मंगलवार, 9 सितंबर 2008

ग्रह शक्ति का रहस्य

भविष्य की सटीक जानकारी के लिए एकमात्र विधा फलित ज्योतिष

निस्संदेह फलित ज्योतिष वैदिक कालीन सबसे पुरानी विधा है। जिस समय कल्प , व्याकरण , छन्द , निरुक्त आदि महज कुछ ही विधा थी , फलित ज्योतिष को वेदों का नेत्र कहा जाता था। आज सभी विश्वविद्यालयों में हजारों विषयों का प्रवेश हो चुका है , अन्य विषयों की तरह गणित ज्योतिष की खगोल विज्ञान के रुप में पढ़ाई हो रही है , किन्तु फलित ज्योतिष को विश्वविद्यालय के बाहर कर दिया गया है। तर्क यह दिया जा रहा है कि करोड़ों मील दूर रहकर ग्रह पृथ्वी के जड़-चेतन को कैसे प्रभावित कर सकता है ? अगर वह प्रभावित करे भी , तो एक ही ग्रह करोड़ो व्यक्तियों पर अपना भिन्न-भिन्न प्रभाव कैसे प्रस्तुत कर सकता है ? ज्योतिषी इसे विज्ञान कहते हैं , कुछ लोग शास्त्र , तो कुछ अवैज्ञानिक कहकर इसपर भरोसा नहीं करने की सलाह देते हैं। कुछ लोगों को इस विधा से आक्रोश या चिढ़ इस बात से है कि यह लोगों को भाग्यवादी बनाता है और यथास्थितिवाद और अकर्मण्यता को बढ़ावा देता है।

फलित ज्योतिष के पक्षधरों के अनुसार आत्मज्ञान के लिए ज्योतिष ज्ञान से बड़ा संसाधन और कुछ हो ही नहीं सकता। सभी विधाएं भूतकाल और वर्तमान काल की जानकारी दे सकती है , भविष्य की सटीक जानकारी के लिए एकमात्र विधा फलित ज्योतिष ही है । पक्ष-विपक्ष में बहुत सारी बातें हो सकती हैं , किन्तु विश्व के किसी भी विश्वविद्यालय में इसे समुचित स्थान नहीं मिलने से इसका पलड़ा कमजोर पड़ गया है। प्रगतिशील विचारधारा के लोग , जो अपने को आधुनिक समझते हैं , इसे अंधविश्वास कहने से भी नहीं चूकते। दूसरी ओर यह जानते हुए भी कि एक रािश के अंदर पृथ्वी के पचास करोड़़ लोग आते हैं , मामूली रािशफल को पढ़ने के लिए पचास प्रतिशत आबादी बेचैन रहती है। फिर वे इसे बकवास या मनोरंजन का साधन बताते हैं। आखिर ऐसी कौन सी कमजोरी है , जो फलित ज्योतिष को विश्वसनीय बनायी हुई है ?

भौतिक विज्ञान में विभिन्न प्रकार की शक्तियों का उल्लेख है। हर प्रकार की शक्ति की माप के लिए वैज्ञानिक सूत्र या शक्तिमापक इकाई है। शक्ति की माप के लिए एक संयंत्र या उपकरण है , ताकि शक्ति के स्वरुप या तीव्रता का आकलन स्पष्ट तौर पर किया जा सके। स्पीडोमीटर से बस ,ट्रेन या यान की गति का स्पष्ट बोध हो जाता है। थर्मामीटर से ताप , बैरोमीटर से हवा का दवाब , अल्टीमीटर से उड़ान के समय वायुयान की ऊंचाई ,ऑडियोमीटर से ध्वनि की तीव्रता के बारे में कहा जा सकता है। बड़ी मात्रा की विद्युत-धारा को मापने के लिए इलेक्ट्रोमीटर तथा छोटी को मापने के लिए गैल्वेनोमीटर का व्यवहार किया जाता है। लैक्टोमीटर दूध की शुद्धता को मापता है तथा रेनगेज किसी विशेष स्थान में हुई वषाZ की मात्रा की सूचना देता है। स्टॉप वाच से सूक्ष्म अवधि को रिकार्ड किया जा सकता है। उपरोक्त सभी प्रकार के वैज्ञानिक प्रकरण या संयंत्रों का निर्माण वैज्ञानिक सूत्रों पर आधारित हैं। अत: ये नििश्चत
सूचना प्रदान करने में सक्षम हैं। इनसे प्राप्त होनेवाली सभी जानकारियॉ वैज्ञानिक और विश्वसनीय हैं।

