गुरुवार, 2 अक्तूबर 2008

फलित ज्योतिष : विज्ञान या अंधविश्वास

फलित ज्योतिष विज्ञान है या अंधविश्वास , इस प्रश्न का उत्तर दे पाना समाज के किसी भी वर्ग के लिए आसान नहीं है। परंपरावादी और अंधविश्वासी विचारधारा के लोग ,जो कई स्थानों पर ज्योतिष पर विश्वास करने के कारण धोखा खा चुकें हैं ,भी इस शास्त्र पर संदेह नहीं करते। सारा दोषारोपण ज्योतिषी पर ही होता है। वैज्ञानिकता से संयुक्त विचारधारा से ओत-प्रोत व्यक्ति भी किसी मुसीबत में फंसते ही समाज से छुपकर ज्योतिषियों की शरण में जाते देखे जाते हैं। ज्योतिष की इस विवादास्पद स्थिति के लिए मै सरकार ,शैक्षणिक संस्थानों एवं पत्रकारिता विभाग को दोषी मानती हूं। इन्होने आजतक ज्योतिष को न तो अंधविश्वास ही सिद्ध किया और न ही विज्ञान ?

सरकार यदि ज्योतिष को अंधविश्वास समझती तो जन्मकुंडली बनवाने या जन्मपत्री मिलवाने के काम में लगे ज्योतिषियों पर कानूनी अड़चनें आ सकती थी। यज्ञ हवन करवाने या तंत्र-मंत्र का प्रयोग करनेवाले ज्योतिषियों के कार्य में बाधाएं आ सकती थी। सभी पत्रिकाओं में राशि-फल के प्रकाशन पर रोक लगाया जा सकता था। आखिर हर प्रकार की कुरीतियों और अंधविश्वासों जैसे जुआ , मद्यपान , बाल-विवाह, सती-प्रथा आदि को समाप्त करनें में सरकार ने कोई कसर नहीं छोड़ी है ,परंतु ज्योतिष पर विश्वास करनेवालों के लिए ऐसी कोई कड़ाई नहीं हुई। आखिर क्यों ?

क्या सरकार ज्योतिष को विज्ञान समझती है ? नहीं, अगर वह इस विज्ञान समझती तो इस क्षेत्र में कार्य करनेवालों के लिए कभी-कभी किसी प्रतियोगिता, सेमिनार आदि का आयोजन होता तथा विद्वानों को पुरस्कारों से सम्मानित कर प्रोत्साहित किया जाता। परंतु आजतक ऐसा कुछ भी नहीं किया गया। पत्रकारिता के क्षेत्र में देखा जाए तो लगभग सभी पत्रिकाएं यदा-कदा ज्योतिष से संबंधित लेख, इंटरव्यू , भविष्यवाणियॉ आदि निकालती रहती है पर जब आजतक इसकी वैज्ञानिकता के बारे में निष्कर्ष ही नहीं निकाला जा सका, जनता को कोई संदेश ही नहीं मिल पाया तो फिर ऐसे लेखों या समाचारों का क्या औचित्य ?

पत्रिकाओं के विभिन्न लेखों हेतु किया जानेवाला ज्योतिषियों कें चयन का तरीका ही गलत है । उनकी व्यावसायिक सफलता को उनके ज्ञान का मापदंड समझा जाता है , लेकिन वास्तव में किसी की व्यावसायिक सफलता उसकी व्यावसायिक योग्यता का परिणाम होती है ,न कि विषय-विशेष की गहरी जानकारी। इन सफल ज्योतिषियों का ध्यान फलित ज्योतिष के विकास में न होकर अपने व्यावसायिक विकास पर होता है। ऐसे व्यक्तियों द्वारा ज्योतिष विज्ञान का प्रतिनिधित्व करवाना पाठकों को कोई संदेश नहीं दें पाता है। जो ज्योतिषी ज्योतिष को विज्ञान सिद्ध कर सकें , उन्हें ही अपने विचार प्रस्तुत करने के लिए आमंत्रित किया जाना चाहिए या एक प्रतियोगिता में किसी व्यक्ति की जन्मतिथि, जन्मसमय और जन्मस्थान देकर सभी ज्योतिषियों से उस जन्मपत्री का विश्लेषण करवाना चाहिए । उसकी पूरी जिंदगी कें बारे में जो ज्योतिषी सटीक भविष्यवाणी कर सके उसे ही अखबारों ,पत्रिकाओं में स्थान मिलना चाहिए।

परंतु ज्योतिषियों की परीक्षा लेने के लिए कभी भी ऐसा नहीं किया गया ,फलस्वरुप ज्योतिष की गहरी जानकारी रखनेवाले समाज के सम्मुख कभी नहीं आ सके और समाज नीम-हकीम ज्योतिषियों से परेशान होता रहा। इसके अतिरिक्त वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखनेवाले कुछ लोग और कुछ संस्थाएं ऐसी है , जो ज्योतिष विज्ञान के प्रति किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं। वे ज्योतिष से संबंधित बातों को सुनने में रुचि कम और उपहास में रुचि ज्यादा रखते हैं। उनके दृष्टिकोण में समन्वयवादिता की कमी भी आजतक ज्योतिष को विज्ञान नहीं सिद्ध कर पायी है।

