और वे अंतिम `न´ को सुनने में कठिनाई महसूस कर रहें हों। इसके बाद उन्होने धारा प्रवाह बोलना शुरु कर दिया , हम कितने भाई-बहन हैं , बड़े भाई की शादी हो चुकी है , एक पुत्री है , बहन की दो पुति्रयॉ और एक पुत्र हैं। मेरे संबंध में उन्होने बताया- मै परीक्षा दे चुका हूं और परीक्षाफल का इंतजार है। अपेक्षित रिजल्ट में मामूली बाधा है। ज्योतिष की चाहे जिस विधा पर उनका पूर्ण नियंत्रण था या वे सििद्धप्राप्त पुरुष थे , उस दिन की उनकी सारी बाते जो घट चुकी थी , अक्षरश: सही थी , यहॉ तक कि कुछ दिनों बाद मेरा रिजल्ट भी निकला , मैंने मात्र एक अंक से प्रथम श्रेणी खो दी थी , परंतु मेरे सिवा बहुत लोगों के लिए बहुत सारी भविष्यवाणियॉ थी ,जो सभी गलत निकली। जो दम्पत्ति निकट भविष्य में संतान प्राप्त करनेवाले थे, उनके पुत्र-पुति्रयों से संबंधित भविष्यवाणियॉ, नौकरी प्राप्त करने की भविष्यवाणियॉ और निकट भविष्य में ही लाभ प्राप्त करने की भविष्यवाणियॉ गलत साबित हुईं। एक व्यक्ति मारकेश के प्रबल योग में पड़ा हुआ है , कहकर उसे काफी ठगा भी गया , परंतु उसे मामूली बुखार भी न हुआ।


इस पूरे प्रसंग पर गौर किया तो मेरे सामने जो निष्कर्ष आए , वह यह कि वह आदमी भूतात्मा सिद्ध किए हुए था। वह सिद्ध आत्मा ही उस व्यक्ति को वत्र्तमान तक की सारी बातें अक्षरश: बताया करता था और उसे ही वह तोते की तरह बोलता था। इस कारण भूत और वत्र्तमान की सारी बातें बिल्कुल सही थी , परंतु अधिकांश भविष्यवाणियॉ गलत थी , क्योंकि भविष्यकथन अनुमान पर आधारित था। वह व्यक्ति भूत और वत्र्तमान की सटीक चर्चा करके दूसरों का विश्वास प्राप्त करता था , परंतु भविष्य की जानकारी के लिए समुचित विद्या उसने अर्जित नहीं की थी। 
दूसरी एक बात और थी कि वह सामनेवाले को हिप्नोटाइज करता था और उसके मन की सारी बातों को बता देता था। तारीखों सहित भूत और वर्तमान की चर्चा किसी व्यक्ति को हिप्नोटाइज करके बतायी जा सकती है, किन्तु हिप्नोटिज्म विद्या के जानकार को ज्योतिषी कदापि नहीं कहा जा सकता , क्योकि भविष्य की जानकारी भूत विद्या या हिप्नोटिज्म से कदापि संभव नहीं है। 

गुणात्मक पहलू बतलाना संभव,संख्यात्मक नहीं 

इस प्रसंग का उल्लेख करना इसलिए आवश्यक समझा, क्योंकि मुझे भी पहले यही भ्रम हुआ था कि ज्योतिषी भाई-बहनों की संख्या बता सकता है , संतान की संख्या बता सकता है, यहॉ तक कि कितने पुत्र और कितनी पुति्रयॉ होंगी , इसे भी बतलाया जा सकता है , परंतु आज फलित ज्योतिष के चालीस वषीZय अध्ययन-मनन के बाद इस निष्कषZ पर पहुंचा हूं कि फलित ज्योतिष मानव-मन की मन:स्थिति , सुख-दुख आदि प्रवृत्तियों या उसकी तीव्रता का बोध कराता है न कि किसी संख्या का

भाई-बहन , सहयोगी , शक्ति , पुरुषार्थ , पराक्रम की चर्चा फलित ज्योतिष में तीसरे भाव से की जाती है। इंदिरा गॉधी का कोई सहोदर भाई या बहन नहीं था , परंतु उनके सहयोगियों की कोई कमी नहीं थी ,उनके पुरुषार्थ और पराक्रम पर भी किसी को संदेह नहीं था। भाई-बहन की संख्या का यहॉ कोई प्रयोजन नहीं है , जिनके सहयोग के लिए सहयोगी हाथों की संख्या लाखों और करोड़ों में थी।