लेकिन यदि हम फलित ज्योतिष के विद्वानों से पूछा जाए कि हम ग्रह की किस शक्ति से प्रभावित हैं तथा हमारे पास उस शक्ति की तीव्रता को मापने का कौन सा वैज्ञानिक सूत्र या उपकरण है , तो इन प्रश्नों का समुचित उत्तर देना काफी कठिन होगा। पर यह सच है कि हम जबतक इन प्रश्नों के उत्तर नहीं दे सकेंगे , फलित-ज्योतिष का अनुमान का विषय मानने की बाध्यता जनसमुदाय में बनी ही रहेगी। भैतिक विज्ञान में वणिZत सभी शक्तियॉ अनुभव में भिन्न-भिन्न प्रकार की हो सकती हैं , वस्तुत: उनके मूल स्वरुप में कोई भिन्नता नहीं होती। हर घर में विद्युत-आपूर्ति हो रही है , वही विद्युत बल्ब में प्रकाश , हीटर में ताप , पंखे में गति , टेपरिकॉर्डर या स्टीरियो में संगीत का रुप धारण करता है। इस प्रकार भौतिक विज्ञान में गति , ताप , प्रकाश , चुम्बक , विद्युत घ्वनि आदि शक्ति के विभिन्न स्वरुप हैं , जिन्हे एक-से दूसरे में आसानी से परिवर्तित किया जा सकता है। संयोग से फलित-ज्योतिष के अनुसार भी आकाशीय पिंडों की जिस शक्ति से हम प्रभावित होते हैं , वे सारी शक्तियॉ भौतिक विज्ञान में वणिZत शक्तियॉ ही हैं।

सूर्य के प्रकाश और ताप को तथा चंद्रमा के प्रकाश को पृथ्वीवासी घटते-बढ़ते क्रम में महसूस करते ही हैं । सूर्य के कारण ऋतु-परिवर्तन का होना तथा दिन-रात का होना सबको मान्य है। अमावश और पूणिZमा का प्रभाव समुद्र में भी देखा जाता आ रहा है। पूणिZमा के दिन आत्महत्या या पागलपन की प्रवृत्तियों में वृिद्ध को भी लोगों ने महसूस किया है। किन्तु जब शेष ग्रहों के प्रभाव को सिद्ध करने की बारी आती है , तो ज्योतिषी प्रत्यक्ष तौर पर प्रमाण जुटा पाने में असमर्थ दिखाई देते हैं। यही बात वैज्ञानिकों , बुिद्धजीवी वर्ग के लोगों और आम लोगों के ज्योतिष पर अविश्वास करने का कारण बन जाता है। लेकिन अब वैसी बात नहीं रह गयी है , क्योंकि मुझे सभी ग्रहों के गतिज और स्थैतिज ऊर्जा के गणना की जानकारी हो चुकी है , जिससे ये पृथ्वीवासी को प्रभावित करते आ रहे हैं।

सभी ग्रह गतिशील हैं , पृथ्वी भी गतिशील है। सभी सूर्य की परिक्रमा कर रहे हैं। अत: कोई भी ग्रह कभी पृथ्वी से काफी निकट , तो कभी काफी दूरी पर चला जाता है। पृथ्वी से ग्रहों की दूरी के घटने-बढ़ने के कारण पृथ्वी के सापेक्ष उसकी गति में भी निरंतर बदलाव होता रहता है। कोई ग्रह पृथ्वी से बहुत अधिक दूरी पर हो , तो वह अधिक गतिशील होता है। पुन: वही ग्रह पृथ्वी के जितना अधिक निकट होता है , उतना ही विपरीत गति में होता है। पृथ्वी से ग्रहों की दूरी में जबर्दस्त परिवर्तन हो , तो ग्रह की गति में भी आमूल-चूल परिवर्तन हो जाता है। अधिक गतिशील और विपरीत गति के एक ही ग्रह के जातक उस ग्रह के काल में बहुत ही आक्रामक तो दूसरा बहुत ही दैन्य परिस्थितियों से संयुक्त होता है। संक्षेप में पृथ्वी से ग्रह की दूरी के बदलने से गति में बदलाव आता है और गति के बदलने से विद्युत-चुम्बकीय परिवेश में स्वत: ही बदलाव आता है।