ज्योतिष विज्ञान की वैज्ञानिकता के बारे में संशय प्रकट करते हुए यह कहा जाता है कि सौरमंडल में सूर्य स्थिर है तथा अन्य ग्रह इसकी परिक्रमा करते हैं, किन्तु ज्योतिष शास्त्र यह मानता है कि पृथ्वी स्थिर है और अन्य ग्रह इसकी परिक्रमा करते हैं। जब यह परिकल्पना ही गलत है तो उसपर आधारित भविष्यवाणी कैसे सही हो सकती है ? पर बात ऐसी नहीं है । जिस पृथ्वी पर हम रहते हैं , वह चलायमान होते हुए भी हमारे लिए स्थिर है , ठीक उसी प्रकार , जिस प्रकार हम किसी गाड़ी में चल रहे होते हैं , वह हमारे लिए स्थिर होती है और किसी स्टेशन पर पहुंचते ही हम कहते हैं , `अमुक शहर आ गया।´ जिस पृथ्वी में हम रहतें हैं , उसमें हम स्थिर सूर्य के ही उदय और अस्त का प्रभाव देखते हैं। इसी प्रकार अन्य आकाशीय पिंडों का भी प्रभाव हमपर पड़ता है। पृथ्वी से कोई कृत्रिम उपग्रह को किसी दूसरे ग्रह पर भेजना होता है तो पृथ्वी को स्थिर मानकर ही उसके सापेक्ष अन्य ग्रहों की दूरी निकालनी पड़ती है। जब यह सब गलत नहीं होता तो ज्योतिष में पृथ्वी को स्थिर मानते हुए उसके सापेक्ष अन्य ग्रहों की गति पर आधारित फल कैसे गलत हो सकता है ?

ज्योतिष की वैज्ञानिकता के बारे में संशय प्रकट करते हुए दूसरा तर्क यह दिया जाता है कि सौरमंडल में सूर्य तारा है , पृथ्वी, मंगल, बुध, बृहस्पति, शनि आदि ग्रह हैं तथा चंद्रमा उपग्रह है, जबकि ज्योतिष शास्त्र में सभी ग्रह माने जाते हैं । इसलिए इस परिकल्पना पर आधारित भविष्यवाणी महत्वहीन है। इसके उत्तर में मेरा यह कहना है कि सभी विज्ञान में एक ही शब्दों के तकनीकी अर्थ भिन्न-भिन्न हो सकते हैं । अभी विज्ञान पूरे ब्रह्मांड का अध्ययन कर रहा है। ब्रह्मांड में स्थित सभी पिंडों को स्वभावानुसार कई भागों में व्यक्त किया गया है। सभी ताराओं की तरह ही सूर्य की प्रकृति होने के कारण इसे तारा कहा गया है। सूर्य की परिक्रमा करनेवाले पिंडों को ग्रह कहा गया है। ग्रहों की परिक्रमा करनेवाले पिंडों को उपग्रह कहा गया है। किन्तु फलित ज्योतिष पूरे ब्रह्मांड का अध्ययन नहीं कर सिर्फ अपने सौरमंडल का ही अध्ययन करता है। सूर्य को छोड़कर अन्य ताराओं का प्रभाव पृथ्वी पर नहीं महसूस किया गया है। इसी प्रकार अन्य ग्रहों के उपग्रहों का पृथ्वी पर कोई प्रभाव नहीं देखा गया है । सूर्य, चंद्र , बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि एवं मंगल की गति और स्थिति के प्रभाव को पृथ्वी , उसके जड़-चेतन और मानव-जाति पर महसूस किया गया है। इसलिए इन सबों को ग्रह कहा जाता है। ग्रहों की इस शास्त्र में यही परिभाषा दी गयी है। इसके आधार पर इसकी वैज्ञानिकता पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया जा सकता।

तीसरा तर्क यह है कि ज्योतिष में राहू और केतु को भी ग्रह माना गया है , जबकि ये ग्रह नहीं हैं । ये तर्क बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। सबसे पहले यह जानकारी आवश्यक है कि राहू और केतु हैं क्या ? पृथ्वी को स्थिर मानने से पृथ्वी के चारो ओर सूर्य का एक काल्पनिक परिभ्रमण-पथ बन जाता है। पृथ्वी के चारो ओर चंद्रमा का एक परिभ्रमण पथ है ही । ये दोनो परिभ्रमण-पथ एक दूसरे को दो विन्दुओं पर काटते हैं । अतिप्राचीनकाल में ज्योतिषियों को मालूम नहीं था कि एक पिंड की छाया दूसरे पिंडों पर पड़ने से ही सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण होते हैं। जब ज्योतिषियों ने सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण होते देखा, तो वे इसके कारण ढूंढ़ने लगे। दोनो ही समय इन्होने पाया कि सूर्य, चंद्र, पृथ्वी एवं सूर्य, चंद्र के परिभ्रमण-पथ पर कटनेवाले दोनो विन्दु लम्बवत् हैं। बस उन्होने समझ लिया कि इन्हीं विन्दुओं के फलस्वरुप खास अमावस्या को सूर्य तथा पूर्णिमा की रात्रि को चंद्र आकाश से लुप्त हो जाता है। उन्होने इन विन्दुओं को महत्वपूर्ण पाकर इन विन्दुओं का नामकरण `राहू´ और `केतु´ कर दिया। इस स्थान पर उन्होने जो गल्ती की, उसका खामियाजा ज्योतिष विज्ञान अभी तक भुगत रहा है ,क्योंकि राहू और केतु कोई आकाशीय पिंड हैं ही नहीं और हमलोग ग्रहों की जिस उर्जा से भी प्रभावित हो---गुरुत्वाकर्षण, गति, किरण या विद्युत-चुम्बकीय शक्ति, राहू और केतु इनमें से किसी का भी उत्सर्जन नहीं कर पाते। इसलिए इनसे प्रभावित होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। यही कारण है कि राहू और केतु पर आधारित भविष्यवाणी सही नहीं हो पाती।

चौथा तर्क यह है कि सभी ज्योतिषियों की भविष्यवाणियों में विविधता क्यों होती है ? हम सभी जानते हैं कि कोई भी शास्त्र या विज्ञान क्यों न हो कार्य और कारण में सही संबंध स्थापित किया गया हो तो निष्कर्ष निकालने में कोई गल्ती नहीं होती। इसके विपरित यदि कार्य और कारण में संबंध भ्रामक हो तो निष्कर्ष भी भ्रमित करनेवाले होंगे। ज्योतिष विज्ञान का विकास बहुत ही प्राचीन काल में हुआ। उस काल में कोई भी शास्त्र काफी विकसित अवस्था में नहीं था।सभी शास्त्रों और विज्ञानों में नए-नए प्रयोग कर युग के साथ-साथ उनका विकास करने पर बल दिया गया , पर अफसोस की बात है कि ज्योतिष विज्ञान अभी भी वहीं है जहॉ से इसने यात्रा शुरु की थी । महर्षि जैमिनी और पराशर के द्वारा ग्रह शक्ति मापने और दशाकाल निर्धारण के जो सूत्र थे ,उसकी प्रायोगिक जॉच कर उन्हें सुधारने की दिशा में कभी कार्य नहीं किया गया। अंधविश्वास समझते हुए ज्योतिष-शास्त्र की गरिमा को जैसे-जैसे धक्का पहुंचता गया, इस विद्या का हर युग में ह्रास होता ही गया।

