<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-8693317056729335791</id><updated>2012-01-05T01:52:01.620-08:00</updated><category term='vidya sagar mahtha'/><category term='petarwar'/><category term='bokaro'/><category term='गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष'/><title type='text'>फलित ज्योतिष : सच या झूठ</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://jyotishsachyajhuth.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8693317056729335791/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jyotishsachyajhuth.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>संगीता पुरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04508740964075984362</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-3-6nqb_SsJg/TkYxJpLh07I/AAAAAAAABIo/QGE8zdftwBo/s220/sangita.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>16</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8693317056729335791.post-8484844009948589744</id><published>2010-03-30T07:34:00.000-07:00</published><updated>2011-08-30T02:32:27.682-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='bokaro'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='vidya sagar mahtha'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='petarwar'/><title type='text'>'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' की खोज : ग्रहों के बुरे प्रभाव को दूर करने के उपाय</title><content type='html'>हजारो वर्षों से विद्वानों द्वारा अध्ययन-मनन और चिंतन के फलस्वरुप मानव-मन-मस्तिष्‍क एवं अन्य जड़-चेतनों पर ग्रहों के पड़नेवाले प्रभाव के रहस्यों का खुलासा होता जा रहा है , किन्तु ग्रहों के बुरे प्रभाव को दूर करने हेतु किए गए लगभग हर आयामों के उपाय में पूरी सफलता न मिल पाने से अक्सरहा मन में एक प्रश्न उपस्थित होता है,क्या भविष्‍य को बदला नहीं जा सकता ?  किसी व्‍यक्ति का भाग्यफल या आनेवाला समय अच्छा हो तो ज्योतिषियों के समक्ष उनका संतुष्‍ट होना स्वाभाविक है, परंतु आनेवाले समय में कुछ बुरा होने का संकेत हो तो उसे सुनते ही वे उसके निदान के लिए इच्छुक हो जाते हैं। हम ज्योतिषी अक्सर इसके लिए कुछ न कुछ उपाय सुझा ही देते हैं लेकिन हर वक्त बुरे समय को सुधारने में हमें सफलता नहीं मिल पाती है। उस समय हमारी स्थिति कैंसर या एड्स से पीड़ित किसी रोगी का इलाज कर रहे डॉक्टर की तरह होती है ,जिसने बीमारी के लक्षणों एवं कारणों का पता लगाना तो जान गया है परंतु बीमारी को ठीक करने का कोई उपाय न होने से विवश होकर आखिर प्रकृति की इच्छा के आगे नतमस्तक हो जाता है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसी ही परिस्थितियों में हम यह मानने को मजबूर हो जाते हैं कि वास्तव में प्रकृति के नियम ही सर्वोपरि हैं। हमलोग पाषाण-युग, चक्र-युग, लौह-युग, कांस्य-युग ................ से बढ़ते हुए आज आई टी युग में प्रवेश कर चुकें हैं, पर अभी भी हम कई दृष्टि से लाचार हैं। नई-नई असाध्य बीमारियॉ ,जनसंख्या-वृद्धि का संकट, कहीं अतिवृष्टि तो कहीं अनावृष्टि, कहीं बाढ़ तो कहीं सूखा ,कहीं भूकम्प तो कहीं ज्वालामुखी-विस्फोट--प्रकृति की कई गंभीर चुनौतियों से जूझ पाने में विश्व के अव्वल दर्जे के वैज्ञानिक भी असमर्थ होकर हार मान बैठे हैं। यह सच है कि प्रकृति के इन रहस्यों को खुलासा कर हमारे सम्मुख लाने में इन वैज्ञानिकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, जिससे हमें अपना बचाव कर पाने में सुविधा होती है। प्रकृति के ही नियमो का सहारा लेकर कई उपयोगी औजारों को बनाकर भी हमने अपनी वैज्ञानिक उपलब्धियों का झंडा गाडा है , किन्तु वैज्ञानिकों ने किसी भी प्रकार प्रकृति के नियमों को बदलने में सफलता नहीं पायी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पृथ्वी पर मानव-जाति का अवतरण भी अन्य जीव-जंतुओं की तरह ही हुआ। प्रकृति ने जहॉ अन्य जीव-जंतुओं को अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए कुछ न कुछ शारिरिक विशेषताएं प्रदान की वहीं मनुष्‍य को मिली बौद्धिक विशेषताएं , जिसने इसे अन्य जीवों से बिल्कुल अलग कर दिया। बुद्धिमान मानव ने सभी जीव जंतुओं का निरिक्षण किया, उनकी कमजोरियों से फायदा उठाकर उन्हें वश में करना तथा खूबियों से लाभ लेना सीखा। जीव-जंतुओं के अध्ययन के क्रम में जीव-विज्ञान का विकास हुआ। प्राचीनकाल से अब तक के अनुभवों और प्रयोगों के आधार पर विभिन्न प्रकार के जीवों ,उनके कार्यकाल ,उनकी शरिरीक बनावट आदि का अध्ययन होता आ रहा है। आज जब हमें सभी जीव-जंतुओं की विशेषताओं का ज्ञान हो चुका है , हम उनकी बनावट को बिल्कुल सहज ढंग से लेते हैं । कौए या चिड़ियां को उड़ते हुए देखकर हम बकरी या गाय को उड़ाने की भूल नहीं करतें। बकरी या गाय को दूध देते देखकर अन्य जीवों से यही आशा नहीं करते। बकरे से कुत्ते जैसी स्वामिभक्ति की उम्मीद नहीं करतें। घोड़े की तेज गति को देखकर बैल को तेज नहीं दौड़ाते। जलीय जीवों को तैरते देखकर अन्य जीवों को पानी में नहीं डालते। हाथी ,गधे और उंट की तरह अन्य जीवों का उपयोग बोझ ढोने के लिए नहीं करते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस वैज्ञानिक युग में पदार्पण के बावजूद अभी तक हमने प्रकृति के नियमों को नहीं बदला । न तो बाघ-शेर-चीता-तेदुआ-हाथी-भालू जैसे जंगली जानवरों का बल कम कर सकें , न भयंकर सर्पों के विष को खत्म करने में सफलता मिली , और न ही बीमारी पैदा करनेवाले किटाणुओं को जड़ से समाप्त किया। पर  अब जीन के अध्‍ययन में मिलती जा रही सफलता के बाद यह भी संभव हो सकता है कि किसी एक ही प्राणी को विकसित कर उससे हर प्रकार के काम लिया जा सके। पर इस प्रकार की सफलता के लिए हमें काफी समय तक विकास का नियमित क्रम तो रखना ही होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 17px;"&gt;जीव-जंतुओं के अतिरिक्त हमारे पूर्वजों ने पेड-पौधों का बारीकी से निरिक्षण किया। पेड़-पौधे की बनावट , उनके जीवनकाल और उसके विभिन्न अंगों की विशेषताओं का जैसे ही उसे अहसास हुआ, उन्होने जंगलो का उपयोग आरंभ किया। हर युग में वनस्पति-शास्त्र वनस्पति से जुड़े तथ्यो का खुलासा करता रहा ,जिसके अनुसार ही हमारे पूर्वजों ने उनका उपयोग करना सीखा। फल देनेवाले बड़े वृक्षों के लिए बगीचे लगाए जाने लगे। सब्जी देनेवाले पौधों को मौसम के अनुसार बारी-बारी से खाली जमीन पर लगाया जाने लगा। इमली जैसे खट्टे फलों का स्वाद बढ़ानेवाले व्यंजनों में इस्तेमाल होने लगा। मजबूत तने वाली लकड़ी फर्नीचर बनाने में उपयोगी रही। पुष्‍पों का प्रयोग इत्र बनाने में किया जाने लगा। कॉटेदार पौधें का उपयोग बाड़ लगाने में होने लगा। ईख के मीठे तनों से मीठास पायी जाने लगी। कडवे फलों का उपयोग बीमारी के इलाज में किया जाने लगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह भूगर्भ में बिखरी धातुएं भी मानव की नजर से छुपी नहीं रहीं। प्रारंभ में लौह-अयस्क, ताम्र-अयस्क और सोने-चॉदी जैसे अयस्को को गलाकर शुद्ध रुप प्राप्त कर उनका उपयोग किया गया । भिन्‍न भिन्‍न धातुओं की प्रकृति के अनुरूप उनका उपयोग भिन्‍न भिन्‍न प्रकार के गहने और बर्तनों को बनाने में किया गया। फिर क्रमश: कई धातुओं को मिलाकर या कृत्रिम धातुओं को बनाकर उनका उपयोग भी किया जाने लगा। भूगर्भ के रहस्यों का खुलासा करने के लिए वैज्ञानिकों के द्वारा कितने साधन भी बनाए जा चुके , ध्येय भूगर्भ के आंतरिक संरचना की पहचान करना है, उससे फायदा उठाने की है , उसमें किसी प्रकार के बदलाव की कल्पना भी वैज्ञानिकों द्वारा नहीं की जा सकती ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रकृति में तरह-तरह के जीव-जंतु , पेड़-पौधे और खनिज-भंडार भरे पड़े हैं। गुण और स्वभाव की दृष्टि से देखा जाए , तो कुदरत की हर वस्तु का अलग-अलग महत्व है। बड़े फलदार वृक्ष दस-बीस वर्षों तक अच्छी तरह देखभाल करने के बाद ही फल देने लायक होते हैं। कुछ फलदार वृक्ष दो-तीन वर्षों में ही फल देना आरंभ कर देते हैं। सब्जियों के पौधे दो-चार माह में ही पूंजी और मेहनत दोनों को वापस लौटा देते हैं। फर्नीचर बनाने वाले पौधों में फल नहीं होता , इनकी लकड़ी ही काम लायक होती है। वर्षों बाद ही इन वृक्षों से लाभ हो पाता है। यदि हमें समुचित जानकारी नहीं हो और टमाटर के पौधों को चार-पॉच महीने बाद ही फल देते देखकर उपेक्षित दृष्टि से आम के पेड़ को देखें या आम के सुंदर पेड को देखकर बबूल को खरी-खोटी सुनाएं , तो यह हमारी भूल होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आर्थिक दृष्टि से देखा जाए , तो कभी लोहे का महत्व अधिक होता है , तो कभी सोने का , कभी पेट्रोलियम का महत्व अधिक होता है , तो कभी अभ्रख का। कभी घोड़े-हाथी राजा-महाराजाओं द्वारा पाले जाते थे , जबकि आज घोडे हाथी दर दर की ठोकरें खा रहे हैं और चुने हुए नस्लों के कुत्तों का प्रचलन अच्‍छे घरानों में है। कभी आम के पेड़ से अधिक पैसे मिलते थे , कभी शीशम से और आज टीक के पेड़ विशेष महत्व पा रहे हैं। युग की दृष्टि से किसी वस्तु का विशेष महत्व हो जाने से हम पाय: उसी वस्तु की आकांक्षा कर बैठते हैं , तो क्या अन्य वस्तुओं को लुप्त होने दिया जाए। आज टीक सर्वाधिक पैसे देनेवाला पेड़ बन गया है , तो क्या आम का महत्व कम है ? आखिर आम का स्वाद तो आम का पेड़ ही तो दे सकता है। वर्षों से उपेक्षित पड़े देश पेट्रोलियम के निर्यात करने के क्रम में आज भले ही विश्व के अमीर देशों में शामिल हो गए हों , पर अन्य वस्तुओं के लिए उसे दूसरे देशों पर निर्भर रहना ही पड़ता है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 17px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 17px;"&gt;फिर हमारे पूर्वजों की नजरें आसमान तक भी पहुंच ही गयी। अगणित तारें, चंद्रमा, सूर्य , राशि ,नक्षत्र  ............ भला इनके शोध क्षेत्र में कैसे शामिल न होते। ब्रह्मांड के रहस्यों का खुलासा करने में मानव को असाधारण सफलता भी मिली और इन प्राकृतिक नियमों के अनुसार उन्होने अपने कार्यक्रमों को निर्धारित भी किया। पृथ्वी अपनी घूर्णन 24 घंटे में पूरी करती है इस कारण 24 घंटे की घड़ी बनायी गयी। चंद्रमा को पृथ्वी की परिक्रमा करने में 28 दिन लगते हैं इसलिए चंद्रमास 28 दिनों का निश्चित किया गया। 365 दिनों में पृथ्वी अपने परिभ्रमण-पथ पर पूरी घूम जाती है , इसलिए 365 दिनों के एक वर्ष का कैलेण्डर बनाया गया। 6 घंटे के अंतर को हर चौथे वर्ष लीप ईयर मनाकर समायोजित किया गया। दिन और रात , पूर्णिमा और अमावस्या , मौसम परिवर्तन ................ सब प्रकृति के नियमों के अनुसार होते हैं इसकी जानकारी से न सिर्फ समय पर फसलों के उत्‍पादन में ही , वरन् हमें अपना बचाव करने में भी काफी सुविधा होती है। अधिक गर्मी पड़नेवाले स्थानों में ग्रीष्‍मऋतु में प्रात: विद्यालय चलाकर या गर्मियों की लम्बी छुटि्टयॉ देकर चिलचिलाती लू से बच्चों का बचाव किया जाता है। बरसात के दिनों में बाढ की वजह से रास्ता बंद हो जानेवाले स्थानों में बरसात में छुटि्टयॉ दे दी जाती हैं ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग्रह-नक्षत्रों की किसी खास स्थिति में पृथ्वी के जड़-चेतनों पर पड़नेवाले खास प्रभाव को महसूस करने के बाद ही `फलित ज्योतिष´ जैसे विषय का विकास किया गया होगा। परंतु शायद कुछ प्रामाणिक नियमों के न बन पाने से , भविष्‍यवाणियों के सटीक न हो पाने से या वैज्ञानिक सोंच रखनेवालों का ज्योतिष के प्रति दुराग्रह के कारण ही आधुनिक वैज्ञानिक युग में ज्योतिष का अच्छा विकास नहीं हो पाया। किन्तु वर्षों की साधना के बाद हम `गत्यात्मक ज्योतिष´ द्वारा सटीक भविष्‍यवाणियॉ करने में सफल हो रहे हैं। हमने पाया है कि विभिन्न जंतुओं और पेड़-पौधों में यह बात होती है कि उनके बीज से ही उन्हीं के गुण और स्वभाव वाले पेड़-पौधे और जीव-जंतुओं का जन्म होता है , पर मनुष्‍य के बच्चे शारीरिक और आंतरिक संरचना में भले ही अपने माता-पिता से मिलते जुलते हों , परंतु उनकी मन और बुद्धि के काम करने के ढंग में विभिन्नता होती है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 17px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 17px;"&gt;जन्म के समय ही हर बच्चे में समानता नहीं देखी जाती है। कोई शरीर से मजबूत होता है , तो कोई कमजोर। किसी में रोग-प्रतिरोधक-क्षमता की प्रचुरता होती है , तो किसी में इसकी अल्पता। कोई दिमाग से तेज होते हैं , तो कोई कमजोर। पालन-पोषण के समय में भी बच्चे का वातावरण भिन्न-भिन्न होता है। बहुत बच्चों को भरपूर प्यार मिल पाता है ,जिससे उनका मनोवैज्ञानिक विकास अच्छी तरह हो पाता है। पूरे जीवन वे मनमौजी और चंचल हो जाते है , अपनी इच्छा पूरी करने में बेसब्री का परिचय देते है। अपनी बातें बेबाक ढंग से रख पाने में सफल होते है। बहुत बच्चे प्यार की कमी महसूस करते हैं , जिससे इनका मनोवैज्ञानिक विकास सही ढंग से नहीं हो पाता है। पूरी जिंदगी वे अपनी इच्छाओं को दबाने की प्रवृत्ति रखते हैं। उनके जन्मकालीन ग्रहों के प्रभाव से ही पूरी जिंदगी उनके सामने अलग-अलग तरह की परिस्थितियॉ आती हैं। जन्मकालीन ग्रहों के प्रभाव से ही किसी की रुचि व्यवसाय में , किसी की पढ़ाई में , किसी की कला में और किसी की राजनीति में होती है। किसी का ध्यान अपने शरीर को मजबूती प्रदान करने का होता है , तो किसी का कोष को बढ़ाने का , किसी का ध्यान संपत्ति की स्थिति को मजबूत बनाने का होता है , तो किसी का ध्यान अपनी घर गृहस्थी और संतान को मजबूती देने का।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग्रहों के कारण आनेवाली कई समस्‍याओं के निराकरण कर पाने की दिशा में भी हमने काफी प्रयास किया है , हालॉकि विपरीत परिस्थितियों को पूर्ण रुप से सुधार न पाने का हमें अफसोस भी बना रहता है। पर किसी व्‍यक्ति के जन्‍मकालीन अच्‍छे ग्रहों के प्रभाव को बढाने और बुरे ग्रहों के प्रभाव को कम करने में तो कुछ कामयाबी मिल ही जाती है , समय का इंतजार भले ही हम करने को मजबूर होते हों। इसपर हम यह सोंचकर संतुष्‍ट हो जाते हैं कि प्रकृति के नियमों को बदल पाना इतना आसान नहीं । हो सकता है कुछ वर्षों में प्रकृति के किसी अन्य रहस्य को समझने के बाद हम बुरे ग्रहों के प्रभाव से पूर्णतया मुक्त हो सकें। पर अभी भी इस रहस्य का खुलासा कि अमुक ग्रह स्थिति में जन्म लेनेवालों की जीवन-यात्रा अमुक ढंग की होगी , निस्संदेह आज की बहुत बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि है। जिन्होनें भी इस धरती पर जन्म ले लिया है या लेनेवाले हैं ,उन्हें तो गत्यात्मक ज्योतिष के अनुसार उपस्थित होनेवाली परिस्थितियों के अनुसार जीवन जीना ही होगा ,परंतु यदि उन्हें अपने जीवन में आनेवाले सुखों और दुखों का पहले से ही अनुमान हो जाए तो वे तदनुरुप अपने कार्यक्रम बना सकते हैं । आनेवाले हर वर्ष या महीने के ग्रह स्थिति को जानकर अपने कार्य को अंजाम दे सकते हैं। यदि ग्रहो की स्थिति उनके पक्ष में हो तो वे हर प्रकार के कार्य को अंजाम देंगे।यदि ग्रहों की स्थिति उनके पक्ष में नहीं हो तो वे किसी प्रकार का रिस्क नहीं लेंगे। इस प्रकार वे अपने जीवनग्राफ के अच्छे समय के समुचित उपयोग द्वारा विशेष सफलता हासिल कर सकते हैं , जबकि बुरे समय में वे प्रतिरोधात्मक ढंग से जीवन व्यतीत कर सकते हैं । भविष्‍य में उत्पन्न होनेवाले बच्चों के लिए गत्यात्मक ज्योतिष वरदान हो सकता है। क्‍यूंकि विशेष मुहूर्तों में बच्चे को जन्म देकर उसकी जीवन-यात्रा को काफी महत्वपूर्ण तो बनाया ही जा सकता है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 17px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 17px;"&gt;युगों-युगों से मनुष्‍य अपने समक्ष उपस्थित होनेवाली समस्याओं के कारणों की जानकारी और उसके समाधान के लिए चिंतन-मनन करता रहा है। मानव-मन के चिंतन मनन के फलस्वरुप ही नाना प्रकार के उपचारों के विवरण हमारे प्राचीन ग्रंथों में मिलते हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि प्राकृतिक वनस्पतियों से ही सब प्रकार के रोगों का उपचार संभव है , उनकी पद्धति नेचरोपैथी कहलाती है। कुछ विद्वानों का मानना है कि जल ही जीवन है और इसके द्वारा ही सब प्रकार के रोगों का निदान संभव है। एक अलग वर्ग का मानना है कि विभिन्न प्रकार के योग और व्यायाम का भी मानव स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। कुछ ऋषि-मुनियों का मानना है कि वातावरण को स्वास्थ्यवर्द्धक बनाने में समय-समय पर होनेवाले यज्ञ हवन की भी बड़ी भूमिका होती है। सतत् विकास के क्रम में इसी प्रकार आयुर्वेद , होम्योपैथी , एक्यूपंक्चर , एक्यूप्रेशर , एलोपैथी की भी खोज हुई। फलित ज्योतिष मानता है कि मनुष्‍य के समक्ष उपस्थित होनेवाली शरीरिक , मानसिक या अन्य प्रकार की कमजोरी का मुख्य कारण उसके जन्मकाल के किसी कमजोर ग्रह का प्रभाव है और उस ग्रह के प्रभाव को मानव पर पड़ने से रोककर ही उस समस्या को दूर किया जा सकता है। इसी क्रम में विभिन्न धातुओं और रत्नों द्वारा या तरह तरह के पूजा पाठ के द्वारा ग्रहों के प्रभाव को कम कर रोगों का इलाज करने की परंपरा की शुरुआत हुई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर इन सबसे अलग पिछले बीस वर्षों से `गत्यात्मक ज्योतिष` भी कमजोर ग्रहों से जातकों को बचाने के लिए प्रयत्नशील रहा है। `गत्यात्मक ज्योतिष` के अनुसार ग्रहों की तीन मुख्य स्थितियॉ होती हैं , जिसके कारण जातक के सामने शारीरिक , मानसिक , आर्थिक , पारिवारिक या अन्य किसी भी असामान्य परिस्थितियां उपस्थित होती हैं और उससे वह अच्‍छे या बुरे तौर पर प्रभावित हो सकता है ----&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1  सभी वक्री ग्रह कमजोर होते हैं और जातक को अपने भाव से संबंधित कमजोर तथा निराशाजनक वातावरण प्रदान करते हैं , दुखद फल प्रदान करते हैं। खासकर ग्रह के गत्यात्मक दशाकाल में इनका प्रभाव अवश्य ही महसूस किया जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;2  सभी शीघ्री ग्रह मजबूत होते हैं और जातक को अपने भाव से संबंधित मजबूती तथा उत्साहजनक वातावरण प्रदान करते हैं , सुखद फल प्रदान करते हैं। खासकर ग्रह के गत्यात्मक दशाकाल में इनका प्रभाव अवश्य ही महसूस किया जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;3  सभी सामान्य ग्रह महत्वपूर्ण होते हैं और जातक को अपने भाव से संबंधित स्तर तथा कार्य करने का वातावरण प्रदान करते हैं , स्तरीय फल प्रदान करते हैं। खासकर ग्रह के गत्यात्मक दशाकाल में इनका प्रभाव अवश्य ही महसूस किया जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गत्यात्मक ज्योतिष के अनुसार ग्रहों के बुरे प्रभाव को परिवर्तित कर पाना यानि बुरे को अच्छे में तथा अच्छे को बुरे में बदल पाना कठिन ही नहीं असंभव है , किन्तु ग्रहों के बुरे प्रभाव को कम करने के लिए या अच्छे प्रभाव को और बढ़ा पाने के लिए निम्न सलाह दी जाती है --------------&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1   जिन जातकों के अधिकांश जन्मकालीन ग्रह शीघ्री होते हैं , उन्हें लगभग जीवनभर सारे संदर्भों की सुख-सुविधा आसानी से प्राप्त होती है , जिसके कारण वे थोड़े लापरवाह स्वभाव के हो जाते हैं , अपनी पहचान बनाने की इच्छा नहीं रखते हैं , इस कारण मेहनत से दूर भागते हैं। इस स्वभाव को कम करने के लिए उन्हें ऐसी अंगूठी पहननी चाहिए , जो उस दिन बनी हो , जब अधिकांश ग्रह सामान्य या मंद गति के हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;2  जिन जातकों के अधिकांश जन्मकालीन ग्रह सामान्य होते हैं , वे लगभग जीवनभर काफी महत्वाकांक्षी होते हैं , उन्हें अपनी पहचान बननने की दृढ़ इच्छा होती है , जिसके कारण ये सतत् प्रयत्नशील होते हैं , वैसे तो वर्तमान युग में ऐसे व्यक्तित्व का काफी महत्व है , किन्तु यदि ग्रह ऋणात्मक हो और फल प्राप्ति में कुछ विलम्ब की संभावना हो तो वे ऐसी अंगूठी पहनकर कुछ आराम कर सकते हैं , जो उस दिन बनी हो , जिस दिन अधिकांश ग्रह शीघ्री हों।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;3  जिन जातकों के अधिकांश ग्रह वक्री हों , उन्हें लगभग जीवनभर काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है , निरंतर निराशाजनक परिस्थितियों में जीने के कारण वे काफी कुंठित हो जाते हैं। इन परिस्थितियों को कुछ सहज बनाने के लिए उन्हें ऐसी अंगूठी दी जा सकती है , जो उस दिन बनी हो , जिस दिन अधिकांश ग्रह शीघ्री हों।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये अंगूठियॉ उस मुहूर्त्‍त में बनवायी जा सकती हैं , जब उन ग्रहों का शुभ प्रभाव पृथ्वी के उस स्थान पर पड़ रहा हो , जिस स्थान पर वह अंगूठी बनवायी जा रही हो। दो घंटे के उस विशेष लग्न का चुनाव कर अंगूठी को अधिक प्रभावशाली बनाया जा सकता है। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 17px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 17px;"&gt;हम संगति के महत्व के बारे में हमेशा ही कुछ न कुछ पढ़ते आ रहें हैं। यहॉ तक कहा गया है -----` संगत से गुण होत हैं , संगत से गुण जात ´। गत्यात्मक ज्योतिष्‍ा भी संगति के महत्व को स्वीकार करता है। एक कमजोर ग्रह या कमजोर भाववाले व्यक्ति को मित्रता , संगति , व्यापार या विवाह वैसे लोगों से करनी चाहिए , जिनका वह ग्रह या वह भाव मजबूत हो। इस बात को एक उदाहरण की सहायता से अच्छी तरह समझाया जा सकता है। यदि एक बालक का जन्म अमावस्या के दिन हुआ हो , तो उन कमजोरियों के कारण , जिनका चंद्रमा स्वामी है ,बचपन में बालक का मनोवैज्ञानिक विकास सही ढंग से नहीं हो पाता है और बच्चे का स्वभाव कुछ दब्बू किस्म का हो जाता है , उसकी इस स्थिति को ठीक करने के लिए बालक की संगति पर ध्यान देना होगा। उसे उन बच्चों के साथ अधिकांश समय व्यतीत करना चाहिए , जिन बच्चों का जन्म पूर्णिमा के आसपास हुआ हो। उन बच्चों की उच्छृंखलता को देखकर उनके बाल मन का मनोवैज्ञानिक विकास भी कुछ अच्छा हो जाएगा। इसके विपरीत यदि उन्हें अमावस्या के निकट जन्म लेनेवाले बच्चों के साथ ही रखा जाए तो बालक अधिक दब्बू किस्म का हो जाएगा। इसी प्रकार अधिक उच्छृंखल बच्चों को अष्‍टमी के आसपास जन्म लेनेवाले बच्चों के साथ रखकर उनके स्वभाव को संतुलित बनाया जा सकता है। इसी प्रकार व्‍यवसाय , विवाह या अन्‍य मामलों में अपने कमजोर ग्रहों के प्रभाव को कम करने या अपने कमजोर भावों की समस्‍याओं को कम करने के लिए सामनेवाले के यानि मित्रों या जीवनसाथी की जन्‍मकुंडली में उन ग्रहों या मुद्दों का मजबूत रहना अच्‍छा होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके अलावे ग्रहों के बुरे प्रभाव को दूर करने के लिए हमारे धर्मशास्त्रों में हर तिथि पर्व पर स्नानादि के पश्चात् दान करने के बारे में बताया गया है।प्राचीनकाल से ही दान का अपना महत्व रहा है , परंतु दान किस प्रकार का किया जाना चाहिए , इसकी जानकारी बहुत कम लोगों को है। दान के लिए शुद्ध द्रब्य का होना अनिवार्य है । दान के लिए सुपात्र वह व्यक्ति है , जो अनवरत किसी क्रियाकलाप में संलग्न होते हुए भी अभावग्रस्त है। दुष्‍कर्म या पापकर्म करनेवाले या आलसी व्यक्ति को दान देना बहुत बड़ा पाप होता है । यदि दान के नाम पर आप ठगे जाते हैं , तो इसका पुण्य आपको नहीं मिलेगा। इसलिए दान का उचित फल प्राप्त करने के लिए आप दान करते या देते समय ध्यान रखें कि दान उस सुपात्र तक पहुंच सके , जहॉ इसका उचित उपयोग हो सके।ऐसे में आपको सर्वाधिक फल की प्राप्ति होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साथ ही अपनी कुंडली के अनुसार ही उसमें जो ग्रह कमजोर हो , उसको मजबूत बनाने के लिए दान करना चाहिए। जातक का चंद्रमा कमजोर हो , तो अनाथाश्रम को दान करना चाहिए , खासकर 12 वर्ष से कम उम्र के अभावग्रस्त और जरुरतमंद बच्चों को दिए जानेवाले दान से उनका काफी भला होगा। जातक का बुध कमजोर हो तो उन्हें विद्यार्थियों को या किसी प्रकार के रिसर्च कार्य में लगे व्‍यक्ति को सहयोग देना चाहिए। जातक का मंगल कमजोर हो , तो उन्हें युवाओं की मदद और कल्याण के लिए कार्यक्रम बनाने चाहिए। जातक का शुक्र कमजोर हो तो उनके लिए कन्याओं के विवाह में सहयोग करना अच्छा रहेगा। सूर्य कमजोर हो तो प्राकृतिक आपदाओं में पड़नेवालों की मदद की जा सकती है। बृहस्पति कमजोर हो तो अपने माता पिता और गुरुजनों की सेवा से लाभ प्राप्त किया जा सकता है। शनि कमजोर हो तो वृद्धाश्रम को दान करें या अपने आसपास के जरुरतमंद अतिवृद्ध की जरुरतों को पूरा करने की कोशिश करें।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 17px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 17px;"&gt;यह तथ्‍य सर्वविदित ही है कि विभिन्न पदार्थों में रंगों की विभिन्नता का कारण किरणों को अवशोषित और उत्सर्जित करने की शक्ति है। जिन रंगों को वे अवशोषित करती हैं , वे हमें दिखाई नहीं देती , परंतु जिन रंगों को वे परावर्तित करती हैं , वे हमें दिखाई देती हैं। यदि ये नियम सही हैं तो चंद्र के द्वारा दूधिया सफेद , बुध के द्वारा हरे , मंगल के द्वारा लाल , शुक्र के द्वारा चमकीले सफेद , सूर्य के द्वारा तप्‍त लाल , बृहस्पति के द्वारा पीले और शनि के द्वारा काले रंग का परावर्तन भी एक सच्‍चाई होनी चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पृथ्‍वी में हर वस्‍तु का अलग अलग रंग है , यानि ये भी अलग अलग रंगों को परावर्तित करती है । इस आधार पर सफेद रंग की वस्‍तुओं का चंद्र , हरे रंग की वस्‍तुओं का बुध , लाल रंग की वस्‍तुओं का मंगल , चमकीले सफेद रंग की वस्‍तुओं का शुक्र , तप्‍त लाल रंग की वस्‍तुओं का सूर्य , पीले रंग की वस्‍तुओं का बृहस्‍पति और काले रंग की वस्‍तुओं का श‍नि के साथ संबंध होने से इंकार नहीं किया जा सकता। शायद यही कारण है कि नवविवाहिता स्त्रियों को मंगल ग्रह के दुष्‍प्रभावों से बचाने के लिए लाल रंग को परावर्तित करने के लिए प्राय: लाल वस्त्र से सुशोभित करने तथा मॉग में लाल सिंदूर लगे की प्रथा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी कारण चंद्रमा के बुरे प्रभाव से बचने के लिए मोती , बुध के लिए पन्ना , मंगल के लिए मूंगा , शुक्र के लिए हीरा , सूर्य के लिए माणिक , बृहस्पति के लिए पुखराज और शनि के लिए नीलम पहनने की परंपरा समाज में बनायी गयी है। ये रत्न संबंधित ग्रहों की किरणों को उत्सर्जित कर देते हैं , जिसके कारण ये किरणें इन रत्नों के लिए तो प्रभावहीन होती ही हैं , साथ ही साथ इसको धारण करनेवालों के लिए भी प्रभावहीन बन जाती हैं। इसलिए रत्नों का प्रयोग सिर्फ बुरे ग्रहों के लिए ही किया जाना चाहिए , अच्छे ग्रहों के लिए नहीं। कभी-कभी पंडितों की समुचित जानकारी के अभाव के कारण ये रत्न जातक को अच्छे फल से भी वंचित कर देती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रंगों में अद्भूत प्रभाव होने का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि विभिन्न रंगों की बोतलों में रखा पानी सूर्य के प्रकाश में औषधि बन जाता है , जिसका उपयोग विभिन्न रोगों की चिकित्सा में किया जाता है। 'गत्यात्मक ज्योतिष' भी कमजोर ग्रहों के बुरे प्रभाव से बचने के लिए उससे संबंधित रंगों का अधिकाधिक प्रयोग करने की सलाह देता है। रत्न धारण के साथ साथ आप उसी रंग की प्रधानता के वस्त्र धारण कर सकते हैं । मकान के बाहरी दीवारों की पुताई करवा सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि व्यक्ति का जन्मकालीनचंद्र कमजोर हो, तो उन्हें सफेद , बुध कमजोर हो , तो उसे हरे , मंगल कमजोर हो , तो उसे लाल , शुक्र कमजोर हो , तो उसे हल्के नीले , सूर्य कमजोर हो , तो उसे ईंट के रंग , बृहस्पति कमजोर हो , तो उसे पीले , तथा शनि कमजोर हो , तो काले रंग का अधिक प्रयोग कर उन ग्रहों के प्रभाव को परावर्तित किया जा सकता है। लेकिन ध्यान रहे , मजबूत ग्रहों की किरणों का अधिकाधिक प्रभाव आपपर पड़े , इसके लिए उससे संबंधित रंगों का कम से कम प्रयोग होना चाहिए। इन रंगों की वस्तुओं का प्रयोग न कर आप दान करें , तो काफी फायदा हो सकता है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 17px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 17px;"&gt;प्राचीनकाल से ही पेड़-पौधें का मानव विकास के साथ गहरा संबंध रहा है। भारतीय ज्योतिष में रत्नधारण की ही तरह विभिन्न वनस्पतियों की जड़ों को भी धारण करने की भी परंपरा है। सूर्य की शांति के लिए बेल की जड़ , चंद्र के लिए खिन्नी की जड़ , मंगल के लिए अनंतमूल की जड़ , बुध के लिए विधारा की जड़ , गुरु के लिए संतरे या केले की जड़ , शुक्र के लिए सरफाकों की जड़ तथा शनि की शांति के लिए बिच्छुए की जड़ धारण करने की बात ज्‍योतिष के प्राचीन ग्रंथों में लिखी है। साथ ही रंगों के अनुसार ही विभिन्न पेड़-पौधें की पूजा या विभिन्न देवी देवताओं पर पुष्‍प अर्पण करने का भी विधान है। इससे साबित होता है कि हमारे ऋषि मुनियों को ग्रहों के दुष्‍प्रभाव को दूर करने के लिए पेड़-पौधों की भूमिका का भी पता था। अन्‍य बातों की तरह ही जब गंभीरतापूर्वक काफी दिनों तक ग्रहों के प्रभाव को दूर करने में पेड पौधों की भूमिका का भी परीक्षण किया गया तो निम्न बातें दृष्टिगोचर हुई --------------&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1. यदि जातक का चंद्रमा कमजोर हो , तो उन्हें तुलसी या अन्‍य छोटे-छोटे औषधीय पौधे अपने अहाते में लगाकर उसमें प्रतिदिन पानी देना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;2. यदि जातक का बुध कमजोर हो तो उसे बिना फल फूलवाले या छोटे छोटे हरे फलवाले पौधे लगाने से लाभ पहुंच सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;3. इसी प्रकार जातक का मंगल कमजोर हो तो उन्हें लाल फल-फूलवाले बड़े-बड़े पेड़ लगा़ने  से लाभ होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;4. इसी प्रकार जातक का शुक्र कमजोर हो तो उन्हें सफेद फल-फूलवाले बड़े-बड़े पेड़ लगा़ने से लाभ होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;5. इसी प्रकार जातक का सूर्य कमजोर हो तो उन्हें तप्‍त लाल रंग के फल-फूलवाले बड़े-बड़े पेड़ लगा़ने से लाभ होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;6. इसी प्रकार जातक का बृहस्पति कमजोर हो तो उन्हें पीले फल-फूलवाले बड़े-बड़े पेड़ लगा़ने से लाभ होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;7. इसी प्रकार जातक का शनि कमजोर हो तो उन्हें बिना फल-फूल वाले या काले फल-फूलवाले बड़े-बड़े पेड़ लगा़ने से लाभ होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ध्यान रहे , ये सभी छोटे-बड़े पेड़-पौधे पूरब की दिशा में लगे हुए हों , इसके अतिरिक्‍त ग्रह के बुरे प्रभाव से बचने के लिए पश्चिमोत्‍तर दिशा में भी कुछ बड़े पेड़ लगाए जा सकते हैं , किन्तु अन्य सभी दिशाओं में आप शौकिया तौर पर कोई भी पेड़ पौधे लगा सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपरोक्त समाधानों के द्वारा जहॉ ग्रहों के बुरे प्रभावों को कम किया जा सकता है , वहीं अच्छे प्रभावों को बढा़ पाने में भी सफलता मिल सकती है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 17px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 17px;"&gt;मेरे आलेख को पढने के बाद एक पाठक का प्रश्‍न है कि पुराने जमाने में तो हमलोगों के लिए ये कोई उपाय नहीं किए गए , फिर हमलोगों पर ग्रहों का बुरा प्रभाव नहीं पडा , आज इसकी जरूरत क्‍यूं पड गयी। अभी हाल फिलहाल में मेरे यहां आए एक डॉक्‍टर ने भी मुझसे यही प्रश्‍न पूछा था। मैने डॉक्‍टर से पूछा कि क्‍या कारण है कि आपलोग गर्भवती स्‍त्री को इतने विटामीन लिखा करते हैं , कल तक गांव में अत्‍यंत निर्धन महिलाओं को छोडकर शायद किसी को भी ऐसी आवश्‍यकता नहीं पडती थी। उन्‍होने कहा कि हमारे रहन सहन में आए फर्क के कारण ऐसा हो रहा है। गांव में औरतें पर्याप्‍त मात्रा में साग सब्जियां खाया करती थी , परंपरागत खाने की थालियों के बाद शरीर में किसी और चीज की जरूरत नहीं रह जाती है। पर आज कुछ व्‍यस्‍तता की वजह से , तो कुछ ताजी सब्जियों की अनुप्‍लब्‍धता के कारण महिलाओं में इसकी कमी हो जाया करती है। अर्थ यही है कि प्रकृति से आप जितनी ही दूरी बनाए रखेंगे , आपको कृत्रिम उपायों की आवश्‍यकता उतनी ही पडेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैने उन्‍हें समझाया कि ऐसी ही बात हर क्षेत्र में हैं , मेरे पूरे को पढनेवाले ने पाया होगा कि सबसे पहले मैने शुभ मुहूर्त्‍त में बननेवाले अंगूठी यानि गहने की चर्चा की है। एक पाठक ने यह भी पूछा कि हम यह कैसे पता करें कि अंगूठी शुभ मुहूर्त्‍त में बनी है। सचमुच हर बात में ज्‍योतिषीयों से राय लेना काफी कठिन है। इसी के लिए परंपरा बनायी गयी थी। जब आपके घर में कोई शुभ कार्य आराम से हो रहा हो , तो समझ जाएं कि आपके लिए ग्रहों की शुभ स्थिति बनी है। संतान का जन्‍म खुशी खुशी हुआ , बच्‍चा पूर्ण रूप से स्‍वस्‍थ है यानि ग्रह मनोनुकूल हैं , आप जन्‍मोत्‍सव की तैयारी करते हैं। इस समय सुनार को बुलाया गया , उसे ऑर्डर दिया गया , आपके शुभ समय में सोने या चांदी को पूर्ण तौर पर गलाकर एक वस्‍तु बनायी गयी , जिसे आपके गले , हाथ या पैर में धारण करवा दिया गया। यही नहीं अन्‍य लोगों के द्वारा उपहार में मिले सामान भी इसी समय के बने होते हैं , बाद में ग्रह अच्‍छा हो या बुरा , बच्‍चे की मानसिक स्थिति पर अधिक प्रभाव नहीं पडता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह बेटे या बेटी के विवाह के लिए योग्‍य पार्टनर नहीं मिल रहा है , कितने दिनों से ढूंढ ढूंढकर लोग परेशान हैं , अचानक एक उपयुक्‍त पार्टनर मिल जाता है। वैज्ञानिकों की भाषा में इसे संयोग कहते हैं , पर इसमें भी शुभ ग्रहों का प्रभाव होता है। इस समय फिर से सुनार को बुलाया गया , उसे ऑर्डर दिया गया , आपके शुभ समय में सोने या चांदी को पूर्ण तौर पर गलाकर एक वस्‍तु बनायी गयी , जिसे वर और वधू दोनो के गले , हाथ या पैर में धारण करवा दिया जाता है। अब यदि इनके ग्रह बुरे भी हों तो मानसिक शांति देने के लिए ये जेवर काफी होते थे। सुख और दुख तो जीवन के नियम हैं , लडकी की शादी हो गयी , पति नहीं कमाता है , कोई बात नहीं , पापाजी बेटी जैसा प्‍यार कर रहे हैं , नौकरी नहीं हो रही है , चलो कोई बात नहीं , पापा के ही व्‍यवसाय को संभाला जाए , कुछ और काम कर लिया जाए, मतलब संतोष ही संतोष। और फिर समय हमेशा एक जैसा तो हो ही नहीं सकता , कल सबकुछ मन मुताबिक होना ही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर आजकल आपका शुभ मुहूर्त्‍त चल रहा होता है तो आप गहने नहीं बनवाते , गहने खरीदकर ले आते हैं , वह गहना उस समय का बना हो सकता है , जब आपके ग्रह कमजोर चल रहे थे। उसे पहनकर बच्‍चा या वर वधू शांति से तभी तक रह पाते हैं , जबतक उनके ग्रह मजबूत चल रहे हों , जैसे ही उनका ग्रह कमजोर होता है , उनपर दुगुना बुरा प्रभाव पडता है , वे परेशान हो जाते हैं , दुख से लडने की उनकी शक्ति नहीं होती। छोटी छोटी समस्‍याओं से जूझना नहीं चाहते , असंतोष उनपर हावी हो जाता है। पति कमा रहा है तो सास ससुर के साथ क्‍यूं रहना पड रहा है , ट्रांसफर करवा लो , ट्रांसफर हो गया , तो मुझे नौकरी नहीं करने दे रहा , नौकरी भी करने दी , तो हमारे घूमने फिरने के दिन हैं , ये फ्लैट खरीद रहा है यानि हर बात में परेशानी। कैरियर में युवकों को ऐसी ही परेशानी है , इस तरह पति को वैसा ही असंतोष , किसी को किसी से संतुष्टि नहीं। इसी प्रकार जब आपका बुरा समय चल रहा होता है और आप एक ज्‍योतिषी के कहने पर अंगूठी बनवाकर पहनते हैं , तो आप अपने कष्‍ट को दुगुनी कर लेते हैं, इसलिए कभी भी बुरे वक्‍त में नई अंगूठी बनवाने की कोशिश न करें। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 17px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 17px;"&gt;एक सप्‍ताह बाद अपने रिश्‍तेदारी के एक विवाह से लौटी मेरी बहन ने कल एक प्रसंग सुनाया। उस विवाह में दो बहनें अपनी एक एक बच्‍ची को लेकर आयी थी। हमउम्र लग रही उन बच्चियों में से एक बहुत चंचल और एक बिल्‍कुल शांत थी। उन्‍हें देखकर मेरी बहन ने कहा कि इन दोनो बच्चियों में से एक का जन्‍म छोटे चांद और एक का बडे चांद के आसपास हुआ लगता है। वैसे तो उनकी मांओं को हिन्‍दी पत्रक की जानकारी नहीं थी , इसलिए बताना मुश्किल ही था। पर हिन्‍दी त्‍यौहारों की परंपरा ने इन तिथियों को याद रखने में अच्‍छी भूमिका निभायी है , शांत दिखने वाली बच्‍ची की मां ने बताया कि उसकी बच्‍ची दीपावली के दिन हुई है यानि ठीक अमावस्‍या यानि बिल्‍कुल क्षीण चंद्रमा के दिन ही और इस आधार पर उसने बताया कि दूसरी यानि चंचल बच्‍ची उससे डेढ महीने बडी है। इसका अर्थ यह है कि उस चंचल बच्‍ची के जन्‍म के दौरान चंद्रमा की स्थिति मजबूत रही होगी। ज्‍योतिष की जानकारी न रखने वालों ने तो इतनी छोटी सी बात पर भी आजतक ध्‍यान न दिया होगा। क्‍या यह स्‍पष्‍ट अंतर पुराने जमाने के बच्‍चों में देखा जा सकता था ? कभी नहीं , आंगन के सारे बच्‍चे एक साथ उधम मचाते देखे जाते थे , कमजोर चंद्रमा के कारण बच्‍चे के मन में रहा भय भी दूसरों को खेलते कूदते देखकर समाप्‍त हो जाता था। मन में चल रही किसी बात को उसके क्रियाकलापों से नहीं समझा जा सकता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग्रहों के बुरे प्रभाव को दूर करने के लिए शुभ मुहूर्त्‍तों में जेवर बनवाने के बाद हमने संगति की चर्चा की है। हमने कहा कि एक कमजोर ग्रह या कमजोर भाववाले व्यक्ति को मित्रता , संगति , व्यापार या विवाह वैसे लोगों से करनी चाहिए , जिनका वह ग्रह या वह भाव मजबूत हो। आज के युग में जब लोगों का संबंध गिने चुने लोगों से हो गया है , ग्रहों को समझने की अधिक आवश्‍यकता हो गयी है। प्राचीन काल में पूरे समाज से मेलजोल रखकर हम अपने गुणों और अवगुणों को अच्‍छी तरह समझने का प्रयास करते थे , हर प्रकार का समझौता करने को तैयार रहते थे। पर आज अपने विचार को ही प्रमुखता देते हैं और ऐसे ही विचारो वालों से दोसती करना पसंद करते हैं। यहां तक कि विवाह करने से पहले बातचीत करके सामनेवाले के स्‍वभाव को परख लेते हें , जबकि दो विपरीत स्‍वभाव हो और दोनो ओर से समझौता करने की आदत हो , तो व्‍यक्ति में संतुलन अधिक बनता है। पर अब हमें समझौता करना नागवार गुजरता है , अपनों से सही ढंग से तालमेल बना पाने वाले लोगों से ही संबंध बनाना पसंद करते हैं। ऐसी स्थिति में अपने और सामनेवालों के एक जैसे ग्रहों के प्रभाव से उनका संकुचित मानसिकता का बनना स्‍वाभाविक है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके अलावे हमने ग्रहों के बुरे प्रभाव के लिए दान की चर्चा की है। हमलोग जब छोटे थे , तो हर त्‍यौहार या खास अवसरों पर नहाने के बाद दान किया करते थे। घर में जितने लोग थे , सबके नाम से सीधा निकला हुआ होता था। स्‍नान के बाद हमलोगों को उसे छूना होता था। दूसरे दिन गरीब ब्राह्मण आकर दान कए गए सारे अनाज को ले जाता था। वे लोग सचमुच गरीब होते थे। उन्‍हें कोई लालच भी नहीं होता था , जितना मिल जाता , उससे संतुष्‍ट हो जाया करते थे। हालांकि गृहस्‍थ के घरों से मिले इस सीधे के बदले उन्‍हें समाज के लिए ग्रंथो का अच्‍छी तरह अध्‍ययन मनन करना ही नहीं , नए नए सत्‍य को सामने लाना था , जिसे उन्‍होने सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों के बिगडने के दौरान पीढीयों पूर्व ही छोड दिया था। पर फिर भी किसी गरीब को दान देकर हम अच्‍छी प्रवृत्ति विकसित कर ही लेते थे , साथ ही बुरे वक्‍त में मन का कष्‍ट भी दूर होता ही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज हमलोग उतने सही जगह दान भी नहीं कर पाते हैं। हमारे यहां एक ब्राह्मण प्रतिदिन शाम को आरती के बाद वह थाल लेकर प्रत्‍येक दुकान में घूमा करता है , कम से कम भी तो उसकी थाली में हजार रूपए प्रतिदिन हो जाते हैं। सडक पर आते जाते मेरे सामने से वह गुजरता है , मुझसे भी चंद सिक्‍के की उम्‍मीद रखता है , पर मैं उसे नहीं देती , मेरे अपने पुरोहित जी बहुत गरीब हैं , उन्‍हे देना मेरी दृष्टि में अधिक उचित है। जिस शहर में प्रतिदिन 12 से 14 घंटे काम करने के बाद एक ग्रेज्‍युएट को भी प्रतिमाह मात्र 2000 रू मिलते हों , वहां इसे शाम के दो घंटे मे 1000 रू मिल जाते हैं , उसको दिया जानेवाला दान दान नहीं हो सकता , पर आज ऐसे ही लोगों को दान मिला करता है। किसी भी क्षेत्र में पात्रता का हिसाब ही समाप्‍त हो गया है , इस कारण तो हर व्‍यक्ति ग्रहों के विशेष दुष्‍प्रभाव में है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर इन सब बातों को समझने के लिए यह आवश्‍यक है कि पहले हमें ग्रहों के प्रभाव को स्‍वीकार करना होगा। जिस तरह ऊपर के उदाहरण से मैने स्‍पष्‍ट किया कि चंद्रमा से बच्‍चे का मन प्रभावित होता हैं , उसी तरह बुध से किशोर का अध्‍ययन , मंगल से युवाओं का कैरियर प्रभावित होता हैं और शुक्र से कन्‍याओं का वैवाहिक जीवन। इसी प्रकार बृहस्‍पति और शनि से वृद्धों का जीवन प्रभावित होता है , इसलिए इन सारे ग्रहों की स्थिति को मजबूत बनाने के लिए संबंधित जगहों पर दान करना या मदद में खडे हो जाना उचित है। इसमें किसी तरह की शंका नहीं की जा सकती , सीधे स्‍वीकार कर लेना बेहतर है। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 17px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 17px;"&gt;ग्रहों के बुरे प्रभाव को दूर करने के उपायों की चर्चा के क्रम में विभिन्‍न रंगो के द्वारा इसे समायोजित करने की चर्चा की गयी है। इन रंगो का उपयोग आप विभिन्‍न रंग के रत्‍न के साथ ही साथ वस्‍त्र धारण से लेकर अपने सामानों और घरों की पुताई तक और विभिन्‍न प्रकार की वनस्‍पतियों को लगाकर प्राप्‍त कर सकते हैं। सुनने में यह बडा अजीब सा लग सकता है , पर इस ब्रह्मांड की हर वस्‍तु एक खास रंग का प्रतिनिधित्‍व करती है और इस कारण एक जैसे रंगों को परिवर्तित करनेवाली सभी वस्‍तुओं का आपस में एक दूसरे से संबंध हो जाता है। और यही ग्रहों के दुष्‍प्रभाव को रोकने में हमारी मदद करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी भी पद्धति के द्वारा उपचार किए जाने से पहले उसके आधार पर विश्‍वास करना आवश्‍यक होता है। ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ का मानना है कि किसी भी प्रकार की शारीरिक , मानसिक या अन्‍य परिस्थितियों की गडबडी में उस व्‍यक्ति के जन्‍त्‍मकालीन ग्रहों की ‘गत्‍यात्‍मक शक्ति’ की कमी भी एक बडा कारण होती हैं , इसलिए उन्‍हें दूर करने के लिए हमें ग्रहों के इस दुष्‍प्रभाव को समाप्‍त करना ही पडेगा , जो कि असंभव है। हमलोग सिर्फ उसके प्रभाव को कुछ कम या अधिक कर सकते हैं। जिस ग्रह से हम प्रभावित हो रहे होते हैं , उससे संबंधित रंगों का प्रयोग हमें समस्‍याओं से मात्र आसानी से लडने की शक्ति प्रदान करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रंग हमारे मन और मस्तिष्‍क को काफी प्रभावित करते हैं। कोई खास रंग हमारी खुशी को बढा देता है तो कोई हमें कष्‍ट देने वाला भी होता है। यदि हम प्रकृति के अत्‍यधिक निकट हों , तो ग्रहों के अनुसार जिस रंग का हमें सर्वाधिक उपयोग करना चाहिए , उस रंग को हम खुद पसंद करने लगते हैं और उस रंग का अधिकाधिक उपयोग करते हैं। प्रकृति की ओर से यह व्‍यवस्‍था खुद हमारी मदद के तौर पर हो जाती है। पर प्रकृति से दूर कंप्‍यूटर में विभिन्‍न रंगों के संयोजन से तैयार किए गए नाना प्रकार के रंगों में से एक को चुनना आज हमारा फैशन है और वह हमें ग्रहों के दुष्‍प्रभाव से लडने की शक्ति नहीं दे पाता। संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि आज हर स्‍थान पर कृत्रिमता के बने होने से ही हमें कृत्रिम तौर पर ग्रहों के लिए उपायों की या रंगों की ऐसी व्‍यवस्‍था करनी होती है , ताकि हम विपरीत परिस्थितियों में भी खुश रह सके। प्रकृति से हम जितना ही दूर रहेंगे , हमें इलाज की उतनी ही आवश्‍यकता पडेगी।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 17px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 17px;"&gt;इस प्रकार प्रकृति के नियमों को समझना ही बहुत बडा ज्ञान है , उपचारों का विकास तो इसपर विश्‍वास होने या इस क्षेत्र में बहुत अधिक अनुसंधान करने के बाद ही हो सकता है। अभी तो परंपरागत ज्ञानों की तरह ही ज्‍योतिष के द्वारा किए जाने वाले उपचारो को बहुत मान्‍यता नहीं दी जा सकती , पर ग्रहों के प्रभाव के तरीके को जानकर अपना बचाव कर पाने में हमें बहुत सहायता मिल सकती है। लेकिन फिर भी ज्‍योतिषियों द्वारा लालच दिखाए जाने पर लोग उनके चक्‍कर में पडकर अपने धन का कुछ नुकसान कर ही लेते हैं।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;ग्रहों के अनुसार हो या फिर पूर्वजन्‍म के कर्मों के अनुसार, जिस स्‍तर में हमने जन्‍म लिया , जिस स्‍तर का हमें वातावरण मिला,  उस स्‍तर में रहने में अधिक परेशानी नहीं होती। पर कभी कभी अपनी जीवनयात्रा में अचानक ग्रहों के अच्‍छे या बुरे प्रभाव देखने को मिल जाते हैं , जहां ग्रहों का अच्‍छा प्रभाव हमारी सुख और सफलता को बढाता हुआ हमारे मनोबल को बढाता है , वहीं ग्रहों का बुरा प्रभाव हमें दुख और असफलता देते हुए हमारे मनोबल को घटाने में भी सक्षम होता है। वास्‍तव में , जिस तरह अच्‍छे ग्रहों के प्रभाव से जितना अच्‍छा नहीं हो पाता , उससे अधिक हमारे आत्‍मविश्‍वास में वृद्धि होती है द्व ठीक उसी तरह बुरे ग्रहों के प्रभाव से हमारी स्थिति जितनी बिगडती नहीं , उतना अधिक हम मानसिक तौर पर निराश हो जाया करते हैं। ज्‍योतिष के अनुसार हमारी मन:स्थिति को प्रभावित करने में चंद्रमा का बहुत बडा हाथ होता है। धातु में चंद्रमा का सर्वाधिक प्रभाव चांदी पर पडता है। यही कारण है कि बालारिष्‍ट रोगों से बचाने के लिए जातक को चांदी का चंद्रमा पहनाए जाने की परंपरा रही है। बडे होने के बाद भी हम चांदी के छल्‍ले को धारण कर अपने मनोबल को बढा सकते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;आसमान में चंद्रमा की घटती बढती स्थिति से चंद्रमा की ज्‍योतिषीय प्रभाव डालने की शक्ति में घट बढ होती रहती है। अमावस्‍या के दिन बिल्‍कुल कमजोर रहने वाला चंद्रमा पूर्णिमा के दिन अपनी पूरी शक्ति में आ जाता है। आप दो चार महीने तक चंद्रमा के अनुसार अपनी मन:स्थिति को अच्‍छी तरह गौर करें , पूर्णिमा और अमावस्‍या के वक्‍त आपको अवश्‍य अंतर दिखाई देगा। पूर्णिमा के दिन चंद्रोदय के वक्‍त यानि सूर्यास्‍त के वक्‍त चंद्रमा का पृथ्‍वी पर सर्वाधिक अच्‍छा प्रभाव देखा जाता है। इस लग्‍न में दो घंटे के अंदर चांदी को पूर्ण तौर पर गलाकर एक छल्‍ला तैयार कर उसी वक्‍त उसे पहना जाए तो उस छल्‍ले में चंद्रमा की सकारात्‍मक शक्ति का पूरा प्रभाव पडेगा , जिससे व्‍यक्ति के मनोवैज्ञानिक क्षमता में वृद्धि होगी। इससे उसके चिंतन मनन पर भी सकारात्‍मक प्रभाव पडता है। यही कारण है कि लगभग सभी व्‍यक्ति को पूर्णिमा के दिन चंद्रमा के उदय के वक्‍त तैयार किए गए चंद्रमा के छल्‍ले को पहनना चाहिए।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;वैसे तो किसी भी पूर्णिमा को ऐसी अंगूठी तैयार की जा सकती है , पर विभिन्‍न राशि के लोगों को भिन्‍न भिन्‍न माह के पूर्णिमा के दिन ऐसी अंगूठी को तैयार करें। 15 मार्च से 15 अप्रैल के मध्‍य आनेवाली पूर्णिमा को मेष राशिवाले , 15 अप्रैल से 15 मई के मध्‍य आनेवाली पूर्णिमा को वृष राशिवाले , 15 मई से 15 जून के मध्‍य आनेवाली पूर्णिमा को मिथुन राशिवाले , 15 जून से 15 जुलाई के मध्‍य आनेवाली पूर्णिमा को कर्क राशिवाले , 15 जुलाई से 15 अगस्‍त के मध्‍य आनेवाली पूर्णिमा को सिंह राशिवाले , 15 अगस्‍त से 15 सितम्‍बर के मध्‍य आनेवाली पूर्णिमा को कन्‍या राशिवाले , 15 सितम्‍बर से 15 अक्‍तूबर के मध्‍य आनेवाली पूर्णिमा को तुला राशिवाले , 15 अक्‍तूबर से 15 नवम्‍बर के मध्‍य आनेवाली पूर्णिमा को वृश्चिक राशिवाले , 15 नवम्‍बर से 15 दिसंबर के मध्‍य आनेवाली पूर्णिमा को धनु राशिवाले , 15 दिसंबर से 15 जनवरी के मध्‍य आनेवाली पूर्णिमा को मकर राशिवाले , 15 जनवरी से 15 फरवरी के मध्‍य आनेवाली पूर्णिमा को कुंभ राशिवाले तथा 15 फरवरी से 15 मार्च के मध्‍य आनेवाले पूर्णिमा को मीन राशिवाले अपनी अपनी अंगूठी बनवाकर पहनें , तो अधिक फायदेमंद होगा। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 17px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Verdana, sans-serif; font-size: 17px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;iframe frameborder="0" height="50" id="blogvaniframe" scrolling="no" width="190"&gt;&amp;amp;amp;amp;amp;amp;amp;lt;p&amp;amp;amp;amp;amp;amp;amp;gt;&amp;amp;amp;amp;amp;amp;amp;lt;p&amp;amp;amp;amp;amp;amp;amp;gt;&amp;amp;amp;amp;amp;amp;amp;lt;br /&amp;amp;amp;amp;amp;amp;amp;gt; &amp;amp;amp;amp;amp;amp;amp;lt;/p&amp;amp;amp;amp;amp;amp;amp;gt;&amp;amp;amp;amp;amp;amp;amp;lt;/p&amp;amp;amp;amp;amp;amp;amp;gt;&lt;/iframe&gt;&lt;br /&gt;&lt;script type="text/javascript"&gt;    document.getElementById("blogvaniframe").src = "http://www.blogvani.com/blogup.aspx?url=" + window.location.href;&lt;/script&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8693317056729335791-8484844009948589744?l=jyotishsachyajhuth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jyotishsachyajhuth.blogspot.com/feeds/8484844009948589744/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8693317056729335791&amp;postID=8484844009948589744' title='18 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8693317056729335791/posts/default/8484844009948589744'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8693317056729335791/posts/default/8484844009948589744'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jyotishsachyajhuth.blogspot.com/2010/03/blog-post.html' title='&apos;गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष&apos; की खोज : ग्रहों के बुरे प्रभाव को दूर करने के उपाय'/><author><name>संगीता पुरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04508740964075984362</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-3-6nqb_SsJg/TkYxJpLh07I/AAAAAAAABIo/QGE8zdftwBo/s220/sangita.jpg'/></author><thr:total>18</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8693317056729335791.post-3233196440494353084</id><published>2009-11-14T20:36:00.000-08:00</published><updated>2011-08-30T02:32:11.993-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='bokaro'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='vidya sagar mahtha'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='petarwar'/><title type='text'>घड़ी की तरह ही समय की जानकारी मनुष्‍य के लिए बहुत उपयोगी है</title><content type='html'>संसार के प्राय: सभी लोग आज घड़ी पहनने लगे हैं। इसे पहनने पर भी और नहीं पहनने पर भी हर स्थिति में समय तो अबाध गति से चलता ही रहेगा यानि जिस समय जितना बजना है , बजता ही रहेगा , हम समय में कोई परिवर्तन नहीं कर सकते , फिर घड़ी के पहनने से क्या लाभ ? इसे पहनने की क्या बाध्यता है ? क्या इसे आप शौक से पहनते  हैं ? या सचमुच यह प्रयोजनीय है ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रात्रि में मेरी नींद एक बार टूटती है , उस समय टॉर्च जलाकर दीवाल घड़ी की ओर झॉकता हूं। तीन बजे के पहले का समय होता है , तो सडक वाली खिड़की को नहीं खोलता हूं। समय तीन बजे के बाद का हो , तो खिड़की को खोल देता हूं। घड़ी मुझे ऐसा कुछ करने का आदेश देती है , बात वैसी नहीं है। मैं घड़ी के माध्यम से बाहरी परिवेश को समझने की कोशिश करता हूं , तद्नुरुप मेरी कार्यवाही होती है। 12 बजे रात्रि से 3 बजे भोर तक निशाचर या असामाजिक तत्वों का भय होता है। इस समय शेष संसार गंभीर निद्रा में पड़ा होता है। ऐसी बात को समझकर अवचेतन मन सड़क की तरफ की खिड़की को खोलने की इजाजत नहीं देता। घड़ी मुझे केवल समय बता रही होती है , मै उसके साथ अपने को नियोजित करता हूं। रात बहुत बाकी हो , तो पुन: सो जाता हूं। अगर नींद तीन बजे के बाद खुली , तो छत पर टहलता हूं या लिखने-पढ़ने का कुछ काम कर लेता हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो व्यक्ति जितना व्यस्त होता है , उसे घड़ी की उतनी ही आवश्यकता होती है। स्टेशन या बस-स्टैण्ड पर ऐसे बहुत से आदमी मिलेंगे , जिन्हें आप बार-बार घड़ी देखते हुए पाएंगे। समझ लीजिए किसी आवश्यक काम से वे कहीं जा रहे हैं और निर्धारित निश्चित समय  पर उन्हें किसी गंतब्य तक पहुंचना है। जब रेल या बस का आना निश्चित है , उस व्यक्ति का उससे यात्रा करना निश्चित है तो फिर बार-बार घड़ी देखने की व्याकुलता कैसी ? घड़ी तो रेल या बस की गति को कम या तेज नहीं कर सकती , गाड़ी में आयी गड़बड़ी या ब्रेक-डाउन को भी ठीक नहीं कर सकती। आशा और निराशा के बीच झूलनेवाले व्यक्ति को घड़ी समझा भी नहीं सकती। फिर वह व्यक्ति बार-बार घड़ी क्यो देखता है। समय के रफ्तार में समरुपता बनी हुई है। जितना बजना है , बजता जा रहा है। फिर घड़ी देखनेवाले , घड़ी देखकर अपने बोझिल मन को और हल्का करते हैं या हल्के मन को और बोझिल या फिर घड़ी के माध्यम से संसार को समझते हुए उससे अपने को सही जगह खपाने की कोशिश करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परीक्षा में सम्मिलित होनेवाले सभी परीक्षार्थियो की कलाई में घड़ी दिखाई पड़ती है। प्रश्नपत्र मिलने के समय और पूरी परीक्षा के दौरान परीक्षार्थी का जितना ध्यान प्रश्नपत्र को देखने का होता है , उससे कम घड़ी पर नहीं होता। उत्तरपुस्तिका में लिखने के समय भी वे बार-बार घड़ी पर ही निगाह रखते हैं। देखनेवाले को कभी-कभी ऐसा प्रतीत होगा , मानो घड़ी में ही उस प्रश्न का उत्तर लिखा हो । जब परीक्षा की अवधि समाप्त समाप्त होने में मामूली समय बचा होता है ,कुछ परीक्षार्थी के चेहरे पर संतोष की रेखाएं उभरती है , वे प्रसन्न नजर आते हैं , तो कुछ परीक्षार्थियों को इस समय बार-बार घड़ी देखते हुए रोने की मुद्रा में देखा जा सकता है। परीक्षार्थियों में हंसने या रोने का भाव क्या सचमुच घड़ी की ही देन है ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपरोक्त उदाहरणों से स्पश्ट है कि घड़ी अपने-आपमें बिल्कुल तटस्थ है। वह किसी के हंसने या रोने का कारण कदापि नहीं बन सकती। किन्तु घड़ी को जिसने भी समझ लिया , वह अधिक से अधिक काम कर सकता है। उसकी कार्यक्षमता बढ़ जाती है। उसे इस बात की पूरी जानकारी हो जाती है कि किस मौके पर कौन सा काम किया जाना चाहिए। घड़ी के माध्यम से घर बैठे सारे संसार को समझ पाने में सहायता मिलती है। घड़ी तत्कालीन परिवेश की जानकारी देकर कम से कम समय में अधिक से अधिक काम करने की प्रवृत्ति का विकास करके आत्मविश्वास का संचार करती है। समय को समझकर उसके अनुसार काम करनेवाले तथा समय की मॉग के विरुद्ध काम करनेवाले के आत्मविश्वास में काफी अंतर होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बैंक के खाते में आपका धन जमा है , उसकी आपको जरुरत है , उसपर आपका अधिकार भी है , किन्तु आप 11 बजे से 5 बजे दिन में ही उसकी निकासी कर सकते हैं , 11 बजे रात्रि को बैंक से निकालने का प्रयत्न करेंगे , तो हथकड़ी भी लग सकती है। इसी प्रकार हर समय की अपनी विशेषता होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक विद्यार्थी गणित में कमजोर है तथा प्रतिदिन 1 बजे से 2 बजे के बीच रुटीन के अनुसार उसकी गणित की पढ़ाई होती है। गणित की इस कक्षा में उपस्थित रहे या अनुपस्थित , दोनो ही स्थिति में वह विद्यार्थी स्वाभाविक रुप से खुद को अशांत पाएगा। यह घड़ी की देन कदापि नहीं है , वह तो उस व्यवस्था की देन है , जिसके अनुसार इस अरुचिकर विषय को ढोने का काम उसे मिला हुआ है।गणित की पढ़ाई का समय निर्धारित है , घड़ी उस समय की जानकारी देती है , किन्तु घड़ी अपने आपमें तटस्थ है , निरपेक्ष है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रतिक्षण हम घटनाओं के बीच से गुजरते और यह मामूली घड़ी समय की जानकारी देकर घटनाओं के बीच तालमेल स्थापित करने के लिए दिशानिर्देश करते हुए हमें संचालित और क्रियाशील करती है। लेकिन विचारनीय है कि यह घड़ी आयी कहॉ से ? भले ही घड़ी को पृथ्वी की दैनिक गति का पर्याय नहीं कहा जाए , पृथ्वी की दैनिक गति को समझने के लिए या उसका पूर्णत: प्रतिनिधित्व करने के लिए घड़ी के 24 घंटों का स्वीकार किया गया , ताकि सूर्योदय , सूर्यास्त दोपहर या आधीरात के नैसर्गिक शाश्वत परिवेश को आसानी से समझा जा सके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब पृथ्वी की दैनिक गति और उसके पर्याय घड़ी के 24 घंटे को समझने के बाद उस ब्रह्मांड को समझने की चेष्‍टा करें , जो ,महीने ऋतु , वर्ष, युग, मन्वंतर , सृष्टि , प्रलय का लेखा-जोखा और संपूर्ण जगत की गतिविधि को विराट कम्प्यूटर की तरह अपने-आपमें संजोए हुए है। निस्संदेह इन वर्णित संदर्भों का लेखा-जोखा विभिन्न ग्रहों की गतिविधियों पर निर्भर है। उसकी सही जानकारी आत्मविश्वास में वृद्धि करेगी , उसकी एक झलक मात्र से किसी का कल्याण हो सकता है , दिव्य चक्षु खुल जाएगा , आत्मज्ञान बढ़ेगा और संसार में बेहतर ढंग से आप अपने को नियोजित कर पाएंगे। भविष्‍य को सही ढंग से समझ पाना , उसमें अपने आपको खपाते हुए सही रंग भरना सकारात्मक दृष्टिकोण है। समय की सही जानकारी साधन और साध्य दोनो ही है। पहली दृष्टि में देखा जाए , तो घड़ी मात्र एक साधन है , किन्तु गंभीरता से देखें , तो वह मौन रहकर भी कई समस्याओं का इलाज कर देती है। इसी तरह ग्रहों के माध्यम से भविष्‍य की जानकारी रखनेवाला मौन रहकर भी अपनी समस्याओं का समाधान प्राप्त कर लेता है , पर इसके लिए एक सच्‍चे ज्‍योतिषी से आपका परिचय आवश्‍यक है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अति सामान्य व्यक्ति के लिए घड़ी या फलित ज्योतिष शौक का विषय हो सकता है , किन्तु जीवन के किसी क्षेत्र में उंचाई पर रहनेवाले व्यक्ति के लिए घड़ी और भविष्‍य की सही जानकारी की जरुरत अधिक से अधिक है। यह बात अलग है कि सही मायने में भविष्‍यद्रष्‍टा की कमी अभी भी बनी हुई है। 'गत्यात्मक दशा पद्धति' संपूर्ण जीवन के तस्वीर को घड़ी की तरह स्पष्‍ट बताता है। ग्रह ऊर्जा लेखाचित्र से यह स्पष्‍ट हो जाता है कि कब कौन सा काम किया जाना चाहिए। एक घड़ी की तरह ही गत्‍यात्‍मक ज्योतिष की जानकारी भी समय की सही जानकारी प्राप्त करने का साधन मात्र नहीं , वरन् अप्रत्यक्षत: बहुत सारी सूचनाएं प्रदान करके , समुचित कार्य करने की दिशा में बड़ी प्रेरणा-स्रोत है।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो कहते हैं कि घड़ी मैंने यों ही पहन रखी है या ज्योतिषी के पास मैं यों ही चला गया था , निश्चित रुप से बहुत ही धूर्त्‍त या अपने को या दूसरों को ठगनेवाले होते हैं। यह सही है कि आज के व्यस्त और अनिश्चित संसार में हर व्यक्ति को एक अच्छी घड़ी या फलित ज्योतिष की जानकारी की आवश्यकता है। इससे उसकी कार्यक्षमता काफी हद तक बढ़ सकती है । जीवन के किसी क्षेत्र में बहुत ऊंचाई पर रहनेवाला हर व्यक्ति यह महसूस करता है कि महज संयोग के कारण ही वह इतनी ऊंचाई हासिल कर सका है , अन्यथा उससे भी अधिक परिश्रमी और बुद्धिमान व्यक्ति संसार में भरे पड़े हैं , जिनकी पहचान भी नहीं बन सकी है। उस बड़ी चमत्कारी शक्ति की जानकारी के लिए फुरसत के क्षणों में उनका प्रयास जारी रहता है। यही कारण है कि बडे बडे विद्वान भी जीवन के अंतिम क्षणों में सर्वशक्तिमान को समझने की कोशिश करते हैं। ऐसे लोगों को फलित ज्योतिष की जानकारी से कई समस्याओं को सुलझा पाने में मदद मिल सकती है , किन्तु इसके लिए अपने विराट उत्तरदायितव को समझते हुए समय निकालने की जरुरत है। अपनी कीमती जीवन-शैली में से कुछ समय निकालकर इस विद्या का ज्ञान प्राप्त करेंगे , तो इसके लिए भी एक घड़ी की आवश्यकता अनिवार्य होगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8693317056729335791-3233196440494353084?l=jyotishsachyajhuth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jyotishsachyajhuth.blogspot.com/feeds/3233196440494353084/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8693317056729335791&amp;postID=3233196440494353084' title='21 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8693317056729335791/posts/default/3233196440494353084'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8693317056729335791/posts/default/3233196440494353084'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jyotishsachyajhuth.blogspot.com/2009/11/blog-post.html' title='घड़ी की तरह ही समय की जानकारी मनुष्‍य के लिए बहुत उपयोगी है'/><author><name>विशेष कुमार</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-ZN2ci0r77MI/Tv9UGFBuf_I/AAAAAAAAAB4/xVUR1w8GkKg/s220/vishesh.jpg'/></author><thr:total>21</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8693317056729335791.post-679219376256030830</id><published>2009-08-29T21:30:00.000-07:00</published><updated>2011-08-30T02:32:00.213-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='bokaro'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='vidya sagar mahtha'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='petarwar'/><title type='text'>शकुन पद्धति की वैज्ञानिकता</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मेरे गॉव में एक बुढ़िया रहती थी। उसके यहॉ शकुन कराने के लिए अक्सर ही लोग आया करते थे। उसके यहॉ लोगों के आवागमन को देखकर मै कौतूहलवश वहॉ पहुंचा , यह जानने की जिज्ञासा के साथ कि यह बुढ़िया आखिर करती क्या है , जिससे इसे सब बातें मालूम हो जाती हैं। उन दिनों मेरी उम्र मात्र 10-12 वर्ष ही रही होगी। यदि कोई विद्यार्थी उसके पास पहुंचता और पूछ बैठता कि वह परीक्षा में पास होगा या नहीं , तो बुढ़िया उसे दूसरे दिन की सुबह बुलाती , उसके आने पर ऑखें बंद कर होठों से कुछ बुदबुदाती , मानो कोई मंत्र पढ़ रही हो। इसके बाद बहुत शीघ्रता से जमीन में कुछ रेखाएं खींचती थी । फिर राम , सीता , लक्ष्मण राम , सीता , लक्ष्मण , के क्रम को दुहराती चली जाती। यदि अंत की रेखा में राम आता तो कहती , अच्छी तरह पास हो जाओगे। यदि अंत में सीता आती , तो पास नहीं हो पाओगे , एक बड़ी अड़चन है। यदि लक्ष्मण आ जातें , तो कहती पास हो जाओगे , किसी तरह पास हो जाओगे।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसी तरह किसी का कोई जानवर खो गया है , तो वह बुढ़िया से पूछता कि उसका जानवर मिलेगा या नहीं , तो वह जमीन में फटाफट कई रेखाएं खींच देती , फिर उन लकीरों को उसी तरह राम , सीता और लक्ष्मण के नाम से गिनना शुरु कर देती , अंतिम रेखा में रामजी का नाम आया , तो जानवर मिल जाएगा , सीताजी आयी , तो जानवर नहीं मिलेगा , लक्ष्मणजी आए , तो कठिन परिश्रम से जानवर मिल जाएगा। जानवर किस दिशा में मिलेगा , इस प्रश्न के उत्तर में वह फटाफट जमीन पर कई रेखाएं खींचती , पहली रेखा को पूरब , दूसरी रेखा को पिश्चम , तीसरी रेखा को उत्तर और चौथी रेखा को दक्षिण के रुप में गिनती जारी रखती। यदि अंतिम रेखा में पूरब आया , तो जानवर के पूरब दिशा में , पश्चिम आया , तो जानवर के पश्चिम दिशा में , उत्तर आया , तो उसके उत्तर दिशा में तथा दक्षिण आया , तो जानवर के दक्षिण दिशा में होने की भविष्‍यवाणी कर दी जाती। बुढ़िया की इस कार्यवाही में सच कितना होता होगा , यह तो नहीं कहा जा सकता , किन्तु इसे विज्ञान कहना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं होगा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt; बुढ़िया की शकुन करने की पद्धति अत्यंत सरल है। इससे कौन आदमी कितना लाभान्वित हो सकता है , यह सोंचने की बात है। राम , लक्ष्मण और सीता की गिनती से रेखाओं को गिनना और किसी निष्‍कर्ष पर पहुंचना महज तीन संभावनाओं में से एक का उल्लेख करता है। तीनों संभावनाओं का विज्ञान से कोई वास्ता नहीं , फिर भी गॉव के सरल लोग किसी दुविधा में पड़ते ही व्याकुल होकर उसके पास पहुंचने का क्रम बनाए रहते थे। जो धर्त्‍त या चालाक तरह के लोग होते , वे भी बुढ़िया के पास मनोरंजनार्थ पहुंचते। बुढ़िया अपनी लोकप्रियता से खुश होती थी , कुछ लोग शकुन के बढ़िया होने पर खुश होकर कुछ दे भी देते , पर काफी लोगों के लिए वह उपहास का विषय बनी हुई थी , इस तरह बुढ़िया की शकुन करने की पद्धति विवादास्पद और हास्यास्पद थी।&lt;/p&gt;&lt;p&gt; बुढ़िया की उपरोक्त शकुन पद्धति की चर्चा इसलिए कर रहा हूं कि आज फलित ज्योतिष में शकुन पद्धति को व्यापक पैमाने पर स्थान मिला हुआ है। शकुनी ने तो पांडवों पर विजय प्राप्त करने और अपने भांजे दुर्योधन को विजयी बनाने के लिए किस पाशे का व्यवहार किया था या किस विधि से पाशे फेकता या फेकवाता था , यह अनुसंधान का विषय हो सकता है , जहॉ केवल जीत की ही संभावनाएं थी , लेकिन इतना तो तय है कि जिस पाशे से हार और जीत दोनो का ही निर्णय हो , उसमें संभावनाएं केवल दो होंगी। घनाकार एक पाशा हो , जिसके हर फलक में अलग अंक लिखा हो , जिसके हर अंक का फल अलग-अलग हो , उसकी संभावनाएं 1/6 होंगी। चूंकि प्रत्येक अंक के लिए एक-एक फल लिखा गया है , तो एक पाशे से बारी-बारी से 6 प्रकार के फलों को सुनाया जा सकता है। ऐसे प्रयोगों का परिणाम कदापि सही नहीं कहा जा सकता। मनोरंजनार्थ या लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए शकुन किया जाए , तो बात दूसरी है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt; हर रेलवे स्टेशन में तौलमापक मशीनें रहती हैं। उसमें निर्धारित शुल्क डाल देने पर तथा उस मशीन में खड़े होने पर व्यक्ति के वजन के साथ ही साथ उसके भाग्य को बताने वाला एक कार्ड मुफ्त में मिल जाता है। अधिकांश लोग उसे अपना सही भाग्यफल समझकर बहुत रुचि के साथ पढ़ते हैं । इस विधि से प्राप्त भाग्यफल को भी एक प्रकार से लॉटरी से उठा हुआ भाग्यफल समझना चाहिए। जो विज्ञान पर आधृत नहीं होने के कारण कदापि विश्वसनीय नहीं कहा जा सकता। इसलिए इस भाग्यफल को विज्ञान मान्यता नहीं दे सकता।