एक साधारण उदाहरण से इस असाधारण तथ्य को समझने की चेष्टा की जा सकती है। सूर्य से मंगल की दूरी 22.7 करोड़ किलोमीटर है और पृथ्वी से सूर्य की दूरी 15 करोड़ किलोमीटर। पृथ्वी और मंगल दोनो ही सूर्य की परिक्रमा करते हैं। जब सूर्य के एक ही ओर पृथ्वी और मंगल दोनों होते हैं , तो दोनों के बीच की दूरी 22.7–15 = 7.7 करोड़ किलोमीटर होती है। किन्तु जब सूर्य पृथ्वी और मंगल के बीच हो अथाZत् सूर्य के एक ओर पृथ्वी तथा दूसरी ओर मंगल हो , तो पृथ्वी से मंगल की दूरी बढ़ जाती है और यह दूरी 22.7+15=37.7 करोड़ किलोमीटर हो जाती है। इस तरह पृथ्वी से मंगल की न्यूनतम और अधिकतम दूरी का अनुपात 1:5 हो जाता है। पहली अवस्था में मंगल अत्यधिक वक्र गति में , तो दूसरी अवस्था में अत्यधिक गतिशील मार्गी गति में होता है। मंगल की तरह ही कोई भी ग्रह पृथ्वी से अधिकतम नजदीक होने पर अधिकतम वक्र गति में तथा अधिकतम दूरी पर स्थित होने पर अतिशीघ्री मार्गी गति में होगा। गति में बदलाव होते रहने से पृथ्वी के परिवेश में ग्रहों के विद्युतचुम्बकीय क्षेत्र और इसकी तीव्रता में बदलाव आता रहता है।

जैसा कि मैंने पहले ही कहा है , सभी प्रकार की शक्तियॉ मूल रुप से एक ही हैं अत: ग्रहों के अधिक दूरी पर होने या अधिक नजदीक होने पर भिन्न-भिन्न प्रकार की शक्ति तरंगों की उत्पत्ति होती है , उसका वैज्ञानिक नामकरण जैसे भी किया जाए। पृथ्वी से अधिक दूरी पर रहनेवाला ग्रह अधिक गतिशील होता है , अत: इस प्रकार के ग्रह में गतिज उर्जा अधिक होती है। पुन: पृथ्वी के अधिक निकट रहनेवाला ग्रह वक्र गति में होता है , अत: वह ऋणात्मक गतिज उर्जा से संयुक्त होता है। किन्तु पृथ्वी से औसत दूरी पर रहनेवाले ग्रह औसत गर्ति में होते हैं। इनमें गतिज उर्जा की कमी तथा स्थैतिज ऊर्जा की अधिकता होती है। कोई भी ग्रह वक्री या मार्गी तिथि के आसपास शत-प्रतिशत स्थैतिज ऊर्जा से संयुक्त होता है।

गतिज उर्जा के ग्रहों से संयुक्त जातक उस ग्रह के काल में सहज-सुखद परिस्थितियों के बीच से गुजरता है उस समय उनमें किसी प्रकार की जवाबदेही नहीं होती , परिवेश उसे भाग्यवान सिद्ध कर देता है। इस प्रकार के जातक सिर्फ अधिकार को समझते हैं , कर्तब्य से उन्हें कोई मतलब नहीं होता। ऋणात्मक गतिज उर्जा वाले ग्रहों से संयुक्त जातक उस ग्रह के काल में विपरीत कठिन परिस्थितियों के बीच से गुजरते हैं , ग्रहों से संबंधित भावों की जवाबदेही में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं होती , परिवेश से ही दैन्य होते हैं , हर समय किंकर्तब्यविमूढ़ता की स्थिति होती है। किन्तु स्थैतिक उर्जा से संयुक्त जातक निरंतर काम करने में विश्वास रखते हैं , फल की चिन्ता कभी नहीं करतें , समन्वयवादी होते हैं , अपने सुख आराम की चिन्ता कभी नहीं करतें , दृिष्टकोण में व्यापकता और विराटता होती है।