फलस्वरुप यह 21वीं सदी में भी घिसट-घिसटकर ही चल रहा है। ज्योतिषियों की भविष्यवाणियों में अंतर का कारण कार्य और कारण में पारस्परिक संबंध की कमी होना है। ग्रह-शक्ति निकालने के लिए मानक-सूत्र का अभाव है। कुल 10-12 सूत्र हैं ,सभी ज्योतिषी अलग अलग सूत्र को महत्वपूर्ण मानते हैं। दशाकाल निर्धारण का एक प्रामाणिक सूत्र है , पर उसमें एक साथ जातक के चार-चार दशा चलते रहतें हैं-एक महादशा, दूसरी अंतर्दशा, तीसरी प्रत्यंतर दशा और चौथी सूक्ष्म महादशा। इतने नियमों को यदि कम्प्यूटर में भी डाल दिया जाए , तो वह भी सही परिणाम नहीं दे पाता है , तो पंडितों की भविष्यवाणी में अंतर होना तो स्वाभाविक है। सभी ज्योतिषी अलग अलग दशा को महत्वपूर्ण मान लें तो सबके कथन में अंतर तो आएगा ही ।

अगला तर्क यह है कि आजकल सभी पत्रिकाओं में लग्नफल की चर्चा रहती है। एक राशि में जन्म लेनेवाले लाखों लोगों का भाग्य एक जैसा कैसे हो सकता है ? यह वास्तव में आश्चर्य की बात है , किन्तु यह सच है कि किसी ग्रह का प्रभाव एक राशि वालो पर तो नहीं , पर एक लग्न के लाखों करोड़ों लोगों पर एक जैसा ही पड़ता है। `एक जैसा फल´ से एक स्वभाव वाले फल का बोध होगा ,न कि मात्रा में समानता का । मात्रा का स्तर तो उसकी जन्मकुंडली एवं अन्य स्तर पर निर्भर करता है ,जैसे किसी खास समय किसी लग्न के लिए धन का लाभ एक मजदूर के लिए 50-100 रु का तथा एक बड़े व्यवसायी के लिए लाखों-करोड़ों का हो सकता है। लेकिन अधिकांश लोगों को अपने लग्न की जानकारी नहीं होती , वे पत्रिकाओं में निकलनेवाले राशिफल को देखकर भ्रमित होते रहते हैं।

अगला तर्क यह है कि किसी दुर्घटना में एक साथ सैकड़ों हजारो लोग मारे जाते हैं ,क्या सभी की कुंडली में ज्योतिषीय योग एक-सा होता है ? इस तर्क का यह उत्तर दिया जा सकता है कि ज्योतिष में अभी काफी कुछ शोध होना बाकी है , जिसके कारण किसी की मृत्यु की तिथि बतला पाना अभी संभव नहीं है ,पर दुर्घटनाग्रस्त होनेवालों के आश्रितों की जन्मकुंडली में कुछ कमजोरियॉ --संतान ,माता ,पिता ,भाई ,पति या पत्नी से संबंधित कष्ट अवश्य देखा गया है । किसी दुर्घटना में एक साथ इतने लोगों की मृत्यु प्रकृति की ही व्यवस्था हो सकती है वरना ड्राइवर या रेलवे कर्मचारी की गल्ती का खामियाजा उतने लोगों को क्यों भुगतना पड़ता है ,उन्हें मौत की सजा क्यों मिलती है, जो बड़े-बड़े अपराधियों को बड़े-बड़े दुष्कर्म करने के बावजूद नहीं दी जाती।

इसी तरह गणित की सुविधा के लिए किए गए आकाश के 12 काल्पनिक भागों के आधार पर भी ज्योतिष को गलत साबित करने की दलील दी जाती है। यदि इसे सही माना जाए तो आक्षांस और देशांतर रेखाओं पर आधारित भूगोल को भी गलत माना जा सकता है। आकाश के इन काल्पनिक 12 भागों की पहचान के लिए इनकें विस्तार में स्थित तारासमूहों के आधार पर किया जानेवाला नामकरण पर किया जानेवाला विवाद का भी कोई औचित्य नहीं हैं , क्योंकि आकाश के 360 डिग्री को 12 भागों में बॉट देने से अनंत तक की दूरी एक ही राशि में आ जाती है।

पूजा-पाठ या ग्रह की शांति से भाग्य को बदल दिए जाने की बात भी वैज्ञानिको के गले नहीं उतरती है। हमारे विचार से भी ऐसा कर पाना संभव नहीं है। किसी बालक के जन्म के समय की सभी ग्रहों सहित आकाशीय स्थिति के अनुसार जो जन्मकुंडली बनती है, उसके अनुसार उसके पूरे जीवन की रुपरेखा निश्चित हो जाती है , ऐसा हमने अपने अनुभव में पाया है। पूजा पाठ या ग्रह-शांति से भाग्य में बदलाव लाया जा सकता , तो इसका सर्वाधिक लाभ पंडित वर्ग के लोग ही उठाते और समाज के अन्य वर्गों की तरक्की में रुकावटें आती। लेकिन यह सत्य है कि पूजा-पाठ, यज्ञ-जाप, मंगला-मंगली, मुहूर्त्‍त आदि अवांछित तथ्यों एवं हस्‍तरेखा , हस्‍ताक्षर विज्ञान , तंत्र- , जादू-टोना, भूत-प्रेत, झाडफूंक , न्‍यूमरोलोजी , फेंगसुई, वास्तु, टैरो कार्ड, लाल किताब आदि ज्‍योतिष से इतर विधाओं के भी ज्‍योतिष में प्रवेश से ही ज्योतिष विज्ञान की तरक्की में बाधा पहुंची है।

ज्योतिष विज्ञान मूलत: संकेतों का विज्ञान है , यह बात न तो ज्योतिषियों को और न ही जनता को भूलनी चाहिए। किन्तु जनता ज्योतिषी को भगवान बनाकर तथा ज्योतिषी अपने भक्तों को बरगलाकर फलित ज्योतिष के विकास में बाधा पहुंचाते आ रहे हैं। हर विज्ञान में सफलता और असफलता साथ-साथ चलती है। मेडिकल साइंस को ही लें। हर समय एक-न-एक रोग डॉक्टर को रिसर्च करने को मजबूर करते हैं। किसी परिकल्पना को लेकर ही कार्य-कारण में संबंध स्थापित करने का प्रयास किया जाता है, पर सफलता पहले प्रयास में ही मिल जाती है, ऐसी बात नहीं है। अनेकानेक प्रयोग होते हैं , करोड़ों-अरबों खर्च किए जाते हैं, तब ही सफलता मिल पाती है ।

भूगर्भ-विज्ञान को ही लें, प्रारंभ में कुछ परिकल्पनाओं को लेकर ही कि यहॉ अमुक द्रब्य की खान हो सकती है , कार्य करवाया जाता था ,परंतु बहुत स्थानों पर असफलता हाथ आती थी। धीरे-धीरे इस विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है कि कसी भी जमीन के भूगर्भ का अध्ययन कम खर्च से ही सटीक किया जा सकता है। अंतरिक्ष में भेजने के लिए अरबों रुपए खर्च कर तैयार किए गए उपग्रह के नष्ट होने पर वैज्ञनिकों ने हार नहीं मानी। उनकी कमजोरियों पर ध्यान देकर उन्हें सुधारने का प्रयास किया गया तो अब सफलता मिल रही है। उपग्रह से प्राप्त चित्र के सापेक्ष की जानवाली मौसम की भविष्यवाणी नित्य-प्रतिदिन सुधार के क्रम में देखी जा रही है।

मानव जब-जब गल्ती करते हैं , नई-नई बातों को सीखते हैं ,तभी उनका पूरा विकास हो पाता है , परंतु ज्योतिष-शास्त्र के साथ तो बात ही उल्टी है , अधिकांश लोग तो इसे विज्ञान मानने को तैयार ही नहीं , सिर्फ खामियॉ ही गिनाते हैं और जो मानते हैं , वे अंधभक्त बने हुए हैं । यदि कोई ज्योतिषी सही भविष्यवाणी करे तो उसे प्रोत्साहन मिले न मिले ,उसके द्वारा की गयी एक भी गलत भविष्यवाणी का उसे व्यंग्यवाण सुनना पड़ता है। इसलिए अभी तक ज्योतिषी इस राह पर चलते आ रहें हैं , जहॉ चित्त भी उनकी और पट भी उनकी ही हो। यदि उसने किसी से कह दिया, `तुम्हे तो अमुक कष्ट होनेवाला है , पूजा करवा लो ,यदि उसने पूजा नहीं करवाई और कष्ट हो गया,तो ज्योतिषी की बात बिल्कुल सही। यदि पूजा करवा ली और कष्ट हो गया तो `पूजा नहीं करवाता तो पता नहीं क्या होता´ । यदि पूजा करवा ली और कष्ट नहीं हुआ तो `ज्योतिषीजी तो किल्कुल कष्ट को हरनेवाले हैं´ जैसे विचार मन में आते हैं। हर स्थिति में लाभ भले ही पंडित को हो , फलित ज्योतिष को जाने-अनजाने काफी धक्का पहुंचता आ रहा है।

किन्तु लाख व्यवधानों के बावजूद भी प्रकृति के हर चीज का विकास लगभग नियिचत होता है प्रकृति का यह नियम है कि जिस बीज को उसने पैदा किया , उसे उसकी आवश्यकता की वस्तु मिल ही जाएगी । देख-रेख नहीं होने के बावजूद प्रकृति की सारी वस्तुएं प्रकृति में विद्यमान रहती ही है। बालक जन्म लेने के बाद अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपनी मॉ पर निर्भर होता है। यदि मॉ न हों , तो पिता या परिवार के अन्य सदस्य उसका भरण-पोषण करते हैं। यदि कोई न हो , तो बालक कम उम्र में ही अपनी जवाबदेही उठाना सीख जाता है। एक पौधा भी अपने को बचाने के लिए कभी टेढ़ा हो जाता है , तो कभी झुक जाता है। लताएं मजबूत पेड़ों से लिपट कर अपनी रक्षा करती हैं ।

कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि सबकी रक्षा किसी न किसी तरह हो ही जाती है और ऐसा ही ज्योतिष शास्त्र के साथ हुआ। आज जब सभी सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाएं ज्योतिष विज्ञान के प्रति उपेक्षात्मक रवैया अपना रही है, सभी परंपरागत ज्योतिषी राहू , केतु और विंशोत्तरी के भ्रामक जाल में फंसकर अपने दिमाग का कोई सदुपयोग न कर पाने से तनावग्रस्त हैं , वहीं दूसरी ओर ज्योतिष विज्ञान का इस नए वैज्ञानिक युग के अनुरुप गत्यात्मक विकास हो चुका है। `गत्यात्मक ज्योतिषीय अनुसंधान केन्द्र´ द्वारा ग्रहों के गत्यात्मक और स्थैतिक शक्ति को निकालने के सूत्र की खोज के बाद आज ज्योतिष एक वस्तुपरक विज्ञान बन चुका है ।