&lt;/p&gt;&lt;p&gt; बड़े-बड़े शहरों में ललाट पर तिलक लगाए ज्योतिशी के रुप में तोते के माध्यम से दूसरों का भाग्यफल निकालते हुए तथाकथित ज्योतिषियों की संख्या भी बढ़ती देखी जा रही है। 25-30 पर्चियों में विभिन्न प्रकार के भाग्यों का उल्लेख होता है। भाग्यफल की जानकारी प्राप्त करने वाला व्यक्ति तोतेवाले को निर्धारित शुल्क दक्षिणा के रुप में देता है , जिसे प्राप्त करते ही तोतेवाला पंडित तोते को निकाल देता है । तोता उन पर्चियों में से एक पर्ची निकालकर अपने मालिक के हाथ में रख देता है , उस पर्ची में जो लिखा होता है , वही उस जिज्ञासु व्यक्ति का भाग्य होता है। तत्क्षण ही एक बार और दक्षिणा देकर भाग्यफल निकालने को कहा जाए , तो प्राय: भाग्यफल बदल जाएगा। इस पद्धति को भी भाग्यफल की लॉटरी कहना उचित होगा। ग्रहों से संबंधित फल कथन से इस भाग्यफल का कोई रिश्ता नहीं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt; इसी तरह धार्मिक प्रवृत्ति के कुछ लोगों को रामायण के प्रारंभिक भाग में उल्लिखित श्री रामश्लाका प्रश्नावलि से भाग्यफल प्राप्त करते देखा गया हैं। रामश्लाका प्रश्नावलि में नौ चौपाइयों के अंतर्गत स्थान पानेवाले 25 गुना नौ यानि 225 अक्षरों को पंद्रह गुना पंद्रह , बराबर 225 ऊध्र्व एवं पार्श्‍व कोष्‍ठकों के बीच क्रम से इस प्रकार सजाया गया है कि जिस कोष्‍ठक पर भगवान का नाम लेकर ऊंगली रखी जाए , वहॉ से नौवें कोष्‍ठक पर जो अक्षर मिलते चले जाएं , और इस प्रक्रिया की निरंतरता को जारी रखा जाए , तो अंतत: एक चौपाई बन जाती है , हर चौपायी के लिए एक विशेष अर्थ रखा गया है । भक्त उस अर्थ को अपना भाग्य समझ बैठता है। जैसे- सुनु सिय सत्य असीस हमारी। पूजहिं मनकामना तुम्हारी। इसका फल होगा - प्रश्नकर्ता का प्रश्न उत्तम है। कार्य सिद्ध होगा । इसी तरह एक चौपाई - उधरे अंत न होई निबाहू। कालनेमि जिमि रावण राहू। का फल इस प्रकार होगा- इस कार्य में भलाई नहीं हैं। कार्य की सफलता में संदेह है। इस प्रकार की नौ चौपाइयों से धनात्मक या ऋणात्मक फल भक्त प्राप्त करते हैं। यहॉ भी फल प्राप्त करने की विधि लॉटरी पद्धति ही मानी जा सकती है। धार्मिक विश्वास और आस्था की दृष्टि से रामायण से शकुन कर मन को शांति प्रदान करने की यह विधि भक्तों के लिए सर्वोत्‍तम हो सकती है , परंतु इस प्रकार के एक उत्तर प्राप्त करने की संभावना 1/9 होगी और यह कदापि नहीं कहा जा सकता है कि इसे किसी प्रकार का वैज्ञानिक आधार प्राप्त है। शकुन शकुन ही होता है। कभी शकुन की बातें सही , तो अधिकांश समय गलत भी हो सकती हैं। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;घर या अस्पताल में अपना कोई मरीज मरणासन्न स्थिति में हो और उसी समय बिल्ली या कुत्ते के रोने की आवाज आ रही हो , तो ऐसी स्थिति में अक्सर मरीज के निकटतम संबंधियों का आत्मविश्वास कम होने लगता है , किन्तु ऐसा होना गलत है। कुत्ते या बिल्ली के रोने का यह अर्थ नहीं कि उस मरीज की मौत ही हो जाएगी। कुत्ते या बिल्ली का रोने की बेसुरी आवाज वातावरण को बोझिल और मन:स्थिति को कष्‍टकर बनाती है , किन्तु यह आवाज हर समय कोई भविष्‍यवाणी ही करती है या किसी बुरी घटना के घटने का संकेत देती है , ऐसा नहीं कहा जा सकता।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस तरह कभी यात्रा की जा रही हो और रास्ते के आगे बिल्ली इस पार से उस पार हो जाए , तो शत-प्रतिशत वाहन-चालक वाहन को एक क्षण के लिए रोक देना ही उचित समझते हैं। ऐसा वे यह सोंचकर करते हैं कि यदि गाड़ी नहीं रोकी गयी , तो आगे चलकर कहीं भी दुर्घटना घट सकती है। ऐसी बातें कभी भी विज्ञानसम्मत नहीं मानी जा सकती , क्योकि जिस बात को लोग बराबर देखते सुनते और व्यवहार में लाते हैं , उसे वे फलित ज्योतिष का अंग मान लेते हैं , उन्हें ऐसा लगता है , मानो बिल्ली ने रास्ता काटकर यह भविष्‍यवाणी कर दी कि थोड़ी देर के लिए रुक जाओ , अन्यथा गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त हो जाएगी। कैसी विडम्बना है , रेलवे फाटक पर पहरा दे रहा चौकीदार जब आते हुए रेल को देखकर गाड़ीवाले को रुकने का संकेत करता है , तो बहुत से लोग एक्सीडेंट की परवाह न करते हुए रेलवे कॉसिंग को पार करने को उद्यत हो जाते हैं और बिल्ली के रास्ता काटने पर उससे डरकर लोग गाड़ी रोक देते हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt; मैं पहले ही इस बात की चर्चा कर चुका हूं कि प्रमुख सात ग्रहों या आकाशीय पिंडों के नाम के आधार पर सप्ताह के सात दिनों के नामकरण भले ही कर दिया गया हो , लेकिन इन दिनों पर संबंधित ग्रहों का कोई प्रभाव नहीं होता है। लेकिन शकुन के लिए लोगों ने इन दिनों को आधार बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यथा ` रवि मुख दर्पण , सोमे पान , मंगल धनिया , बुध मिष्‍टान्न। बिफे दही , शुके राय , शनि कहे नहाय , धोय खाय।´ इसका अर्थ हुआ कि रविवार को दर्पण में चेहरा देखने पऱ , सोमवार को पान खाने पर , मंगलवार को धनिया चबाने पर , बुध को मिठाई का सेवन करने पर , बृहस्पतिवार को दही खाने पर , शुक्रवार को सरसों या राई खाने पर तथा शनिवार को स्नान कर खाने के बाद कोई काम करने पर शकुन बनता है , कार्य की सिद्धि होती है। इन सब बातों का कोई वैज्ञानिक पक्ष नहीं है , जिससे फलित ज्योतिष का कोई लेना-देना रहे। जब सप्ताह के दिनों से ग्रहों के प्रभाव का ही कोई धनात्मक या ऋणत्मक सह-संबंध नहीं है , तो इलाज , शकुन या भविश्यफल कथन कहॉ तक सही हो सकता है , यह सोंचनेवाली बात है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt; शकुन पद्धति से या लॉटरी की पद्धति से कई संभावनाओं में से एक को स्वीकार करने की प्रथा है। किन्तु हम अच्छी तरह से जानते हैं कि बार-बार ऐसे प्रयोगों का परिणाम विज्ञान की तरह एक जैसा नहीं होता। अत: इस प्रकार के शकुन भले ही कुछ क्षणों के लिए आहत मन को राहत दे दे , भविश्य या वर्तमान जानने की पक्की विधि कदापि नहीं हो सकती। स्मरण रहे , विज्ञान से सत्य का उद्घाटन किया जा सकता है तथा अनुमान से कई प्रकार की संभावनाओं की व्याख्या करके अनिश्चय और निश्चय के बीच पेंडुलम की तरह थिरकता रहना पड़ सकता है , लेकिन इन दोनों से अलग लॉटरी या शकुन पद्धति से अनुमान और सत्य दोनों की अवहेलना करते हुए अंधेरे में टटोलते हुए जो भी हाथ लग जाए , उसे अपनी नियति मान बैठने का दर्द झेलने को विवश होना पड़ता है।&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8693317056729335791-679219376256030830?l=jyotishsachyajhuth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jyotishsachyajhuth.blogspot.com/feeds/679219376256030830/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8693317056729335791&amp;postID=679219376256030830' title='29 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8693317056729335791/posts/default/679219376256030830'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8693317056729335791/posts/default/679219376256030830'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jyotishsachyajhuth.blogspot.com/2009/08/blog-post.html' title='शकुन पद्धति की वैज्ञानिकता'/><author><name>संगीता पुरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04508740964075984362</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-3-6nqb_SsJg/TkYxJpLh07I/AAAAAAAABIo/QGE8zdftwBo/s220/sangita.jpg'/></author><thr:total>29</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8693317056729335791.post-794584553579216233</id><published>2009-07-14T00:15:00.000-07:00</published><updated>2011-08-30T02:31:46.887-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='bokaro'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='vidya sagar mahtha'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='petarwar'/><title type='text'>क्‍या एक ही समय में जन्‍म लेनेवालों का भविष्‍य एक सा होता है ?????</title><content type='html'>विश्व की कुल आबादी इस समय 7 अरब के आसपास है और उस आबादी का लगभग छठा भाग 1 करोड़ से अधिक केवल भारत में है। परिवार नियोजन के कार्यक्रमों में बढ़ोत्तरी के बावजूद प्रत्येक दस वर्षों में इस समय आबादी 25 प्रतिशत बढ़ती चली आ रही है। अत: यह कहा जा सकता है कि बच्चों का जन्मदर अपने उफान पर है। इस समय प्रत्येक मिनट में भारत में जन्म लेनेवाले बच्चों की संख्या 4 होती है। फिर भी यदि आप किसी बड़े अस्पताल में कुछ दिनों के लिए ठहरकर निरीक्षण करें , तो आप पाएंगे कि शायद ही कोई दो बच्चे किसी विशेश समय में एक साथ उत्पन्न होते हैं। अत: हर बच्चे की मंजिल निश्चित तौर पर भिन्न होगी , चाहे लगन की कुंडली एक जैसी ही क्यों न हो , सारे ग्रहों की स्थिति एक जैसी ही क्यों न हो। &lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कभी-कभी एक ही गर्भ से दो बच्चों का भी जन्म होता है , तथापि जन्मसमय बिल्कुल एक नहीं होता , यही कारण है कि दो जुड़वॉ भाइयों के बीच बहुत सारी समानताओं के बावजूद कुछ विषमताएं भी होती हैं , किन्तु विषमताएं कभी-कभी इतनी मामूली होती हैं कि दोनों के बीच उसे अलग कर पाना काफी कठिन कार्य होता है। हो सकता है , इन मामूली विषमताओं के कारण ही दोनो की मंजिल भिन्न-भिन्न हो , दोनों अलग-अलग व्यवसाय में हों। बहुत बार देखने को ऐसा भी मिलता है कि दो जुड़वॉ भाइयों में से एक जन्म लेने के साथ ही या कुछ दिनों बाद मर गया और दूसरा आजतक जीवित ही है। जो जीवित है , उसकी चारित्रिक विशेषताएं , सोंच-विचार की शैली , उम्र के सापेक्ष ग्रहों की स्थिति और शक्ति के अनुसार ही है , किन्तु जो संसार से चला गया , उसके सभी ग्रहों का फल उस जातक को क्यों नहीं प्राप्त हो सका ? यह बहुत ही गंभीर प्रश्न है।&lt;br /&gt;&lt;p&gt; मैने आयुर्दाय से संबंधित संपूर्ण प्रकरण का अध्ययन किया , उसके नियम-नियमावलि को भी ध्यान से समझने की चेष्‍टा की , किन्तु मुझे कोई सफलता नहीं मिली। गत्यात्मक दशापद्धति से ही एक तथ्य का उद्घाटन करने में अवश्य सफल हुआ कि जब किसी ग्रह का दशाकाल चल रहा होता है , उससे अष्‍टम भाव में लग्नेश विद्यमान हो , तो कुछ लोगो को मृत्यु या मृत्युतुल्य कष्‍ट अवश्य प्राप्त होता है। संजय गॉधी जब 34 वर्ष के थे और मंगल के काल से गुजर रहे थे , जब उनकी मृत्यु हुई। उनकी जन्मकुंडली में धनु राशि के मंगल से अष्‍टम में लगनेश शनि कर्क राशि में स्थित था। इनकी मृत्यु के समय शनि और मंगल दोनो ही ग्रह लग्न से अष्‍टम भाव में गोचर में लगभग एक तरह की गति में मंदगामी थे। इसी तरह एन टी रामाराव शनि के मध्यकाल से गुजर रहे थे , वे 78 वर्ष की उम्र के थे । इनका जन्मकालीन शनि कन्या राशि द्वादश भाव में स्थित था तथा लग्नेश शुक्र शनि के अष्‍टम भाव में मेष राशि में मौजूद था। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसी प्रकार अन्य कई लोगों को भी इस प्रकार की स्थिति में मृत्यु को प्राप्त करते देखा , अत: इसे मौत के परिकल्पित बहुत से कालों में से एक संभावित काल भले ही मान लिया जाए , पूरे आत्मविश्वास के साथ हम मौत का ही काल नहीं कह सकते। इससे भी अधिक सत्य यह है कि मौत कब आएगी , इसकी जानकारी जन्मकुंडली से अभी तक किए गए शोधों के आधार पर मालूम कर पाना असंभव ही है। चाहे जन्मसमय की शुद्धतम जानकारी किसी ज्योतिषी को क्यो न दे दी जाए , मौत के समय की जानकारी दे पाना किसी भी ज्योतिषी के लिए कठिन होगा ,क्योकि इससे संबंधित कोई सूत्र उनके पास नहीं है। अत: जुड़वे में से एक की मौत क्यो हुई और जीवित के साथ ग्रह किस प्रकार काम कर रहे हैं ? इन दोनों की तुलना का कोई प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता। एक ज्योतिषीय पत्रिका में ऑस्टेलियाई जुड़वो की ऐसी भी कहानी पढ़ने को मिली , जो 65-66 वर्ष की लम्बी उम्र तक जीने के बाद एक ही दिन बीमार पड़े और एक ही दिन कुछ मिनटों के अंतर से मर गए। दोनों की जीवनशैली , चारित्रिक विशेषताएं , कार्यक्रम सभी एक ही तरह के थे। इतनी समानता न भी हो , फिर भी एक दिन और एक ही लग्न के जातको में कुछ समानताएं तो निश्चित तौर पर होती हैं।&lt;/p&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;p&gt; यहॉ एक प्रश्न और भी उठ जाता है कि जिस दिन जिस लग्न में महात्मा गॉधी , जवाहरलाल नेहरु , सुभाशचंद्र बोस , हिटलर , नेपोलियन आदि पैदा हुए थे , उस दिन उस लग्न में क्या कोई और पैदा नहीं हुआ ? यदि पैदा हुआ तो उन्हीं चर्चित लोगों की तरह वह भी चर्चित या यशस्वी क्यों नहीं है ? इस प्रश्न का उत्तर सहज नहीं दिया जा सकता। यदि उत्तर ऋणात्मक हो यानि महात्मा गॉधी जैसे लोगों के जन्म के दिन उसी लग्न की उसी डिग्री में विश्व के किसी भाग में किसी व्यक्ति का जन्म नहीं हुआ , तो उत्तर को विशुद्ध परिकल्पित माना जा सकता है , किन्तु मै इतना तो अवश्य कहना चाहूंगा कि प्रकृति में अति महत्वपूर्ण घटनाएं काफी विरल होती हैं , जबकि सामान्य घटनाओं में निरंतरता बनी होती हैं। शेरनी अपने जीवन मे एक बच्चे को पैदा करती है , उसका बच्चा शेर होता है , जिनकी विशेशताओं और खूबियों को अन्य जीवों में नहीं देखा जा सकता है। अत: शेर के बच्चे के जन्म के समय में जरुर कुछ विशेषताएं रहती होंगी , वह क्षण विरले ही उपस्थित होता होगा। उस क्षण में सियारनी अपने बच्चे को जन्म नहीं दे सकती , क्योंकि सियार के बच्चे एक साथ दर्जनों की संख्या में जन्म लेते हैं और इसलिए इनके बच्चों की विशेषताओं को असाधारण नहीं कहा जा सकता। इनका जन्म सामान्य समय में ही होगा। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसी तरह महापुरुषों के आविर्भाव के काल में ग्रहो की विशेश स्थिति के कारण जन्म-दर में विरलता रहती होगी। महापुरुषों के जन्म के समय किसी सामान्य पुरुष का जन्म नहीं हो सकता है। एक साथ दो भगवान के अवतार की गवाही इतिहास भी नहीं देता। मेरी इन बातों को यदि आप कोरी कल्पना भी कहें , तो दूसरी बात जो बिल्कुल ही निश्चित है , एक लग्न और एक लग्न की डिग्री में महत्वपूर्ण व्यक्ति का जन्म एक स्थान में कभी नहीं होता। यदि किसी दूरस्थ देश में किसी दूसरे व्यक्ति का जन्म इस समय हो भी , तो आक्षांस और देशांतर में परिवर्तन होने से उसके लग्न और लग्न की डिग्री में परिवर्तन आ जाएगा। फिर भी जब जन्म दर बहुत अधिक हो , तो या बहुत सारे बच्चे भिन्न-भिन्न जगहों पर एक ही दिन एक ही लग्न में या एक ही लग्न डिग्री में जन्म लें , तो क्या सभी के कार्यकलाप , चारित्रिक विशेशताएं , व्यवसाय , शिक्षा-दीक्षा , सुख-दुख एक जैसे ही होंगे ?&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मेरी समझ से उनके कार्यकलाप , उनकी बौद्धिक तीक्ष्णता , सुख-दुख की अनुभूति , लगभग एक जैसी ही होगी। किन्तु इन जातकों की शिक्षा-दीक्षा , व्यवसाय आदि संदर्भ भौगोलिक और सामाजिक परिवेश के अनुसार भिन्न भी हो सकते हैं। यहॉ लोगों को इस बात का संशय हो सकता है कि ग्रहों की चर्चा के साथ अकस्मात् भौगोलिक सामाजिक परिवेश की चर्चा क्यो की जा रही है ? स्मरण रहे , पृथ्वी भी एक ग्रह है और इसके प्रभाव को भी इंकार नहीं किया जा सकता। आकाश के सभी ग्रहों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है , परंतु भिन्न-भिन्न युगों सत्युग , त्रेतायुग , द्वापर और कलियुग में मनुष्‍यों के भिनन-भिन्न स्वभाव की चर्चा है। मनुष्‍य ग्रह से संचालित है , तो मनुष्‍य के सामूहिक स्वभाव परिवर्तन को भी ग्रहों से ही संचालित समझा जा सकता है , जो किसी युग विशेष को ही जन्म देता है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;लेकिन सोंचने वाली बात तो यह है कि जब ग्रहों की गति , स्थिति , परिभ्रमण पथ , स्वरुप और स्वभाव आकाश में ज्यो का त्यो बना हुआ है , फिर इन युगों की विशेषताओं को किन ग्रहों से जोड़ा जाए । युग-परिवर्तन निश्चित तौर पर पृथ्वी के परिवेश के परिवर्तन का परिणाम है। पृथ्वी पर जनसंख्या का बोझ बढ़ता जाना , मनुष्‍य की सुख-सुविधाओं के लिए वैज्ञानिक अनुसंधानों का तॉता लगना , मनुष्‍य का सुविधावादी और आलसी होते चले जाना , भोगवादी संस्कृति का विकास होना , जंगल-झाड़ का साफ होते जाना , उद्योगों और मशीनों का विकास होते जाना , पर्यावरण का संकट उपस्थित होना , ये सब अन्य ग्रहों की देन नहीं। यह पृथ्वी के तल पर ही घट रही घटनाएं हैं। पृथ्वी का वायुमंडल प्रतिदिन गर्म होता जा रहा है। आकाश में ओजोन की परत कमजोर पड़ रही है , दोनो ध्रुवों के बर्फ अधिक से अधिक पिघलते जा रहे हैं , हो सकता है , पृथ्वी में किसी दिन प्रलय भी आ जाए ,इन सबमें अन्य ग्रहों का कोई प्रभाव नहीं है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;ग्रहों के प्रभाव से मनुष्‍य की चिंतनधाराएं बदलती रहती हैं , किन्तु पृथ्वी के विभिन्न भागों में रहनेवाले एक ही दिन एक ही लग्न में पैदा होनेवाले दो व्यक्तियों के बीच काफी समानता के बावजूद अपने-अपने देश की सभ्यता , संस्कृति , सामाजिक , राजनीतिक और भौगोलिक परिवेश से प्रभावित होने की भिन्नता भी रहती है। संसाधनों की भिन्नता व्यवसाय की भिन्नता का कारण बनेगी । समुद्र के किनारे रहनेवाले लोग , बड़े शहरों में रहनेवाले लोग , गॉवो में रहनेवाले संपन्न लोग और गरीबी रेखा के नीचे रहनेवाले लोग अपने देशकाल के अनुसार ही व्यवसाय का चुनाव अलग-अलग ढंग से करेंगे। एक ही प्रकार के आई क्यू रखनेवाले दो व्यक्तियों की शिक्षा-दीक्षा भिन्न-भिन्न हो सकती है , किन्तु उनकी चिंतन-शैली एक जैसी ही होगी। इस तरह पृथ्वी के प्रभाव के अंतर्गत आनेवाले भौगोलिक प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस कारण एक ही लग्न में एक ही डिग्री में भी जन्म लेनेवाले व्यक्ति का शरीर भौगोलिक परिवेश के अनुसार गोरा या काला हो सकता है। लम्बाई में कमी-अधिकता कुछ भी हो सकती है , किन्तु स्वास्थ्य , शरीर को कमजोर या मजबूत बनानेवाली ग्रंथियॉ , शारीरिक आवश्यकताएं और शरीर से संबंधित मामलों का आत्मविश्वास एक जैसा हो सकता है। सभी के धन और परिवार विशयक चिंतन एक जैसे होंगे , सभी में पुरुषार्थ-क्षमता या शक्ति को संगठित करने की क्षमता एक जैसी होगी। सभी के लिए संपत्ति , स्थायित्व और संस्था से संबंधित एक ही प्रकार के दृष्टिकोण होंगे। सभी अपने बाल-बच्चों से एक जैसी लगाव और सुख प्राप्त कर सकेंगे। सभी की सूझ-बूझ एक जैसी होगी। सभी अपनी समस्याओं को हल करने में समान धैर्य और संघर्ष क्षमता का परिचय देंगे। सभी अपनी जीवनसाथी से एक जैसा ही सुख प्राप्त करेंगे। अपनी-अपनी गृहस्थी के प्रति उनका दृष्टिकोण एक जैसा ही होगा। सभी का जीवन दर्शन एक जैसा ही होगा , जीवन-शैली एक जैसी ही होगी। भाग्य , धर्म , मानवीय पक्ष के मामलों में उदारवादिता या कट्टरवादिता का एक जैसा रुख होगा। सभी के सामाजिक राजनीतिक मामलों की सफलता एक जैसी होगी। सभी का अभीष्‍ट लाभ एक जैसा होगा। सभी में खर्च करने की प्रवृत्ति एक जैसी ही होगी।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;किन्तु शरीर का वजन , रंग या रुप एक जैसा नहीं होगा। संयुक्त परिवार की लंबाई , चौड़ाई एक जैसी नहीं होगी। धन की मात्रा एक जैसी नहीं हो सकती है। संगठन शक्ति , शारीरिक ताकत या भाई-बहनों की संख्या में भी विभिन्नता हो सकती है। संपत्ति भी परिवेश के अनुसार ही भिन्न-भिन्न होगी । संतान की संख्या एक जैसी नहीं हो सकती है। दाम्पत्य जीवन भिन्न-भिन्न प्रकार का हो सकता है। जीवन की लंबाई में भी एकरुपता की बात नहीं होगी , कोई दीर्घजीवी तो कोई मध्यजीवी तथा कोई अल्पायु भी हो सकता है। व्यवसाय की ऊंचाई या स्तर भी अलग-अलग हो सकता है। इसी प्रकार लाभ और खर्च का स्तर भी सामाजिक , राजनीतिक , भौगोलिक , आर्थिक या अन्य संसाधनों पर निर्भर हो सकता है। किन्तु गत्यात्मक दशा पद्धति के अनुसार ही वे सभी जातक एक साथ किसी खास वर्ष में , किसी खास महीनें में , किसी खास दिन में तथा किसी खास घंटे में सुख या दुख की अनुभूति अवश्य करेंगे , उनमें सकारात्मक या नकारात्मक दृष्टिकोण उसी तरह दिखाई पड़ेगा।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;किसी व्यक्ति को ईंट बनाते हुए आपने अवश्य देखा होगा। उसके पास उसका अपना सॉचा होता है तथा सनी हुई गीली मिट्टी होती है। प्रत्येक बार वह गीली मिट्टी से सॉचे को भरता है और एक-एक ईंट निकालता है। घंटे भर में वह हजार की संख्या में ईंटे निकाल लेता है। ईंट बनानेवाले की निगाह में सभी ईंटे एक तरह की ही होती हैं , किन्तु जिसे ईंटे खरीदना होता है , वह कुछ ईंटों को कमजोर कह अस्वीकृत कर देता है , जबकि उन ईंटों में जबर्दस्त समानता होती है। इस तरह एक आम के वृक्ष में आम के ढेरो फल एक साथ लगते हैं ,फलों के परिपक्व होने पर सभी फलों की बनावट और स्वाद में बड़ी समानता होती है , कोई भी उन्हें देखकर कह सकता है कि आम एक ही जाति के हैं , परंतु कुछ को आकार प्रकार और स्वाद की दृष्टि से कमजोर बताकर अस्वीकृत कर दिया जाता है। इसी प्रकार मानवनिर्मित हो या प्रकृतिसृजित , हर संसाधन के एक होने और बीज की समानता होने के बावजूद अपवाद के रुप में कुछ विषमताएं कभी आश्चर्यचकित कर देनेवाली होती हैं। इसी प्रकार एक ही दिन एक लग्न में या लग्न के एक ही अंश में जन्म लेनेवाले बहुत सारे लोगों में कुछ विषमताओं के बावजूद उनकी अधिकांश समानताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।&lt;/p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8693317056729335791-794584553579216233?l=jyotishsachyajhuth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jyotishsachyajhuth.blogspot.com/feeds/794584553579216233/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8693317056729335791&amp;postID=794584553579216233' title='24 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8693317056729335791/posts/default/794584553579216233'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8693317056729335791/posts/default/794584553579216233'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jyotishsachyajhuth.blogspot.com/2009/07/blog-post.html' title='क्‍या एक ही समय में जन्‍म लेनेवालों का भविष्‍य एक सा होता है ?????'/><author><name>विशेष कुमार</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-ZN2ci0r77MI/Tv9UGFBuf_I/AAAAAAAAAB4/xVUR1w8GkKg/s220/vishesh.jpg'/></author><thr:total>24</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8693317056729335791.post-6898976842855105549</id><published>2009-04-03T17:38:00.000-07:00</published><updated>2011-08-30T02:31:35.235-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='bokaro'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='vidya sagar mahtha'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='petarwar'/><title type='text'>क्या है गत्यात्मक ज्योतिष ?</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;प्राचीन ज्योतिष के ग्रंथों में वर्णित ग्रहों की अवस्था के अनुसार मनुष्य के जीवन पर पड़ने वाले ग्रहों की गति के सापेक्ष उनकी शक्ति के प्रभाव के 12-12 वर्षों का विभाजन `गत्यात्मक दशा पद्धति´ कहलाता है। यह सिद्धांत, परंपरागत ज्योतिष पर आधारित होते हुए भी पूर्णतया नवीन दृष्टिकोण पर आधारित है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;                   इस पद्धति में वर्षों से चली आ रही `विंशोत्तरी दशा पद्धति´ को स्थान न दे कर नये प्रमेयों तथा सूत्रों को स्थान दिया गया है। इसमें प्रत्येक ग्रह के प्रभाव को अलग-अलग 12 वर्षों के लिए निर्धारित किया गया है। साथ ही ग्रहों की शक्ति निर्धारण के लिए स्थान बल, दिक् बल, काल बल, नैसर्गिक बल, दृक बल, अष्टक वर्ग बल से भिन्न ग्रहों की गतिज और स्थैतिज ऊर्जा को स्थान दिया गया हैं। भचक्र के 30 प्रतिशत तक के विभाजन को यथेष्ट समझा गया है तथा उससे अधिक विभाजन की आवश्यकता नहीं समझी गयी है। लग्न को सबसे महत्वपूर्ण राशि समझते हुए इसे सभी प्रकार की भविष्यवाणियों का आधार माना गया है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;                   चंद्रमा मन का प्रतीक ग्रह है। बचपन में सभी अपने मन के अनुसार ही कार्य करना पसंद करते हैं। इसलिए इस अवधि को चंद्रमा का दशा काल माना गया है, चाहे उनका जन्म किसी भी नक्षत्र में क्यों न हुआ हो। चंद्रमा की गत्यात्मक शक्ति के निर्धारण के लिए इसकी सूर्य से कोणिक दूरी पर ध्यान देना आवश्यक होगा। यदि चंद्रमा की स्थिति सूर्य से 0 डिग्री की दूरी पर हो, तो चंद्रमा की गत्यात्मक शक्ति 0 प्रतिशत, यदि 90 डिग्री, या 270 डिग्री दूरी पर हो, तो चंद्रमा की गत्यात्मक शक्ति 50 प्रतिशत और यदि 180 डिग्री की दूरी पर हो, तो चंद्रमा की गत्यात्मक शक्ति 100 प्रतिशत होती है। चंद्रमा की गत्यात्मक शक्ति के अनुसार ही जातक अपनी परिस्थितियां प्राप्त करते हैं। यदि चंद्रमा की गत्यात्मक शक्ति 0 प्रतिशत हो, तो उन भावों की कमजोरियों, जिनका चंद्रमा स्वामी है तथा जहां उसकी स्थिति है, के कारण जातक के बाल मन के मनोवैज्ञानिक विकास में बाधाएं उपस्थित होती हैं। यदि चंद्रमा की गत्यात्मक शक्ति 50 प्रतिशत हो, तो उन भावों की अत्यिधक स्तरीय एवं मजबूत स्थिति, जिनका चंद्रमा स्वामी है तथा जहां उसकी स्थिति है, के कारण बचपन में जातक का मनोवैज्ञानिक विकास संतुलित ढंग से होता है। यदि चंद्रमा की गत्यात्मक शक्ति 100 प्रतिशत हो, तो उन भावों की अति सहज, सुखद एवं आरामदायक स्थिति, जिनका चंद्रमा स्वामी है तथा जहां उसकी स्थिति है, के कारण बचपन में जातक का मनोवैज्ञानिक विकास काफी अच्छा होता है। 5वें-6ठे वर्ष में चंद्रमा का प्रभाव सर्वाधिक दिखायी पड़ता है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;                   बुध विद्या, बुद्धि और ज्ञान का प्रतीक ग्रह है। 12 वर्ष से 24 वर्ष की उम्र विद्याध्ययन की होती है, चाहे वह किसी भी प्रकार की हो। इसलिए इस अविध को बुध का दशा काल माना गया है। बुध की गत्यात्मक शक्ति के निर्धारण के लिए इसकी सूर्य से कोणिक दूरी के साथ इसकी गति पर भी ध्यान देना आवश्यक होता है। यदि बुध सूर्य से 0 डिग्री की दूरी पर स्थित हो और इसकी गति वक्र हो, तो इसकी गत्यात्मक शक्ति 0 प्रतिशत होती है। यदि बुध सूर्य से 26-27 डिग्री के आसपास स्थित हो तथा बुध की गति 10 प्रतिदिन की हो, तो इसकी गत्यात्मक शक्ति 50 प्रतिशत होती है। यदि बुध सूर्य से 0 डिग्री की दूरी पर स्थित हो और बुध की गति 2 डिग्री प्रतिदिन के आसपास हो, तो इसकी गत्यात्मक शक्ति 100 प्रतिशत होती है। बुध की गत्यात्मक शक्ति के अनुसार ही जातक विद्यार्थी जीवन में अपनी परिस्थितियां प्राप्त करते हैं। यदि बुध की शक्ति 0 प्रतिशत हो, तो उन संदर्भो की कमजोरियों, जिनका बुध स्वामी है तथा जिसमें उसकी स्थिति है, के कारण जातक के मानसिक विकास में बाधाएं आती हैं। यदि बुध की शक्ति 50 प्रतिशत के आसपास हो, तो उन भावों की स्तरीय एवं मजबूत स्थिति, जिनका बुध स्वामी है तथा जिसमें उसकी स्थिति है, के कारण जातक का मानसिक विकास उच्च कोटि का होता है। यदि बुध की शक्ति 100 प्रतिशत के आसपास हो, तो उन भावों की आरामदायक स्थिति, जिनका बुध स्वामी है तथा जिसमें उसकी स्थिति है, के कारण जातक का मानसिक विकास सहज ढंग से होता है। 17वें-18वें वर्ष में यह प्रभाव सर्वाधिक दिखायी पड़ता है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;                   मंगल शक्ति एवं साहस का प्रतीक ग्रह है। युवावस्था, यानी 24 वर्ष से 36 वर्ष की उम्र तक जातक अपनी शक्ति का सर्वाधिक उपयोग करते हैं। इस दृष्टि से इस अविध को मंगल का दशा काल माना गया है। मंगल की गत्यात्मक शक्ति का आकलन भी सूर्य से इसकी कोणिक दूरी के आधार पर किया जाता है। यदि मंगल सूर्य से 180 डिग्री की दूरी पर स्थित हो, तो मंगल की गत्यात्मक शक्ति 0 प्रतिशत, यदि 90 डिग्री की दूरी पर स्थित हो, तो मंगल की गत्यात्मक शक्ति 50 प्रतिशत, यदि 0 डिग्री की दूरी पर स्थित हो, तो मंगल की गत्यात्मक शक्ति 100 प्रतिशत होगी। मंगल की गत्यात्मक शक्ति के अनुसार ही जातक अपनी युवावस्था में अपनी परिस्थितियां प्राप्त करते हैं। यदि मंगल की शक्ति 0 प्रतिशत के आसपास हो, तो उन भावों की कमजोरियों, जिनका मंगल स्वामी है और जिसमें उसकी स्थिति है, के कारण जातक के उत्साह में कमी आती है। यदि मंगल की शक्ति 50 प्रतिशत के आसपास हो, तो उन भावों की अत्यिधक स्तरीय एवं मजबूत स्थिति, जिनका मंगल स्वामी है तथा जिसमें उसकी स्थिति है, के कारण उनका उत्साह उच्च कोटि का होता है। यदि मंगल की शक्ति 100 प्रतिशत के आसपास हो, तो उन भावों की सुखद एवं आरामदायक स्थिति, जिनका मंगल स्वामी है और जिसमें उसकी स्थिति है, के कारण जातक की परिस्थितियां सहज होती हैं। 29वें-30वें वर्ष में यह प्रभाव सर्वाधिक दिखायी पड़ता है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;                   शुक्र चतुराई का प्रतीक ग्रह है। 36 वर्ष से 48 वर्ष की उम्र के प्रौढ़ अपने कार्यक्रमों को युक्तिपूर्ण ढंग से अंजाम देते हैं। इसलिए इस अवधि को शुक्र का दशा काल माना गया है। शुक्र की गत्यात्मक शक्ति के आकलन के लिए, सूर्य से इसकी कोणिक दूरी के साथ-साथ, इसकी गति पर भी ध्यान देना आवश्यक होता है। यदि शुक्र सूर्य से 0 डिग्री की दूरी पर हो और इसकी गति वक्र हो, तो शुक्र की गत्यात्मक शक्ति 0 प्रतिशत होती है। यदि शुक्र सूर्य से 45 डिग्री की दूरी के आसपास स्थित हो और इसकी गति प्रतिदिन 1 डिग्री की हो, तो शुक्र की गत्यात्मक शक्ति 50 प्रतिशत होती है। यदि शुक्र की सूर्य से दूरी 0 डिग्री हो और इसकी गति प्रतिदिन 1 डिग्री से अधिक हो, तो शुक्र की गत्यात्मक शक्ति 100 प्रतिशत होती है। शुक्र की गत्यात्मक शक्ति के अनुसार ही जातक अपनी प्रौढ़ावस्था पूर्व का समय व्यतीत करते हैं। यदि शुक्र की शक्ति 0 डिग्री हो, तो उन संदर्भों की कमजोरियों, जिनका शुक्र स्वामी है तथा जिसमें उसकी स्थिति है, के कारण जातक अपनी जिम्मेदारियों का पालन करने में कठिनाई प्राप्त करते हैं। यदि शुक्र की शक्ति 50 प्रतिशत के आसपास हो, तो उन संदर्भों की मजबूत एवं स्तरीय स्थिति, जिनका शुक्र स्वामी है तथा जिसमें उसकी स्थिति है, के कारण जातक अपनी जिम्मेदारियों का पालन काफी सहज ढंग से कर पाते हैं। 41वें-42वें वर्ष में यह प्रभाव सर्वाधिक दिखायी पड़ता है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;                   ज्योतिष की प्राचीन पुस्तकों में मंगल को राजकुमार तथा सूर्य को राजा माना गया है। मंगल के दशा काल 24 से 36 वर्ष में पिता बनने की उम्र 24 वर्ष को जोड़ दिया जाए, तो यह 48 वर्ष से 60 वर्ष हो जाता है। इसलिए इस अविध को सूर्य का दशा काल माना गया है। एक राजा की तरह ही जनसामान्य को सूर्य के इस दशा काल में अधिकाधिक कार्य संपन्न करने होते हैं। सभी ग्रहों को ऊर्जा प्रदान करने वाले अिधकतम ऊर्जा के स्रोत सूर्य को हमेशा ही 50 प्रतिशत गत्यात्मक शक्ति प्राप्त होती है। इसलिए इस समय उन भावों की स्तरीय एवं मजबूत स्थिति, जिनका सूर्य स्वामी है तथा जिसमें उसी स्थिति है, के कारण उनकी बची जिम्मेदारियो का पालन उच्च कोटि का होता है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;                   बृहस्पति धर्म का प्रतीक ग्रह है। 60 वर्ष से 72 वर्ष की उम्र के वृद्ध, हर प्रकार की जिम्मेदारियों निर्वाह कर, धार्मिक जीवन जीना पसंद करते हैं। इसलिए इस अविध को बृहस्पति का दशा काल माना गया है। बृहस्पति की गत्यात्मक शक्ति का आकलन भी सूर्य से इसकी कोणिक दूरी के आधार पर किया जाता है। यदि बृहस्पति सूर्य से 180 डिग्री की दूरी पर स्थित हो, तो बृहस्पति की गत्यात्मक शक्ति 0 प्रतिशत, 90 डिग्री की दूरी पर स्थित हो, तो बृहस्पति की गत्यात्मक शक्ति 50 प्रतिशत तथा यदि 0 डिग्री की दूरी पर स्थित हो, तो बृहस्पति की गत्यात्मक शक्ति 100 प्रतिशत होगी। बृहस्पति की गत्यात्मक शक्ति के अनुसार ही जातक अपने वृद्ध जीवन में अपनी परिस्थितियां प्राप्त करते हैं। यदि बृहस्पति की शक्ति 0 प्रतिशत के आसपास हो, तो उन भावों की कमजोरियों, जिनका बृहस्पति स्वामी है तथा जिसमें उसकी स्थिति है, के कारण उनका जीवन निराशाजनक बना रहता है। यदि बृहस्पति की शक्ति 50 प्रतिशत के आसपास हो, तो उन भावों की मजबूत एवं स्तरीय स्थिति, जिनका बृहस्पति स्वामी है तथा जिसमें उसकी स्थिति है, के कारण अवकाश प्राप्ति के बाद का जीवन उच्च कोटि का होता है। यदि बृहस्पति की शक्ति 100 प्रतिशत के आसपास हो, तो उन भावों की आरामदायक स्थिति, जिनका बृहस्पति स्वामी है और जिसमें इसकी स्थिति है, के कारण जातक की परिस्थितियां वृद्धावस्था में काफी सुखद होती हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;                   प्राचीन ज्योतिष के कथनानुसार ही शनि को, अतिवृद्ध ग्रह मानते हुए, जातक के 72 वर्ष से 84 वर्ष की उम्र तक का दशा काल इसके आधिपत्य में दिया गया है। शनि की गत्यात्मक शक्ति का आकलन भी सूर्य से इसकी कोणिक दूरी के आधार पर ही किया जाता है। यदि शनि सूर्य से 180 डिग्री की दूरी पर हो, तो इसकी गत्यात्मक शक्ति 0 प्रतिशत होती है। यदि शनि सूर्य से 90 डिग्री की दूरी पर स्थित हो, तो इसकी गत्यात्मक शक्ति 50 प्रतिशत होती है। यदि शनि सूर्य से 0 डिग्री की दूरी पर स्थित हो, तो इसकी गत्यात्मक शक्ति 100 प्रतिशत होती है। शनि की शक्ति के अनुसार ही जातक अति वृद्धावस्था में अपनी परिस्थितियां प्राप्त करते हैं। यदि शनि की शक्ति 0 प्रतिशत के आसपास हो, तो उन भावों की कमजोरियों, जिनका शनि स्वामी है, या जिसमें उसकी स्थिति है, के कारण अति वृद्धावस्था का उनका समय काफी निराशाजनक होता है। यदि शनि की गत्यात्मक शक्ति 50 प्रतिशत के आसपास हो, तो उन भावों की अत्यिधक मजबूत एवं स्तरीय स्थिति, जिनका शनि स्वामी है, या जिसमें उसकी स्थिति है, के कारण उनका यह समय उच्च कोटि का होता है। यदि शनि की शक्ति 100 प्रतिशत के आसपास हो, तो उन भावों की अति सुखद एवं आरामदायक स्थिति, जिनका शनि स्वामी हो, या जिसमें उसकी स्थिति हो, के कारण, वृद्धावस्था के बावजूद, उनका समय काफी सुखद होता है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;                   इसी प्रकार जातक का उत्तर वृद्धावस्था का 84 वर्ष से 96 वर्ष तक का समय यूरेनस, 96 से 108 वर्ष तक का समय नेप्च्यून तथा 108 से 120 वर्ष तक का समय प्लूटो के द्वारा संचालित होता है। यूरेनस, नेप्च्यून एवं प्लूटो की गत्यात्मक शक्ति का निधाZरण भी, मंगल, बृहस्पति और शनि की तरह ही, सूर्य से इसकी कोणात्मक दूरी के आधार पर किया जाता है। इस प्रकार इस दशा पद्धति में सभी ग्रहों की एक खास अविध में एक निश्चित भूमिका होती है। विंशोत्तरी दशा पद्धति की तरह एक मात्र चंद्रमा का नक्षत्र ही सभी ग्रहों को संचालित नहीं करता है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;                   सभी ग्रह, अपनी अवस्था विशेष में कुंडली में प्राप्त बल और स्थिति के अनुसार, अपने कार्य का संपादन करते हैं। लेकिन इन 12 वर्षों में भी समय-समय पर उतार-चढ़ाव आना तथा छोटे-छोटे अंतरालों के बारे में जानकारी इस पद्धति से संभव नहीं है। 12 वर्ष के अंतर्गत होने वाले उलट-फेर का निर्णय `लग्न सापेक्ष गत्यात्मक गोचर प्रणाली´ से करें, तो दशा काल से संबंधित सारी कठिनाइयां समाप्त हो जाएंगी। इन दोनों सिद्धांतों का उपयोग होने से ज्योतिष विज्ञान दिन दूनी रात चौगुनी प्रगति के पथ पर होगा, इसमें कोई संदेह नहीं है।&lt;br /&gt;गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष पर आधारित &lt;a href="http://sangeetapuri.blogspot.com/"&gt;मेरे ब्‍लाग&lt;/a&gt;पर आपका स्‍वागत है।&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8693317056729335791-6898976842855105549?l=jyotishsachyajhuth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jyotishsachyajhuth.blogspot.com/feeds/6898976842855105549/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8693317056729335791&amp;postID=6898976842855105549' title='44 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8693317056729335791/posts/default/6898976842855105549'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8693317056729335791/posts/default/6898976842855105549'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jyotishsachyajhuth.blogspot.com/2009/04/blog-post.html' title='क्या है गत्यात्मक ज्योतिष ?'/><author><name>संगीता पुरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04508740964075984362</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-3-6nqb_SsJg/TkYxJpLh07I/AAAAAAAABIo/QGE8zdftwBo/s220/sangita.jpg'/></author><thr:total>44</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8693317056729335791.post-6702883384752427049</id><published>2008-10-24T07:16:00.000-07:00</published><updated>2011-08-30T02:31:22.704-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='bokaro'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='vidya sagar mahtha'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='petarwar'/><title type='text'>हम ग्रह की किस शक्ति से प्रभावित हैं</title><content type='html'>&lt;div align="center"&gt;&lt;span style="color:#663333;"&gt;एक ही ग्रह का कोण बदल जाने से उसका प्रभाव बदल जाता है&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;span style="color:#663333;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color:#663333;"&gt;पृथ्वी के सभी जड़-चेतन , जीव-जंतु और मनुष्य ग्रहों के विकिरण , कॉस्मि‍क किरण , विद्युत-चुम्बकीय तरंग , प्रकाश , गुरुत्वाकर्षण या गति से ही प्रभावित हैं । इन सभी शक्तियों की चर्चा भौतिक विज्ञान में की गयी है। पुन: विज्ञान इस बात की भी चर्चा करता है कि सभी प्रकार की शक्तियॉ एक-दूसरे के स्वरुप में रुपांतरित की जा सकती है। ऊपर लिखित शक्तियों के चाहे जिस रुप से ग्रह हमें प्रभावित करें , वह शक्ति निश्चि‍त रुप से ग्रहों के स्थैतिक और गतिज ऊर्जा से प्रभावित हैं , क्योंकि व्यावहारिक तौर पर मैंने पाया है कि ग्रह-शक्ति का संपूर्ण आधार उसकी गति में छुपा हुआ है। &lt;/span&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#663333;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#663333;"&gt;पुन: एक प्रश्न और उठता है , सभी ग्रह मिलकर किसी दिन पृथ्वीवासियों के लिए ऊर्जा या शक्ति से संबंधित एक जैसा वातावरण बनाते हैं , तो उसका प्रभाव भिन्न-भिन्न वनस्पति , जीव-जंतु , और मनुष्यों पर भिन्न-भिन्न रुप से क्यों पड़ता है ? एक ही तरह की किरणों का प्रभाव एक ही समय पृथ्वी के विभिन्न भागों में भिन्न-भिन्न तरह से क्यों पड़ता है ? इस बात को समझने के लिए कुछ बातों पर गौर करना पड़ेगा। मई का महीना चल रहा हो , मध्य आकाश में सूर्य हो ,दोपहर का समय हो , प्रचण्ड गर्मी पड़ती है। इसी समय पृथ्वी के जिस भाग में सुबह हो रही होगी , वहॉ सुबह के वातावरण के अनुरुप , जहॉ शाम हो रही होगी , वहॉ शाम के अनुरुप तथा जहॉ मध्य रात्रि होगी , वहॉ समस्त वातावरण आधी रात का होगा। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#663333;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#663333;"&gt;अभिप्राय यह है कि एक ही किरण का कोण बदल जाने से उसका प्रभाव बिल्कुल बदल जाता है। दोपहर की सूर्य की प्रचंड गर्मी , जो अभी व्याकुल कर देनेवाली है , आधीरात को स्वयंमेव राहत देनेवाली हो जाती है। प्रत्येक दो घंटे में पृथ्वी अपने अक्ष में 30 डिग्री आगे बढ़ जाती है और इसके निरंतर गतिशील होने से सभी ग्रहों के प्रभाव का कार्यक्षेत्र बदल जाता है। पृथ्वी के हर क्षण के बदलाव के कारण ग्रहों के कोण में बदलाव आता है , जिसके फलस्वरुप हर क्षण सृजन , जन्म-मरण , आविर्भाव आदि जीवात्मा की ग्रंथियों में दर्ज हो जाती है। साथ ही सदैव बदलते ग्रहीय परिवेश के साथ हर जीवात्मा की धनात्मक-ऋणात्मक प्रतिक्रिया होती है। इस तरह एक ही ग्रहीय वातावरण का पृथ्वी के चप्पे-चप्पे में स्थित जड़-चेतन पर अलग-अलग प्रभाव पड़ता है।&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#663333;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;ग्रह की गति , प्रकाश , गुरूत्‍वाकर्षण से लोग प्रभावित होते हैं&lt;/p&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;br /&gt;प्रश्न यह भी है कि जब ग्रह की गति , प्रकाश ,गुरुत्वाकर्षण या विद्युत-चुम्बकीय-शक्ति से लोग प्रभावित हैं , तो अभी तक ग्रह-शक्ति की तीव्रता की जानकारी के लिए भौतिक विज्ञान का सहारा नहीं लेकर फलित ज्योतिष में स्थानबल , दिक्बल , कालबल , नैसर्गिक बल , चेष्टाबल , दृ‍ष्टि‍बल , आत्मकारक , योगकारक , उत्तरायण , दक्षिणायण , अंशबल , पक्षबल आदि की चर्चा में ही ज्योतिषी क्यों अपना अधिकांश समय गंवाते रहें ? आज इनसे संबंधित हर नियमों और को बारी बारी से हर कुंडलियों में जॉच की जाए , इन नियमों को कम्प्यूटरीकृत कर इसकी जॉच की जाए , मेरा दावा है , कोई निष्कर्ष नहीं निकलेगा। भौतिक विज्ञान में जितनें प्रकार की शक्तियों की चर्चा की गयी है , सभी को मापने के लिए इकाई , सूत्र या संयंत्र की व्यवस्था है । ग्रहों की शक्ति को मापने के लिए हमारे पास न तो सूत्र है, न इकाई और न ही संयंत्र।&lt;/p&gt;&lt;p align="center"&gt;विकासशील विज्ञानो का एकदूसरे से परस्‍पर सहसंबंध आवश्‍यक&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="center"&gt;आज से हजारो वर्ष पूर्व सूर्यसिद्धांत नामक पुस्तक में ग्रहों की विभिन्न गतियों का उल्लेख है , इन गतियों के भिन्न-भिन्न नामकरण हैं किन्तु इन गतियों की उपयोगिता केवल ग्रह की आकाश में सम्यक् स्थिति को दिखाने तक ही सीमित थी। इन्हीं गतियों में विभिन्न प्रकार से ग्रह की शक्तियॉ छिपी हुई हैं , इस बात पर अभी तक लोगों का ध्यान गया ही नहीं था। किसी भी स्थान पर ये ग्रह विभिन्न गतियों से संयुक्त हो सकते हैं। अत: एक ही स्थान पर रहकर ये ग्रह भिन्न गति के कारण भिन्न फल को प्रस्तुत करते हैं , जातक को भिन्न मनोदशा देते हैं। फलित ज्योतिष में ग्रह-गतियों के विभिन्न फलों का पूरा उपयोग किया जा सकता है , जिसका उल्लेख ज्योतिष के प्राचीन ग्रंथों में नहीं किया गया है। इसका मुख्य कारण यह हो सकता है कि उस समय भौतिक विज्ञान में उल्लि‍खित स्थैतिज या गतिज ऊर्जा , गुरुतवाकर्षण , कॉस्मि‍क किरण , विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र आदि की खोज नहीं हुई हो। &lt;/p&gt;&lt;p align="center"&gt;स्मरण रहे , हर विज्ञान का विकास द्रुतगति से तभी हो सकता है , जब विकासशील विज्ञान एक दूसरे से परस्पर धनात्मक सहसंबंध बनाए रखें। उन दिनों भौतिक विज्ञान का बहुआयामी विकास नहीं हो पाया था , इसलिए हमारे ऋषि या पूर्वज ग्रहों की शक्ति की खोज आकाश के विभिन्न स्थानों में उसकी स्थिति में ढूंढ़ रहे थे। उन्होने ग्रहों की शक्ति को खोज में एड़ी-चोटी का पसीना एक कर दिया था। कभी वे पातें कि ग्रहों की शक्ति भिन्न-भिन्न राशि‍यों में भिन्न-भिन्न है। कभी महसूस करते कि एक ही राशि‍ में ग्रह भिन्न-भिन्न फल दे रहें हैं। उसी राशि‍ में रहकर कभी अपनी सबसे बड़ी विशेषता तो कभी अपनी कमजोरी दर्ज कराते हैं। आज के सभी विद्वान ज्योतिषी भी अवश्य ही ऐसा महसूस करते होंगे। मैं अनेक कुंडलियों में एक ही राशि‍ में स्थित ग्रहों से उत्पन्न दो विपरीत प्रभावों को देख चुका हूं। कर्क लग्न हो , पंचम भाव में वृश्चि‍क राशि‍ का बृहस्पति हो , ऐसी स्थिति में व्यक्ति संतान सुख से परिपूर्ण , संतृप्त भी हो सकता है , तो निस्संतान और दुखी भी। &lt;/p&gt;&lt;p align="center"&gt;वृश्चि‍क राशि‍ के पंचम भाव का बृहस्पति चाहे जिस द्रेष्काण , नवमांश , षड्वर्ग या अष्टकवर्ग में हो , जितने भी अच्छे अंक प्राप्त कर लें , यदि वह मंगल के सापेक्ष अधिक गतिशील नहीं हुआ , तो जातक धनात्मक परिणाम कदापि नहीं प्राप्त कर सकता। अत: ग्रह की शक्ति किसी विशेष स्थान में नहीं , वरन् उसके राशि‍श की तुलना में बढ़ी हुई गति के कारण होती है। ग्रह के बलाबल निर्धारण के लिए परंपरा से दिक्बल को भी महत्वपूर्ण माना जाता है। राजयोग प्रकरण की समीक्षा में उद्धृत कुंडली में मंगल दिक्बली था , किन्तु जातक युवावस्था में ही टी बी का मरीज था। मैंने पाया कि उसके जन्मकाल में मंगल समरुपगामी था , जो अतिशीघ्री राशि‍श के भाव में स्थित था। इस कारण मंगल ऋणात्मक था और युवावस्था में ही यानि मंगल के काल में ही जातक की सारी परिस्थितियॉ और प्रवृत्तियॉ ऋणात्मक थी। फलित ज्योतिष में अब तक ग्रहों की स्थिति को ही सर्वाधिक महत्व दिया गया है , उसकी हैसियत या शक्ति को समझने की चेष्टा हीं की गयी है। धनभाव में स्थित वृष का बृहस्पति करोड़पति और भिखारी दोनों को जन्म दे सकता है। इस कारण बृहस्पति और शुक्र दोनों में अंतिर्नहित शक्ति को भिन्न तरीके से समझने की बात होनी चाहिए। थाने में बैठे सभी लोगों को थानेदार समझ लिया जाए तो अनर्थ ही हो जाएगा , क्योंकि भले ही वहॉ अधिक समय थानेदार की उपस्थिति रहती हो , परंतु कभी वहॉ एस पी , डी एस पी और कभी सफेदपोश अपराधी भी बैठे हो सकते हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;अभी तक ग्रहों के बलाबल को समझने के लिए विभिन्न विद्वानों की ओर से जितने तरह के सुझाव ज्योतिष के ग्रंथों में दिए गए हैं , वे पर्याप्त नहीं हैं। परंपरागत सभी नियमों की जानकारी , जो शक्ति निर्धारण के लिए बनायी गयी है , में सर्वश्रेष्ठ कौन सा है , निकालना मुश्कि‍ल है , जिसपर भरोसा कर तथा जिसका प्रयोग कर भविष्यवाणी को सटीक बनाकर जनसामान्य के सामने पेश किया जा सके। ऐसी अनेक कुंडलियॉ मेरी निगाहों से होकर भी गुजरी हैं , जहॉ ग्रह को शक्तिशाली सिद्ध करने के लिए प्राय: सभी नियम काम कर रहे हैं , फिर भी ग्रह का फल कमजोर है। इसका कारण यह है कि उपरोक्त सभी नियमों में से एक भी ग्रह-शक्ति के मूलस्रोत से संबंधित नहीं हैं। इसी कारण फलित ज्योतिष अनिश्चि‍त वातावरण के दौर से गुजर रहा है।&lt;/p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8693317056729335791-6702883384752427049?l=jyotishsachyajhuth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jyotishsachyajhuth.blogspot.com/feeds/6702883384752427049/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8693317056729335791&amp;postID=6702883384752427049' title='63 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8693317056729335791/posts/default/6702883384752427049'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8693317056729335791/posts/default/6702883384752427049'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jyotishsachyajhuth.blogspot.com/2008/10/blog-post_24.html' title='हम ग्रह की किस शक्ति से प्रभावित हैं'/><author><name>विशेष कुमार</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' 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वैज्ञानिकता से संयुक्त विचारधारा से ओत-प्रोत व्यक्ति भी किसी मुसीबत में फंसते ही समाज से छुपकर ज्योतिषियों की शरण में जाते देखे जाते हैं। ज्योतिष की इस विवादास्पद स्थिति के लिए मै सरकार ,शैक्षणिक संस्थानों एवं पत्रकारिता विभाग को दोषी मानती हूं। इन्होने आजतक ज्योतिष को न तो अंधविश्वास ही सिद्ध किया और न ही विज्ञान ?&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt; सरकार यदि ज्योतिष को अंधविश्वास समझती तो जन्मकुंडली बनवाने या जन्मपत्री मिलवाने के काम में लगे ज्योतिषियों पर कानूनी अड़चनें आ सकती थी। यज्ञ हवन करवाने या तंत्र-मंत्र का प्रयोग करनेवाले ज्योतिषियों के कार्य में बाधाएं आ सकती थी। सभी पत्रिकाओं में राशि-फल के प्रकाशन पर रोक लगाया जा सकता था। आखिर हर प्रकार की कुरीतियों और अंधविश्वासों जैसे जुआ , मद्यपान , बाल-विवाह, सती-प्रथा आदि को समाप्त करनें में सरकार ने कोई कसर नहीं छोड़ी है ,परंतु ज्योतिष पर विश्वास करनेवालों के लिए ऐसी कोई कड़ाई नहीं हुई। आखिर क्यों ? &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;क्या सरकार ज्योतिष को विज्ञान समझती है ? नहीं, अगर वह इस विज्ञान समझती तो इस क्षेत्र में कार्य करनेवालों के लिए कभी-कभी किसी प्रतियोगिता, सेमिनार आदि का आयोजन होता तथा विद्वानों को पुरस्कारों से सम्मानित कर प्रोत्साहित किया जाता। परंतु आजतक ऐसा कुछ भी नहीं किया गया। पत्रकारिता के क्षेत्र में देखा जाए तो लगभग सभी पत्रिकाएं यदा-कदा ज्योतिष से संबंधित लेख, इंटरव्यू , भविष्यवाणियॉ आदि निकालती रहती है पर जब आजतक इसकी वैज्ञानिकता के बारे में निष्कर्ष ही नहीं निकाला जा सका, जनता को कोई संदेश ही नहीं मिल पाया तो फिर ऐसे लेखों या समाचारों का क्या औचित्य ? &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पत्रिकाओं के विभिन्न लेखों हेतु किया जानेवाला ज्योतिषियों कें चयन का तरीका ही गलत है । उनकी व्यावसायिक सफलता को उनके ज्ञान का मापदंड समझा जाता है , लेकिन वास्तव में किसी की व्यावसायिक सफलता उसकी व्यावसायिक योग्यता का परिणाम होती है ,न कि विषय-विशेष की गहरी जानकारी। इन सफल ज्योतिषियों का ध्यान फलित ज्योतिष के विकास में न होकर अपने व्यावसायिक विकास पर होता है। ऐसे व्यक्तियों द्वारा ज्योतिष विज्ञान का प्रतिनिधित्व करवाना पाठकों को कोई संदेश नहीं दें पाता है। जो ज्योतिषी ज्योतिष को विज्ञान सिद्ध कर सकें , उन्हें ही अपने विचार प्रस्तुत करने के लिए आमंत्रित किया जाना चाहिए या एक प्रतियोगिता में किसी व्यक्ति की जन्मतिथि, जन्मसमय और जन्मस्थान देकर सभी ज्योतिषियों से उस जन्मपत्री का विश्लेषण करवाना चाहिए । उसकी पूरी जिंदगी कें बारे में जो ज्योतिषी सटीक भविष्यवाणी कर सके उसे ही अखबारों ,पत्रिकाओं में स्थान मिलना चाहिए।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt; परंतु ज्योतिषियों की परीक्षा लेने के लिए कभी भी ऐसा नहीं किया गया ,फलस्वरुप ज्योतिष की गहरी जानकारी रखनेवाले समाज के सम्मुख कभी नहीं आ सके और समाज नीम-हकीम ज्योतिषियों से परेशान होता रहा। इसके अतिरिक्त वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखनेवाले कुछ लोग और कुछ संस्थाएं ऐसी है , जो ज्योतिष विज्ञान के प्रति किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं। वे ज्योतिष से संबंधित बातों को सुनने में रुचि कम और उपहास में रुचि ज्यादा रखते हैं। उनके दृष्टिकोण में समन्वयवादिता की कमी भी आजतक ज्योतिष को विज्ञान नहीं सिद्ध कर पायी है।&lt;p&gt;ज्योतिष विज्ञान की वैज्ञानिकता के बारे में संशय प्रकट करते हुए यह कहा जाता है कि सौरमंडल में सूर्य स्थिर है तथा अन्य ग्रह इसकी परिक्रमा करते हैं, किन्तु ज्योतिष शास्त्र यह मानता है कि पृथ्वी स्थिर है और अन्य ग्रह इसकी परिक्रमा करते हैं। जब यह परिकल्पना ही गलत है तो उसपर आधारित भविष्यवाणी कैसे सही हो सकती है ? पर बात ऐसी नहीं है । जिस पृथ्वी पर हम रहते हैं , वह चलायमान होते हुए भी हमारे लिए स्थिर है , ठीक उसी प्रकार , जिस प्रकार हम किसी गाड़ी में चल रहे होते हैं , वह हमारे लिए स्थिर होती है और किसी स्टेशन पर पहुंचते ही हम कहते हैं , `अमुक शहर आ गया।´ जिस पृथ्वी में हम रहतें हैं , उसमें हम स्थिर सूर्य के ही उदय और अस्त का प्रभाव देखते हैं। इसी प्रकार अन्य आकाशीय पिंडों का भी प्रभाव हमपर पड़ता है। पृथ्वी से कोई कृत्रिम उपग्रह को किसी दूसरे ग्रह पर भेजना होता है तो पृथ्वी को स्थिर मानकर ही उसके सापेक्ष अन्य ग्रहों की दूरी निकालनी पड़ती है। जब यह सब गलत नहीं होता तो ज्योतिष में पृथ्वी को स्थिर मानते हुए उसके सापेक्ष अन्य ग्रहों की गति पर आधारित फल कैसे गलत हो सकता है ?&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ज्योतिष की वैज्ञानिकता के बारे में संशय प्रकट करते हुए दूसरा तर्क यह दिया जाता है कि सौरमंडल में सूर्य तारा है , पृथ्वी, मंगल, बुध, बृहस्पति, शनि आदि ग्रह हैं तथा चंद्रमा उपग्रह है, जबकि ज्योतिष शास्त्र में सभी ग्रह माने जाते हैं । इसलिए इस परिकल्पना पर आधारित भविष्यवाणी महत्वहीन है। इसके उत्तर में मेरा यह कहना है कि सभी विज्ञान में एक ही शब्दों के तकनीकी अर्थ भिन्न-भिन्न हो सकते हैं । अभी विज्ञान पूरे ब्रह्मांड का अध्ययन कर रहा है। ब्रह्मांड में स्थित सभी पिंडों को स्वभावानुसार कई भागों में व्यक्त किया गया है। सभी ताराओं की तरह ही सूर्य की प्रकृति होने के कारण इसे तारा कहा गया है। सूर्य की परिक्रमा करनेवाले पिंडों को ग्रह कहा गया है। ग्रहों की परिक्रमा करनेवाले पिंडों को उपग्रह कहा गया है। किन्तु फलित ज्योतिष पूरे ब्रह्मांड का अध्ययन नहीं कर सिर्फ अपने सौरमंडल का ही अध्ययन करता है। सूर्य को छोड़कर अन्य ताराओं का प्रभाव पृथ्वी पर नहीं महसूस किया गया है। इसी प्रकार अन्य ग्रहों के उपग्रहों का पृथ्वी पर कोई प्रभाव नहीं देखा गया है । सूर्य, चंद्र , बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि एवं मंगल की गति और स्थिति के प्रभाव को पृथ्वी , उसके जड़-चेतन और मानव-जाति पर महसूस किया गया है। इसलिए इन सबों को ग्रह कहा जाता है। ग्रहों की इस शास्त्र में यही परिभाषा दी गयी है। इसके आधार पर इसकी वैज्ञानिकता पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया जा सकता।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तीसरा तर्क यह है कि ज्योतिष में राहू और केतु को भी ग्रह माना गया है , जबकि ये ग्रह नहीं हैं । ये तर्क बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। सबसे पहले यह जानकारी आवश्यक है कि राहू और केतु हैं क्या ? पृथ्वी को स्थिर मानने से पृथ्वी के चारो ओर सूर्य का एक काल्पनिक परिभ्रमण-पथ बन जाता है। पृथ्वी के चारो ओर चंद्रमा का एक परिभ्रमण पथ है ही । ये दोनो परिभ्रमण-पथ एक दूसरे को दो विन्दुओं पर काटते हैं । अतिप्राचीनकाल में ज्योतिषियों को मालूम नहीं था कि एक पिंड की छाया दूसरे पिंडों पर पड़ने से ही सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण होते हैं। जब ज्योतिषियों ने सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण होते देखा, तो वे इसके कारण ढूंढ़ने लगे। दोनो ही समय इन्होने पाया कि सूर्य, चंद्र, पृथ्वी एवं सूर्य, चंद्र के परिभ्रमण-पथ पर कटनेवाले दोनो विन्दु लम्बवत् हैं। बस उन्होने समझ लिया कि इन्हीं विन्दुओं के फलस्वरुप खास अमावस्या को सूर्य तथा पूर्णिमा की रात्रि को चंद्र आकाश से लुप्त हो जाता है। उन्होने इन विन्दुओं को महत्वपूर्ण पाकर इन विन्दुओं का नामकरण `राहू´ और `केतु´ कर दिया। इस स्थान पर उन्होने जो गल्ती की, उसका खामियाजा ज्योतिष विज्ञान अभी तक भुगत रहा है ,क्योंकि राहू और केतु कोई आकाशीय पिंड हैं ही नहीं और हमलोग ग्रहों की जिस उर्जा से भी प्रभावित हो---गुरुत्वाकर्षण, गति, किरण या विद्युत-चुम्बकीय शक्ति, राहू और केतु इनमें से किसी का भी उत्सर्जन नहीं कर पाते। इसलिए इनसे प्रभावित होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। यही कारण है कि राहू और केतु पर आधारित भविष्यवाणी सही नहीं हो पाती।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;चौथा तर्क यह है कि सभी ज्योतिषियों की भविष्यवाणियों में विविधता क्यों होती है ? हम सभी जानते हैं कि कोई भी शास्त्र या विज्ञान क्यों न हो कार्य और कारण में सही संबंध स्थापित किया गया हो तो निष्कर्ष निकालने में कोई गल्ती नहीं होती। इसके विपरित यदि कार्य और कारण में संबंध भ्रामक हो तो निष्कर्ष भी भ्रमित करनेवाले होंगे। ज्योतिष विज्ञान का विकास बहुत ही प्राचीन काल में हुआ। उस काल में कोई भी शास्त्र काफी विकसित अवस्था में नहीं था।सभी शास्त्रों और विज्ञानों में नए-नए प्रयोग कर युग के साथ-साथ उनका विकास करने पर बल दिया गया , पर अफसोस की बात है कि ज्योतिष विज्ञान अभी भी वहीं है जहॉ से इसने यात्रा शुरु की थी । महर्षि जैमिनी और पराशर के द्वारा ग्रह शक्ति मापने और दशाकाल निर्धारण के जो सूत्र थे ,उसकी प्रायोगिक जॉच कर उन्हें सुधारने की दिशा में कभी कार्य नहीं किया गया। अंधविश्वास समझते हुए ज्योतिष-शास्त्र की गरिमा को जैसे-जैसे धक्का पहुंचता गया, इस विद्या का हर युग में ह्रास होता ही गया।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;फलस्वरुप यह 21वीं सदी में भी घिसट-घिसटकर ही चल रहा है। ज्योतिषियों की भविष्यवाणियों में अंतर का कारण कार्य और कारण में पारस्परिक संबंध की कमी होना है। ग्रह-शक्ति निकालने के लिए मानक-सूत्र का अभाव है। कुल 10-12 सूत्र हैं ,सभी ज्योतिषी अलग अलग सूत्र को महत्वपूर्ण मानते हैं। दशाकाल निर्धारण का एक प्रामाणिक सूत्र है , पर उसमें एक साथ जातक के चार-चार दशा चलते रहतें हैं-एक महादशा, दूसरी अंतर्दशा, तीसरी प्रत्यंतर दशा और चौथी सूक्ष्म महादशा। इतने नियमों को यदि कम्प्यूटर में भी डाल दिया जाए , तो वह भी सही परिणाम नहीं दे पाता है , तो पंडितों की भविष्यवाणी में अंतर होना तो स्वाभाविक है। सभी ज्योतिषी अलग अलग दशा को महत्वपूर्ण मान लें तो सबके कथन में अंतर तो आएगा ही ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अगला तर्क यह है कि आजकल सभी पत्रिकाओं में लग्नफल की चर्चा रहती है। एक राशि में जन्म लेनेवाले लाखों लोगों का भाग्य एक जैसा कैसे हो सकता है ? यह वास्तव में आश्चर्य की बात है , किन्तु यह सच है कि किसी ग्रह का प्रभाव एक राशि वालो पर तो नहीं , पर एक लग्न के लाखों करोड़ों लोगों पर एक जैसा ही पड़ता है। `एक जैसा फल´ से एक स्वभाव वाले फल का बोध होगा ,न कि मात्रा में समानता का । मात्रा का स्तर तो उसकी जन्मकुंडली एवं अन्य स्तर पर निर्भर करता है ,जैसे किसी खास समय किसी लग्न के लिए धन का लाभ एक मजदूर के लिए 50-100 रु का तथा एक बड़े व्यवसायी के लिए लाखों-करोड़ों का हो सकता है। लेकिन अधिकांश लोगों को अपने लग्न की जानकारी नहीं होती , वे पत्रिकाओं में निकलनेवाले राशिफल को देखकर भ्रमित होते रहते हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अगला तर्क यह है कि किसी दुर्घटना में एक साथ सैकड़ों हजारो लोग मारे जाते हैं ,क्या सभी की कुंडली में ज्योतिषीय योग एक-सा होता है ? इस तर्क का यह उत्तर दिया जा सकता है कि ज्योतिष में अभी काफी कुछ शोध होना बाकी है , जिसके कारण किसी की मृत्यु की तिथि बतला पाना अभी संभव नहीं है ,पर दुर्घटनाग्रस्त होनेवालों के आश्रितों की जन्मकुंडली में कुछ कमजोरियॉ --संतान ,माता ,पिता ,भाई ,पति या पत्नी से संबंधित कष्ट अवश्य देखा गया है । किसी दुर्घटना में एक साथ इतने लोगों की मृत्यु प्रकृति की ही व्यवस्था हो सकती है वरना ड्राइवर या रेलवे कर्मचारी की गल्ती का खामियाजा उतने लोगों को क्यों भुगतना पड़ता है ,उन्हें मौत की सजा क्यों मिलती है, जो बड़े-बड़े अपराधियों को बड़े-बड़े दुष्कर्म करने के बावजूद नहीं दी जाती।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इसी तरह गणित की सुविधा के लिए किए गए आकाश के 12 काल्पनिक भागों के आधार पर भी ज्योतिष को गलत साबित करने की दलील दी जाती है। यदि इसे सही माना जाए तो आक्षांस और देशांतर रेखाओं पर आधारित भूगोल को भी गलत माना जा सकता है। आकाश के इन काल्पनिक 12 भागों की पहचान के लिए इनकें विस्तार में स्थित तारासमूहों के आधार पर किया जानेवाला नामकरण पर किया जानेवाला विवाद का भी कोई औचित्य नहीं हैं , क्योंकि आकाश के 360 डिग्री को 12 भागों में बॉट देने से अनंत तक की दूरी एक ही राशि में आ जाती है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पूजा-पाठ या ग्रह की शांति से भाग्य को बदल दिए जाने की बात भी वैज्ञानिको के गले नहीं उतरती है। हमारे विचार से भी ऐसा कर पाना संभव नहीं है। किसी बालक के जन्म के समय की सभी ग्रहों सहित आकाशीय स्थिति के अनुसार जो जन्मकुंडली बनती है, उसके अनुसार उसके पूरे जीवन की रुपरेखा निश्चित हो जाती है , ऐसा हमने अपने अनुभव में पाया है। पूजा पाठ या ग्रह-शांति से भाग्य में बदलाव लाया जा सकता , तो इसका सर्वाधिक लाभ पंडित वर्ग के लोग ही उठाते और समाज के अन्य वर्गों की तरक्की में रुकावटें आती। लेकिन यह सत्य है कि पूजा-पाठ, यज्ञ-जाप, मंगला-मंगली, मुहूर्त्‍त आदि अवांछित तथ्यों एवं हस्‍तरेखा , हस्‍ताक्षर विज्ञान , तंत्र- , जादू-टोना, भूत-प्रेत, झाडफूंक , न्‍यूमरोलोजी , फेंगसुई, वास्तु, टैरो कार्ड, लाल किताब आदि ज्‍योतिष से इतर विधाओं के भी ज्‍योतिष में प्रवेश से ही ज्योतिष विज्ञान की तरक्की में बाधा पहुंची है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt; ज्योतिष विज्ञान मूलत: संकेतों का विज्ञान है , यह बात न तो ज्योतिषियों को और न ही जनता को भूलनी चाहिए। किन्तु जनता ज्योतिषी को भगवान बनाकर तथा ज्योतिषी अपने भक्तों को बरगलाकर फलित ज्योतिष के विकास में बाधा पहुंचाते आ रहे हैं। हर विज्ञान में सफलता और असफलता साथ-साथ चलती है। मेडिकल साइंस को ही लें। हर समय एक-न-एक रोग डॉक्टर को रिसर्च करने को मजबूर करते हैं। किसी परिकल्पना को लेकर ही कार्य-कारण में संबंध स्थापित करने का प्रयास किया जाता है, पर सफलता पहले प्रयास में ही मिल जाती है, ऐसी बात नहीं है। अनेकानेक प्रयोग होते हैं , करोड़ों-अरबों खर्च किए जाते हैं, तब ही सफलता मिल पाती है । &lt;/p&gt;&lt;p&gt;भूगर्भ-विज्ञान को ही लें, प्रारंभ में कुछ परिकल्पनाओं को लेकर ही कि यहॉ अमुक द्रब्य की खान हो सकती है , कार्य करवाया जाता था ,परंतु बहुत स्थानों पर असफलता हाथ आती थी। धीरे-धीरे इस विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है कि कसी भी जमीन के भूगर्भ का अध्ययन कम खर्च से ही सटीक किया जा सकता है। अंतरिक्ष में भेजने के लिए अरबों रुपए खर्च कर तैयार किए गए उपग्रह के नष्ट होने पर वैज्ञनिकों ने हार नहीं मानी। उनकी कमजोरियों पर ध्यान देकर उन्हें सुधारने का प्रयास किया गया तो अब सफलता मिल रही है। उपग्रह से प्राप्त चित्र के सापेक्ष की जानवाली मौसम की भविष्यवाणी नित्य-प्रतिदिन सुधार के क्रम में देखी जा रही है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt; मानव जब-जब गल्ती करते हैं , नई-नई बातों को सीखते हैं ,तभी उनका पूरा विकास हो पाता है , परंतु ज्योतिष-शास्त्र के साथ तो बात ही उल्टी है , अधिकांश लोग तो इसे विज्ञान मानने को तैयार ही नहीं , सिर्फ खामियॉ ही गिनाते हैं और जो मानते हैं , वे अंधभक्त बने हुए हैं । यदि कोई ज्योतिषी सही भविष्यवाणी करे तो उसे प्रोत्साहन मिले न मिले ,उसके द्वारा की गयी एक भी गलत भविष्यवाणी का उसे व्यंग्यवाण सुनना पड़ता है। इसलिए अभी तक ज्योतिषी इस राह पर चलते आ रहें हैं , जहॉ चित्त भी उनकी और पट भी उनकी ही हो। यदि उसने किसी से कह दिया, `तुम्हे तो अमुक कष्ट होनेवाला है , पूजा करवा लो ,यदि उसने पूजा नहीं करवाई और कष्ट हो गया,तो ज्योतिषी की बात बिल्कुल सही। यदि पूजा करवा ली और कष्ट हो गया तो `पूजा नहीं करवाता तो पता नहीं क्या होता´ । यदि पूजा करवा ली और कष्ट नहीं हुआ तो `ज्योतिषीजी तो किल्कुल कष्ट को हरनेवाले हैं´ जैसे विचार मन में आते हैं। हर स्थिति में लाभ भले ही पंडित को हो , फलित ज्योतिष को जाने-अनजाने काफी धक्का पहुंचता आ रहा है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;किन्तु लाख व्यवधानों के बावजूद भी प्रकृति के हर चीज का विकास लगभग नियिचत होता है प्रकृति का यह नियम है कि जिस बीज को उसने पैदा किया , उसे उसकी आवश्यकता की वस्तु मिल ही जाएगी । देख-रेख नहीं होने के बावजूद प्रकृति की सारी वस्तुएं प्रकृति में विद्यमान रहती ही है। बालक जन्म लेने के बाद अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपनी मॉ पर निर्भर होता है। यदि मॉ न हों , तो पिता या परिवार के अन्य सदस्य उसका भरण-पोषण करते हैं। यदि कोई न हो , तो बालक कम उम्र में ही अपनी जवाबदेही उठाना सीख जाता है। एक पौधा भी अपने को बचाने के लिए कभी टेढ़ा हो जाता है , तो कभी झुक जाता है। लताएं मजबूत पेड़ों से लिपट कर अपनी रक्षा करती हैं । &lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि सबकी रक्षा किसी न किसी तरह हो ही जाती है और ऐसा ही ज्योतिष शास्त्र के साथ हुआ। आज जब सभी सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाएं ज्योतिष विज्ञान के प्रति उपेक्षात्मक रवैया अपना रही है, सभी परंपरागत ज्योतिषी राहू , केतु और विंशोत्तरी के भ्रामक जाल में फंसकर अपने दिमाग का कोई सदुपयोग न कर पाने से तनावग्रस्त हैं , वहीं दूसरी ओर ज्योतिष विज्ञान का इस नए वैज्ञानिक युग के अनुरुप गत्यात्मक विकास हो चुका है। `गत्यात्मक ज्योतिषीय अनुसंधान केन्द्र´ द्वारा ग्रहों के गत्यात्मक और स्थैतिक शक्ति को निकालने के सूत्र की खोज के बाद आज ज्योतिष एक वस्तुपरक विज्ञान बन चुका है ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जीवन में सभी ग्रहों के पड़नेवाले प्रभाव को ज्ञात करने के लिए दो वैज्ञानिक पद्धतियों `गत्यात्मक दशा पद्धति´ और `गत्यात्मक गोचर प्रणाली´ का विकास किया गया है , जिसके द्वारा जातक अपने पूरे जीवन के उतार-चढ़ाव का लेखाचित्र प्राप्त कर सकते हैं। इस दशा-पद्धति के अनुसार शरीर में स्थित सभी ग्रंथियों की तरह सभी ग्रह एक विशेष समय ही मानव को प्रभावित करते हैं। जन्म से 12 वर्ष तक की अवधि में मानव को प्रभावित करनेवाला मन का प्रतीक ग्रह चंद्रमा है , इसलिए ही बच्चे सिर्फ मन के अनुसार कार्य करतें हैं ,इसलिए अभिभावक भी खेल-खेल में ही उन्हें सारी बातें सिखलाते हैं। 12 वर्ष से 24 वर्ष तक के किशोरों को प्रभावित करनेवाला विद्या , बुद्धि और ज्ञान का प्रतीक ग्रह बुध होता है, इसलिए इस उम्र में बच्चों में सीखने की उत्सुकता और क्षमता काफी होती है। 24 वर्ष से 36 वर्ष तक के युवकों को प्रभावित करनेवाला शक्ति-साहस का प्रतीक ग्रह मंगल होता है, इसलिए इस उम्र में युवक अपने शक्ति का सर्वाधिक उपयोग करते हैं । &lt;/p&gt;&lt;p&gt;36 वर्ष से 48 वर्ष की उम्र तक के प्रौढ़ों को प्रभावित करनेवाला युक्तियो का ग्रह शुक्र है , इसलिए इस उम्र में अपनी युक्ति-कला का सर्वाधिक उपयोग किया जाता है । 48 वर्ष से 60 वर्ष की उम्र के व्यक्ति को प्रभावित करनेवाला ग्रह समस्त सौरमंडल की उर्जा का स्रोत सूर्य है, इसलिए इस उम्र के लोगों पर अधिकाधिक जिम्मेदारियॉ होती हैं, बड़े-बड़े कार्यों के लिए उन्हें अपने तेज और धैर्य की परीक्षा देनी पड़ती है। 60 वर्ष से 72 वर्ष की उम्र को प्रभावित करनेवाला धर्म, न्याय का प्रतीक ग्रह बृहस्पति है, इसलिए यह समय सभी प्रकार के जवाबदेहियों से मुक्त होकर धार्मिक जीवन जीने का माना गया है। 72 वर्ष से 84 वर्ष तक की अतिवृद्धावस्था को प्रभावित करनेवाला सौरमंडल का दूरस्थ ग्रह शनि है। इसी प्रकार 84 से 96 तक यूरेनस , 96 से 108 तक नेपच्यून और 108 से 120 वषZ की उम्र तक प्लूटो का प्रभाव माना गया है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस दशा-पद्धति के अनुसार यदि पूर्णिमा के समय बच्चे का जन्म हो तो बचपन में स्वास्थ्य की मजबूती और प्यार-दुलार का वातावरण मिलने के कारण उनका मनोवैज्ञानिक विकास काफी अच्छा होता हैं। इसके विपरित, अमावस्या के समय जन्म लेनेवाले बच्चे में स्वास्थ्य या वातावरण की गड़बड़ी से मनोवैज्ञानिक विकास बाधित होते देखा गया है। बच्चे के जन्म के समय बुध ग्रह की स्थिति मजबूत हो तो विद्यार्थी जीवन में उन्हें बौद्धिक विकास के अच्छे अवसर मिलते हैं । विपरित स्थिति में बौद्धिक विकास में कठिनाई आती हैं। जन्म के समय मंगल मजबूत हो तो 24वर्ष से 36 वर्ष की उम्र तक मनोनुकूल माहौल प्रााप्त होता है। विपरीत स्थिति में जातक अपने को शक्तिहीन समझता है। जन्म के समय मजबूत शुक्र की स्थिति 36 वर्ष से 48 वर्ष की उम्र तक सारी जवाबदेहियों को सुचारुपूर्ण ढंग से अंजाम देती हैं, विपरीत स्थिति में , काम सुचारुपूर्ण ढंग से नहीं चल पाता है। इसी प्रकार मजबूत सूर्य 48 वर्ष से 60 वर्ष तक व्यक्ति के स्तर में काफी वृद्धि लाते हैं, किन्तु कमजोर सूर्य बड़ी असफलता प्रदान करते हैं। जन्मकाल का मजबूत बृहस्पति से व्यक्ति का अवकाश-प्राप्त के बाद का जीवन सुखद होता हैं।विपरीत स्थिति में अवकाश प्राप्‍त करने के बाद उनकी जवबदहेही खत्म नहीं हो पाती हैं। मजबूत शनि के कारण 72 वर्ष से 84 वर्ष तक के अतिवृद्ध की भी हिम्मत बनी हुई होती है, जबकि कमजोर शनि इस अवधि को बहुत कष्टप्रद बना देते हैं।इन ग्रहों का सर्वाधिक बुरा प्रभाव क्रमश: 6ठे, 18वें, 30वें, 42वें ,54वें, 66वें और 78वें वर्ष में देखा जा सकता है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गत्यात्मक ज्योतिष की खोज के पश्चात् किसी व्यक्ति का भविष्य जानना असंभव तो नहीं , मुश्किल भी नहीं रह गया है , क्योंकि व्यक्ति के भविष्य को प्रभावित करने में बड़ा अंश विज्ञान के नियम का होता है , छोटा अंश ही सामाजिक , राजनीतिक , आर्थिक या पारिवारिक होता है या व्यक्ति खुद तय करता है। वास्तव में , हर कर्मयोगी आज यह मानते हैं कि कुछ कारकों पर आदमी का वश होता है , कुछ पर होकर भी नहीं होता और कुछ कुछ पर तो होता ही नहीं । व्यक्ति का एक छोटा निर्णय भी गहरे अंधे कुएं में गिरने या उंची छलांग लगाने के लिए काफी होता है। इतनी अनिश्चितता के मध्य भी अगर ज्योतिष भविष्य में झांकने की हिम्मत करता आया है तो वह उसका दुस्साहस नहीं , वरण् समय-समय पर किए गए रिसर्च के मजबूत आधार पर उसका खड़ा होना है।&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8693317056729335791-7911269038160929288?l=jyotishsachyajhuth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jyotishsachyajhuth.blogspot.com/feeds/7911269038160929288/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8693317056729335791&amp;postID=7911269038160929288' title='22 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8693317056729335791/posts/default/7911269038160929288'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8693317056729335791/posts/default/7911269038160929288'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jyotishsachyajhuth.blogspot.com/2008/10/blog-post.html' title='फलित ज्योतिष : विज्ञान या अंधविश्वास'/><author><name>संगीता पुरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04508740964075984362</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-3-6nqb_SsJg/TkYxJpLh07I/AAAAAAAABIo/QGE8zdftwBo/s220/sangita.jpg'/></author><thr:total>22</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8693317056729335791.post-6059972783840010029</id><published>2008-09-30T22:17:00.000-07:00</published><updated>2011-08-30T02:30:56.832-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='bokaro'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='vidya sagar mahtha'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='petarwar'/><title type='text'>वार से फलित कथन अवैज्ञानिक</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#663300;"&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;मैं प्रत्येक मंगलवार को शैव करने या बाल बनाने के लिए सैलून जाता हूं , या कभी-कभी सैलूनवाले को ही घर पर बुलवा लेता हूं। सेलून में जो नाई रहता है , वह गंवई रिश्ते में मुझे चाचाजी कहता है। विगत दो वषोZं से मैं उससे लागातर प्रत्येक मंगलवर को शैव करवाता आ रहा हूं। एक दिन सैलूनवाला मुझसे कहता है-`चाचाजी एक प्रश्न पूछूं ?´&lt;br /&gt;मैंने कहा -` क्यों नहीं ? खुशी से पूछ सकते हो । ´&lt;br /&gt;` लोग कहते हैं , आप बहुत बड़े ज्योतिषी हो ,&lt;br /&gt;,लोग कहते हैं तो मैं हो सकता हूं , पर तुझे कोई संशय है क्या ? ´&lt;br /&gt;` इतने बड़े ज्योतिषी होने के बावजूद आप मंगलवार को बाल या दाढ़ी बनवाते हैं। कई लोगों का कहना है कि बृहस्पतिवार को बाल बनवाने से लक्ष्मी दूर भागती है और शनिवार मंगलवार को लागातार बाल बनवाने से बहुत ही अनिष्ट होता है। एक राजा लागातार कुछ दिनों तक इन्हीं दिनों में हजामत बनवाया करता था , जिससे कुछ दिनों बाद उसकी हत्या हो गयी थी। ´&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;वह बोलता ही जा रहा था। उसकी बातों को सुनने के बाद मैंने कहा-` किस राजा महाराजा के साथ कौन सी घटना घटी थी , यह तो मुझे मालूम नहीं और न ही मैं मालूम करना चाहता हूं। मैने मंगलवार का दिन इसलिए चयन किया क्योंकि इस दिन अंधविश्वास के चक्कर में पड़ने से लोगों की भीड़ तुम्हारे पास नहीं होती और इसलिए तुम फुर्सत में होते हो। मुझे काफी देर तक तुम्हारा इंतजार नहीं करना होता है। मेरा काम शीघ्र ही बन जाता है। आज से बहुत दिन पहले सप्ताह के दूसरे दिनों में भी तुम्हारे पास आया था। उस समय तुम्हें फुर्सत नहीं थी , तब काफी देर मुझे अखबार पढ़कर समय काटना पड़ा था। इस तरह मेरे कीमती समय की कुछ बर्वादी हो गयी थी। अब मुझे मंगलवार को बाल कटवाने में सुविधा हो जाती है। इसलिए इस दिन के साथ समझौता कर चुका हूं , सप्ताह के दूसरे दिनों में मुझे असुविधा होती है। सुयोग उसे ही कहते हैं , जब काम आसानी से बन जाए। इन कायोZं के लिए मेरे लिए बुधवार शुभ नहीं है , क्योंकि इस दिन समय की अनावश्यक बर्वादी हो जाती है , रुटीन में व्यवधान उपस्थित होता है , काम करनें का सिलसिला बिगड़ जाता है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;समाज में देखा जाए , तो अधिकांश लोग मंगलवार और शनिवार को इस तरह के कायोZं या अन्य दिनों को अन्य किसी प्रकार के कायोZं के लिए अशुभ मानते हैं। उनका ऐसा विश्वास है कि गलत दिनों में किया गया कार्य अनिष्टकर फल भी प्रदान कर सकता है। इसे कोरा अंधविश्वास ही कहा जा सकता है , क्योंकि भले ही ग्रहों के नाम पर इन वारों का नामकरण हो गया हो ,किन्तु सच्ची बात यह है कि ग्रहों की स्थिति से इन वारों का कोई संबंध है ही नहीं। न तो रविवार को सूर्य आकाश के किसी खास भाग में होता है ,और न ही इस दिन सूर्य की गति में कोई परिवत्र्तन होता है , और न ही रविवार को सूर्य केवल धनात्मक या ऋणात्मक फल ही देता है। जब ऐसी बाते है ही नही तो फिर रविवार से सूर्य का कौन सा संबंध है ? &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;आपको जानकर आश्चर्य होगा कि रविवार से सूर्य का कोई संबंध है ही नहीं । रविवार से सूर्य का संबंध दिखा पाना किसी भी ज्योतिषी के लिए न केवल कठिन वरन् असंभव कार्य है। सुविधा के अनुसार किसी भी बच्चे का कुछ भी नाम रखा जा सकता है , परंतु उस बच्चे में नाम के अनुसार गुण भी आ जाएं , ऐसा नििश्चत नहीं है। यथानाम तथागुण लोगों की संख्या नगण्य ही होती है , इस संयोग की सराहना की जा सकती है पर किसी व्यक्ति का कोई नाम रखकर उसके अनुरुप ही विशेषताओं को प्राप्त करने की इच्छा रखें तो यह हमारी भूल होगी । इस बात से आम लोग भिज्ञ भी हैं , तभी ही यह कहावत मशहूर है ` ऑख का अंधा , नाम नयनसुख ´ । &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;इसी तरह कभी-कभी पृथ्वीपति नामक व्यक्ति के पास कोई जमीन नहीं होती तथा दमड़ीलाल के पास करोड़ों की संपत्ति होती है। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि किसी नामकरण का कोई वैज्ञानिक अर्थ हो या नाम के साथ गुणों का भी संबंध हो , यह आवश्यक नहीं है। कोई व्यक्ति अपने पुत्र का नाम रवि रख दे तथा उसमें सूर्य की विशेषताओं की तलाश करे , उसकी पूजा कर सूर्य भगवान को खुश रखने की चेष्टा करे तो ऐसा संभव नहीं है। इस तरह न तो रविवार से सूर्य का , न सोमवार से चंद्र का , मंगलवार से मंगल का , बुधवार से बुध का , बृहस्पतिवार से बृहस्पति का , शुक्रवार से शुक्र का और न ही शनिवार से शनि का ही संबंध होता है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;इसी तरह मंगलवार का व्रत करके सुखद परिस्थितियों में मन और शरीर को चाहे जिस हद तक स्वस्थ , चुस्त , दुरुस्त या विपरीत परिस्थितियों में शरीर को कमजोर कर लिया जाए , हनुमानजी या मंगल ग्रह का कितना भी स्मरण कर लिया जाए , हनुमान या मंगल पर इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रभाव नहीं पड़ता। पूजा करने से ये खुश हो जाएंगे , ऐसा विज्ञान नहीं कहता , किन्तु पुजारी ये समझ लें और बहुत आस्था के साथ पूजापाठ में तल्लीन हो जाएं , तो मनोवैज्ञानिक रुप से इसका भले ही कुछ लाभ उन्हें मिल जाए , वे कुछ क्षणों के लिए राहत की सॉस अवश्य ले लेते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;कभी कभी नामकरण विशेषताओं के आधार पर भी किया जाता है और कभी कुछ चित्रों और तालिकाओं के अनुसार किया जाता है। ऋतुओं का नामकरण इनकी विशेषताओं की वजह से है , इसे हम सभी जानते हैं। ग्रीष्मऋतु कहने से ही प्रचंड गमीZ का बोध होता है , वषाZऋतु से मूसलाधार वृिष्ट का तथा शरदऋतु कहने से उस मौसम का बोध होता है , जब अत्यधिक ठंड से लोग रजाई के अंदर रहने में सुख महसूस करें। इसी तरह माह के नामकरण के साथ भी कुछ विशेषताएं जुड़ी हुई है। आिश्वन महीने का नामकरण इसलिए हुआ , क्योंकि इस महीने में अिश्वनी नक्षत्र में पूणिZमा का चॉद होता है। बैशाख नाम इसलिए पड़ा , क्योंकि इस महीने में विशाखा नक्षत्र में पूणिZमा का चॉद होता है। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;इस तरह हर महीने की विशेषता भिन्न-भिन्न इसलिए हुई ,क्योंकि सूर्य की स्थिति प्रत्येक महीने आकाश में भिन्न-भिन्न जगहों पर होती है। ज्योतिषीय दृिष्ट से भी हर महीने की अलग-अलग विशेषताएं हैं। इसी तरह शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में उजाले और अंधेरे का अनुपात बराबर बराबर होने के बावजूद एक को कृष्ण और दूसरे को शुक्ल पक्ष कहा गया है। दोनों पक्षों के मौलिक गुणों में कोई भी अंतर नहीं होता है। बड़ा या छोटा चॉद दोनो पक्षों में होता है। अष्टमी दोनों पक्षों में होती है। किन्तु ये नाम अलग ही दृिष्टकोण से दिए गए हैं । जिस पक्ष में शाम होने के साथ ही अंधेरा हो , उसे कृष्ण पक्ष और जिस पक्ष में शाम पर उजाला रहे , उसे शुक्ल पक्ष कहते हैं। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;शुक्ल पक्ष के आरंभ में चंद्रमा सूर्य के अत्यंत निकट होता है। प्रत्येक दिन सूर्य से उसकी दूरी बढ़ती चली जाती है और पूर्णमासी के दिन यह सूर्य से सर्वाधिक दूरी पर पूर्ण प्रकाशमान देखा जाता है। इस समय सूर्य से इसकी कोणिक दूरी 180 डिग्री होती है। इस दिन सूर्यास्त से सूयोZदय तक रोशनी होती है। इसके बाद कृष्ण पक्ष का प्रारंभ होता है। प्रत्येक दिन सूर्य और चंद्रमा की कोणिक दूरी घटने लगती है। इसका प्रकाशमान भाग घटने लगता है और कृष्ण पक्ष के अंत में अमावश तिथि के दिन सूर्य चंद्रमा एक ही विन्दु पर होते हैं। सूयोZदय से सूर्यास्त तक अंधेरा ही अंधेरा होता है। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;इस तरह ऋतु , महीने और पक्षों की वैज्ञानिकता समझ में आ जाती है। भचक्र में सूर्य , चंद्रमा और नक्षत्र - सभी का एक दूसरे के साथ परस्पर संबंध है , किन्तु सप्ताह के सात दिनों का नामकरण ग्रहों के गुणों पर आधारित न होकर याद रख पाने की सुविधा से प्रमुख सात आकाशीय पिंडों के नाम के आधार पर किया गया लगता है , महीनें को दो हिस्सों में बॉटकर एक-एक पखवारे का शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष बनाया गया है। दोनो ही पक्ष सूर्य और चंद्रमा की वििभ्न्न स्थितियों के सापेक्ष हैं , किन्तु एक पखवारे को दो हिस्सों में बॉटकर दो सप्ताह में समझने की विधि केवल सुविधावादी दृिष्टकोण का परिचायक है। जब सप्ताह का निर्माण ही ग्रहों पर आधारित नहीं है , तो उसके अंदर आनेवाले सात अलग अलग दिनों का भी कोई वैज्ञानिक अर्थ नहीं है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;सौरमास और चंद्रमास दोनों की परिकल्पनाओं का आधार भिन-भिन्न है। पृथ्वी 365 दिन और कुछ घंटों में एक बार सूर्य की परिक्रमा कर लेती है। इसे सौर वषZ कहतें हैं, इसके बारहवें भाग को एक महीना कहा जाता है। सौरमास से अभिप्राय सूर्य का एक रािश में ठहराव या आकाश में 30 डिग्री की दूरी तय करना होता है। चंद्रमास उसे कहते हैं , जब चंद्रमा एक बार पूरी पृथ्वी की परिक्रमा कर लेता है। यह लगभग 29 दिनों का होता है । बारह महीनों में बारह बार सूर्य की परिक्रमा करने में चंद्रमा को लगभग 354 दिन लगते हैं। इसलिए चंद्रवषZ 354 दिनों का होता है। सौर वष्र और चंद्रवषZ के सवा ग्यारह दिनों के अंतर को प्रत्येक तीन वषोZं के पश्चात् चंद्रवषZ में एक अतिरिक्त महीनें मलमास को जोड़कर पाट दिया जाता है। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;सौर वषZ में भी 365 दिनों के अतिरिक्त के 5 घंटों को चार वषे बाद लीप ईयर वषZ में फरवरी महीने को 29 दिनों का बनाकर समन्वय किया जाता है , किन्तु सप्ताह के सात दिन , जो पखवारे के 15 दिन , महीने के 30 दिन , चांद्रवषZ के 354 दिन और सौर वषZ के 365 दिन में से किसी का भी पूर्ण भाजक या अपवत्र्तांक नहीं है , के समन्वय या समायोजन का ज्योतिष शास्त्र में कहीं भी उल्लेख नहीं है , जिससे स्वयंमेव ही ज्योतिषीय संदर्भ में सप्ताह की अवैज्ञानिकता सिद्ध हो जाती है। अत: मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि रविवार को सूर्य का , सोमवार को चंद्र का , मंगलवार को मंगल का , बुधवार को बुध का , बृहस्पतिवार को बृहस्पति का , शुक्रवार को शुक्र का तथ शनिवार को शनि का पर्याय मान लेना एक बहुत बड़ी गल्ती है। ग्रहों का सप्ताह के सातो दिनों से कोई लेना-देना नहीं है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;सात दिनों का सप्ताह मानकर पक्ष को लगभग दो हिस्सों में बॉटकर सात दिनों के माध्यम से सातो ग्रहों को याद करने की चेष्टा की गयी होगी। लोग कभी यह महसूस नहीं करें कि ग्रहों का प्रभाव नहीं होता ।शायद इसी शाश्वत सत्य के स्वीकर करने और कराने के लिए ऋषि मुनियो द्वारा सप्ताह के सात दिनों को ग्रहों के साथ जोड़ना एक बड़े सूत्र के रुप में काम आया हो। एक ज्योतिषी होने के नाते सप्ताह के इन सात दिनों से मुझे अन्य कुछ सुविधाएं प्राप्त हैं। आज मंगलवार को चंद्रमा सिंह रािश में स्थित है , तो बिना पंचांग देख ही यह अनुमान लगाना संभव है कि आगामी मंगलवार को चंद्रमा वृिश्चक रािश में , उसके बाद वाले मंगलवार को कुंभ रािश में तथ उसके बादवाले मंगलवार को वृष रािश में या उसके अत्यंत निकट होगा।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt; इस दृिष्ट से चंद्रमा की भचक्र में 28 दिनों का चक्र मानकर इसे 4 भागों में बॉट दिया गया हो तो हिसाब सुविधा की दृिष्ट से अच्छा ही है। मंगलवार को स्थिर रािश में चंद्रमा है तो कुछ सताहों तक आनेवाले मंगलवार को चंद्रमा स्थिर रािश में ही रहेगा। कुछ दिनों बाद चंद्रमा द्विस्वभाव रािश में चला जाएगा तो फिर कुछ सप्ताहों तक मंगलवार को चंद्रमा द्विस्वभाव रािश में ही रहेगा।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;मैं वैज्ञानिक तथ्यों को सहज ही स्वीकार करता हूं। पंचांग में तिथि , नक्षत्र , योग और करण की चर्चा रहती है। ये सभी ग्रहों की स्थिति पर आधारित हैं। किसी ज्योतिषी को बहुत दिनों तक अंधेरी कोठरी में बंद कर दिया जाए , ताकि महीने और दिनों के बीतने की कोई सूचना उसके पास नहीं हो । कुछ महीनों बाद जिस दिन उसे आसमान को निहारने का मौका मिल जाएगा , केवल सूर्य और चंद्रमा की स्थिति को देखकर वह समझ जाएगा कि उस दिन कौन सी तिथि है , कौन से नक्षत्र में चंद्रमा है , सामान्य गणना से वह योग और करण की भी जानकारी प्राप्त कर सकेगा , किन्तु उसे सप्ताह के दिन की जानकारी कदापि संभव नहीं हो पाएगी , ऐसा इसलिए क्योंकि सूर्य , चंद्रमा या अन्य ग्रहों की स्थिति के सापेक्ष सप्ताह के सात के दिनों का नामकरण नहीं है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8693317056729335791-6059972783840010029?l=jyotishsachyajhuth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jyotishsachyajhuth.blogspot.com/feeds/6059972783840010029/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8693317056729335791&amp;postID=6059972783840010029' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8693317056729335791/posts/default/6059972783840010029'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8693317056729335791/posts/default/6059972783840010029'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jyotishsachyajhuth.blogspot.com/2008/09/blog-post_30.html' title='वार से फलित कथन अवैज्ञानिक'/><author><name>विशेष कुमार</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-ZN2ci0r77MI/Tv9UGFBuf_I/AAAAAAAAAB4/xVUR1w8GkKg/s220/vishesh.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8693317056729335791.post-8775388121864242857</id><published>2008-09-21T02:17:00.000-07:00</published><updated>2011-08-30T02:30:41.167-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='bokaro'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='vidya sagar mahtha'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='petarwar'/><title type='text'>राहू-केतु का फलित पर कोई प्रभाव नहीं</title><content type='html'>&lt;span style="color:#660000;"&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;भौतिक विज्ञान किसी पिंड के सापेक्ष या उसके अस्तित्व के कारण गुरुत्वाकषZण , विद्युत-चुम्बकीय-क्षेत्र , या अन्य रुपांतरित शक्ति के स्वरुपों की व्याख्या करता है। जहॉ पिंड नहीं है , किसी प्रकार कीे शक्ति के अस्तित्व में होने की बात कही ही नहीं जा सकती। राहू-केतु आकाश में किसी पिंड के रुप में नहीं हैं। अत: इसमें अंतिर्नहित और उत्सर्जित शक्ति को स्वीकार किया ही नहीं जा सकता है । फलित ज्योतिष में राहूकेतु को कष्टकारक ग्रह कहा गया है , इससे लोग पीिड़त होते हैं। ज्योतिषियों ने इसके भयावह स्वरुप का वर्णन कर धर्मशास्त्र में उिल्लखित भगवान विष्णु की तरह ही इनके साथ उचित न्याय नहीं किया है। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;हमारे धर्मग्रंथों में जैसा उल्लेख है , छल से देवताओं की पंक्ति में बैठकर अमृतपान करते हुए राक्षस का वध श्रीविष्णु ने सुदशZनचक्र से कर दिया राक्षस के गर्दन का उपरी भाग राहू और नीचला भाग केतु कहलाया। भगवान नें ऐसा करके राक्षसी गुणों का प्रकारांतर में वध ही कर दिया था। किन्तु ज्योतिषी आज भी उसे जीवित समझते हैं और उसके भयावह स्वरुप का वर्णन करके यजमानों को भयभीत करते हैं। सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण के समय ही इनके असाधारण स्वरुप को देखकर लोगों के मस्तिष्क में यह बात कौध गयी हो कि सूर्य और चंद्रमा जैसे प्रभावशाली , प्रकाशोत्पादक , आकाशीय पिंडों के देदीप्यमान स्वरुप को निस्तेज करनेवाले ग्रहों की दुष्टता और विध्वंसात्मक प्रवृत्ति को कैसे अस्वीकार कर लिया जाए , किन्तु मेरा दृिष्टकोण यहॉ बिल्कुल ही भिन्न है। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;दो मित्र परस्पर टकराकर लहुलूहान हो जाएं , घायल हो जाएं ,तो इसमें उस जगह का क्या दोष , जहॉ इस प्रकार की घटना घट गयी हो। सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण यदि असाधारण घटनाएं हैं , तो इसके समस्त फलाफल की विवृत्ति सूर्य चंद्र तक ही सीमित हो , क्योंकि ये शक्तिपृंज या शक्ति के स्रोत हैं। चंद्रग्रहण के समय पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ती है और सूर्यग्रहण के समय चंद्रमा के कारण सूर्य आंिशक तौर पर या पूर्ण रुप से नहीं दिखाई पड़ता है। इस प्रकार के ग्रहण राहू केतु रेखा पर सूर्यचंद्र के पहुंचने के कारण होते हैं। इस प्रकार के ग्रहणों से किसकी शक्ति घटी और किसकी बढ़ी ,उसका मूल्यांकण किया जाना चाहिए। राहू केतु जैसे विन्दुओं को शक्ति का स्रोत समझ लेना , उन परिकल्पित विन्दुओं की शक्ति और विशेषताओं को भचक्र के किसी भाग से जोड़ देना तथ व्यक्तिविशेष के जीवन के किसी भाग से इसके मुख्य प्रतिफलन काल को जोड़ने की परिपाटी वैज्ञानिक दृिष्ट से उचित नहीं लगती। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;चंद्रमा का परिभ्रमणपथ पृथ्वी के चतुिर्दक बहुत ही छोटा है। इसकी तुलना में सूर्य के चतुिर्दक पूथ्वी का परिभ्रमणपथ बहुत ही विशाल है। यदि पृथ्वी को स्थिर मान लिया जाता है , तो चंद्रपथ की तुलना में सूर्य का काल्पनिक परिभ्रमण पथ नििश्चत रुप से बड़ा हो जाएगा। परिकल्पना यह है कि चंद्रमा और सूर्य के परिभ्रमण पथ एक दूसरे को काटते हैं , उसमें से एक विन्दु उत्तर की ओर तथा दूसरा दक्षिण की ओर झुका होता है। दोनों के परिभ्रमणपथ परिधि की दृिष्ट से एक दूसरे से काफी छोटे-बड़े हैं ,अत: इनके परस्पर कटने का कोई प्रश्न ही नहीं उपस्थित होता है , किन्तु दोनो के परिभ्रमण पथ को बढ़ाते हुए नक्षत्रों की ओर ले जाया जाए तो दोनो का परिभ्रमणपथ आकाश में दो विन्दुओं पर अवश्य कटता है। इस तरह चंद्रसूर्यपथ के कटनेवाले दोनो विन्दुओं उत्तरावनत् और दक्षिणावनत् का नाम क्रमश: राहू और केतु है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt; इस तरह येे काल्पनिक विन्दु आकाश में कितनी दूरी पर है , इसका भी सही बोध नहीं हो पाता। पुन: अस्तित्व की दृिष्ट से विन्दु विन्दु ही है , इसकी न तो लंबाई है , न चौड़ाई और न ही मोटाई , इसलिए पिंड के नकारात्मक अस्तित्व तथा दूरी की अनििश्चतता के कारण फलित में राहू केतु का महत्व समीचीन नहीं लगता। किन्तु ये सूर्य और चंद्रग्रहण काल को समझने में सहायक हुए , इसलिए इन्हें ग्रह का दर्जा दे दिया गया। सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण को सूर्य चंद्रमा की युति और वियुति से अधिक महत्व नहीं दिया जा सकता। यह युति वियुति खास इसलिए मानी जा सकती है या तीव्रता में वृिद्ध की संभावना रहती है , क्योंकि यह राहूकेतु रेखा पर होती है , जो पृथ्वी के केन्द्र से होकर गुजरती है , किन्तु इस प्रकार की आकाशीय घटनाएं बहुत बार घटती हैं। सूर्य बुध और सूर्य शुक्र के ग्रहणों को भी देख चुका हूं , किन्तु इसके विशेष फलित की चर्चा युति से अधिक कहीं भी नहीं हुई है। यदि इन विशेष युतियों पर भी बात हो , इनके फलित को उजागर करने की बात हो तो आकाश में राहू केतुओ की संख्या ग्रहों से भी अधिक हो जाएगी। आकाशीय पिंडों से संबंधित भौतिक विज्ञान जिन शक्तिसिद्धांतों पर काम करता है , उन्हीं का उपयोग करके सही फल प्राप्त किया जा सकता है। राहू केतु परिकल्पित आकाशीय विन्दु हैं , अत: आकाशीय िंपड की तरह इसके फल को स्वीकार नहीं किया जा सकता।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;राहू केतु को ग्रह न मानकर फलित ज्योतिष से इनकी छुट्टी कर दी जाए तो विंशोत्तरी पद्धति में वणिZत राहू केतु के महादशा और अंतर्दशा का क्या होगा ? ठंडे दिमाग से काम लें तो जो राहू केतु सूर्य और चंद्र का भक्षण कर रहा था , एस्ट्रोफिजिक्स के सिद्धांत आज उसी का भक्षण कर रहें हैं। जिस प्रकार सूर्य और चंद्रमा के परिभ्रमणपथों के दो विन्दुओं पर कटने से उन परिकल्पित विन्दुओं के नाम राहू केतु पड़े , इस तरह सूर्य बुध , सूर्य शुक्र , सूर्य मंगल , सूर्य बृहस्पति , सूर्य शनि , पुन: चंद्र बुध , चंद्र मंगल , चंद्र शुक्र ,चंद्र बृहस्पति , चंद्र शनि , के परिभ्रमण पथ भी दो विन्दुओं पर कट सकते हैं , इन परिस्थितियों में इन परिकल्पित विन्दुओं के नाम राहू1 , राहू2 ,राहू3 ,,,,,,,,,,,,,,तथा केतु1 , केतु2 , केतु3 ,,,,,,,,,,,,,पड़ते चले जाएंगे। सूर्यपथ के साथ सभी ग्रहों के परिभ्रमण पथ के कटने से 9 राहू केतुओं का , चंद्रपथ के साथ अन्य ग्रहों के कटने से 8 राहू केतुओं का , इस तरह बुध के परिभ्रमण पथ पर 7 , मंगल के परिभ्रमण पथ पर 6,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;इस तरह यह सिद्ध हेा जाता है कि सूर्य चंद्रमा के एक ही तल में युति-वियुति ,जो पृथ्वी तल के समकक्ष होती है , की ही तरह शेष ग्रहों की युति-वियुति की संभावनाएं 44 बार बनती है। इस तरह अनेकानेक यानि 45 राहू केतुओं का आविभाZव हो जाएगा। यहॉ ध्यान देने योग्य बात ये है कि इन विशेष परिस्थितियों में युति या वियुति बनानेवाले ग्रह तत्काल या कालान्तर में अपने दशाकाल में सचमुच असाधारण परिणाम प्रस्तुत करते हैं। इन विशेष विन्दुओं के ठीक 90 डिग्री की दूरी पर दोनो तरफ दोनो के परिभ्रमणपथ सर्वाधिक दूरी पर होंगे। उस समय संबंधित दोनो ग्रहों की युति या वियुति का अर्थ ग्रहण काल की युति-वियुति के विपरीत किस प्रकार का फल प्रदान करेंगे , यह परीक्षण का विषय होना चाहिए। हर दो ग्रहों के विभिन्न परिभ्रमणपथ परस्र एक दूसरे कों काटे तो उन विन्दुओं पर उनकी युति-वियुति के फलित से 90 डिग्री की दूरी पर युति-वियुति के फलित की विभिन्नता को समझने और परीक्षण करने का दायित्व ज्योतिषियों के समक्ष उपस्थित होता है। तब ही राहू केतु विन्दुओं पर ग्रहों की युति-वियुति की विशेषताओं की पकड़ की जा सकती है। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;पृथ्वी सूर्य के चतुिर्दक परिक्रमा करती है , किन्तु जब पृथ्वी के सापेक्ष सूर्य की परिक्रमा को गौर से देखा जाए तो इसका कभी उत्तरायण और कभी दक्षिणायण होना बिल्कुल ही नििश्चत है। इसी तरह सभी ग्रहों के परिभ्रमणपथ की नियमावलि प्राय: सुनििश्चत है। ये सभी ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं , अपने पथ पर थिरकते हुए भले ही ये उत्तर-दक्षिण आवर्ती हो जाएं , क्योंकि पृथ्वी के सापेक्ष सूर्य स्वयं उत्तरायन-दक्षिणायन होता प्रतीत होता है । सभी ग्रहों की गति भिन्न-भिन्न होती है अत: विभिन्न ग्रहों के पथ मेंं विचलन परिभाषित होता रहता है। इस प्रकार किसी भी दो ग्रहों की युति-वियुति पृथ्वी तल समानांतर एक तल में एक विंदु पर या 180 डिग्री पर होती रहती है। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;सूर्य और चंद्रमा कब राहू केतु विंदु पर युति या वियुति करेंगे , इसकी नियमितता की जानकारी प्राप्त हे चुकी है , किन्तु शेष ग्रहों से संबंधित राहू केतु विंदुओं की गति की नियमितता की जानकारी गणित ज्योतिष के मर्मज्ञ ही दे सकते हैं । जनसामान्य तक इसकी जानकारी की आवश्यकता इसलिए महसूस नहीं की गयी क्योंकि शेष ग्रहों के ग्रहण न तो आकषZक होते हैं और न ही दृिष्टपटल में आ ही पाते हैं। फलित ज्योतिष में भी इसकी चर्चा युति के रुप में ही होती है , ग्रहण के रुप में नही। पृथ्वी के बहिर्कक्षीय ग्रह मंगल , बृहस्पति , शनि , यूरेनस , नेपच्यून और प्लूटो सूर्य से ग्रहण के बावजूद सूर्य के पृष्ठतल में ही रहेंगे , अत: ये पृथ्वी से दृष्ट नहीं हो सकते। अनेक राहू केतुओं की चर्चा करके मैं यही सिद्ध करना चाह रहा हूं कि फलित ज्योतिष में वणिZत इसके भयानक स्वरुप को लोग भूल जाएं। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;किसी भी दो ग्रहों के लिए ये ऐसे परिकल्पित विन्दु हैं , जहॉ पहुंचने पर इन दोनों आकाशीय पिंडों के साथ ही साथ पृथ्वी एक सीधी रेखा में होता है। इन विन्दुओं पर संबंधित ग्रहों के एक बार पहुंच जाने पर उन ग्रहों की शक्ति में भले ही कमी या वृिद्ध देखी जाए , किन्तु इस परिप्रेक्ष्य में राहू केतु के प्रभाव को अलग से दर्ज करना कदापि उचित नहीं लगता। पहले एक राहू और एक केतु से ही लोग इतने भयभीत होते थे , अब 45 राहू और केतु की चर्चा कर मैं लोगों को डराने की चेष्टा नहीं कर रह हूं , वरन् इसके माध्यम से असलियत को समझाने की चेष्टा कर रहा हूं , इस विश्वास के साथ कि इसकी जानकारी के बाद इसके जानकार इसका दुरुपयोग नहीं करेंगे। अब वे दिन लद गए , जब राहू केतु के गुणों के आधार पर भचक्र के रािशयों या नक्षत्रों पर इसके स्वामित्व की चर्चा होती थी। इनके उच्च या नीच रािश की चर्चा की जाती थी। इनके नाम पर महादशा और अंतर्दशा की चर्चा होती थी। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;सभी प्रकार की दशापद्धतियों में इनके प्रभाव की हिस्सेदारी सुनििश्चत की जाती थी। राहू केतु के सही स्वरुप कों समझ लेने के बाद यह दायित्व हम ज्योतिषियों के समक्ष उपस्थित होता है कि विभिन्न दशापद्धतियों , चाहे वह विंशोत्तरी हो या अष्टोत्तरी या परंपरागत , राहू केतु के महादशा के काल भिन्नता 18 वषZ और 7 वषZ के साथ ही साथ महादशा और अंतर्दशा आदि से संबंधित त्रुटियों को कैसें समाप्त किया जा सकेगा ? पंचांग निर्माणकत्र्ताओं को यह स्मरण होगा कि श्री संवत् 2050 शक 1915 कार्तिक कृष्ण सप्तमी शनिवार 6 नवंबर 1993 को सूर्य-बुध की भेद-युति हुई थी। इसे सूर्य बुध का ग्रहण कहा जा सकता है। भला राहू केतु के अभाव में कोई ग्रहण संभव है ? &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8693317056729335791-8775388121864242857?l=jyotishsachyajhuth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jyotishsachyajhuth.blogspot.com/feeds/8775388121864242857/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8693317056729335791&amp;postID=8775388121864242857' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8693317056729335791/posts/default/8775388121864242857'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8693317056729335791/posts/default/8775388121864242857'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jyotishsachyajhuth.blogspot.com/2008/09/blog-post_21.html' title='राहू-केतु का फलित पर कोई प्रभाव नहीं'/><author><name>विशेष कुमार</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-ZN2ci0r77MI/Tv9UGFBuf_I/AAAAAAAAAB4/xVUR1w8GkKg/s220/vishesh.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8693317056729335791.post-7592754875704241560</id><published>2008-09-14T03:03:00.000-07:00</published><updated>2011-08-30T02:30:28.981-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='bokaro'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='vidya sagar mahtha'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='petarwar'/><title type='text'>राजयोगों की वैज्ञानिकता</title><content type='html'>&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#663300;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;फलित ज्योतिष में ग्रह या ग्रहों की विशेष स्थितियों का विवरण राजयोग या ज्योतिषयोग प्रकरण में मिलता है। राजयोग ज्योतिष में प्रयुक्त होनेवाला वह शब्द है , जिसका अर्थ सामान्यतया राजा होने या राजा की तरह सुख , संसाधन या प्रतिष्ठा प्राप्त करने की भविष्यवाणी की पुिष्ट करता है। राजयोगों की विवेचना या उल्लेख करते हुए सामान्यतया ज्योतिषी या ज्योतिषप्रेमी अपने मस्तिष्क मे भावी उपलब्धियों की बहुत बड़ी तस्वीर खींच लेने की भूल करते हैं। चूंकि आज का युग राजतंत्र का नहीं है , कई लोग इसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं कि राजयोग का जातक मंत्री , राज्यपाल , राष्ट्रपति , कमांडर , जनप्रतिनिधि या टाटा ,बिड़ला जैसी कम्पनियों का मालिक होना है। लेकिन जब इस प्रकार के योगों की प्राप्ति बहुत अधिक दिखलाई पड़ने लगी , यानि राजयोगवाली बहुत सारी कुंडलियॉ देखने को मिलने लगीं , तो ज्योतिषी फलित कहते वक्त कुछ समझौता करने लगे और राजयोग का अर्थ गजेटेड अफसरो से जोड़ने लगें। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;span style="color:#663300;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#663300;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;1965 के आसपास अधिकांश ज्योतिषियों के दृिष्टकोण लगभग ऐसे ही थे। जब भी किसी कुंडली में कोई राजयोग दिखाई पड़ता , मै भी शीघ्र इस निर्णय पर पहुंच जाता कि संबंधित जातक को असाधारण व्यक्तित्व का मालिक होना चाहिए। कालांतर में यानि 1970 तक जब बहुत सी कुंडलियो को गौर से देखने का मौका मिला , तो राजयोग से संबंधित मेरी धारणाएं धीरे-धीरे बदलने लगी। गाणितिक दृिष्ट से राजयोग की संभावनाओं पर मेरा ध्यान केिन्द्रत हुआ। इस अनुक्रम में मेरा पहला लेख 1971 में शक्तिनगर दिल्ली से प्रकािशत होनेवाली ज्योतिषीय पति्रका ` भारतीय ज्योतिष´ में प्रकािशत हुआ , जिसका शीषZक था - ` चामर योग की संभावनाएं और इसका मूल्यांकण ´ । इस लेख को लिखते हुए मैनें ग्रह योग की संभावनाओं को गणित में वणिZत संभावनावाद की कसौटी पर रखने की कोिशश की। दूसरा लेख जयपुर से निकलनेवाली ज्योतिष पति्रका ` ज्योतिष मार्तण्ड ´ में नवंबर 1974 में प्रकािशत हुआ , जिसका शीषZक था--` विपर्यय योग और इंदिरा गॉधी ´ । &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(102, 51, 0); "&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;श्रीमती इंदिरा गॉधी की कुंडली में कोई भी ग्रह स्वक्षेत्रीय या उच्च का नहीं था , किन्तु सूर्य-मंगल , बृहस्पति-शु्रक्र तथा शनि-चंद्र का परस्पर विपर्यय था । इस लेख में भी योगों की संभावनाओ की गाणितिक व्याख्या थी। प्रकाशन के समय ये लेख काफी चर्चित थें। इस तरह ज्योतिष की प्राचीन पुस्तकों में वणिZत अधिकांश राजयोगों की गाणितिक व्याख्या के बाद मैं इस निष्कषZ पर पहुंचा कि इस प्रकार के योग बहुत सारे कुंडलियों में भरे पड़े हैं , जिनका कोई विशेष अर्थ नहीं है। अब तो मैं दृढतापूर्वक इस बात को कह सकता हूं कि राजयोगों की तालिका में ऐसे बहुत सारे राजयोग हैं , जो किसी कुंडली में 5-7 की संख्या में होने के बावजूद भी जातक को वििशष्ट नहीं बना पाते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="color:#663300;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;यदि आपको ज्योतिष में रुचि है , तो कई बार आप पढ़ ही चुके होंगे कि किसी कुंडली में तीन ग्रह उच्च के हों तो जातक नृपतुल्य होता है। जब प्रारंभ में इस योग की जानकारी हुई थी , तो अपनी कुंडली में उच्चस्थ ग्रहों को गिनने की कोिशश की , जैसा हर कोई करते ही होंगे , ऐसा मेरा मानना है। मेरी कुंडली में उच्चस्थ ग्रह सिर्फ मंगल था। श्रीमती इंदिरा गॉधी की कुंडली में ढंूढ़ने की कोिशश की तो एक भी नहीं मिला , पुन: यह सोंचते हुए कि यह सचमुच उच्च कोटि का राजयोग है , इंदिरा गॉधी से भी अधिक प्रभुतासंपन्न कुंडली में मिल सकता है , उनके पिता श्री जवाहरलालजी की कुंडली को देखा । वहॉ भी तीन उच्चस्थ ग्रहों को नहीं पाया। किन्तु एक दिन ऐसा भी आया , जब मैं तीन उच्चस्थ ग्रहों की तलाश में नहीं था , फिर भी एक दुकानदार की कुंडली में सहसा तीन उच्चस्थ ग्रह दिखाई पड़े। उस दुकानदार की मासिक आय परिवार के भरण-पोषण के बाद दो सौ से अधिक की नहीं थी। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(102, 51, 0); "&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;उक्त कुंडलीवाले सज्जन के जीवन का पूर्वार्द्ध बहुत ही संघषZमय था। ये अपने जीवन के अंतिम क्षणों को सुख्सपूर्वक तो व्यतीत कर रहे थे , पर अधिक सुधार की गुंजाइश नहीं थी। इस कुंडली को देखने के बाद मैं सोचने लगा--इस कुंडली में सूर्य , बृहस्पति और शनि उच्च के हेैं। इस जातक के जन्म के समय के आसपास जब तक मेष रािश में सूर्य रहा होगा , तीन उच्चस्थ ग्रहों का योग एक महीने के लिए कायम होगा और इस एक महीने के अंदर जितने भी बच्चों ने जन्म लिया होगा , सभी की कुंडली में तीन ग्रह उच्चस्थ ही रहे होंगे। किन्तु वे सभी जातक नृपयोग मे जन्म लेकर भी वास्तव में राजा नहीं हुए होंगे। इनमें से एक व्यक्ति मामूली दुकानदार के रुप में मुझे मिल गया , शेष के बारे में भगवान ही जाने , कहॉ , कौन किस स्थिति में है। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;p&gt;&lt;span&gt;&lt;span style="color:#663300;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;उपरोक्त व्याख्या से इतनी बात तो स्पष्ट हो गयी कि अभी तक राजयोगों का सही मूल्यांकण नहीं हुआ है और न ही आधुनिक ज्योतिषी इस दिशा में कोई ठोस कदम ही उठा पाए हैं। जिस राजयोग में एक राजा को पैदा होना चाहिए , उसमें एक मामूली दुकानदार पैदा हो जाता है और जब श्रीमती इंदिरा गॉधी जैसे सर्वगुणसंपन्न प्रधानमंत्री की कुंडली की व्याख्या करने का अवसर मिलता है , तो बड़े से बड़े ज्योतिषी उनकी कुंडली में बुधादित्य राजयोग ही उनके प्रघानमंत्री बनने का कारण बताते हैं , जबकि संभावनावाद के अनुसार 50 प्रतिशत से अधिक लोगों की कुंडली में बुधादित्य योग के होने की संभावना होती है। एक महान ज्योतिषी ने अपनी पुस्तक में लिखा है , बुधादित्य योग यद्यपि प्राय: सभी कुंडलियों में पाया जाता है , फिर भी इसे कम महत्वपूर्ण नहीं समझना चाहिए। इस तरह राजयोगों का विश्लेषण क्या असमंजस में डालनेवाला पेचीदा , अस्पष्ट और भ्रामक नहीं है ? इस तरह के पेचीदे वाक्य राजयोग के विषय में ही नहीं , वरन् ज्योतिष के समस्त नियमों के प्रति बुिद्धजीवी वर्ग की जो धारणा बनती है , उससे फलित ज्योतिष का भविष्य उज्जवल नहीं दिखाई पड़ता है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/span&gt;&lt;p&gt;&lt;span&gt;&lt;span style="color:#663300;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;आज कम्प्यूटर का जमाना है , अपने समस्त ज्योतिषीय नियमों , सिद्धांतो को कम्प्यूटर में डालकर देखा जाए , कुंडली निर्माण से संबंधित गणित भाग का काम संतोषजनक है , परंतु फलित भाग बिल्कुल ही स्थूल पड़ जाता है , इससे किसी को संतुिष्ट नहीं मिल पाती है। एक मामूली प्राथ्मिक स्कूल के िशक्षक और बसचालक की कुंडली में अनेक राजयोग निकल आते हैं और अमेरिका के राष्ट्रपति बिल िक्लंटन की कुंडली में एक दरिद्र योग का उल्लेख इस तरह होता है , मानो वह अति वििशष्ट व्यक्ति न होकर भिखारी हो। वास्तव में फलित ज्योतिष से संबंधित नियम बहुत ही उलझनपूर्ण और अस्पष्ट हैं। यदि कोई यह कहे कि एक रुपये में सौ आम खरीदकर तो लाया गया है , परंतु इसे कम महत्वपूर्ण नहीं समझा जाए , एक आम का दाम दस रुपये है , तो इस प्रकार के दुविधापूर्ण तथ्यो को कम्प्यूटर में डालने के बाद आम की कीमत के बारे में पूछा जाए , तो कम्प्यूटर भी सदैव दुविधापूर्ण उत्तर ही देगा। अभी बाजार में राजयोगों से संबंधित कई पुस्तकें उपलब्ध है , किन्तु आजतक के विद्वानों के विश्लेषण की पद्धति मौलिक या वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित नहीं है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;p&gt;&lt;span&gt;&lt;span style="color:#663300;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;ईस प्रकार की दुविधापूर्ण पुस्तकों के बाजार में भरे होने के कई कारण हो सकते हैं। वैज्ञानिक दृिष्टकोणों का अभाव हो या व्यावसायिक सफलता में अधिक रुचि होने के कारण परंपरागत भूलों को नजरअंदाज किया जा रहा हो। कारण जो भी हो , लेकिन सभी पुस्तको ंमें परंपरागत राजयोगों को महत्वपूर्ण समझा गया है और उसका मात्र हिन्दी अनुवाद कर दिया गया है। इन राजयोगों की पुिष्ट में सिर्फ एक महापुरुषों की जन्मकुंडली को उद्धृत कर दिया गया है। ऐसा ही होता आया है , सोंचकर पाठक के दिमाग में राजयोगों की गलत धारणाएं आ जाती हैं । जब भी वे किसी कुंडली में राजयोग को पा लेते हैं , फलित की चर्चा करते तनिक भी नहीं हिचकिचाते कि अमुक जातक मंत्री या पदाधिकारी होगा , जबकि तथ्य अनुमान के विपरीत असमंजस में डालनेवाले होते हैं। मैंने राजयोगों के सभी नियमों का भली-भॉति अध्ययन किया है और सर्वदा इसी निष्कषZ पर आया हूं कि इनका न तो सही क्रम है और न ही नििश्चत मूल्य। इन योगों की सहायता से योगों की तीव्रता की अभिव्यक्ति नहीं की जा सकती है। राजयोग में पैदा होनेवाले व्यक्तियों को वर्गीकृत नहीं किया जा सकता। राजयोग के शािब्दक अर्थ या निहित अर्थ को कायम नहीं रखा जा सकता , वरन् राजयोगों को समझने के क्रम में उलझनें ही सामने आएंगी। इन योगों को सटीक बनाने के क्रम में ज्योतिषी गणित के संभावनावाद और ग्रहगति में सबसे महत्वपूर्ण मंदगति मंद गति की उपस्थिति को राजयोगों में सिम्मलित कर संभावनाओं को विरल बनाने की कोिशश करें , नही ंतो इन योगों का कोई अभिप्राय नहीं रह जाएगा। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/span&gt;&lt;p&gt;&lt;span&gt;&lt;span style="color:#663300;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;कई राजयोगों की विफलता को प्रस्तुत करती कुंडली हमनें देखा है, जो एक ऐसे व्यक्ति की है , जो अपने माता-पिता और अपने पूरे परिवार को परेशान करता हुआ अपनी सारी संपत्ति खो बैठा है। इश्कमिजाज , फिजूलखर्च और शराबी है , चाकू रखता है , दूसरों को परेशान करना , धमकी देना और ब्लैकमेलिंग करना इसका काम है। पुलिस की निगाह सदैव इसपर बनी रहती है। इस प्रकार प्रशासन की दृिष्ट में भी यह एक संदिग्ध व्यक्ति है। टी बी का मरीज है , इसकी कुंडली में चामर योग , नीचभंग महायोग , रुचक योग बुधादित्य योग -- सभी विद्यमान है। लगनेश मंगल दशम भाव में दिक्बली है। किन्तु राजयोग से संबंधित किसी भी फल का जीवन में घोर अभाव है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8693317056729335791-7592754875704241560?l=jyotishsachyajhuth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jyotishsachyajhuth.blogspot.com/feeds/7592754875704241560/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8693317056729335791&amp;postID=7592754875704241560' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8693317056729335791/posts/default/7592754875704241560'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8693317056729335791/posts/default/7592754875704241560'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jyotishsachyajhuth.blogspot.com/2008/09/blog-post_14.html' title='राजयोगों की वैज्ञानिकता'/><author><name>विशेष कुमार</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-ZN2ci0r77MI/Tv9UGFBuf_I/AAAAAAAAAB4/xVUR1w8GkKg/s220/vishesh.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8693317056729335791.post-3158597108095065824</id><published>2008-09-09T02:43:00.001-07:00</published><updated>2011-08-30T02:30:16.497-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='bokaro'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='vidya sagar mahtha'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='petarwar'/><title type='text'>ग्रह शक्ति का रहस्य</title><content type='html'>&lt;span style="color:#993300;"&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;span style="color:#663300;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="color:#993300;"&gt;&lt;span style="color:#663300;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;भविष्य की सटीक जानकारी के लिए एकमात्र विधा फलित ज्योतिष&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span style="color:#993300;"&gt;&lt;span style="color:#663300;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;निस्संदेह फलित ज्योतिष वैदिक कालीन सबसे पुरानी विधा है। जिस समय कल्प , व्याकरण , छन्द , निरुक्त आदि महज कुछ ही विधा थी , फलित ज्योतिष को वेदों का नेत्र कहा जाता था। आज सभी विश्वविद्यालयों में हजारों विषयों का प्रवेश हो चुका है , अन्य विषयों की तरह गणित ज्योतिष की खगोल विज्ञान के रुप में पढ़ाई हो रही है , किन्तु फलित ज्योतिष को विश्वविद्यालय के बाहर कर दिया गया है। तर्क यह दिया जा रहा है कि करोड़ों मील दूर रहकर ग्रह पृथ्वी के जड़-चेतन को कैसे प्रभावित कर सकता है ? अगर वह प्रभावित करे भी , तो एक ही ग्रह करोड़ो व्यक्तियों पर अपना भिन्न-भिन्न प्रभाव कैसे प्रस्तुत कर सकता है ? ज्योतिषी इसे विज्ञान कहते हैं , कुछ लोग शास्त्र , तो कुछ अवैज्ञानिक कहकर इसपर भरोसा नहीं करने की सलाह देते हैं। कुछ लोगों को इस विधा से आक्रोश या चिढ़ इस बात से है कि यह लोगों को भाग्यवादी बनाता है और यथास्थितिवाद और अकर्मण्यता को बढ़ावा देता है। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#993300;"&gt;&lt;span style="color:#663300;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#993300;"&gt;&lt;span style="color:#663300;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;फलित ज्योतिष के पक्षधरों के अनुसार आत्मज्ञान के लिए ज्योतिष ज्ञान से बड़ा संसाधन और कुछ हो ही नहीं सकता। सभी विधाएं भूतकाल और वर्तमान काल की जानकारी दे सकती है , भविष्य की सटीक जानकारी के लिए एकमात्र विधा फलित ज्योतिष ही है । पक्ष-विपक्ष में बहुत सारी बातें हो सकती हैं , किन्तु विश्व के किसी भी विश्वविद्यालय में इसे समुचित स्थान नहीं मिलने से इसका पलड़ा कमजोर पड़ गया है। प्रगतिशील विचारधारा के लोग , जो अपने को आधुनिक समझते हैं , इसे अंधविश्वास कहने से भी नहीं चूकते। दूसरी ओर यह जानते हुए भी कि एक रािश के अंदर पृथ्वी के पचास करोड़़ लोग आते हैं , मामूली रािशफल को पढ़ने के लिए पचास प्रतिशत आबादी बेचैन रहती है। फिर वे इसे बकवास या मनोरंजन का साधन बताते हैं। आखिर ऐसी कौन सी कमजोरी है , जो फलित ज्योतिष को विश्वसनीय बनायी हुई है ?&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#993300;"&gt;&lt;span style="color:#663300;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;भौतिक विज्ञान में विभिन्न प्रकार की शक्तियों का उल्लेख है। हर प्रकार की शक्ति की माप के लिए वैज्ञानिक सूत्र या शक्तिमापक इकाई है। शक्ति की माप के लिए एक संयंत्र या उपकरण है , ताकि शक्ति के स्वरुप या तीव्रता का आकलन स्पष्ट तौर पर किया जा सके। स्पीडोमीटर से बस ,ट्रेन या यान की गति का स्पष्ट बोध हो जाता है। थर्मामीटर से ताप , बैरोमीटर से हवा का दवाब , अल्टीमीटर से उड़ान के समय वायुयान की ऊंचाई ,ऑडियोमीटर से ध्वनि की तीव्रता के बारे में कहा जा सकता है। बड़ी मात्रा की विद्युत-धारा को मापने के लिए इलेक्ट्रोमीटर तथा छोटी को मापने के लिए गैल्वेनोमीटर का व्यवहार किया जाता है। लैक्टोमीटर दूध की शुद्धता को मापता है तथा रेनगेज किसी विशेष स्थान में हुई वषाZ की मात्रा की सूचना देता है। स्टॉप वाच से सूक्ष्म अवधि को रिकार्ड किया जा सकता है। उपरोक्त सभी प्रकार के वैज्ञानिक प्रकरण या संयंत्रों का निर्माण वैज्ञानिक सूत्रों पर आधारित हैं। अत: ये नििश्चत &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#993300;"&gt;&lt;span style="color:#663300;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;सूचना प्रदान करने में सक्षम हैं। इनसे प्राप्त होनेवाली सभी जानकारियॉ वैज्ञानिक और विश्वसनीय हैं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#993300;"&gt;&lt;span style="color:#663300;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#993300;"&gt;&lt;span style="color:#663300;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt; लेकिन यदि हम फलित ज्योतिष के विद्वानों से पूछा जाए कि हम ग्रह की किस शक्ति से प्रभावित हैं तथा हमारे पास उस शक्ति की तीव्रता को मापने का कौन सा वैज्ञानिक सूत्र या उपकरण है , तो इन प्रश्नों का समुचित उत्तर देना काफी कठिन होगा। पर यह सच है कि हम जबतक इन प्रश्नों के उत्तर नहीं दे सकेंगे , फलित-ज्योतिष का अनुमान का विषय मानने की बाध्यता जनसमुदाय में बनी ही रहेगी। भैतिक विज्ञान में वणिZत सभी शक्तियॉ अनुभव में भिन्न-भिन्न प्रकार की हो सकती हैं , वस्तुत: उनके मूल स्वरुप में कोई भिन्नता नहीं होती। हर घर में विद्युत-आपूर्ति हो रही है , वही विद्युत बल्ब में प्रकाश , हीटर में ताप , पंखे में गति , टेपरिकॉर्डर या स्टीरियो में संगीत का रुप धारण करता है। इस प्रकार भौतिक विज्ञान में गति , ताप , प्रकाश , चुम्बक , विद्युत घ्वनि आदि शक्ति के विभिन्न स्वरुप हैं , जिन्हे एक-से दूसरे में आसानी से परिवर्तित किया जा सकता है। संयोग से फलित-ज्योतिष के अनुसार भी आकाशीय पिंडों की जिस शक्ति से हम प्रभावित होते हैं , वे सारी शक्तियॉ भौतिक विज्ञान में वणिZत शक्तियॉ ही हैं। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#993300;"&gt;&lt;span style="color:#663300;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#993300;"&gt;&lt;span style="color:#663300;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;सूर्य के प्रकाश और ताप को तथा चंद्रमा के प्रकाश को पृथ्वीवासी घटते-बढ़ते क्रम में महसूस करते ही हैं । सूर्य के कारण ऋतु-परिवर्तन का होना तथा दिन-रात का होना सबको मान्य है। अमावश और पूणिZमा का प्रभाव समुद्र में भी देखा जाता आ रहा है। पूणिZमा के दिन आत्महत्या या पागलपन की प्रवृत्तियों में वृिद्ध को भी लोगों ने महसूस किया है। किन्तु जब शेष ग्रहों के प्रभाव को सिद्ध करने की बारी आती है , तो ज्योतिषी प्रत्यक्ष तौर पर प्रमाण जुटा पाने में असमर्थ दिखाई देते हैं। यही बात वैज्ञानिकों , बुिद्धजीवी वर्ग के लोगों और आम लोगों के ज्योतिष पर अविश्वास करने का कारण बन जाता है। लेकिन अब वैसी बात नहीं रह गयी है , क्योंकि मुझे सभी ग्रहों के गतिज और स्थैतिज ऊर्जा के गणना की जानकारी हो चुकी है , जिससे ये पृथ्वीवासी को प्रभावित करते आ रहे हैं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#993300;"&gt;&lt;span style="color:#663300;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;सभी ग्रह गतिशील हैं , पृथ्वी भी गतिशील है। सभी सूर्य की परिक्रमा कर रहे हैं। अत: कोई भी ग्रह कभी पृथ्वी से काफी निकट , तो कभी काफी दूरी पर चला जाता है। पृथ्वी से ग्रहों की दूरी के घटने-बढ़ने के कारण पृथ्वी के सापेक्ष उसकी गति में भी निरंतर बदलाव होता रहता है। कोई ग्रह पृथ्वी से बहुत अधिक दूरी पर हो , तो वह अधिक गतिशील होता है। पुन: वही ग्रह पृथ्वी के जितना अधिक निकट होता है , उतना ही विपरीत गति में होता है। पृथ्वी से ग्रहों की दूरी में जबर्दस्त परिवर्तन हो , तो ग्रह की गति में भी आमूल-चूल परिवर्तन हो जाता है। अधिक गतिशील और विपरीत गति के एक ही ग्रह के जातक उस ग्रह के काल में बहुत ही आक्रामक तो दूसरा बहुत ही दैन्य परिस्थितियों से संयुक्त होता है। संक्षेप में पृथ्वी से ग्रह की दूरी के बदलने से गति में बदलाव आता है और गति के बदलने से विद्युत-चुम्बकीय परिवेश में स्वत: ही बदलाव आता है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#993300;"&gt;&lt;span style="color:#663300;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;एक साधारण उदाहरण से इस असाधारण तथ्य को समझने की चेष्टा की जा सकती है। सूर्य से मंगल की दूरी 22.7 करोड़ किलोमीटर है और पृथ्वी से सूर्य की दूरी 15 करोड़ किलोमीटर। पृथ्वी और मंगल दोनो ही सूर्य की परिक्रमा करते हैं। जब सूर्य के एक ही ओर पृथ्वी और मंगल दोनों होते हैं , तो दोनों के बीच की दूरी 22.7–15 = 7.7 करोड़ किलोमीटर होती है। किन्तु जब सूर्य पृथ्वी और मंगल के बीच हो अथाZत् सूर्य के एक ओर पृथ्वी तथा दूसरी ओर मंगल हो , तो पृथ्वी से मंगल की दूरी बढ़ जाती है और यह दूरी 22.7+15=37.7 करोड़ किलोमीटर हो जाती है। इस तरह पृथ्वी से मंगल की न्यूनतम और अधिकतम दूरी का अनुपात 1:5 हो जाता है। पहली अवस्था में मंगल अत्यधिक वक्र गति में , तो दूसरी अवस्था में अत्यधिक गतिशील मार्गी गति में होता है। मंगल की तरह ही कोई भी ग्रह पृथ्वी से अधिकतम नजदीक होने पर अधिकतम वक्र गति में तथा अधिकतम दूरी पर स्थित होने पर अतिशीघ्री मार्गी गति में होगा। गति में बदलाव होते रहने से पृथ्वी के परिवेश में ग्रहों के विद्युतचुम्बकीय क्षेत्र और इसकी तीव्रता में बदलाव आता रहता है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#993300;"&gt;&lt;span style="color:#663300;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;जैसा कि मैंने पहले ही कहा है , सभी प्रकार की शक्तियॉ मूल रुप से एक ही हैं अत: ग्रहों के अधिक दूरी पर होने या अधिक नजदीक होने पर भिन्न-भिन्न प्रकार की शक्ति तरंगों की उत्पत्ति होती है , उसका वैज्ञानिक नामकरण जैसे भी किया जाए। पृथ्वी से अधिक दूरी पर रहनेवाला ग्रह अधिक गतिशील होता है , अत: इस प्रकार के ग्रह में गतिज उर्जा अधिक होती है। पुन: पृथ्वी के अधिक निकट रहनेवाला ग्रह वक्र गति में होता है , अत: वह ऋणात्मक गतिज उर्जा से संयुक्त होता है। किन्तु पृथ्वी से औसत दूरी पर रहनेवाले ग्रह औसत गर्ति में होते हैं। इनमें गतिज उर्जा की कमी तथा स्थैतिज ऊर्जा की अधिकता होती है। कोई भी ग्रह वक्री या मार्गी तिथि के आसपास शत-प्रतिशत स्थैतिज ऊर्जा से संयुक्त होता है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#993300;"&gt;&lt;span style="color:#663300;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#993300;"&gt;&lt;span style="color:#663300;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt; गतिज उर्जा के ग्रहों से संयुक्त जातक उस ग्रह के काल में सहज-सुखद परिस्थितियों के बीच से गुजरता है उस समय उनमें किसी प्रकार की जवाबदेही नहीं होती , परिवेश उसे भाग्यवान सिद्ध कर देता है। इस प्रकार के जातक सिर्फ अधिकार को समझते हैं , कर्तब्य से उन्हें कोई मतलब नहीं होता। ऋणात्मक गतिज उर्जा वाले ग्रहों से संयुक्त जातक उस ग्रह के काल में विपरीत कठिन परिस्थितियों के बीच से गुजरते हैं , ग्रहों से संबंधित भावों की जवाबदेही में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं होती , परिवेश से ही दैन्य होते हैं , हर समय किंकर्तब्यविमूढ़ता की स्थिति होती है। किन्तु स्थैतिक उर्जा से संयुक्त जातक निरंतर काम करने में विश्वास रखते हैं , फल की चिन्ता कभी नहीं करतें , समन्वयवादी होते हैं , अपने सुख आराम की चिन्ता कभी नहीं करतें , दृिष्टकोण में व्यापकता और विराटता होती है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#993300;"&gt;&lt;span style="color:#663300;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;उपरोक्त विवेचना से यह स्पष्ट हो जाता है कि भौतिक विज्ञान में उिल्लखित सभी प्रकार की शक्तियॉ ही वस्तुत: ग्रहों की शक्तियॉ हैं। किन्तु जिस समय फलित ज्योतिष विकसित हो रहा था , उस समय भौतिक विज्ञान में ऊर्जा से संबंधित सिद्धांतों का विकास नहीं हो पाया था। अत: फलित ज्योतिष को विकसित करनेवाले चिन्तक , ऋषि ,महर्षि , ग्रहों की शक्ति को उसकी विभिन्न स्थितियों में ढंूढ़ने की चेष्टा कर रहें थे। ग्रहों की शक्ति को समझने के लिए आज तक भौतिक विज्ञान के नियमों का इस्तेमाल नहीं किया जा सका , अत: फलित ज्योतिष अभी तक अनुमान का विषय बना हुआ है।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#993300;"&gt;&lt;span style="color:#663300;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;मुझे यह सूचित करते हुए हषZ हो रहा है कि ग्रहबल को समझने की इस वैज्ञानिक विधि की सूझ अकस्मात् कुछ घटनाओं के अवलोकन के पश्चात् सन् 1981 में मेरे मस्तिश्क में कौंधी और सन् 1987 तक विभिन्न ग्रहों के विभिन्न प्रकार की शक्तियों को समझने की चेष्टा करता रहा। इसके पूर्व एक नई गत्यात्मक दशा पद्धति, जिसकी बुनियाद सन् 1975 में रखी गयी थी , में ग्रहशक्ति की तीव्रता को इसमें सिम्मलित कर देनें से पूर्णता आ गयी। किसी भी व्यक्ति के जीवन की सफलता-असफलता , सुख-दुख , बढ़ते-घटते मनोबल तथा व्यक्ति के स्तर को लेखाचित्र में जीवन के विभिन्न भागों में अनायास दिखाया जाना संभव हो सका। इस पद्धति से किसी विशेष उम्र में जातक की मन:स्थिति , उसके कार्यक्र्र्र्रम और उसके समस्त परिवेश को आसानी से समझा जाना भी संभव हो सका।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#993300;"&gt;&lt;span style="color:#663300;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;लेख के आरंभ में मैनें ग्रहशक्ति को मापने के लिए एक संयंत्र या उपकरण की आवश्यकता की चर्चा की थी , इसके लिए मुझे बहुत अधिक भटकना नहीं पड़ा। संपूर्ण ब्रह्मांड की बनावट अपने आपमें परिपूर्ण है। ग्रहों की शक्ति को निधािZरत करने का यंत्र भी मुझे यहीं दिखाई पड़ा। मैनें देखा कि जब सूर्य चंद्र अमावश के दिन युति कर रहे होते हैं , चंद्रमा के पूर्ण अप्रकािशत भाग को ही हम देख पाते हैं , मतलब चंद्रमा नहीं दिखाई पड़ता है। जब सूर्य चंद्रमा परस्पर 30 डिग्री का कोण बनाते हैं , उसके छठे भाग को ही हम प्रकािशत देख पाते हैं। जब सूर्य-चंद्र परस्पर 90 डिग्री का कोण बनाते हैंं , तब चंद्रमा का आधा भाग प्रकाशमान होता है। जब दोनो 180 डिग्री का कोण बनाते हेैं , उसका शत-प्रतिशत भाग ही प्रकाशमान हो जाता है। इस तरह सूर्य से चंद्रमा की दूरी जैसे-जैसे बढ़ती है , उसका प्रकाशमान भाग भी उसी अनुपात में बढ़ता जाता है। ठीक इसके विपरीत मैंने पाया कि मंगल , बृहस्पति , शनि , यूरेनस , नेप्च्यून और प्लूटो सूर्य से युति कर रहे होते हैं , तो उनकी गति सबसे अधिक होती है , जबकि ये सूर्य से 180 डिग्री की दूरी पर हो तो सर्वाधिक वक्र गति में होते हैं। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#993300;"&gt;&lt;span style="color:#663300;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#993300;"&gt;&lt;span style="color:#663300;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;इस तरह इन ग्रहों की गतिज उर्जा , सूर्य से कोणिक दूरी बढ़ने पर कम होती चली जाती है। निष्कषZ यह निकला कि चंद्रमा के प्रकाश से उसकी शक्ति की जानकारी प्राप्त करना हो या अन्य ग्रहों की गतिज ऊर्जा को निकालना हो , उस ग्रह की सूर्य से कोणिक दूरी को निकालने की आवश्यकता पड़ेगी। इसी कोणिक दूरी के अनुपाती या व्युत्क्रमानुपाती ग्रह की शक्ति होगी। सभी ग्रहों की गतिज और स्थैतिज ऊर्जा को निकालने के लिए सूत्रों की खोज की जा चुकी है। सूर्य से ग्रहों की कोणिक दूरी को जानने के लिए किसी उपकरण की कोई आवश्यकता नहीं है। पंचांग में वणिZत ग्रहों के अंश को ही जान लेना काफी होगा , इसकी जानकारी के बाद गतिज ऊर्जा और स्थैतिज ऊर्जा को सूत्र के द्वारा निकाला जा सकेगा।&lt;br /&gt;बंदूक की गोली में शक्ति है , इसे हर कोई महसूस करता है। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#993300;"&gt;&lt;span style="color:#663300;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#993300;"&gt;&lt;span style="color:#663300;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;बंदूक की गोली काफी छोटी होती है , गतिरहित होने पर इसमें किसी प्रकार की शक्ति का बोध नहीं होता , किन्तु अत्यधिक गतिशीलता के कारण ही गोली की मारक क्षमता बढ़ जाती है। हथेली पर पत्थर का टुकड़ा रखकर कोई भी व्यक्ति अपने को शक्तिशाली समझता है , क्योकि उसे मालूम है कि पत्थर को गति देकर उसे शक्तिशाली बनाया जा सकता है। इस प्रकार किसी भी पिंड में गति का महत्व तो अनायास समझ में आता है , किन्तु ग्रहों के भीमकाय पिंड में अप्रत्यािशत रुप से अत्यधिक गति होने के बावजूद ग्रहों की शक्ति को अन्यत्र ढूंढ़ने की कोिशश की जाती रही है। जिस पृथ्वी का व्यास आठ हजार मील है , जिसकी परिधि 25 हजार मील है , जिसका वजन 5.882´1021 टन है , लगभग एक मिनट में हजार मील की रतार से परिभ्रमण-पथ पर आगे बढ़ रही है , की तुलना में बृहस्पति कई गुणा बड़ा है , इसकी रफतार प्रति मिनट लगभग 500 मील है । इनकी तेज गति की तुलना लाखों हाडाªेजन बम या अणुबम से की जा सकती है। इस प्रकार की विराट शक्ति से विद्युत-चुम्बकीय शक्ति तरंगों से पृथ्वीवासी प्रभावित होते हैं।ग्रहों की स्थैतिज ऊर्जा और गतिज ऊर्जा का प्रभाव किसी भी व्यक्ति पर भिन्न-भिन्न प्रकार से पड़ता है। हजारों प्रकार की कुंडलियों में ग्रहों के इस भिन्न प्रभाव को मैं महसूस करता हंू। सभी गह गति-नियमों के आधार पर ही अपना फल प्रस्तुत करते हैं , गति ही इनकी शक्ति हैं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#993300;"&gt;&lt;span style="color:#663300;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family:verdana;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;किसी भी व्यक्ति के जन्मकाल में सभी ग्रहों की गति और स्थिति भिन्न-भिन्न तरह की होती हें तथा उसके लग्न से सूर्य की कोणिक दूरी उस समय के जातक को विश्व के सभी मनुष्यों से भिन्न बनाती है। विश्व को देखने का उसका नजरिया भिन्न होता है। वह एक भिन्न बीज की तरह हो जाता है। हर व्यक्ति बदले हुए कोण से ब्रह्म की प्रतिछाया या प्रतीक है। ग्रह इस शरीर में ब्रह्म में ग्रंथि के रुप में होते हैं। वे समय-समय पर अपना फल प्रस्तुत करते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8693317056729335791-3158597108095065824?l=jyotishsachyajhuth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jyotishsachyajhuth.blogspot.com/feeds/3158597108095065824/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8693317056729335791&amp;postID=3158597108095065824' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8693317056729335791/posts/default/3158597108095065824'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8693317056729335791/posts/default/3158597108095065824'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jyotishsachyajhuth.blogspot.com/2008/09/blog-post_09.html' title='ग्रह शक्ति का रहस्य'/><author><name>विशेष कुमार</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-ZN2ci0r77MI/Tv9UGFBuf_I/AAAAAAAAAB4/xVUR1w8GkKg/s220/vishesh.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8693317056729335791.post-7606393972853378533</id><published>2008-09-07T04:28:00.000-07:00</published><updated>2011-08-30T02:30:02.612-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='bokaro'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='vidya sagar mahtha'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='petarwar'/><title type='text'>फलित ज्योतिष की त्रुटियॉ एवं दूर करने के उपाय</title><content type='html'>&lt;span style="color:#993300;"&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;विकसित विज्ञान नहीं , विकासशील विद्या या शास्त्र है&lt;/div&gt;&lt;p&gt;फलित ज्योतिष अभी विकसित विज्ञान नहीं , विकासशील विद्या या शास्त्र है , किन्तु इसके विकास की पर्याप्त संभावनाएं विद्यमान हैं । इसे अनििश्चत से नििश्चत की ओर आसानी से ले जाया जा सकता है। इस शास्त्र को विज्ञान में रुपांतरित किया जा सकता है। गणित ज्योतिष विज्ञान है , क्योंकि आकाश में ग्रहों की स्थिति , गति आदि से संबंधित नििश्चत सूचना प्रदान करता है। सैकड़ो वषोZं बाद लगनेवाले सूर्यग्रहण , चंद्रग्रहण की अवधि की सूचना घंटा , मिनट और सेकण्ड तक शुद्ध रुप से प्रदान करता है। यह भी सूचित करता है कि पृथ्वी के किस भाग में यह दिखाई पड़ेगा। किन्तु हम फलित ज्योतिष को विज्ञान नहीं कह पाते ,क्योंकि ग्रहों के फलाफल का स्पष्ट उल्लेख हम नहीं कर पाते। धनेश धन स्थान में स्वगृही हो तो व्यक्ति को धनवान होना चाहिए परंतु इस योग से कोई करोड़पति , कोई लखपति और कोई सहस्रपति है तो कोई केवल अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति ही जोड़-तोड़ से कर पा रहा है। लग्नेश , लाभेश और नवमेश धन स्थान में हो तो जातक को इस योग से बहुत ही समृद्ध और धनवान होना चाहिए परंतु इस योग में उत्पन्न हुए व्यक्ति को भी दरिद्रता के दौर से गुजरते हुए देखा जाता है। मेरे पास ऐसे कई उदाहरण हैंं - कम्प्यूटर जिस कुंडली में अधिक से अधिक धन योग की चर्चा करता है , वह व्यक्ति धनी नहीं है तथा जिस कुंडली में कुछ दरिद्र योगों की चर्चा है , वह सर्वाधिक संपन्न देश का राष्टपति है। ऐसी परिस्थिति में ग्रहों की स्थिति के अनुसार उससे उत्पन्न प्रभाव या फलाफल की समरुपता का क्या सही पता चल पाता है ? ग्रहों की शक्ति , उसकी तीव्रता या उत्पन्न प्रभाव के मूल स्रोत या असली कारणों तक क्या हम पहुंच चुके हैं ? क्या ग्रह की शक्ति , तीव्रता या कार्यक्षमता को मापने का सही उपाय हमारे पास है।&lt;/p&gt;&lt;p style="text-align: center;"&gt;ज्‍योतिष में ग्रहों की शक्तिमापक फार्मूला आवश्‍यक है&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;भौतिक विज्ञान में विभिन्न प्रकार की शक्तियों का उल्लेख है। प्रत्येक शक्ति की माप के लिए वैज्ञानिक सूत्र हैं , शक्तिमापक इकाई है। शक्ति की माप के लिए शक्तिमापक संयंत्र या उपकरण है , ताकि उसकी तीव्रता का आकलण स्पष्ट रुप से किया जा सके। स्पीडोमीटर से बस , रेल और यान की गति का स्पष्ट बोध हो जाता है। थर्मामीटर से तापमान का स्पष्ट बोध होता है। बैरोमीटर से हवा के दबाब की जानकारी होती है । अल्टीमीटर से उड़ान के समय वायूयान की ऊंचाई का पता चलता है। ऑडियोमीटर से ध्वनि की तीव्रता का पता चलता है। विद्युत की मात्रा को मापने के लिए इलेक्टोमीटर का व्यवहार होता है। गैल्वेनोमीटर से कम मात्रा की विद्युतधारा कों मापा जाता है। लैक्टोमीटर दूध की शुद्धता को मापता है। रेनगेज किसी विशेष स्थान पर हुई वषाZ की मात्रा को मापता है। सेक्सटेंट से आकाशीय पिंडों की कोणिक ऊंचाई की माप की जाती है। स्टॉप वाच से सूक्ष्म अवधि को रिकार्ड किया जाता है। उपरोक्त सभी प्रकार के यंत्र वैज्ञानिक सूत्रों पर आधारित नििश्चत सूचना देने का काम करते हैं , अत: ये सभी जानकारियॉ वैज्ञानिक और विश्वसनीय हैं। यदि हम ज्योतिषियों से पूछा जाए कि ग्रह-शक्ति की तीव्रता को मापने के लिए हमारे पास कौन सा वैज्ञानिक सूत्र या उपकरण है तो मै समझता हूं कि इस प्रश्न का उत्तर देना काफी कठिन होगा ,लेकिन जबतक इस प्रश्न का सही उत्तर नहीं मिलेगा , फलित ज्योतिष अनुमान का विषय बना रहेगा। अब ग्रहों के बलाबल को निर्धारित करने से संबंधित कुछ सूत्रों की खोज कर ली गयी है। इसकी चर्चा थोड़ी देर बाद होगी , सबसे पहले हम एक बार उन सभी परंपरागत ज्योतिषीय नियमों पर दृिष्टपात करें , जो ग्रह बलाबल निर्धारण के सूत्र के रुप में विद्यमान हैं -&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;1 स्थान-बल- स्वगृही , उच्च , मूल ति्रकोण , मित्र रािश में स्थित या उिल्लखित द्रेष्काण ,नवमांश ,सप्तमांश , आदि ‘ाडवर्ग में अधिक वर्ग प्राप्त होने पर या अन्य ग्रहों के सापेक्ष अष्टक वर्ग नियम से चार रेखाओं से ऊपर होने पर ग्रह बलवान होता है ।&lt;br /&gt;2 दिक्बल- बुध , बृहस्पति लग्न में , शुक्र , चंद्र चतुर्थ भाव में , शनि सप्तम भाव में तथा सूर्य , मंगल दशम भाव में दिक्बली होते हैं।&lt;br /&gt;3 कालबल- कालबल के अंतर्गत चंद्र , शनि , मंगल राति्र में , सूर्य , गुरु , शुक्र दिन में तथा बुध सदैव बलि होता है।&lt;br /&gt;4 नैसगिZकबल- शनि , मंगल , बुध , गुरु , शुक्र , चंद्र और सूर्य उत्तरोत्तर आरोही क्रम में बलवान होते हैं। शायद इस प्रकार के ग्रह बल की परिकल्पना इनके प्रकाश की तीव्रता को ध्यान में रखकर की गयी थी।&lt;br /&gt;5 चेष्टाबल- मकर से मिथुनपर्यन्त किसी भी रािश में सूर्य , चंद्र की स्थिति हो तो उनमें चेष्टाबल होगा तथा अन्य सभी ग्रह चंद्रमा के साथ होने से चेष्टाबल प्राप्त कर सकेंगे।&lt;br /&gt;6 दृिष्टबल- किसी ग्रह को शुभग्रह देख रहा हो तो शुभदृिष्टप्राप्त ग्रह बलवान हो जाता है।&lt;br /&gt;7 आत्मकारक ग्रहबल - आत्मकारक ग्रहबल की स्थिति के सापेक्ष ग्रहबल या जैमिनी सूत्र से ग्रहबल आत्मकारक ग्रह के साथ या उससे केन्द्रगत रहनेवाले ग्रह पूर्णबली , दूसरे , पॉचवे आठवें और एकादश में रहनेवाले अर्द्धबली तथा तीसरे , छठे , नवें और द्वादश भाव में रहनेवाले निर्बल होते हैं।&lt;br /&gt;8 अंशबल- किसी रािश के प्रारंभिक अंशो में स्थित रहनेवाला ग्रह बाल्यावस्था में होता है तथा रािश के अंतिम भाग में रहनेवाला ग्रह वृद्धावस्था में होता है। रािश के मध्य में रहनेवाले ग्रहों को बलवान कहा जाता है।&lt;br /&gt;9 योगकारक-अयोगकारक बल - संहिताओं में ग्रह फलाफल की विवृत्ति जिस ढंग से मिलती है , उसके अनुसार योगकारक ग्रहों को शुभफलदायक ,बलवान तथा अयोगकारक ग्रहों को अशुभफलदायक और निर्बल समझा जाता है।&lt;br /&gt;10 पक्षबल- कृष्णपक्ष में पापग्रह एवं शुक्लपक्ष में शुभग्रह बलवान होते हैं।&lt;br /&gt;11 अयण बल- उत्तरायण में शुभग्रह और दक्षिणायण में पापग्रह बलवान होते हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार ग्रह के बलाबल निर्धारण के लिए परंपरा से ग्यारह नियमों की खोज हो चुकी है। स्थान बल के अंतर्गत आनेवाले दो नियमों ‘ाडवर्ग बल और अष्टकवर्गबल को अलग-अलग कर दिया जाए तो ग्रह शक्ति की जानकारी के लिए कुल तेरह प्रकार के नियम परंपरा में प्रचलित हैं। हो सकता है कि ज्योतिष के अन्य ग्रंथों में कुछ और नियमों का भी उल्लेख हो। इन परिस्थितियों में ग्रह बलाबल से संबंधित कई गंभीर प्रश्न एक साथ उपस्थित होते हैं -&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;1 ग्रह बल निर्धरित करने का एक भी नियम सही होता तो दूसरे , तीसरे , ```````````````````````` बारहवें , तेरहवें नियम की बात क्यों आती ?&lt;br /&gt;2 सभी नियम ऋषि-मुनियों की ही देन हैं। यदि कोई एक नियम सही है तो शेष की उपयोगिता क्या है ?&lt;br /&gt;3 यदि ग्रह बलाबल निर्धारण में सभी नियमों का उपयोग करें तो क्या ग्रहबल की वास्तविक जानकारी हो पाएगी या ग्रहबल नियमों के बीच ज्योतिषी उलझकर ही रह जाएंगे ?&lt;br /&gt;4 कम्प्यूटर में ग्रह बलाबल से संबंधित सभी नियमों को डालकर बारी बारी से या एक साथ इनकी सत्यता की जॉच की जाए तो क्या सफलता मिलने की संभावना हैं ?&lt;br /&gt;5 क्या ग्रह बलाबल से संबंधित सभी नियम एक दूसरे के पूरक हैं ?&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;आप कुछ उत्तर देंगे , इसे पहले मैं ही उत्तर देता हूं कि उपरोक्त नियमों में एक भी नियम ग्रहबल निर्धारण के लिए आंिशक रुप से भी सही नहीं हैं। शायद इसीलिए फलित ज्योतिष अनुमान का विषय बना हुआ है। यदि कोई एक नियम काम करता तो दूसरे नियम की आवश्यकता ही नहीं महसूस होती। एक नियम के पूरक नियमों के रुप में शेष नियमों को मान भी लिया जाए तो व्यावहारिक तौर पर इसकी पुिष्ट नहीं हो पा रही है। ऐसे कई उदाहरण मेरे पास हैं , ग्रह बलाबल से संबंधित अधिकांश नियमों के अनुसार ग्रह बलवान होने के बावजूद ग्रह का फल कमजोर है। निष्कषZत: इन परंपरागत सभी नियमों के संदर्भ में यही कहना चाहूंगा कि इन सभी नियमों को कम्प्यूटर में डालकर विभिन्न महत्वपूर्ण कुंडलियों में इसकी सत्यता की जॉच की जाए तो परिणाम कुछ भी नहीं निकलेगा । यह फलित ज्योतिष की सबसे बड़ी कमजोरियों में से एक है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;फलित ज्योतिष के प्रणेता हमारे पूज्य ऋषि-मुनियों , पूर्वजों और फलित ज्योतिष के विद्वानों के समक्ष ग्रहशक्ति के रहस्यों को समझने की गंभीर चुनौती, हर युग में उपस्थित रही है । इसलिए उन्होनें विभिन्न दृिष्टकोणों से ग्रह शक्ति के रहस्य को उद्घाटित करने का भरपूर प्रयास किया। संभवत: इसलिए ग्रह-शक्ति को समझने से संबंधित इतने सूत्रों का उल्लेख विभिन्न पुस्तकों में दर्ज है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;आज भौतिक विज्ञान पिंड की शक्ति को उसकी गति , ताप , प्रकाश , चुम्बक , विद्युत और ध्वनि के सापेक्ष उसके अस्तित्व को स्वीकार करता है। विज्ञान यह भी कहता है कि किसी भी शक्ति को उसके दूसरे स्वरुप में परिवर्तित किया जा सकता है। ग्रह में गति और प्रकाश है , परस्पर गुरुत्वाकषZण के कारण प्रत्येक ग्रह का अपना एक विद्युत-चुम्बकीय क्षेत्र होता है। सभी आकाशीय पिंड परस्पर गुरुत्वाकषZण बल और गति से इतने सशक्त बंधे हुए हैं कि करोड़़ों वषZ व्यतीत हो जाने के बाद भी अपने नियमों का पालन यथावत कर रहें हैं। सूर्य से पृथ्वी 15 करोड़ किलोमीटर दूर रहकर सूर्य के चारो ओर 365 दिन , 5 घ्ंाटे , 48 मिनट और कुछ सेकण्ड में एक परिक्रमा कर लेती है। करोडों वषोZं के बाद भी एक परिक्रमा की अवधि में मिनट भर का अंतर नहीं पड़ा। स्मरण रहे , पृथ्वी अपने परिभ्रमण पथ में एक मिनट में लगभग हजार मील की गति से सूर्य के चारो ओर परिक्रमा करते हुए अग्रसर है। बृहस्पति जैसा भीमकाय ग्रह सूर्य की परिक्रमा 80 करोड़ किलोमीटर की दूरी पर रहते हुए प्रतिमिनट लगभग 500 मील की गति से कर रहा है। ग्रहों की गति और पृथ्वी पर उसकी सापेक्षिक गति का प्रभाव पृथ्वी के परिवेश में अणु-परमाणुओं पर किस विधि से पड़ता हे , यह वैज्ञानिकों के लिए शोध का विषय भले ही हो , हम ज्योतिषियों को यह समझ लेना चाहिए कि ग्रह-शक्ति का सारा रहस्य उसकी गति में तथा उस आकाशीय पिंड की सूर्य के साथ पृथ्वी पर बन रही कोणिक दूरी में ही छिपा हुआ है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;बंदूक की गोली बहुत छोटी होती है, पर उसकी शक्ति उसकी गति के कारण है। हाथ में एक पत्थर का टुकड़ा रखकर लोग अपने को बलवान समझ लेते हैं , क्योंकि पत्थर को गति देकर शक्तिशाली बनाया जा सकता है। इसी परिप्रेक्ष्य में ग्रहों की शक्ति को समझने की चेष्टा करें , बंदूक की गोली में गति के कारण उसकी शक्ति को समझने में कठिनाई नहीं होती , किन्तु भीमकाय ग्रहों में उसकी तीव्र गति को देखते हुए भी उसकी शक्ति को अन्यत्र तलाशने की चेष्टा की जाती रही है। गति में शक्ति के रहस्य को न समझ पाने के कारण ही परंपरागत ज्योतिष में ग्रह-शक्ति के निर्धारण के लिए गति से संबंधित किसी सूत्र की चर्चा नहीं की गयी केवल रािश स्थिति में ही ग्रहों की शक्ति को ढूंढ़ने का बहुआयामी निष्फल प्रयास किया गया, जबकि ग्रहों के भीमकाय पिंड और उसकी तीव्र गति की तुलना लाखों -करोड़ों परमाणु-बमों से की जा सकती है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;ग्रहों के विभिन्न प्रकार की गतियों का ज्ञान हमारे पूज्य ऋषि-मुनियों , ज्योतिषियों को पूरा था। सूर्य-सिद्धांत में ग्रहों की विभिन्न गतियों - अतिशीघ्री , शीघ्री , सम , मंद , कुटीला , वक्र और अतिवक्र आदि का उल्लेख है , किन्तु इन गतियों का उपयोग केवल ज्योतिष के गणित प्रकरण में किया गया है। पंचांग-निर्माण , ग्रहों की स्थिति के सही आकलण सूर्य-ग्रहण एवं चंद्र-ग्रहण की जानकारी के लिए ग्रहों की इन गतियों का प्रयोग किया गया परंतु फलित ज्योतिष के विकास में इन गतियों का उपयोग नहीं हो सका , क्योंकि ज्योतिषियों को यह जानकारी नहीं हो सकी कि ग्रह-शक्ति का सारा रहस्य ग्रह-गति में ही छिपा हुआ है । पृथ्वी के सापेक्ष ग्रहों की विभिन्न गतियों के कारण ही उनकी गतिज और स्थैतिज ऊर्जा में सदैव परिवत्र्तन होता रहता है , तदनुरुप जातक की प्रवृत्तियों और स्वभाव में परिवत्र्तन होता है। यह भी ध्यातव्य है कि किसी आकाशीय पिंड और सूर्य के बीच पृथ्वी पर जो कोण बनेगा , वह आकाशीय पिंड की ग्रह-गति के साथ सदैव व्युत्क्रमानुपाती संबंध बनाएगा। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;इस तरह चंद्रमा के प्रकाशमान भाग को मापना हो या अन्य ग्रहों की गति को समझना हो , सूर्य से उस पिंड की पृथ्वी पर बन रही कोणिक दूरी को समझ लेना पर्याप्त होगा । इस तरह ग्रह की शक्ति की जानकारी के लिए अलग से किसी उपकरण को बनाने की आवश्यकता नहीं है। विभिन्न ग्रहों की शक्ति के आकलण के लिए इस आधार पर विभिन्न सूत्रों का प्रयोग किया जा सकता है। इसका पूरा प्रयोग कर ही फलित ज्योतिष को इसकी पहली कमजोरी से छुटकारा दिलाया जा सकता है। इसकी पूरी जानकारी अगले किसी पुस्तक मेें फलित ज्योतिष के विज्ञान प्रकरण के किसी अध्याय के अंतर्गत की जाएगी , जिससे किसी ग्रह-शक्ति की तीव्रता को प्रतिशत में जाना जा सकता है। इसके बाद इस प्रश्न का उत्तर मिल जाएगा कि किस व्यक्ति के लिए किस ग्रह की भूमिका सर्वोपरि है , कोई व्यक्ति किस संबंध में अधिकतम ऊंचाई पर जाने की क्षमता रखता है तथा उस ऊंचाई को प्राप्त करने का उसे कब मौका मिलेगा , इसके लिए नई दशा-पद्धति का एक नया सूत्र भी अलग से विकसित किया गया है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;ग्रह और राशीश की सापेक्षिक गति जातक को सकारात्मक या नकारात्मक दृिष्टकोण प्रदान करती है। ग्रह की गति और ग्रह की सूर्य से कोणिक दूरी का परस्पर गहरा संबंध है , किन्तु किसी भी हालत में ग्रह-शक्ति को समझने के लिए परंपरागत नियमों में एक भी नियम ग्रह-शक्ति के मूल स्रोत से संबंधित नहीं हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;जब किसी एक ग्रह की शक्ति का सही मूल्यांकण नहीं किया जा सकता तो बहुत से ग्रहों की युति , वियुति और सापेक्षिक ग्रहों की स्थिति का मूल्यांकण कदापि नहीं किया जा सकता। इस तरह विभिन्न राजयोग , दरिद्र योग , मृत्युयोग , या अनिष्टकर योगों का कोई विशेष अर्थ नहीं रह जाता। सभी योगों की व्याख्या अनुमान पर आधारित हो जाती है। यह फलित ज्योतिष की दूसरी बड़ी कमजोरी है। यही कारण है कि एक ही कुंडली विभिन्न ज्योतिषियों की नजर में भिन्न-भिन्न तरह से परिलक्षित होती है। सभी का निष्कषZ एक नहीं होता। सभी राजयोगों को सचमुच महत्वपूर्ण बनाने के लिए स्थैतिज धनात्मक ग्रहों को योग में भागीदार बनाना आवश्यक शर्त होगी । उच्च गणित के संभावनावाद का प्रयोग करके इसे अपेक्षाकृत विरल बनाना होगा। तभी फलित ज्योतिष की दूसरी बड़ी कमजोरी से छुटकारा पाया जा सकता है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;फलित ज्योतिष की तीसरी और सबसे बड़ी कमजोरी ` विंशोत्तरी दशा पद्धति ´ है , जिसपर भारतीय ज्योतिषियों को नाज है तथा जिसकी जानकारी के बाद ही वे महसूस करते हैं कि वे पाश्चात्य ज्योतिषियों से अधिक जानकारी रखते हैं , क्योंकि पाश्चात्य ज्योतिषियों कों केवल गोचर के ग्रहों का ही ज्ञान होता है , जबकि भारत के ज्योतिषियों को गोचर के अतिरिक्त ऐसे सूत्रों की भी जानकारी है , जिससे विभिन्न ग्रहों का फलाफल जीवन के किस भाग में होगा , की स्पष्ट व्याख्या की जा सकती है यानि कोई ग्रह जीवन में कब फल प्रदान करेंगे , भारत के ज्योतिषी विशोत्तरी पद्धति से इसकी स्पष्ट व्याख्या कर सकते हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;किन्तु मेरा मानना है कि विंशोत्तरी पद्धति से दूरस्थ भविष्यवाणी की ही नहीं जा सकती है। निकटस्थ भविष्यवाणियॉ अनुमान पर आधारित होती हैं और घटित घटनाओं को सही ठहराने के लिए विंशोत्तरी पद्धति बहुत ही बढ़िया आधार है , क्योंकि विंशोत्तरी पद्धति में एक ग्रह अपनी महादशा का फल प्रस्तुत करता है , दूसरा अंतर्दशा का , तीसरा प्रत्यंतरदशा का तथा चौथा सूक्ष्मदशा का । कल्पना कीजिए , ज्योतिषीय गणना में महादशावाला ग्रह काफी अच्छा फल प्रदा करनेवाला है , अंतर्दशा का ग्रह बहुत बुरा फल प्रदान करने की सूचना दे रहा है । प्रत्यंतर दशा का ग्रह सामान्य अच्छा और सूक्ष्म महादशा का ग्रह सामान्य बुरा फल देने का संकेत कर रहा हो , इन परिस्थितियों में किसी के साथ अच्छी से अच्छी और किसी के साथ बुरी से बुरी या कुछ भी घटित हो जाए , हेड हो जाए या टेल, किसी भी ज्योतिषी के लिए अपनी बात , अपनी व्याख्या , अपनी भविष्यवाणी को सही ठहरा पाने का पर्याप्त अवसर मिल जाता है। लेकिन इतना तो तय है कि कोई भी ज्योतिषी संसार के लिए कितनी भी भविष्यवाणी क्यो न कर ले , विंशोत्तरी पद्धति से अपने लिए कोई भविष्यवाणी नहीं कर पातें। इस दशा-पद्धति के जानकार के लिए इससे बड़ी दुर्दशा और क्या हो सकती है ?&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;किसी ग्रह की शक्ति कितनी है , उसके राशीश की शक्ति कितनी है , वह पृथ्वी से कितनी दूरी पर स्थित है , वह किस उम्र का प्रतीक ग्रह है , इन सब बातों से विंशोत्तरी दशा पद्धति का कोई संबंध नहीं है। जन्मकालीन चंद्रमा पुष्य नक्षत्र में स्थित हो , तो वृद्धावस्था के ग्रह शनि को काम करने का अवसर बाल्यावस्था में ही प्राप्त हो गया , फिर विंशोत्तरी क्रम से अविशष्ट ग्रह अपना काम करते रहेंगे।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;सभी ज्योतिषी इस बात से भिज्ञ हैं कि बृहस्पति सभी ग्रहों में सबसे बड़ा है , एक रािश में एक वषZ रहता है। कल्पना करें , किसी वषZ मेंष रािश में बृहस्पति स्थित हो तो उस वषZ मेष लग्न के जितने भी व्यक्ति पैदा होंगे , सभी की कुंडली में लग्न में बुहस्पति होगा। सभी कुंडलियों में नवमेश और व्ययेश बृहस्पति लग्न में स्थित होने से इस ग्रह की नैसगिZक और भावाधिपत्य विशेषताएं एक जैसी होंगी। प्रत्येक दिन नौ दिनों तक उसी लग्न की उसी डिग्री में बच्चे पैदा होते चले जाएं , जो बिल्कुल असंभव नहीं , सभी जातकों के जीवन में बृहस्पति के प्रतिफलन काल की जानकारी देनी हो तो चूंकि बृहस्पति के सापेक्ष अन्य ग्रहों की स्थिति में बड़ा परिवत्र्तन नहीं होगा तो फलाफल में भी हर बच्चे में समानता मिल जाएगी। किन्तु बृहस्पति के फलप्राप्ति का मुख्य काल विंशोत्तरी दशा का के अनुसार उछल-कूद करता हुआ मिल जाएगा , जिसे निम्न प्रकार दिखाया जा सकता है --&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;जातक का जन्म यानि जन्म के समय चंद्रमा बृहस्पति के मुख्य काल का आरंभ&lt;br /&gt;अिश्वनी नक्षत्र के आरंभ में आसमान के 0 डिग्री में हो 68 वषZ की उम्र के बाद&lt;br /&gt;भरणी नक्षत्र के आरंभ में आसमान के 13 डिग्री में हो 61 वषZ की उम्र के बाद&lt;br /&gt;कृतिका नक्षत्र के आरंभ में आसमान के 27 डिग्री में हो 41 व‘ाZ की उम्र के बाद&lt;br /&gt;रोहिणी नक्षत्र के आरंभ में आसमान के 40 डिग्री में हो 35 वषZ की उम्र के बाद&lt;br /&gt;मृगिशरा नक्षत्र के आरंभ में आसमान के 53 डिग्री में हो 25 वषZ की उम्र के बाद&lt;br /&gt;आद्रा नक्षत्र के आरंभ में आसमान के 67 डिग्री में हो 18 वषZ की उम्र के बाद&lt;br /&gt;पुनर्वसु नक्षत्र के आरंभ में आसमान के 80 डिग्री में हो जन्म के तुरंत बाद&lt;br /&gt;पुष्य नक्षत्र के आरंभ में आसमान के 93 डिग्री में हो 104 वषZ की उम्र के बाद&lt;br /&gt;अश्लेषा नक्षत्र के आरंभ में आसमान के 107 डिग्री में हो 85 वषZ की उम्र के बाद&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;यहॉ गौर करने की बात यह है कि आज जिस समय पुनर्वसु के चंद्र में जिस समय बच्चे का जन्म हुआ , ठीक 24 घंटे बाद कल इसी समय दूसरे बच्चे का जन्म हो , तो इन दोनो कुडलियों में लग्न के साथ साथ सभी भावों में ग्रहों की वही स्थिति होगी। केवल चंद्रमा दूसरी कुंडली में 13 डिग्री 20 मिनट की अधिक दूरी पर होगा । इतने ही अंतर के कारण बृहस्पति एक जातक के लिए अपना मुख्य फल बाल्यावस्था में ही प्रदान करेगा , तो दूसरे जातक को वह फल अतिवृद्धावस्था में प्रदान करने के लिए बाध्य होगा । इससे भी अधिक गंभीर परिस्थिति तब उत्पन्न हाोगी , जब दो बच्चे एक ही लग्न में पुनर्वसु और पुष्य नक्षत्र के संधिकाल में जन्म लेंगे । जिस जातक का जन्म पुनर्वसु नक्षत्र में होगा , एक ही लग्न और एक ही ग्रह स्थिति के बावजूद पहले बचे को बृहस्पति से संबंधित फल की प्राप्ति जन्मकाल में होगी तथा कुछ ही क्षणों बाद जन्म लेनेवाले जातक को बृहस्पति का मुख्य फल 104 वषZ के बाद प्राप्त होगा। यह नियम केवल बृहस्पति के लिए ही लागू नहीं होगा , शेष ग्रहों के काल में भी बदलाव आएगा , क्योंकि शेष ग्रह भी अपना फल प्रदान करने के लिए क्यू में खड़े हैं। स्थान परिवत्र्तन सिर्फ चंद्रमा का हुआ , पर फल प्रदान करनेवाले सभी ग्रहों के दशाकाल में भारी उलटफेर हो गया। इस प्रकार के चमत्कार को कोई भी विज्ञानसम्मत नहीं मान सकता । जब संपूर्ण विंशोत्तरी पद्धति ही वैज्ञानिकता के दायरे से बाहर निकल जाती है , तो इसी पद्धति पर आधारित कृष्णमूर्ति पद्धति की वैज्ञानिकता भी स्वत: संदिग्ध हो जाती है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;ग्रहों की वक्रता के संबंध में बहुत सारे लेख विभिन्न पत्र-पति्रकाओं में देखने को मिले , किन्तु एक भी लेखक आत्मविश्वास के साथ निर्णयात्मक स्वर में , बेहिचक यह कहने में सक्षम नहीं हैं कि वक्री ग्रह अच्छा फल देतें हैं या बुरा। यदि ये अच्छा फल देते हैं तो कब और यदि बुरा फल देते हैं तो कब ? संपूर्ण जीवन में किन परिस्थितियों में इनका केवल बुरा फल ही प्राप्त होता है। किन परिस्थितियों में वक्री ग्रह का जीवन के अधिकांश समय में अच्छा फल प्राप्त होता है ? इस प्रश्न के उत्तर देने में हमें कोई कठिनाई नहीं है , क्योंकि हमें सही दशा पद्धति की जानकारी है , परंतु जिसे नहीं है , वे इस प्रश्न का उत्तर देने में अवश्य ही कठिनाई महसूस करेंगे।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार के आलोचात्मक बातों से फलित ज्योतिष के ऐसे भक्तों को बहुत बार कष्ट पहुंचा चुका हंंू , जो फलित ज्योतिष के स्वरुप में कोई परिवत्र्तन नहीं चाहते। वे इन आलोचनाओं को ऋ़षि पराशर और जैमिनी की अवमानना से जोड़ देते हैं। किन्तु मेरी दृिष्ट में फलित ज्योतिष के नियमों की प्रामाणिकता या वैज्ञानिकता को सिद्ध करने के लिए किसी साक्ष्य की कोई आवश्यकता नहीं है। फलित ज्योतिष में वही नियम सही माने जा सकते हैं , जिनसे भविष्यवाणियॉ खरी उतरती रहे। जबतक फलित ज्योतिष के अनुपयोगी नियमों को हटा नहीं दिया जाए , इसे विज्ञान का दर्जा नहीं दिलाया जा सकता। साथ ही सही नियमों की खोज में संलग्न रहना होगा। फलित ज्योतिष के विकास में गणित और भौतिक विज्ञान के साथ धनात्मक सहसंबध स्थापित करना होगा। सन् 1975 जुलाई के `ज्योतिष-मार्तण्ड ´ पति्रका मे मेरा एक लेख ` दशाकाल निरपेक्ष अनुभूत तथ्य ´ प्रकािशत हुआ था , जिसमें कारणों सहित यह उल्लेख किया गया था कि जन्म से 12 वषZ की उम्र तक चंद्रमा , 12 से 24 वषZ की उम्र तक बुध , 24 से 36 वषZ की उम्र तक मंगल , 36 से 48 वषZ की उम्र तक शुक्र , 48 से 60 वषZ की उम्र तक सूर्य , 60 से 72 वषZ की उम्र तक बृहस्पति , 72 से 84 वषZ की उम्र तक शनि , 84 से 96 वषZ की उम्र तक यूरेनस , 96 से 108 वषZ की उम्र तक नेपच्यून और 108 से 120 वषZ की उम्र तक प्लूटो अपनी शक्ति के अनुसार मानवजीवन पर अपना अच्छा या बुरा प्रभााव डालते हैं। देश-विदेश के प्रबुद्ध पाठकों का समुदाय इस उद्घोषित नयी दशा-पद्धति की संपुिष्ट में निम्न सत्य का अवलोकण करें----&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;1 जिन कुंडलियों में चंद्रमा अमावस्या के निकट का होता है , वे सभी जातक 5-6 वषZ की उम्र में मनोवैज्ञानिक रुप से कमजोर होते हैं। उनके बचपन में मन को कमजोर बनानेवाली घटनाएं घटित होती हैं&lt;br /&gt;2 जिन कुंडलियों में बुध बहुत वक्र है , उन जातकों का 17-18वॉ वषZ कष्टकर होता है।&lt;br /&gt;3 जिन कुंडलियों में मंगल बहुत वक्र है , उन जातकों का 29-30वॉ वषZ कष्टकर होता है।&lt;br /&gt;4 जिन कुंडलियों में शुक्र बहुत वक्र है , उन जातकों का 41-42 वॉ वषZ कष्टकर होता है।&lt;br /&gt;5 जिन कुंडलियों में सूर्य अतिशीघ्री ग्रह की रािश में स्थित होता है , उनका 53-54 वॉ वषZ कष्टप्रद होता है।&lt;br /&gt;6 जिन कुंडलियों में बृहस्पति बहुत वक्र हो , उन जातकों का 65-66 वॉ वषZ कष्टकर होता है।&lt;br /&gt;7 जिन कुंडलियों में शनि बहुत वक्र हो , उन जातकों का 77-78 वॉ वषZ कष्टकर होता है।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;मै समझता हंू कि उपरोक्त वैज्ञानिक तथ्य इतने सटीक हैं कि एक भी अपवाद आप प्रस्तुत नहीं कर पाएंगे।&lt;br /&gt;परंपरागत फलित ज्योतिष की आलोचना या समीक्षा से किसी को भी परेशान होने की जरुरत नहीं है , क्योंकि अनावश्यक नियमों की खुलकर आलोचना करते हुए वैकल्पिक व्यवस्था के रुप में वैज्ञानिक नियमों पर आधारित फलित ज्योतिष के नए नियमों को भी मैने प्रस्तुत किया है। मै गत्यात्मक दृिष्टकोण से भविष्यवाणी करते हुए पूर्ण आश्वस्त रहता हंू किन्तु अभी भी ऐसे बहुत सारे पहलू हैं ,जिन्हें विकसित करने के लिए वैज्ञानिक दृिष्टकोण की आवश्यकता है। इसके लिए लम्बी अवधि तक लाखों लोगों को अनुसंधान में संलग्न रहना होगा । ग्रह की संपूर्ण शक्ति उसके प्रकाशमान भाग , उसकी गति और सूर्य से इसकी कोणिक दूरी में अंतिर्नहित है , अन्यत्र कहीं नहीं , इस बात को समझना होगा। हर व्यक्ति के जन्मकाल से ही चंद्रमा के काल का आरंभ हो जाता है , इसके बाद बुध , फिर मंगल , शुक्र , सूर्य , बृहस्पति और शनि का काल आता है। प्रत्येक का काल 12 वषोZं का होता है। प्रत्येक ग्रह अपनी शक्ति के अनुसार ही अपने काल में फल प्रदान करता है। मानव-जीवन में ग्रहों के प्रतिफलन काल को समझने के लिए गत्यात्मक दशा पद्धति फलित ज्योतिष को वैज्ञानिक आधार प्रदान कर रहा है , इसमें किसी प्रकार का संशय नहीं।&lt;/p&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8693317056729335791-7606393972853378533?l=jyotishsachyajhuth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jyotishsachyajhuth.blogspot.com/feeds/7606393972853378533/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8693317056729335791&amp;postID=7606393972853378533' title='8 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8693317056729335791/posts/default/7606393972853378533'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8693317056729335791/posts/default/7606393972853378533'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jyotishsachyajhuth.blogspot.com/2008/09/blog-post_07.html' title='फलित ज्योतिष की त्रुटियॉ एवं दूर करने के उपाय'/><author><name>विशेष कुमार</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-ZN2ci0r77MI/Tv9UGFBuf_I/AAAAAAAAAB4/xVUR1w8GkKg/s220/vishesh.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8693317056729335791.post-4534823626717445137</id><published>2008-09-04T22:05:00.000-07:00</published><updated>2011-08-30T02:29:47.025-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='bokaro'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='vidya sagar mahtha'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='petarwar'/><title type='text'>ज्योतिषी का विवादास्पद सामाजिक महत्व</title><content type='html'>&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div align="center"&gt;ज्योतिषी महामानव या भगवान का अवतार नहीं&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt;हर जिले में अनिवार्यत: एक जिलाधीश होता है , किन्तु कई जिलों में भटकने के बाद भी एक सही ज्योतिषी से भेंट नहीं हो पाती , ऐसा लोगों का मानना है। इस विरलता का यह अर्थ कदापि नहीं कि ज्योतिषी कोई महामानव या भगवान का अवतार होता है , जैसा कि लोग सोंचते हैं और ज्योतिषी से बहुत अधिक अपेक्षा करते हैं। वे समझते हैं कि ज्योतिषी को न सिर्फ सभी बातों की जानकारी होती है , वरन् वे सभी जटिलताओं का इलाज भी कर सकते हैं। लेकिन वास्तव में ऐसी कोई बात नहीं होती। मै यह स्वीकार करता हूं कि भविष्य की जानकारी के लिए फलित ज्योतिष के सिवा कोई दूसरी विद्या सहायक नहीं हो सकती और किसी व्यक्ति का यह बड़ा सौभाग्य है कि इसकी जानकारी उसे होती है , किन्तु किसी भी हालत में वह सर्वज्ञ नहीं हो सकता।&lt;br /&gt;अभी तक फलित ज्योतिष विकासशील विद्या ही है , पूर्ण विकसित या विज्ञान का स्वरुप प्राप्त करने में अभी काफी विलम्ब है। ऐसी स्थिति में इसका सहारा लेकर वांछित निष्कर्ष प्राप्त कर लेना काफी कठिन कार्य है। बुिद्धमान ज्योतिषी को भी किसी निष्कर्ष तक पहुंचने में अपने अंत:करण की आवाज या अनुमान का आंिशक तौर पर सहारा लेना ही पड़ता है। &lt;/p&gt;&lt;p align="center"&gt;असाधारणत्व की रक्षा के लिए संदिग्ध आचरण&lt;/p&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;अक्सर यह देखा गया है कि इस अनुमान की जगह ज्योतिषी धूत्र्तता का सहारा लेते हैं। यह सत्य है कि जिस तरह के साधन का उपयोग किया जाता है , साध्य भी उसी अनुरुप हो जाता है। फलित ज्योतिष की बहुत सारी त्रुटियो के कारण इस समय किसी लगनशील समर्पित ज्योतिषी द्वारा भी की जानेवाली भविष्यवाणी भी अविकसित आधार के कारण त्रुटिपूर्ण ही प्राप्त होगी। इस परिस्थिति में फलित ज्योतिष के जानकार सिद्ध पुरुष , महामानव या भगवान के अवतार हो ही नहीं सकते। इस प्रकार का ढोंग भी अच्छा नहीं लगता। फलित ज्योतिष के अध्येता इन कमजोरियों से भली-भॉति परिचित हैं। वे अन्य विद्याओं के जानकार की तरह ही फलित ज्योतिष के जानकार हैं। ग्रहों के फलाफल की जानकारी कुछ सूत्रों , सिद्धांतों और गणना के आधार पर प्राप्त कर लेते हैं। उन सिद्धांतों , सूत्रों या गणना की पद्धति की जिसे जानकारी हो जाएगी , वह वह भी सतत् अभ्यास से वांछित फल को प्राप्त कर सकता है। इस परिप्रेक्ष्य में कोई ज्योतिषी अपने को भिन्न समझे या लोग उसे असाधारण समझने लगें तो आमलोगों की अपेक्षाएं नििश्चत तौर पर बलवती हो जाएंगी।&lt;/p&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;आमलोग ज्योतिषियों से अधिक अपेक्षा रखते हैं , इसीलिए इन्हें सिद्धपुरुष भी समझने लगते हैं। इधर ज्योतिषी भी इनके मनोभावों को समझकर अपनी वेश-भूषा , खान-पान , रहन-सहन , दिनचर्या , को असाधारण और भिन्न बनाकर लोगों की अपेक्षाओं में वृिद्ध ही करते हैं। किन्तु किसी की अधिक अपेक्षा करने से तथा उनकी मनोकामना की पूर्ति की दिशा में कोई मिथ्या आश्वासन देने के बीच एक बड़ी खाई बन जाती है। मजबूरन तथाकथित असाधारण व्यक्ति अपने असाधारणत्व की रक्षा के लिए तरह-तरह के झूठ-सच सबका सहारा लेते हैं और अंतत: उनका व्यक्तित्व संदिग्ध हो जाता है। किसी विज्ञान का विकास ऐसे महामानवों से कदापि नहीं हो सकता , जो बाबा या भगवान कहलाने में गर्व महसूस करते हों और फिर संदिग्ध आचरण को प्रस्तुत करते हों।&lt;/p&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; एक ज्योतिषी भी ग्रहों से संचालित है&lt;/p&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;मै कहना चाहता हूं कि ज्योतिषी भी एक मनुष्य है , वह भी ग्रहों से संचालित है । किसी एक ग्रह की वजह से ज्योतिष प्रकरण की उसे विशेष सकारात्मक जानकारी हो गयी है। हो सकता है , अन्य ग्रहों का भी सहयोग इस विशेष दिशा में प्राप्त हो गया हो। निस्संदेह ऐसी परिस्थितियों में उसे ज्योतिष शास्त्र का विशेष ज्ञान प्राप्त हो गया हो और इसके विकसित होने की संभावना बढ़ेगी , जिससे लोगो का दृिष्टकोण में परिवत्र्तन हा़ेगा , लोग सत्य के अधिक निकट होंगे। ग्रह फलाफल की सही जानकारी से लोग अधिक सुखी हो सकते हैं , किन्तु व्यक्ति या महामानव कोई भी हो , सभी के लिए अच्छे या बुरे ग्रहों का काल उपस्थित होता रहता है।&lt;/p&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;संसार का निर्माण ही धनात्मकता और ऋणात्मकता के संयोग से हुआ है। अत: किसी ज्योतिषी को भविष्यद्रष्टा या दूरदिशZता से संयुक्त एक मनुष्य से अधिक समझने की बात नहीं होनी चाहिए। संसार में इनकी भी बहुत सारी समस्याएं हो सकती हैं। इनके शरीर में किसी प्रकार की जटिलताएं आ जाएं तो इन्हें डॉक्टर के पास जाना पड़ सकता है। इनका भी अपना परिवार होता है , जिसके सदस्यो की देखभाल के लिए इनको धन की भी आवश्यकता होती है। इनके भी बंधु-बांधव होते हैं , जिनका ख्याल रखना पड़ता है। ये भी संपत्ति और स्थायित्व की अभिलाषा रखते हैं । इनकी भी संतानें होती हैं और वे इन्हें सुिशक्षित बनाकर अधिकारी बनाने का सपना देखते हैं। ये अपने अहं की रक्षा के लिए अपने प्रभाव को प्रदिशZत करने में तनिक भी संकोच नहीं करते हैं।&lt;/p&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;ज्योतिषी भी शरीरधारी हैं और इनके शरीर में सभी ग्रंथियॉ मौजूद हैं। स्वाभाविक है , इनकी सभी इंद्रियॉ सचेतन होंगी। अत: इनके लिए भी अच्छी गृहस्थी और विश्रामागार आवश्यक है। जनसामान्य की तरह ही काम , निद्रा , क्षुधा , नित्यकर्म में नियमितता इनके लिए आवश्यक हैं। समाज राज्य में अपने वर्चस्व , प्रभाव और प्रतिष्ठा को बनाए रखने की ये अभिलाषा रखते होंगे। मानवीय स्वभाव के अनुरुप ही यदि वे समाज को कुछ दे रहें होंगे , तो कुछ प्राप्ति की आशा भी मन में संजोए होंगे। इनके जीवन का भी कुछ अभीष्ट होगा , जिससे वे संयुक्त होना चाहते होंगे। &lt;/p&gt;&lt;p align="center"&gt;एक ज्योतिषी को भी उचित फी की आवश्यकता होती है&lt;/p&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;ये ब्रह्मवेत्ता हैं , ये भविष्यद्रष्टा हैं , ये महामानव हैं , यहॉ तक कि ये भगवान हैं , अत: सांसारिकता से इन्हें कोई मतलब नहीं है , जब लोग किसी के प्रति ऐसी बातें सोंचने लगतें हैं तो वह व्यक्ति भी जाने अनजाने वैसा ही आचरण लोगों के सम्मुख प्रस्तुत करता है। सन्यासी की वेश-भूषा धारण कर वह यह सिद्ध करने की चेष्टा करता है कि उसके शरीर की रक्षा और साज-सजावट के लिए कम से कम वस्त्रों की आवश्यकता है। दाढ़ी-मूंछ और जटा-जूट रखकर वह प्रकृति के अधिक निकट होने की ढोंग करता हैं। वह सादे रहन-सहन और उच्च विचारधारा के प्रदशZन का स्वांग रचता है , भगवान का एजेंट होने का दावा करता है , किन्तु बहुत सारी कहानियों में आपने पढ़ा होगा कि ऐसे लिबास के अंदर बहुत ही क्रूर अमानवीय व्यक्ति छुपा होता है। ऊपर से सन्यासी की वेश-भूषा धारण करनेवाला व्यक्ति लुटेरा या डकैत होता है । लोग उसे ठगना चाहते हैं , वह लोगों को ठगकर चला जाता है। यहॉ न्यूटन का तीसरा नियम लागू होता है । किसी ज्योतिषी को मामूली दक्षिणा देकर वे अपनी ड्यूटी पूरी कर लेते हैं , यह सोंचते हुए कि ज्योतिषी को भला धन की क्या आवश्यकता , पर ज्योतिषी को लगता है , इस ब्रह्मज्ञान के बदले इतनी मामूली सी दक्षिणा , जिससे परिवार का भरण-पोषण भी ढंग से नहीं किया जा सकता। बाबा द्वारा निकाले गए दूसरे रास्ते में आप कर्मकांड में इस प्रकार उलझा दिए जाते हैं , कि उनकी जेब बढ़िया से कट जाती है। बाबा अच्छी तरह जानते हैं कि इस दुनिया में कम से कम पढ़ा-लिखा व्यक्ति भी अच्छी कमाई कर लेता है , जब उन्हें पैसे-पैसे के लिए ही मुहंताज रहना पड़े , तो फिर इस ब्रह्मविद्या की जानकारी से क्या लाभ ?&lt;/p&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;डॉक्टर , इंजिनियर , वकील अपेक्षाकृत कम जानकारी के बाद भी अधिक से अधिक धन अर्जित करने में सक्षम हैं। यही नहीं , उनके सहयोगी क्वैक डॉक्टर , चैनमैन या मुंशी भी नाजायज कमाई करके प्रचुर धन अर्जित कर लेते हैं। ऐसी परिस्थिति में मामूली दक्षिणा में कोई ज्योतिषी इस विद्या में किस प्रकार पूर्ण समर्पित हो सकता है ? सरकारी व्यवस्था भी ऐसी कि डिग्री , डिप्लोमा प्राप्त करनेवाले व्यक्ति को सरकारी नौकरी मिल भी सकती है , पर फलित ज्योतिष के जानकार को नहीं। अत: ब्रह्मविद्या के जानकार दैवज्ञ बाबा अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत करने में ठगी और धूत्र्तता का सहारा लेते हैं।&lt;/p&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;जो ज्योतिषी सामान्य व्यक्ति की तरह अपने घर में रहकर फलित ज्योतिष के अध्ययन में जीजान से जुटा हो , उसे मामूली व्यक्ति समझकर पेश आया जाता है। यदि उसकी आर्थिक स्थिति कमजोर है और उसके समक्ष स्थायित्व का संंकट है तो उसे सही पारिश्रमिक देकर भी उसे उबारा नहीं जाता है , सबको लगता है कि उनके पैसे का दुरुपयोग न हो जाए । एक ज्योतिषी तो बाबाजी होता है , उसे स्थायित्व की क्या आवश्यकता ? उसे तो आश्रम में होना चाहिए , जहॉ घर-गृहस्थी का कोई झमेला न हो । वे आश्रम में रहकर इस विद्या को अधिक विकसित कर पाएंगे , ऐसा सबका मनोभाव होता है । इस मनोभाव को बाबा अच्छी तरह समझने लगे हैं , इसलिए वे आश्रम में ही रहने लगे हैं। &lt;/p&gt;&lt;p align="center"&gt;भीड़ भाड़ से दूर स्थित होता है बाबा का आश्रम &lt;/p&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;हर आश्रम भीड़-भाड़ से दूर प्राकृतिक सुषमाओं से संयुक्त काफी विस्तृत जमीन पर होता है। एक समाजसेवी संस्था के रुप में इसके विकास का संकल्प होता है। इसके बहुत सारे विभाग होते हैं। इसके लिए बड़ी बड़ी इमारतों की जरुरत होती है। लोगों के सर्वांगीन विकास के साथ साथ बहुआयामी सुख-सुविधाओं का संकल्प होता है । यहॉ दैहिक , दैविक , भौतिक ताप किसी को नहीं होना चाहिए। नर-नारी का कोई भेद नहीं होता , सबके मनोवैज्ञानिक सुख और संतुिष्ट के लिए आश्रम उन्मुक्त , स्वच्छंद भोग विलास की पुष्पवाटिका होती है। सभी उच्च संगति का रसास्वादन करते हैं। ऐसे स्वर्गीय सुख को प्राप्त करने के लिए रमणीक स्थल का विकास किया जाता है , जिसके लिए पर्याप्त धन की आवश्यकता होती है। खास अवसरों पर यहॉ बड़े-बड़े उत्सव का आयोजन होता है। हजारो और लाखों की संख्या में भीड़ एकति्रत होती है। भक्त बहुत ही गदगद होकर बड़ी श्रद्धा के साथ क्षणभर में दान-दक्षिणा में लाखों करोड़ों एकति्रत कर देे हैं। आश्रमवाले बाबा विशेष उत्सव के अवसर पर साज-सजावट में जितना ही अधिक तामझाम प्रस्तुत करते हैं , जितने ही आधुनिक संसाधनों का उपयोग करते हैं , चंदे की रकम उसी के अनुपात में कई गुणा अधिक बढ़ते हुए क्रम में होती है। इस तरह भीड़-भाड़ , ताम-झाम और समृिद्ध ही उनके आध्याित्मक विकास और गुण-ज्ञान की गहराई का परिचायक बन जाती है , जबकि सच तो यह है कि प्रयोगशाला में तल्लीन खेजकत्र्ता के लिए भीड़-भाड़ , तामझाम या बड़े धन की आवश्यकता नहीं होती।&lt;/p&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;उपरोक्त व्याख्या का यह कदापि अर्थ नहीं कि मै बड़ी संस्था या आश्रम का पक्षधर नहीं हूं। विश्वकवि रविन्द्र नाथ टैगोर ने वोलपुर के आश्रम शांति-निकेतन को विश्वविद्यालय का स्वरुप प्रदान किया। श्रीराम शर्मा आचार्य ने मथुरा के अपने आश्रम को गायत्री मंत्र के माध्यम से जन-जागरण और आध्याित्मक विकास का उत्कृष्ट मंच बना दिया है। संसार के सभी विद्यालयों को चलाने के लिए बड़े पैमाने पर धन और संसाधन की आवश्यकता होती ही है , किन्तु संचालनकत्र्ता के गुण-अवगुण की परीक्षा करने में चूक हुई तो आश्रम वाले बाबा विराट स्तर पर व्याभिचार के साथ ही साथ राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय गिरोह के सरगना के रुप में कााम करना आरंभ कर देते हैं। किसी विश्वविद्यालय की पढ़ाई-लिखाई या प्रयोगशाला के प्रयोग में धनागम और खर्च का नियमित लेखा-जोखा होता है। आश्रम का लेखा-जोखा , हिसाब-किताब बाबा की इच्छा होती है। विश्वविद्यालय के उपकुलपति , प्राचार्य और हर विभाग के अध्यक्षों की शैक्षणिक और बौिद्धक योग्यता खुली किताब की तरह होती है, हो सकता है , यहॉ भी कुछ घपला हो , किन्तु आश्रम के मौनी बाबा और उनकी संपूर्ण कार्यवाही रहस्यात्मक होने के कारण संदेह के घेरे में होती है। वहॉ अच्छाइयों के साथ ही साथ बुराइयों के पनपने की पूरी संभावना होती है। अत: बहुत सारी विशेषताओं के बावजूद मानव को महामानव समझने की भूल न करें , किसी ज्योतिषी को बाबा , सृिष्टकत्र्ता , जन्मदाता या भगवान नहीं समझें। यदि आत्मा कहे तो गुरुजी या आचार्य कहना ही काफी होगा। &lt;/p&gt;&lt;p align="center"&gt;मामूली भूल भी विरक्ति का कारण बन जाती है &lt;/p&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;कहने का अभिप्राय यह है कि जिस बाबा में मानवीय गुणों का अत्यधिक विकास हो चुका है , जो अपने नैसगिZक गुणों के विकास के कारण लोक-मंगल की कामना और तद्नुरुप आचरण के लिए विख्यात है , जिन्हें ईश्वर के सही स्वरुप का बोध हो चुका है या जो ब्रह्मविद्या के जानकार हैं , वे भी शरीर धारण करने की वजह से संासारी है तथा संासारिक आवश्यताओं कोे महसूस करते हैं। अत: बाबा बनाकर उन्हें उनके अधिकारों से वंचित न करें , अन्यथा अपनी जरुरतों के लिए वे जो रास्ता अपनाएंगे , वह आपको नागवार लग सकता है।&lt;/p&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;किसी से अधिक अपेक्षाएं रखने से उसकी मामूली भूल भी विरक्ति का कारण बन सकती है। यही कारण है कि ज्योतिषी की एक भी भविष्यवाणी गलत होने पर लोग विक्षुब्ध हो जाते हैं , उनकी आस्था वहॉ पर घटने लगती है, उनका विद्रोहात्मक स्वरुप उभरने लगता है , जबकि सच तो यह है कि हर मनुष्य से भूल होती है , ज्योतिषी से भी भूल हो सकती है। अरबों रुपए खर्च करके वैज्ञानिक एक उपग्रह छोड़ता है ,कुछ ही देर बाद वह पृथ्वी पर गिर जाता है , उपग्रह के ध्वस्त होने से देश की बड़ी पूंजी नष्ट होती है , बहुत सारे वैज्ञानिकों का वषोZं का परिश्रम बर्वाद होता है, इस प्रकार के प्रयोग में कल्पना चावला जैसी मूल्यवान वैज्ञानिक मारी जाती हैं , किन्तु इसके लिए वैज्ञानिकों की योग्यता को चुनौती नहीं दी जा सकती। उनके दोषों को क्षमा कर दिया जाता हैं , यह सोंचते हुए कि वैज्ञानिक भगवान नहीं होते । क्या यही कम है कि अनंत आकाश में उड़ने की महत्वाकांक्षी योजना या प्रगतिशील और विकासोन्मुख विचारधारा उनके पास है ? प्राकृतिक नियमों के रहस्यों से पर्दा उठाकर उन शक्तियों का समुचित उपयोग मनुष्य की सुख-सुविधाओं के लिए कर रहें हैं। एक डॉक्टर चिकित्सा विज्ञान का विशेषज्ञ होता है । अपनी जानकारियों से मनुष्य या पशु के शरीर में उत्पन्न जटिलताओं को दूर करता है , किन्तु इलाज के क्रम में बहुत लोग मारे भी जाते हैं। इस तरह मनुष्य के पृथ्वी पर बने रहने के पीछे डॉक्टर का इलाज है , तो इलाज के दौरान मनुष्यों के मरने का अपयश भी उसके साथ है। लोगों की नजर में डाक्टर कसूरवार नहीं है , क्योंकि लोग उसे बाबा या भगवान के समकक्ष नहीं मानते। हर वकील मुकदमें की पैरवी करता है , सभी मुकदमा जीतने की इच्छा रखते हैं , लेकिन हर मुकदमें का निष्कषZ एक ही होता हैै , एक वकील जीतता है और दूसरा हारता है , किन्तु हारनेवाला मुविक्कल कभी भी किसी वकील पर दोषारोपण नहीं करता। वकील के हार-जीत की संभावनाएं 50 प्रतिशत होती है , किन्तु किसी ज्योतिषी की एक भी भविष्यवाणी गलत हो जाए तो उसपर चतुिर्दक आक्रमण होने लगता है ,क्योंकि बाबा की छोटी सी भूल को भी भक्तगण क्षमा नहीं कर पाते। &lt;/p&gt;&lt;p align="center"&gt;आखिर ज्योतिषी का सामाजिक स्वरूप क्या हो &lt;/p&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;एक बहुत ही गंभीर प्रश्न खड़ा होता है। क्या सचमुच ही बाबा के इसी रुप में लोग श्रद्धावनत होते हैं ? ज्योतिषी बाबा सरल वेश-भूषा में हो , उसे कम से कम संासारिक आश्यकताएं हों , उसे कम से कम पारिश्रमिक दिया जाए , उसे स्थायित्व प्राप्त न रहे , हर प्रकार की सुख-सुविधाओं से संयुक्त आवासीय सुविधा न हो , स्वयं सहनशील हो , उनकी संतान प्रगतिशील न हो। प्राचीनकाल में ऋषियों के साथ उनकी पित्नयॉ भी हुआ करती थी, परंतु आज के बाबा का जो स्वरुप लोगों के मस्तिष्क में उभरता है , वह यह कि उनके आध्याित्मक विकास के लिए उनका गृहस्थ आश्रम आवश्यक नहीं है। गृहस्थ होने मात्र से उनकी योग्यता को संदेह के घेरे में डाल दिया जाता है। आखिर जो विशुद्ध ज्योतिषी हैं , उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति कैसे होती होगी , यह ज्योतिषी के समक्ष उपस्थित होनेवाले लोग भी नहीं बता पाएंगे। सामान्य लोग उन्हें भगवान का दर्जा देकर मुक्त हो जाते हैं , जबकि मूर्धन्य लोग ज्योतिषी से मिलने की बात को छिपाने की पूरी कोिशश करते हैं। बड़े राजनेताओं की किसी ज्योतिषी से मिलने की चर्चा-परिचर्चा अखबारों पति्रकाओं में इतनी हो जाती है कि यही उनके पराभव का कारण बन जाती है। वत्र्तमान समाज में एक ज्योतिषी बाबा है या अछूत , यह बात तो हमारी समझ से परे है , किन्तु इतनी बात तो स्पष्ट है कि प्रगतिशील विचारधारा का कोई व्यक्ति ज्योतिषी से मिला , तो वह दकियानूसी हो गया। भला बताइए तो सही , उस ज्योतिषी बाबा के प्रति जनता का कौन सा भाव अच्छा है , जिसकी प्रशंसा की जा सके। नििश्चत रुप से बाबा कहकर जनता उसे ठगने की चेष्टा करती है , इसलिए वह खुद ही ठगी जाती है। अच्छा होगा , किसी ज्योतिषी की बौिद्धक क्षमता ,अर्जित गुण-ज्ञान के समानांतर उन्हें अपना हितैषी समझते हुए उसी के अनुरुप उनके साथ मानवीय व्यवहार प्रदिशZत किया जाए। &lt;/p&gt;&lt;p align="center"&gt;वास्तव में ज्योतिषी एक समय विशेषज्ञ है &lt;/p&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;एक ज्योतिषी समय विशेषज्ञ होता है। उसका काम अच्छे या बुरे समय की सूचना देना है। किन्तु अच्छा या बुरा समय बहु-आयामी हो सकता है। यदि समय अच्छा हुआ , तो कोई जरुरी नहीं कि आप सभी प्रकार के काम कर लेंगे , किन्तु इतना अवश्य होगा कि आपका कुछ काम इस ढंग से बनेगा कि कि आपका मनोबल ऊंचाई की ओर जाएगा। इस तरह बुरा समय हो तो कोई आवश्यक नहीं कि हर काम बुरा ही हो , परंतु कुछ घटनाएं इस ढंग से घटित होंगी , जिससे मनोबल गिरा हुआ महसूस होगा। अच्छा समय है तो कोई भी व्यक्ति अधिक से अधिक मनोवांछित फल की प्राप्ति के संदर्भ में बिल्कुल मस्त होता है। उसे किसी की परवाह नहीं होती , वह एक क्षण के लिए भी कदापि नहीं सोंच पाता कि इसकी निरंतरता में कभी कमी भी हो सकती है। उस समय किसी ज्योतिषी से राय-परामशZ करना भी उसकी शान के खिलाफ होता है। हर प्रकार के अच्छे फल को अपना कर्मफल मानता है , किन्तु बुरे समय के उपस्थित होने से उसकी घबराहट काफी बढ़ जाती है। बुरे समय की तीव्रता को कैसे कम किया जाए इसकी चिन्ता प्राय: सभी व्यक्ति को होती है। इसी अतिरिक्त प्रत्याशा के साथ प्राय: पूरा समाज किसी ज्योतिषी की ओर आकर्षित होता है , किन्तु बुरे समय को अच्छे समय में परिवर्तित करने के असफल प्रयास के कारण ही कोई ज्योतिषी बदनाम हो जाता है और पूरा समाज उससे विकर्षित होने लगता है। भला-बुरा कहने में भी लोगों को कोई हिचकिचाहट नहीं होती और ज्योतिषी के दिव्य या ब्रह्मज्ञान का कोई महत्व नहीं रह जाता।&lt;/p&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;कैसी विडम्बना है , एक ज्योतिषी आधुनिक वेश-भूषा , खान-पान का हिमायती हो तो उसके ज्योतिषीय ज्ञान पर संशय किया जाता है , वही ज्योतिषी किसी साधु-सन्यासी की वेश-भूषा में हो उसका खान-पान सन्यासियों की तरह हो , तो उसे लकीर का फकीर दकियानूस कहा जाता है , उसकें चरित्र को संदेह की दृिष्ट से देखा जाता है। इस परिस्थिति में एक प्रश्न बहुत ही महत्वपूर्ण है , ज्योतिषी का सामाजिक स्वरुप तांति्रक , यांति्रक , पुजारी , बाबा , सन्यासी या वैज्ञानिक - किसके जैसा हो ? ज्योतिषी एक सामान्य मनुष्य है , जिसे भविष्य की जानकारियॉ होती है। भविष्य की जानकारी देनेवाला व्यक्ति भविष्य को बदल नहीं सकता। भूकम्प या समुद्री तूफान की सूचना देनेवाला भूकम्प या समुद्री तूफान को रोक नहीं सकता , सिर्फ पूर्व सूचना से इससे प्रभावित होनेवाले लोग सावधानियॉ बरत सकते हैं। दो व्यक्ति राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार हैं , दोनो की जन्मकुंडली देखकर किसी के राष्ट्रपति चुने जाने की भविष्यवाणी की जा सकती है , परंतु दोनो के भाग्य या मंजिल को कैसे बदला जा सकता है ?&lt;/p&gt;&lt;p align="left"&gt; सूर्यग्रहण की भविष्यवाणी कर उससे पड़नेवाले प्रभाव को समझाया जा सकता है , परंतु इसे रोका नहीं जा सकता । जानकारी होने के बाद लोग क्या कर सकते हैं , वे अपनी बनावट के अनुसार , अपनी मानसिकता के अनुसार निर्णय लेंगे। आपके क्षेत्र में तूफान या भूकम्प हो , तो क्या करना होगा , सूर्यग्रहण के समय सूर्य को देखें या नही ? या फिर देखे तो किस प्रकार ? लोग अपनी कमजोरियों , असफलताओं और अदूरदिशZता को किसी ज्योतषी पर नहीं थोपें , यही ज्योतिष के प्रति सच्ची श्रद्धा होगी । अपनी असफलताओं को छिपाने के लिए ग्रहों के जानकार के विवादास्पद स्वरुप को प्रस्तुत न करें।&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8693317056729335791-4534823626717445137?l=jyotishsachyajhuth.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://jyotishsachyajhuth.blogspot.com/feeds/4534823626717445137/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8693317056729335791&amp;postID=4534823626717445137' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8693317056729335791/posts/default/4534823626717445137'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8693317056729335791/posts/default/4534823626717445137'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://jyotishsachyajhuth.blogspot.com/2008/09/blog-post.html' title='ज्योतिषी का विवादास्पद सामाजिक महत्व'/><author><name>विशेष कुमार</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-ZN2ci0r77MI/Tv9UGFBuf_I/AAAAAAAAAB4/xVUR1w8GkKg/s220/vishesh.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8693317056729335791.post-8246372463082882432</id><published>2008-08-21T04:33:00.000-07:00</published><updated>2011-08-30T02:29:30.566-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='bokaro'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='vidya sagar mahtha'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='petarwar'/><title type='text'>फलित ज्योतिष की सीमाएं</title><content type='html'>&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;span style="color:#663333;"&gt;एक ज्योतिषी से लोगों की अपेक्षाएं बहुत होती हैं &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color:#663333;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#663333;"&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;आज कोई भी व्यक्ति जब एक ज्योतिषी के पास पहुंचता है तो उस व्यक्ति की ज्योतिषी से बहुत सारी अपेक्षाएं होती हैं। आम लोग यही समझते हैं कि ज्योतिषी को किसी के भविष्य की पूरी जानकारी होती है , अत: वह उस व्यक्ति के भविष्य की सारी बाते बता देगा। दूसरी ओर तरह-तरह के ज्योतिषी होते हैं , सभी के दावे एक से बढ़कर एक होते हैं । शरीर के रंग , कद ,स्वरुप , धन की मात्रा ,भाई-बहनों की संख्या , शैक्षणिक योग्यता , बाल-बच्चों की संख्या , शादी की तिथि , शादी की दिशा, मृत्यु का समय , लॉटरी से धन प्राप्त करने का समय ,व्यक्ति का नाम , पिताजी का नाम , हस्तरेखा से कुंंडली निर्माण आदि के दावे किसी ज्योतिषी की ज्योतिषीय योग्यता को प्रचारित करने के लिए विज्ञापन का काम भले ही कर जाए , उपरोक्त सभी संदभोZ की जानकारियॉ अभी तक का विकासशील फलित ज्योतिष किसी भी हालत में प्रदान नहीं कर सकता। इस प्रकार की जिज्ञासा को लेकर कोई भी व्यक्ति किसी ज्योतिषी के यहॉ पहुंचे तो उसे निराशा ही मिलेगी। ज्योतिषी से लोगों की अपेक्षाएं बहुत अधिक होती हैं। एक सज्जन पूछ रहें हैं- मेरी पुत्री की शादी किस दिशा में कब और कितनी दूरी पर होगी ? क्या इस प्रश्न का उत्तर सचमुच फलित ज्योतिष से दिया जा सकता है ?&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;br /&gt;वैदिक काल , पौराणिक काल , प्राक् ऐतिहासिक काल में स्वयंवर हुआ करते थे । उस समय वर-वधू अपने जोडे का खुद चयन किया करते थे । किन्तु उसके पश्चात् भारत में विदेशी आक्रमण होते चले गए और प्रतिष्ठा बचा पाने का भय इतना प्रबल हो गया कि लोगों ने अपनी पुति्रयों का विवाह जन्म लेने के साथ ही तय करना शुरु कर दिया। कहीं कहीं ऐसा भी उदाहरण देखने को मिला कि दो गर्भवती सहेलियॉ परस्पर यह तय करती थी कि एक दूसरे को पुत्र-पुति्रयॉ हुईं तो उनकी शादी कर दी जाएगी। सौ वषZ पूर्व तक बालक बालिकाओं की शादी शैशवकाल में की जाती थी। आज से 50 वषZ पूर्व शादियॉ उस समय होती थी जब लड़के लड़कियॉ क्रमश: पंद्रह और दस वषZ के हुआ करते थे। पच्चीस वषZ पूर्व बालिग होने पर ही विवाह का प्रचलन था , पर इस समय जब इक्कीसवीं सदी का आरंभ हो रहा है ,कोई भी जागरुक लड़का या लड़की तबतक शादी के पक्ष में नहीं होते , जबतक वे स्वावलम्बी नहीं बन जाते। इस समय वैवाहिक बंधन में बंधनेवालों की उम्र कभी-कभी 25-30 वषोZं से भी अधिक होती है। &lt;/div&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;span style="color:#663333;"&gt;किसी संदर्भ की इतनी अपेक्षा क्यों ?&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span style="color:#663333;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#663333;"&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;ध्यान देने की बात यह है कि एक ही ग्रह भिन्न भिन्न काल में कभी बाल्यावस्था में , कभी किशोरावस्था में ,और कभी युवावस्था में विवाह का योग उत्पन्न करता है। 15वी शताब्दी से 19वी शताब्दी तक सभी के लिए वैवाहिक योग शैशवावस्था में , 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में किशोरावस्था के आरंभ में ,20वीं शताब्दी के अंत में किशोरावस्था के अंत में तथा इक्कीसवी सदी के प्रारंभ में युवावस्था के मध्य में वैवाहिक योग उत्पन्न होता है । क्या इन बातों से ग्रह की प्रकृति और कार्यशैली में एकरुपता दिखाई पड़ती है ? यदि नही तो ज्योतिषी विवाह के समय के उल्लेख का दावा किस प्रकार करतें हैं ? ज्योतिष पर विश्वास करने वाले लोग इस संदर्भ में इतनी अपेक्षाएं क्यों रखते हैं ? यह बात दूसरी है कि देश काल के अनुसार सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए ग्रह की स्थिति और उसकी गत्यात्मकता से वैवाहिक काल की संभावनाओं पर परिचर्चा भले ही कर ली जाए।&lt;/p&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;20वीं शताब्दी के प्रारंभ या मध्य तक यातायात की बड़ी सुविधा नहीं थी , संपर्क-सूत्र भी महत्वपूर्ण नहीं थे , अत: शादी-विवाह आसपास निकटस्थ ग्राम में होते थे। जैसे-जैसे यातायात की सुविधाएं बढ़ती गयी , संपर्क-सूत्र बढते चले गए , सभ्यता का विकास होता गया , लोग िशक्षित होते गए , अन्तर्जातीय , अन्तप्राZंतीय , दूरस्थ , यहॉ तक कि अब देश-देशांतर तक की शादियॉ प्रचलित हो गयी हैं। वही ग्रह पहले सीमित जगहों में शादियॉ करवाते थे , अब दम्पत्ति पृथ्वी के दो छोर के भी हो सकते हैं। विवाह-सूत्र में बंधनेवाले अब किसी दूरी की परवाह नहीं करते हैं । अत: संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि कुंडली के ग्रहों को देखकर यह कदापि नहीं बतलाया जा सकता है कि जातक की शादी कहीं निकट स्थल में होनेवाली है या फिर काफी दूर। इसका कारण है , लोगों की मनोवृत्ति में आया बदलाव। पहले लोग अपने गॉव या आसपास के गॉवों में बसनेवाले अपनी जाति के लोगों को ही असली बिरादरी समझते थे , दूर की अपनी ही जाति के लोगों की कुलीनता पर संशय किया जाता था। अत: उनसे संबंध करके अपनी प्रतिष्ठा को दॉव पर से लोग बचते थे।&lt;/p&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;आज परिस्थितियॉ बिल्कुल भिन्न हैं। जाति और खून की पवित्रता गौण हो गयी है। धन अर्जित करने की क्षमता , कर्म और चरित्र ही प्रतिष्ठा के मापदंड बनते जा रहें हैं। वैवाहिक संबंध में दूरी अब बाधा नहीं रह गयी है। किसी भारतीय नारी या पुरुष की शादी अमेरिका या ब्रिटेन निवासी के साथ हो तो इसे शान और प्रतिष्ठा की बात समझी जाती है। दाम्पत्य जीवन में दो-चार वषोZं का वियोग हो , पत्नी 2-4 वषZ बड़ी भी हो तो इसे सहज स्वीकार कर लिया जाएगा। इस प्रकार के बदलते सामाजिक परिवेश में ग्रह के आधार पर यह निर्णय करना काफी कठिन होगा कि किसी की शादी निकट या दूर या फिर किस उम्र में होनेवाली है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;span style="color:#663333;"&gt;भूतप्रेत सिद्ध कर भविष्यवाणी करना ज्योतिष नहीं&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span style="color:#663333;"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#663333;"&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;एक बार अति सामान्य और अतिवििशष्ट एक ही व्यक्ति से मिलने का मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ। अति सामान्य इसलिए क्योंकि वे वेश-भूषा और रुप-रंग से अतिसामान्य , वस्त्र के नाम पर लाल रंग का एकमात्र मामूली अंगोछा पहने हुए थे, मालूम हुआ , वे बाहर से आए हुए थे , अपने ही वेश-भूषा के अनुरुप कई दिनों से हरिजनों की बस्ती में मेल-मिलाप से रह रहें थे। मुझे शैशवकाल से ही ज्योतिष विद्या में रुचि है। मै मिलने के लिए उनके पास गया। उन्होने मुझे देखते ही कहा-आइए विद्यासागरजी , बैठिए। मै उनकी ज्योतिष विद्या से अवाक् था। मै अच्छी तरह जान रहा था कि इस ज्योतिषी को मेरा नाम किसी ने नहीं बताया है। फिर भी ऐसा समझते हुए कि मै इस क्षेत्र का महत्वपूर्ण विद्यार्थी हंू , मुझे आते हुए देखकर किसी ने मेरा नाम फुसफुसाकर बता दिया हो , मैने कहा- मेरे साथ जो हैं , उन्हे आपने बैठने को नहीं कहा । मैने जानबूझकर ज्योतिषी की परीक्षा लेने के लिए ये बातें कही , क्योंकि मेरे साथ जो व्यक्ति था , वह मेरे इलाके के लिए अजनबी था , उसका नाम लोग नहीं जानते थे , अत: ज्योतिषी को इसकी खबर नहीं हो सकती थी। ज्योतिषीजी मेरा इशारा समझ चुके थे। उहोेनें इस अजनबी का नाम हकलाते हुए ` अभ्यान , अभ्यान ,अभ्याननजी , बैठिए ´- कहा । वे अभ्यानन के नाम को ऐसे दूहरा रहे थे , मानो बहुत धीमी आवाज में कोई उन्हें अभ्यानन कह रहा हो और वे अंतिम `न´ को सुनने में कठिनाई महसूस कर रहें हों। इसके बाद उन्होने धारा प्रवाह बोलना शुरु कर दिया , हम कितने भाई-बहन हैं , बड़े भाई की शादी हो चुकी है , एक पुत्री है , बहन की दो पुति्रयॉ और एक पुत्र हैं। मेरे संबंध में उन्होने बताया- मै परीक्षा दे चुका हूं और परीक्षाफल का इंतजार है। अपेक्षित रिजल्ट में मामूली बाधा है। ज्योतिष की चाहे जिस विधा पर उनका पूर्ण नियंत्रण था या वे सििद्धप्राप्त पुरुष थे , उस दिन की उनकी सारी बाते जो घट चुकी थी , अक्षरश: सही थी , यहॉ तक कि कुछ दिनों बाद मेरा रिजल्ट भी निकला , मैंने मात्र एक अंक से प्रथम श्रेणी खो दी थी , परंतु मेरे सिवा बहुत लोगों के लिए बहुत सारी भविष्यवाणियॉ थी ,जो सभी गलत निकली। जो दम्पत्ति निकट भविष्य में संतान प्राप्त करनेवाले थे, उनके पुत्र-पुति्रयों से संबंधित भविष्यवाणियॉ, नौकरी प्राप्त करने की भविष्यवाणियॉ और निकट भविष्य में ही लाभ प्राप्त करने की भविष्यवाणियॉ गलत साबित हुईं। एक व्यक्ति मारकेश के प्रबल योग में पड़ा हुआ है , कहकर उसे काफी ठगा भी गया , परंतु उसे मामूली बुखार भी न हुआ।&lt;/p&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;br /&gt;इस पूरे प्रसंग पर गौर किया तो मेरे सामने जो निष्कर्ष आए , वह यह कि वह आदमी भूतात्मा सिद्ध किए हुए था। वह सिद्ध आत्मा ही उस व्यक्ति को वत्र्तमान तक की सारी बातें अक्षरश: बताया करता था और उसे ही वह तोते की तरह बोलता था। इस कारण भूत और वत्र्तमान की सारी बातें बिल्कुल सही थी , परंतु अधिकांश भविष्यवाणियॉ गलत थी , क्योंकि भविष्यकथन अनुमान पर आधारित था। वह व्यक्ति भूत और वत्र्तमान की सटीक चर्चा करके दूसरों का विश्वास प्राप्त करता था , परंतु भविष्य की जानकारी के लिए समुचित विद्या उसने अर्जित नहीं की थी।&lt;br /&gt;दूसरी एक बात और थी कि वह सामनेवाले को हिप्नोटाइज करता था और उसके मन की सारी बातों को बता देता था। तारीखों सहित भूत और वर्तमान की चर्चा किसी व्यक्ति को हिप्नोटाइज करके बतायी जा सकती है, किन्तु हिप्नोटिज्म विद्या के जानकार को ज्योतिषी कदापि नहीं कहा जा सकता , क्योकि भविष्य की जानकारी भूत विद्या या हिप्नोटिज्म से कदापि संभव नहीं है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;span style="color:#663333;"&gt;गुणात्मक पहलू बतलाना संभव,संख्यात्मक नहीं&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;span style="color:#663333;"&gt;&lt;br /&gt;इस प्रसंग का उल्लेख करना इसलिए आवश्यक समझा, क्योंकि मुझे भी पहले यही भ्रम हुआ था कि ज्योतिषी भाई-बहनों की संख्या बता सकता है , संतान की संख्या बता सकता है, यहॉ तक कि कितने पुत्र और कितनी पुति्रयॉ होंगी , इसे भी बतलाया जा सकता है , परंतु आज फलित ज्योतिष के चालीस वषीZय अध्ययन-मनन के बाद इस निष्कषZ पर पहुंचा हूं कि फलित ज्योतिष मानव-मन की मन:स्थिति , सुख-दुख आदि प्रवृत्तियों या उसकी तीव्रता का बोध कराता है न कि किसी संख्या का।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;span style="color:#663333;"&gt;&lt;span style="color:#663333;"&gt;&lt;span style="color:#663333;"&gt;&lt;span style="color:#663333;"&gt;&lt;br /&gt;भाई-बहन , सहयोगी , शक्ति , पुरुषार्थ , पराक्रम की चर्चा फलित ज्योतिष में तीसरे भाव से की जाती है। इंदिरा गॉधी का कोई सहोदर भाई या बहन नहीं था , परंतु उनके सहयोगियों की कोई कमी नहीं थी ,उनके पुरुषार्थ और पराक्रम पर भी किसी को संदेह नहीं था। भाई-बहन की संख्या का यहॉ कोई प्रयोजन नहीं है , जिनके सहयोग के लिए सहयोगी हाथों की संख्या लाखों और करोड़ों में थी।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;span style="color:#663333;"&gt;&lt;span style="color:#663333;"&gt;&lt;span style="color:#663333;"&gt;&lt;span style="color:#663333;"&gt;&lt;br /&gt;आप कितने शक्तिशाली हैं , आपके कितने सहयोगी हैं ,इसकी चर्चा से कहीं उत्कृष्ट चर्चा यह होगी कि सहयोगी तत्वों के सृजन और उसे बनाए रखने की क्षमता आपमें कितनी है ? आपके पुरुषार्थ और पराक्रम से प्रभावित होकर आपके अनुयायियों की संख्या कितनी हो सकती है ? आपके सहयोगी या अनुयायी भी समय और स्थान के सापेक्ष कभी सैकड़ों , कभी हजारों और कभी लाखों में हो सकते हैं , परंतु ये सभी सहयोगी विपरित परिस्थितियों के उत्पन्न होने पर सहयोगी सिद्ध नहीं हो सकते हैं। हो सकता है , भाइयों की संख्या पॉच होने के बावजूद कोई काम न आए। अत: फलित ज्योतिष के लिए किसी भी परिस्थिति में संख्या बताना बहुत ही कठिन , कुछ हद तक असंभव है। जो संख्या बताने का दावा करते हैं , वे किसी न किसी प्रकार से लोगों को बेवकूफ बनाकर उसे विश्वास में लेने की चेष्टा करते हैं। इस तरह धनवान होने की बात कही जा सकती है , किसी भी हालत में नोटों की संख्या नहीं बतलायी जा सकती। स्पेकुलेशन से धन कमाने की बात कही जा सकती है , लेकिन लॉटरी के टिकट नंबर को नहीं बतलाया जा सकता । जो लॉटरी का नंबर बतलाकर लोगों को गुमराह करते हैं, वे अपने भाग्योदय के लिए लॉटरी का नंबर क्यो नहीं खोज पाते ? इसी तरह संपत्ति से संबंधित सुख और नाम यश की भविष्यवाणी की जा सकती है ,मकानों, दुकानों , सवारियों , खेतों , बागों की संख्या बता पाना फलित ज्योतिष की सीमा के अंदर नहीं आता ।&lt;br /&gt;20वीं शताब्दी के मध्य में जब हमलोग हेाश ही रहें थे ,कई बार ऐसे सुयोग आए , 45-50 की उम्र के दंपत्ति को बाजे-गाजे के साथ वैवाहिक बंधन में बंधते देखा। बात समझ में हीं आ रही थी क्योंकि उस समय लोग किशोरावस्था के प्रारंभ में ही वैवाहिक बंधन में बंध जाते थे। मैने कौतुहलवश जब किसी से पूछा तो मुझे बताया गया कि वे शादी नहीं कर रहें हैं वरन् वैवाहिक जीवन की सफलता पर उत्सव मना रहे हैं। मैेने जब उनसे वैवाहिक जीवन के सफल होने के आधार के बारे में पूछा तो मालूम हुआ कि उक्त दम्पत्ति के पुत्र-पुति्रयों की संख्या 21 हो गयी है। उन दिनों उस इलाके में वैवाहिक जीवन की सफलता का मापदण्ड यही था। बाद में जब कुछ बड़ा हुआ तो पाया कि मेरे कई हमउम्रो के कुल भाई-बहन 11-12 की संख्या में थे। किसी को हमलोग फुटबॉल टीम या फिर पूरा दर्जन कहते थे ,क्योंकि आधे दर्जन की तो भरमार थी और इस सिलसिले को बहुत हद तक हमलोगों ने भी ढोया।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;span style="color:#663333;"&gt;&lt;span style="color:#663333;"&gt;&lt;span style="color:#663333;"&gt;&lt;span style="color:#663333;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;span style="color:#663333;"&gt;&lt;span style="color:#663333;"&gt;&lt;span style="color:#663333;"&gt;&lt;span style="color:#663333;"&gt; किन्तु इस जनसंख्या-वृिद्ध के दुष्प्रभाव को सबने महसूस किया और 20वीं शताब्दी के चतुर्थ चरण के प्रारंभ में श्रीमती इंदिरा गॉधी द्वारा परिवार नियोजन की आवाज को बुलंद किया गया। जोर-जबर्दस्ती से इस कार्यक्रम को चलाने के आरोप में उनकी सरकार भले ही ध्वस्त हो गयी हो , परंतु सीमित परिवार की आवश्यकता को धीरे-धीरे सभी ने स्वीकार किया। आज भारत की आबादी एक अरब से अधिक है तथा विश्व की 7 अरब के लगभग , अधिकांश देश अपनी मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने में अक्षम दिखाई दे रहें हैं। विकासशील देशों की सबसे बडी समस्या उसकी बढ़ती हुई आबादी है। विकसित और अविकसित सभी देशों में `हम दो : हमारे दो´ का नारा बुलंद है। जो इससे भी अधिक प्रगतिशील विचारधारा के हैं , वे `हम दो : हमारे एक´ की बात को चरितार्थ कर रहें हैं।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;span style="color:#663333;"&gt;&lt;span style="color:#663333;"&gt;&lt;span style="color:#663333;"&gt;&lt;span style="color:#663333;"&gt;&lt;br /&gt;उपरोक्त परिप्रेक्ष्य को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि ग्रहों के साथ संतान की संख्या को जोड़ने की कोिशश निरर्थक सिद्ध होगी। आज भी कई ग्रह संतान स्थान में स्थित हो सकते हैं और अपनी क्षमता के अनुसार सिद्धांतत: संतान प्रदान करने की बात को सही सिद्ध करना चाहे तो अतीत के लिए कुछ जोड़-तोड़ के साथ ये नियम सही भी हो सकते थे परंतु आज ग्रह-बल के अनुरुप संतान-प्राप्ति की संख्या की बात निष्फल हो जाएगी। अ