आप कितने शक्तिशाली हैं , आपके कितने सहयोगी हैं ,इसकी चर्चा से कहीं उत्कृष्ट चर्चा यह होगी कि सहयोगी तत्वों के सृजन और उसे बनाए रखने की क्षमता आपमें कितनी है ? आपके पुरुषार्थ और पराक्रम से प्रभावित होकर आपके अनुयायियों की संख्या कितनी हो सकती है ? आपके सहयोगी या अनुयायी भी समय और स्थान के सापेक्ष कभी सैकड़ों , कभी हजारों और कभी लाखों में हो सकते हैं , परंतु ये सभी सहयोगी विपरित परिस्थितियों के उत्पन्न होने पर सहयोगी सिद्ध नहीं हो सकते हैं। हो सकता है , भाइयों की संख्या पॉच होने के बावजूद कोई काम न आए। अत: फलित ज्योतिष के लिए किसी भी परिस्थिति में संख्या बताना बहुत ही कठिन , कुछ हद तक असंभव है। जो संख्या बताने का दावा करते हैं , वे किसी न किसी प्रकार से लोगों को बेवकूफ बनाकर उसे विश्वास में लेने की चेष्टा करते हैं। इस तरह धनवान होने की बात कही जा सकती है , किसी भी हालत में नोटों की संख्या नहीं बतलायी जा सकती। स्पेकुलेशन से धन कमाने की बात कही जा सकती है , लेकिन लॉटरी के टिकट नंबर को नहीं बतलाया जा सकता । जो लॉटरी का नंबर बतलाकर लोगों को गुमराह करते हैं, वे अपने भाग्योदय के लिए लॉटरी का नंबर क्यो नहीं खोज पाते ? इसी तरह संपत्ति से संबंधित सुख और नाम यश की भविष्यवाणी की जा सकती है ,मकानों, दुकानों , सवारियों , खेतों , बागों की संख्या बता पाना फलित ज्योतिष की सीमा के अंदर नहीं आता । 
20वीं शताब्दी के मध्य में जब हमलोग हेाश ही रहें थे ,कई बार ऐसे सुयोग आए , 45-50 की उम्र के दंपत्ति को बाजे-गाजे के साथ वैवाहिक बंधन में बंधते देखा। बात समझ में हीं आ रही थी क्योंकि उस समय लोग किशोरावस्था के प्रारंभ में ही वैवाहिक बंधन में बंध जाते थे। मैने कौतुहलवश जब किसी से पूछा तो मुझे बताया गया कि वे शादी नहीं कर रहें हैं वरन् वैवाहिक जीवन की सफलता पर उत्सव मना रहे हैं। मैेने जब उनसे वैवाहिक जीवन के सफल होने के आधार के बारे में पूछा तो मालूम हुआ कि उक्त दम्पत्ति के पुत्र-पुति्रयों की संख्या 21 हो गयी है। उन दिनों उस इलाके में वैवाहिक जीवन की सफलता का मापदण्ड यही था। बाद में जब कुछ बड़ा हुआ तो पाया कि मेरे कई हमउम्रो के कुल भाई-बहन 11-12 की संख्या में थे। किसी को हमलोग फुटबॉल टीम या फिर पूरा दर्जन कहते थे ,क्योंकि आधे दर्जन की तो भरमार थी और इस सिलसिले को बहुत हद तक हमलोगों ने भी ढोया।

किन्तु इस जनसंख्या-वृिद्ध के दुष्प्रभाव को सबने महसूस किया और 20वीं शताब्दी के चतुर्थ चरण के प्रारंभ में श्रीमती इंदिरा गॉधी द्वारा परिवार नियोजन की आवाज को बुलंद किया गया। जोर-जबर्दस्ती से इस कार्यक्रम को चलाने के आरोप में उनकी सरकार भले ही ध्वस्त हो गयी हो , परंतु सीमित परिवार की आवश्यकता को धीरे-धीरे सभी ने स्वीकार किया। आज भारत की आबादी एक अरब से अधिक है तथा विश्व की 7 अरब के लगभग , अधिकांश देश अपनी मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने में अक्षम दिखाई दे रहें हैं। विकासशील देशों की सबसे बडी समस्या उसकी बढ़ती हुई आबादी है। विकसित और अविकसित सभी देशों में `हम दो : हमारे दो´ का नारा बुलंद है। जो इससे भी अधिक प्रगतिशील विचारधारा के हैं , वे `हम दो : हमारे एक´ की बात को चरितार्थ कर रहें हैं।