जीवन में सभी ग्रहों के पड़नेवाले प्रभाव को ज्ञात करने के लिए दो वैज्ञानिक पद्धतियों `गत्यात्मक दशा पद्धति´ और `गत्यात्मक गोचर प्रणाली´ का विकास किया गया है , जिसके द्वारा जातक अपने पूरे जीवन के उतार-चढ़ाव का लेखाचित्र प्राप्त कर सकते हैं। इस दशा-पद्धति के अनुसार शरीर में स्थित सभी ग्रंथियों की तरह सभी ग्रह एक विशेष समय ही मानव को प्रभावित करते हैं। जन्म से 12 वर्ष तक की अवधि में मानव को प्रभावित करनेवाला मन का प्रतीक ग्रह चंद्रमा है , इसलिए ही बच्चे सिर्फ मन के अनुसार कार्य करतें हैं ,इसलिए अभिभावक भी खेल-खेल में ही उन्हें सारी बातें सिखलाते हैं। 12 वर्ष से 24 वर्ष तक के किशोरों को प्रभावित करनेवाला विद्या , बुद्धि और ज्ञान का प्रतीक ग्रह बुध होता है, इसलिए इस उम्र में बच्चों में सीखने की उत्सुकता और क्षमता काफी होती है। 24 वर्ष से 36 वर्ष तक के युवकों को प्रभावित करनेवाला शक्ति-साहस का प्रतीक ग्रह मंगल होता है, इसलिए इस उम्र में युवक अपने शक्ति का सर्वाधिक उपयोग करते हैं ।

36 वर्ष से 48 वर्ष की उम्र तक के प्रौढ़ों को प्रभावित करनेवाला युक्तियो का ग्रह शुक्र है , इसलिए इस उम्र में अपनी युक्ति-कला का सर्वाधिक उपयोग किया जाता है । 48 वर्ष से 60 वर्ष की उम्र के व्यक्ति को प्रभावित करनेवाला ग्रह समस्त सौरमंडल की उर्जा का स्रोत सूर्य है, इसलिए इस उम्र के लोगों पर अधिकाधिक जिम्मेदारियॉ होती हैं, बड़े-बड़े कार्यों के लिए उन्हें अपने तेज और धैर्य की परीक्षा देनी पड़ती है। 60 वर्ष से 72 वर्ष की उम्र को प्रभावित करनेवाला धर्म, न्याय का प्रतीक ग्रह बृहस्पति है, इसलिए यह समय सभी प्रकार के जवाबदेहियों से मुक्त होकर धार्मिक जीवन जीने का माना गया है। 72 वर्ष से 84 वर्ष तक की अतिवृद्धावस्था को प्रभावित करनेवाला सौरमंडल का दूरस्थ ग्रह शनि है। इसी प्रकार 84 से 96 तक यूरेनस , 96 से 108 तक नेपच्यून और 108 से 120 वषZ की उम्र तक प्लूटो का प्रभाव माना गया है।

इस दशा-पद्धति के अनुसार यदि पूर्णिमा के समय बच्चे का जन्म हो तो बचपन में स्वास्थ्य की मजबूती और प्यार-दुलार का वातावरण मिलने के कारण उनका मनोवैज्ञानिक विकास काफी अच्छा होता हैं। इसके विपरित, अमावस्या के समय जन्म लेनेवाले बच्चे में स्वास्थ्य या वातावरण की गड़बड़ी से मनोवैज्ञानिक विकास बाधित होते देखा गया है। बच्चे के जन्म के समय बुध ग्रह की स्थिति मजबूत हो तो विद्यार्थी जीवन में उन्हें बौद्धिक विकास के अच्छे अवसर मिलते हैं । विपरित स्थिति में बौद्धिक विकास में कठिनाई आती हैं। जन्म के समय मंगल मजबूत हो तो 24वर्ष से 36 वर्ष की उम्र तक मनोनुकूल माहौल प्रााप्त होता है। विपरीत स्थिति में जातक अपने को शक्तिहीन समझता है। जन्म के समय मजबूत शुक्र की स्थिति 36 वर्ष से 48 वर्ष की उम्र तक सारी जवाबदेहियों को सुचारुपूर्ण ढंग से अंजाम देती हैं, विपरीत स्थिति में , काम सुचारुपूर्ण ढंग से नहीं चल पाता है। इसी प्रकार मजबूत सूर्य 48 वर्ष से 60 वर्ष तक व्यक्ति के स्तर में काफी वृद्धि लाते हैं, किन्तु कमजोर सूर्य बड़ी असफलता प्रदान करते हैं। जन्मकाल का मजबूत बृहस्पति से व्यक्ति का अवकाश-प्राप्त के बाद का जीवन सुखद होता हैं।विपरीत स्थिति में अवकाश प्राप्‍त करने के बाद उनकी जवबदहेही खत्म नहीं हो पाती हैं। मजबूत शनि के कारण 72 वर्ष से 84 वर्ष तक के अतिवृद्ध की भी हिम्मत बनी हुई होती है, जबकि कमजोर शनि इस अवधि को बहुत कष्टप्रद बना देते हैं।इन ग्रहों का सर्वाधिक बुरा प्रभाव क्रमश: 6ठे, 18वें, 30वें, 42वें ,54वें, 66वें और 78वें वर्ष में देखा जा सकता है।

गत्यात्मक ज्योतिष की खोज के पश्चात् किसी व्यक्ति का भविष्य जानना असंभव तो नहीं , मुश्किल भी नहीं रह गया है , क्योंकि व्यक्ति के भविष्य को प्रभावित करने में बड़ा अंश विज्ञान के नियम का होता है , छोटा अंश ही सामाजिक , राजनीतिक , आर्थिक या पारिवारिक होता है या व्यक्ति खुद तय करता है। वास्तव में , हर कर्मयोगी आज यह मानते हैं कि कुछ कारकों पर आदमी का वश होता है , कुछ पर होकर भी नहीं होता और कुछ कुछ पर तो होता ही नहीं । व्यक्ति का एक छोटा निर्णय भी गहरे अंधे कुएं में गिरने या उंची छलांग लगाने के लिए काफी होता है। इतनी अनिश्चितता के मध्य भी अगर ज्योतिष भविष्य में झांकने की हिम्मत करता आया है तो वह उसका दुस्साहस नहीं , वरण् समय-समय पर किए गए रिसर्च के मजबूत आधार पर उसका खड़ा होना है।

24 टिप्‍पणियां:

परमजीत बाली ने कहा…

आप सभी को गाँधी जी शास्त्री जी व ईद की बहुत बहुत बधाई।

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

जन जन को सामने रखकर
लिखी गयी है यह पोस्‍ट
उत्‍तर मिला है इसमें
कई धारणाओं का बेस्‍ट

कई प्रचलित और चली आ रही
मान्‍यताओं का भी सटीक उत्‍तर
मिल जाता है इसमें इसलिए
सर्वथा उपयोगी है यह लेख।

प्रश्‍न भी उठाए गए हैं अनेक
बतलायें गये हैं रास्‍ते निदान के
अंधविश्‍वास और विज्ञान के
समन्‍वय से बहुत बारीकी से
सच्‍चाई को उकेरा गया है।

hindustani ने कहा…

aap bhoot aacha likh rahe hai.
dhanyavad jo aap ne mera blog pada.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

"फलित ज्योतिष विज्ञान है या अंधविश्वास , इस प्रश्न का उत्तर दे पाना समाज के किसी भी वर्ग के लिए आसान नहीं है।"

जयंत नार्लीकर जी ने तो इस प्रश्न का उत्तर खोजना आसान कर दिया है. अब यह ज्योतिषियों के ऊपर है कि वे क्या चुनते हैं.

BrijmohanShrivastava ने कहा…

आपका आदेश था कि पूरा लेख ध्यान से पढने की बाद ही टिप्पणी देंअब एक तो ध्यान और ऊपर से ज्योतिष दोनो ही मेरी प्रकृति की विपरीत /एकाध लाइन पढ़ कर वेरी गुड लिखने की प्रकृति नहीं -साहित्य की अलावा हर क्षेत्र में घुस कर टांग अडाना आदत नहीं /लेकिन फिर भी लेख दो बार पढ़ा उसका कारण है कि जो तर्क आपने दिए लगभग ऐसी ही शंकाए कई बार मुझे भी हुआ करती है मसलन एक साथ म्रत्यु बगैरा बगैरा /अम्रत पीते वक्त सर काट दिया एक राहू बन गया एक केतु /पूरे संसार को १२ भागों में बाँट दिया और सबका भबिष्य टी; करदिया /भविष्यवाणी में लिख दिया आप आज किसी से झगडा न करे / दोनो प्रत्याशियों को अलग अलग बता दिया आप जीतोगे =५० प्रतिशत भविष्य वाणी सफल /गणित भेदभाव नही करता /लेकिन कोई गिनती ही ग़लत सिखाये तो /यंत्र से धन लाभ वह भी ज्योतिष की आधार पर /विज्ञानं कोई गलत नहीं है सब एक दूसरे की पूरक हैं -विज्ञानं और ज्योतिष एक दूसरे की पूरक है दुश्मन नहीं -उन्हें दुश्मन हम बना रहे है

विद्यासागर महथा ने कहा…

स्मार्ट इंडियनजी ,
लगता है , आपने मेरे पूरे लेख को अच्छी तरह पढ़ा ही नहीं। नहीं तो आप ऐसी बातें नहीं लिखते। फिर भी मै आपको धन्यवाद देना चाहूंगा , क्योकि अपने कमेंट्स द्वारा आपने मेरे लिए एक और पोस्ट की सामग्री तैयार कर दी है । मै आपसे मात्र इतना ही पूछना चाहूंग कि क्या जबतक विभिन्न प्रकार के ब्लडटेस्ट नहीं आरंभ हुए थे और अलग अलग बीमारियों के मरीजों को अलग करना मुश्किल था , तो क्या उस समय एलोपैथी विज्ञान नहीं था। बिना किसी सरकारी , गैर सरकारी या व्यक्तिगत सहयोग के लाखों वर्ष पुराने ज्योतिष को हम हूबहू उसी रूप में ढोने को बाध्य हैं और उम्मीद लगाते हो कि शत.प्रतिशत परिणाम मिले आपलोगों को। अरे ,आज ज्योतिष की जो स्थिति है , उसे देखते हुए कोई जन्मविवरण देकर एक ज्यैतिषी से पूछा जाए कि वह क्या क्या बता सकता है । हमारे पुराने लेखों को भी आप अवश्य पढ़ें , ग्रह सबसे अधिक मन और मस्तिष्क को ही प्रभावित करते हैं। संक्षेप में जिसकी FEELING नहीं होगी , उसपर ग्रह का कोई प्रभाव नहीं पड़ता , यानि वह जानवर के समान होता है और उसे हम ज्यैतिष की सहायता से नहीं देख सकते। मेरे पास जितने भी लेग इस तरह की समस्या से ग्रसित होकर आए , सबसे मै बच्चे की नहीं , माता पिता की जन्मपत्री मांगतk हूं , ताकि उनकी पत्री देखकर बताया जा सके कि उनके बच्चे डाक्टर की दवा से ठीक होंगे या नहीं ?

''ANYONAASTI '' ने कहा…

संगीताजी इतने सारगर्भित लेख के लिए हार्दिक बधाई और धन्यवाद | बहुत समय बाद , प्राचीन प्राकृतिक विज्ञान के सन्दर्भ में किसी का सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ तथ्यों से परिपूर्ण लेख देखने-पढ़ने का अवसर मिला | मैं कल साठ प्रतिशत वाली बात पढ़ कर anuja 916 पर गया था ,उनका कक्षा दस से बारहवी के बच्चों द्वारा लिखित निबंध स्तरका लेख 'ज्योतिष न वियान है न कला ' एवं आप की टिप्पणी पढ़
पुनः आप के यहाँ आया हूँ | अभी पूरी आर्काईव नही देख सका हूँ \फिरभी अनुरोध है की यदि गत्यात्मक ज्योतिष्य के बारे में उस में नाहो तो कुछ उस पर प्रकाश छोडें आभारी रहूगा |वैसे 1972 से 1974 के मध्य मेरे 'अंक ज्योतिष्य ' पर मेरे लेख भी आए हैं आप अपने एक विषय से सम्बंधित लेख आपस में टैग क्यों नही कर देतीं ढूढ़ना आसान हो जायेगा |सादर कालचक्र पर आमंत्रितहैं वहाँ से चौपाल एवं कबीरा पर जाने का साधन मिल जायेगा |
ब्लागस्ते

शिवराज गूजर. ने कहा…

achhi jankari ke liye badhai.

masoom film company ने कहा…

apa abhari hoon. utsahvardhan hetu koti-koti dhanyawad.

आदर्श राठौर ने कहा…

कुछ लंबी पोस्ट थी
लेकिन ज्ञानप्रद है

adil farsi ने कहा…

संगीता पुरी जी धन्यवाद मेरे बलाग को देखने के लिये । आप के बलाग में ज्योतिष संबँधी बहुत महत्वपूणॅ रोचक जानकारी है..बधाई

aaj ki Aawaaz ने कहा…

आपका विस्तृत लेख पढ़ा !
लगता है काफी सोच विचार के उपरांत लिखा है आपने !
आपने कभी ओशो को पढ़ा है ?
ओशो में ये क्षमता थी कि एक दिन अपने आकर्षक व तर्कपूर्ण बातों से किसी चीज को सही सिद्ध कर देंगे तो अगले ही दिन उससे भी ज्यादा धारदार तर्कों से उसी चीज को ग़लत सिद्ध कर देंगे ! आप दोनों ही बार उनकी बातों के कायल हो जायेंगे !
देखिये मैं स्पष्ट कर दूँ कि मै इन सब चीजों पर जरा भी यकीन नही करता ! मेरी नजर में ये ज्योतिष, तंत्र-मंत्र, जादू-टोना, भूत-प्रेत, फेंगसुई, वास्तु, टैरो कार्ड, लाल किताब, .......वगैरह-वगैरह सब बकवास की चीजें हैं .....महज मनोविज्ञान और अटकल या तुक्केबाजी से ज्यादा कुछ नही है ! मेरे पास एक संग्रह भी है - अखबार तथा पत्रिकाओं की कतरनों का ! ये वो कतरनें हैं जिसमे देश के तथाकथित नामी-गरामी ज्योतिषों द्बारा समय-समय पर की भविष्यवाणियाँ हैं जो पूरी तरह ग़लत साबित हुयीं !
मै स्वयं भी पिछले २५ सालों से अनगिनत ज्योतिषों से मिल चुका हूँ लेकिन उनमे से एक भी मेरी कसौटी पर तनिक भी खरा नही उतरा ! मै खुली चुनौती देता हूँ इन ज्योतिषों और तंत्र-मंत्र के पंडितों को कि वे मेरे समक्ष स्वयं को सिद्ध करें ! लेकिन मै भली भांति जानता हूँ कि कोई भी सामने नही आएगा !
कुछ साल पहले की बात है यहाँ लखनऊ में हिन्दी संस्थान के प्रेमचंद सभागार में "अखिल भारतीय ज्योतिष सम्मलेन" चल रहा था ! देश के एक से एक सुप्रसिद्ध ज्योतिषगण पधारे हुए थे, उनमे से अनेकानेक ऐसे थे जिनकी भविष्यवाणियां थे पत्र-पत्रिकाओं में छपती रहती हैं ! संयोग से ये वो दिन था जिस दिन माननीय अटल बिहारी वाजपेयी जी को संसद में अपना बहुमत सिद्ध करना था ! सभी ज्योतिषाचार्यों ने एक स्वर में घोषणा की थी कि अटल जी पूर्ण बहुमत साबित कर लेंगे ! लेकिन हाय ...... ये क्या हुआ ??? ज्योतिष सम्मलेन चल रहा था कि ख़बर आ गई कि अटल जी की सरकार विश्वास मत में हार गई और १३ दिन पुरानी सरकार चली गई ! उस वक्त सभी ज्योतिषाचार्यों की शक्ल देखने लायक थी !
दरअसल इन ज्योतिषों की दुकानदारी व्यवहारिक ज्ञान + सामजिक ज्ञान + मनोविज्ञान + अटकलबाजी के मिश्रण से चलती है ! एक तरफ़ तो ये पंडित बार - बार हुंकार भरते हैं - "होई वही जो राम रूचि राखा" ...... सारे धर्म ग्रन्थ ये कहते हैं कि "ईश्वर की मर्जी के बिना एक पत्ता भी नही हिलता " ....... जब सब कुछ पहले से तय है तो फिर इन रत्न, ताबीज़, या रुद्राक्ष धारण करने से ब्रह्मा जी दोबारा भाग्य लिखने बैठ जाते हैं ?
अच्छा ये सब बातें छोड़िये.......... बहुत लंबा विषय है........... कभी लखनऊ में आईये तो आमने सामने बातें होंगी ! मै सिर्फ एक बहुत छोटी सी बात आपसे पूछता हूँ ..." क्या आपने अपनी जिंदगी में एक भी लड़की की कुंडली ऐसी देखी है जिसमे ये लिखा हो कि लड़की की शादी नही होगी ?" मेरा दावा है आपने क्या किसी ने भी ऐसी कुण्डली नही देखी होगी ! ऐसा क्यूँ ??? जब की समाज में ऐसी सैकड़ों लड़कियां हैं जिनकी शादियाँ किसी कारणवश नही हो पातीं ! बस ज्यादा से ज्यादा कुंडली में इतना लिखा होता है कि विवाह में अड़चन आयेगी.......थोड़ी रुकावट है .......शादी देर में है.... जैसी गोल-मोल बातें ! इसका कारण सिर्फ इतना है चूंकि भारतीय समाज में एक लड़की की शादी बेहद अनिवार्य जैसा मामला है.....और बाल्यावस्था में ही इस तरह की भविष्यवाणी करना ज्योतिष की दुकान चलाने के लिए अत्यधिक जोखिम भरा कथन हो सकता है अतः कुछ ऐसा लिखो कि चित भी मेरी , पट भी मेरी ... अंगूठा मेरे बाप का !
ऐसी ही न जाने कितनी बातें हैं मेरे दूषित मस्तिष्क में ................. उनमे से कई बातों की चर्चा आपने अपने लेख में करके उस पर लीपा पोती करने की असफल कोशिश की है !

अगर आप अनुमति दें तो अगले पत्र में आप द्वारा उठाये गए बिन्दुवार सभी तथ्यों पर मै कुछ और भी प्रकाश डालना चाहूँगा !

संगीता पुरी ने कहा…

परमजीत बाली जी , अविनाश वाचस्‍पति जी , हिन्‍दुस्‍तानी जी ,स्‍मार्ट इंडियन जी ,ब़जमोहन श्रीवास्‍तव जी ,अन्‍योनास्ति जी ,शिवराज गूजर जी , आदर्श राठौर जी , अदिल फारसी , मासूम फिल्‍म कम्‍पनी , आज की आवाज , आप सभी ने मेरे इतने लम्‍बे आलेख को इतने ध्‍यान से पढ्ा और टिप्‍पणियां की , इसके लिए बहुत बहुत धन्‍यवाद
मेरा आज की आवाज से कहना है कि
आप मुझे जितना चाहें ,पत्र लिख सकते हैं , मै आपके सभी प्‍वाइंटस को समझकर तदनुरूप जवाब देने की कोशिश करूंगा , मै परंपरागत ज्‍योतिष की बात कर ही नहीं रहा , इसमें अभी भी बहुत खामियां हैं , पर मैनें चालीस वर्षों के रिसर्च के बाद ज्‍योतिष्‍ा की सभी कमजोरियों कोदूर करने का प्रयास कर रहा हूं एक आलेख http://sangeetapuri.blogspot.com/2008/10/blog-post_23.html को भी पढे और बताएं क्‍या भविष्‍यवाणी का सही होना मात्र संयोग है मैने ज्‍योतिष्‍ा को विज्ञान बना दिया है और एक सीमा के अंदर चुनौती स्‍वीकार करने के लिए तैयार हूं सीमा इसलिए क्‍योंकि इस विज्ञान में अभी तक इतना खर्च नहीं किया गया कि इसे पूर्ण विकसीत बना पाने में हम सक्षम हो सके बेहतर यही होगा कि आप अपना जन्‍मवविरण्‍ा मेरे पास भेज दें

moomal ने कहा…

अधिकांश हल्की-फ़ुल्की ब्लॉग दुनिया में आप के ब्लॉग का गंभीर विषय और उससे भी अधिक गंभीर लेखन अभिनंदनीय है। किसी भी प्रकाशन को ईमानदारी से नही पढ़ा है, इसलिए लेख पर कोई टिपण्णी अभी नहीं.

सुलभ [Sulabh] ने कहा…

हिंदी ब्लोगेर्स को होली की शुभकामनाएं और साथ में होली और हास्य
धन्यवाद.

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

आपका विस्तृत लेख पढा । इस विषय पर शोध क्यूं नही हो रहा । सरकार क्या इसके लिये बिलकुल अनुदान नही देती । रामदेव बाबा के पातंजली योग संस्थान की तरह एक संस्थान ज्योतिष का भी बनना चाहिये पर उसके पहले बाबा की तरह ही लोगों को प्रमाण देने होंगे ।

देवांशु वत्स ने कहा…

Yah to vastav me shodh ka vishay hai ! Ishe vijnan ya andhvishvas siddh karna Tedhi kheer hai....!

दिलीप कवठेकर ने कहा…

बहुत दिनों बाद इतना सार गर्भित लेख पढ पाया. सभी तर्कों पर जो भी विचार रखे गये है, और उसका समाधान किया गया है, इसके कारण यह लेख संजो कर रखने लायक हो गया है. मेरे ज्योतिष मित्रों के सामने ये तथ्य रखे जा सकते हैं ताकि उनकी सोच में भी इसका प्रभाव पडे.

दिलीप कवठेकर ने कहा…

राहु केतु के बारे में पहली बार पढा.

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

bahut hi behatreen vyakhya hai ji .. padhkar bahut si jaankari mili ..

aabhar

vijay

pls read my new poem "झील" on my poem blog " http://poemsofvijay.blogspot.com

prakash ने कहा…

well it is really knowledgeble for our routine life ,in fact i believe on planets and its changeing phenomena and impacts ,but sometime feels very tough to understand ,any how i got some thing new in your blog ,thanks

Manish ने कहा…

Adbhut very nice all articles..

dinesh pandey ने कहा…

महोदया,पूरी पोस्ट पढ़ने के बाद मैं यह नहीं समझ परः हूँ की हम अपनी जन्मा पटरी ज्योतिषी को दिखाएँ या नहीं.जन्मपत्री विवेचन हमारे लिए किस तरह लाभकारी रहेगा.यदि भ्रांतियों व ज्योतिष विवेचन में त्रुतिओं की संभावना का प्रतिशत इतना अधिक है और यदि अशुभ ग्रहों व दशाओं का कोई उपचार नहीं है तो जन्मपत्री ज्योतिषी को दिखने का क्या लाभ?कृपया शंका का निवारण करने का कष्ट करें.

Badal ने कहा…

जो ज्ञान क्रमबद्ध हो उसे बिज्ञान कहते है।
आप द्वारा बताए जा रहे जयोतिष की क्रमबद्धता तो उथल पुथल हुई पड़ी जान पड़ती है। हम हिंदोस्तानीओं का क्या हो सकता है,जब हम बड़े लोग ही आने वाली पीढ़ी को बिचारशून्य करने पर अड़े हुए हों।
मेरी दादी की दी हुई पुरानी घड़ी मुझे बहुत प्रिय है,मैं उसे हरगिज नहीं खो सकता, लेकिन समय देखने के लिए उस का प्रयोग मेरे लिए कहां तक हितकर होगा? क्या आप इतना नहीं समझ सकते?