उपरोक्त विवेचना से यह स्पष्ट हो जाता है कि भौतिक विज्ञान में उिल्लखित सभी प्रकार की शक्तियॉ ही वस्तुत: ग्रहों की शक्तियॉ हैं। किन्तु जिस समय फलित ज्योतिष विकसित हो रहा था , उस समय भौतिक विज्ञान में ऊर्जा से संबंधित सिद्धांतों का विकास नहीं हो पाया था। अत: फलित ज्योतिष को विकसित करनेवाले चिन्तक , ऋषि ,महर्षि , ग्रहों की शक्ति को उसकी विभिन्न स्थितियों में ढंूढ़ने की चेष्टा कर रहें थे। ग्रहों की शक्ति को समझने के लिए आज तक भौतिक विज्ञान के नियमों का इस्तेमाल नहीं किया जा सका , अत: फलित ज्योतिष अभी तक अनुमान का विषय बना हुआ है।

मुझे यह सूचित करते हुए हषZ हो रहा है कि ग्रहबल को समझने की इस वैज्ञानिक विधि की सूझ अकस्मात् कुछ घटनाओं के अवलोकन के पश्चात् सन् 1981 में मेरे मस्तिश्क में कौंधी और सन् 1987 तक विभिन्न ग्रहों के विभिन्न प्रकार की शक्तियों को समझने की चेष्टा करता रहा। इसके पूर्व एक नई गत्यात्मक दशा पद्धति, जिसकी बुनियाद सन् 1975 में रखी गयी थी , में ग्रहशक्ति की तीव्रता को इसमें सिम्मलित कर देनें से पूर्णता आ गयी। किसी भी व्यक्ति के जीवन की सफलता-असफलता , सुख-दुख , बढ़ते-घटते मनोबल तथा व्यक्ति के स्तर को लेखाचित्र में जीवन के विभिन्न भागों में अनायास दिखाया जाना संभव हो सका। इस पद्धति से किसी विशेष उम्र में जातक की मन:स्थिति , उसके कार्यक्र्र्र्रम और उसके समस्त परिवेश को आसानी से समझा जाना भी संभव हो सका।

लेख के आरंभ में मैनें ग्रहशक्ति को मापने के लिए एक संयंत्र या उपकरण की आवश्यकता की चर्चा की थी , इसके लिए मुझे बहुत अधिक भटकना नहीं पड़ा। संपूर्ण ब्रह्मांड की बनावट अपने आपमें परिपूर्ण है। ग्रहों की शक्ति को निधािZरत करने का यंत्र भी मुझे यहीं दिखाई पड़ा। मैनें देखा कि जब सूर्य चंद्र अमावश के दिन युति कर रहे होते हैं , चंद्रमा के पूर्ण अप्रकािशत भाग को ही हम देख पाते हैं , मतलब चंद्रमा नहीं दिखाई पड़ता है। जब सूर्य चंद्रमा परस्पर 30 डिग्री का कोण बनाते हैं , उसके छठे भाग को ही हम प्रकािशत देख पाते हैं। जब सूर्य-चंद्र परस्पर 90 डिग्री का कोण बनाते हैंं , तब चंद्रमा का आधा भाग प्रकाशमान होता है। जब दोनो 180 डिग्री का कोण बनाते हेैं , उसका शत-प्रतिशत भाग ही प्रकाशमान हो जाता है। इस तरह सूर्य से चंद्रमा की दूरी जैसे-जैसे बढ़ती है , उसका प्रकाशमान भाग भी उसी अनुपात में बढ़ता जाता है। ठीक इसके विपरीत मैंने पाया कि मंगल , बृहस्पति , शनि , यूरेनस , नेप्च्यून और प्लूटो सूर्य से युति कर रहे होते हैं , तो उनकी गति सबसे अधिक होती है , जबकि ये सूर्य से 180 डिग्री की दूरी पर हो तो सर्वाधिक वक्र गति में होते हैं।

इस तरह इन ग्रहों की गतिज उर्जा , सूर्य से कोणिक दूरी बढ़ने पर कम होती चली जाती है। निष्कषZ यह निकला कि चंद्रमा के प्रकाश से उसकी शक्ति की जानकारी प्राप्त करना हो या अन्य ग्रहों की गतिज ऊर्जा को निकालना हो , उस ग्रह की सूर्य से कोणिक दूरी को निकालने की आवश्यकता पड़ेगी। इसी कोणिक दूरी के अनुपाती या व्युत्क्रमानुपाती ग्रह की शक्ति होगी। सभी ग्रहों की गतिज और स्थैतिज ऊर्जा को निकालने के लिए सूत्रों की खोज की जा चुकी है। सूर्य से ग्रहों की कोणिक दूरी को जानने के लिए किसी उपकरण की कोई आवश्यकता नहीं है। पंचांग में वणिZत ग्रहों के अंश को ही जान लेना काफी होगा , इसकी जानकारी के बाद गतिज ऊर्जा और स्थैतिज ऊर्जा को सूत्र के द्वारा निकाला जा सकेगा।
बंदूक की गोली में शक्ति है , इसे हर कोई महसूस करता है।

बंदूक की गोली काफी छोटी होती है , गतिरहित होने पर इसमें किसी प्रकार की शक्ति का बोध नहीं होता , किन्तु अत्यधिक गतिशीलता के कारण ही गोली की मारक क्षमता बढ़ जाती है। हथेली पर पत्थर का टुकड़ा रखकर कोई भी व्यक्ति अपने को शक्तिशाली समझता है , क्योकि उसे मालूम है कि पत्थर को गति देकर उसे शक्तिशाली बनाया जा सकता है। इस प्रकार किसी भी पिंड में गति का महत्व तो अनायास समझ में आता है , किन्तु ग्रहों के भीमकाय पिंड में अप्रत्यािशत रुप से अत्यधिक गति होने के बावजूद ग्रहों की शक्ति को अन्यत्र ढूंढ़ने की कोिशश की जाती रही है। जिस पृथ्वी का व्यास आठ हजार मील है , जिसकी परिधि 25 हजार मील है , जिसका वजन 5.882´1021 टन है , लगभग एक मिनट में हजार मील की रतार से परिभ्रमण-पथ पर आगे बढ़ रही है , की तुलना में बृहस्पति कई गुणा बड़ा है , इसकी रफतार प्रति मिनट लगभग 500 मील है । इनकी तेज गति की तुलना लाखों हाडाªेजन बम या अणुबम से की जा सकती है। इस प्रकार की विराट शक्ति से विद्युत-चुम्बकीय शक्ति तरंगों से पृथ्वीवासी प्रभावित होते हैं।ग्रहों की स्थैतिज ऊर्जा और गतिज ऊर्जा का प्रभाव किसी भी व्यक्ति पर भिन्न-भिन्न प्रकार से पड़ता है। हजारों प्रकार की कुंडलियों में ग्रहों के इस भिन्न प्रभाव को मैं महसूस करता हंू। सभी गह गति-नियमों के आधार पर ही अपना फल प्रस्तुत करते हैं , गति ही इनकी शक्ति हैं।

किसी भी व्यक्ति के जन्मकाल में सभी ग्रहों की गति और स्थिति भिन्न-भिन्न तरह की होती हें तथा उसके लग्न से सूर्य की कोणिक दूरी उस समय के जातक को विश्व के सभी मनुष्यों से भिन्न बनाती है। विश्व को देखने का उसका नजरिया भिन्न होता है। वह एक भिन्न बीज की तरह हो जाता है। हर व्यक्ति बदले हुए कोण से ब्रह्म की प्रतिछाया या प्रतीक है। ग्रह इस शरीर में ब्रह्म में ग्रंथि के रुप में होते हैं। वे समय-समय पर अपना फल प्रस्तुत करते हैं।

4 टिप्‍पणियां:

MANVINDER BHIMBER ने कहा…

बहुत अच्छा लिखा है . भाव भी बहुत सुंदर है. पर्याप्त जानकारी भी है. जारी रखें

DR.MANISH KUMAR MISHRA ने कहा…

aap ka lekh padh kar lagta hai ki aap kay jotish gyaan ka laabh humay lena chahiyay .aasha hai aap inkaar nahi karengi .

Rajat Narula ने कहा…

Its been great to see such a detailed knowledge about the subject of your interest...

I love the creation ने कहा…

bhiya mere chandrma grah nahi upgrah hai aur soorya grah nahi tara hai to kaise maane ki ye jyotish ki ganna jo aap log in graho ke adhar par karte ho vo theek hai