उपरोक्त परिप्रेक्ष्य को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि ग्रहों के साथ संतान की संख्या को जोड़ने की कोिशश निरर्थक सिद्ध होगी। आज भी कई ग्रह संतान स्थान में स्थित हो सकते हैं और अपनी क्षमता के अनुसार सिद्धांतत: संतान प्रदान करने की बात को सही सिद्ध करना चाहे तो अतीत के लिए कुछ जोड़-तोड़ के साथ ये नियम सही भी हो सकते थे परंतु आज ग्रह-बल के अनुरुप संतान-प्राप्ति की संख्या की बात निष्फल हो जाएगी। अत: इस संदर्भ में यही कहना उचित होगा कि अधिक से अधिक ग्रह सतंान भाव में मौजूद हो तो उस व्यक्ति को संतान सुख की प्राप्ति होती रहेगी । उसकी संतान का बहु-आयामी विकास होगा और हर काल में संतान-सुख की प्राप्ति होती रहेगी। वास्तव में सुख के साथ संतानसंख्या का कोई संबंध नहीं है। ` एकश्चन्द्रस्तमो हन्ति नच तारागणोपिच। ´ 
इसी प्रकार सप्तम भाव में स्थित ग्रहों को देखकर बहुत से पंडित एकभार्या , द्विभार्या या बहुभार्या योग की चर्चा करते हैं। इस पद्धति को भी गलत समझा जाना चाहिए। बहुत अधिक बलवान धनात्मक ग्रह की सप्तम भाव में उपस्थिति भोग-विलास ,सहवास की तीव्रता, तदनुरुप कार्यकलाप , कामकला में निपुणता , इससे संबंधित भावाभिव्यक्ति , नृत्यकला , अभिनय कला आदि का संकेतक होती है। कोई जरुरी नहीं है कि विलासिता की संतुिष्ट के लिए पित्नयों या भार्याओं की संख्या अधिक हो। 

भगवान श्रीकृष्ण की जन्मकुंडली में सप्तम भाव में एक भी ग्रह नहीं हैं या कुछ ग्रंथों में इनकी जन्मकुंडली में एकमात्र ग्रह स्वक्षेत्रीय मंगल सप्तम भाव में विराजमान है। फिर भी हजारों गोपियॉ उनकी प्रेमिका थी। राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन की जन्मकुंडलियों में सप्तम भाव में बहुत सारे ग्रह स्थित हैं । राजेश खन्ना को एक ही पत्नी मिली और ंउसके साथ भी सार्वकालीक निर्वाह नहीं हो सका। अमिताभ बच्चन एक पत्नी से ही सुखी दाम्पत्य जीवन जी रहें हैं , हालॉकि यह माना जा सकता है कि अभिनेता होने के नाते उन दोनों ने बहुत सुंदरियों के साथ भोग-विलास किया हो । उपरोक्त चर्चा से भी यह स्पष्ट होता है कि फलित ज्योतिष प्रवृत्तियों का विज्ञान है। किसी खास प्रवृत्ति की तीव्रता की चर्चा की जा सकती है , उसकी संख्या या मात्रा को निर्धारित नहीं किया जा सकता ।

फलित ज्योतिष से मनुष्य की इच्छा-शक्ति , बौिद्धक शक्ति , मंत्रणा-शक्ति , साहस , सूझ-बूझ , तेज , बड़प्पन , विश्वास , साख , दृढ़ता , पराक्र्रम , संघषZ-क्षमता , प्रभाव , मानवीय पक्ष , भाग्यवादी दृिष्टकोण , सामाजिक-राजनीतिक वातावरण , पद-प्रतिष्ठा प्राप्ति की संभावनाओं , धन-लाभ और आय-व्यय की प्रवृत्तियों की तीव्रता की चर्चा की जा सकती है , उसकी मात्रा का शािब्दक विवरण प्रस्तुत किया जा सकता है , किन्तु संख्या का उल्लेख कदापि नहीं किया जा सकता। ग्रहों के विद्युत-चुम्बकीय किरणों या कॉिस्मक तरंगों से हम प्रभावित हैं , उसकी तीव्रता की माप ग्रेड या श्रेणी में की जा सकती है । तत्संबंधित प्रवृत्तियों की तीव्रता की जानकारी अधिक से अधिक प्रतिशत में निकाली जा सकती है , किन्तु इनकी प्रतिशत तीव्रता को देखकर किसी भी संख्या का आकलण करना मूर्खता ही होगी । एक व्यक्ति में धन-संचय की प्रवृत्ति अपनी पराकाष्ठा पर हो तो इसका मतलब यह कदापि नहीं कि वह व्यक्ति विश्व का सबसे धनाढ्य आदमी है और हर काल में वह धनाढ्य ही बना रहेगा। पराकाष्ठा की तीव्रता से संबंधित योग भिन्न-भिन्न ग्रहों के साथ सैकड़ों बार बनेगा और भिन्न-भिन्न ग्रहों से उसके संपर्क को देखते हुए भिन्न-भिन्न काल में उसके स्वरुप में धनात्मक या ऋणात्मक परिवत्र्तन हो सकता है। संख्या की चर्चा फलित ज्योतिष में वैज्ञानिक प्रतीत नहीं होता।


संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *