शनिवार, 9 अगस्त 2008

ज्योतिषियों के लिए चुनौती भरे कुछ प्रश्न

ज्योतिषियों के समक्ष निम्नांकित प्रश्न पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से चुनौतियों के रुप में अक्सर रखे जाते हैं , जिनका समुचित उत्तर दिए बिना फलित ज्योतिष को कदापि विश्वसनीय नहीं बनाया जा सकता है।

राशि या लग्‍नफल का औचित्‍य

विश्व की आबादी छः अरब है ,एक राशि के अंतर्गत 50 करोड़ व्यक्ति आते हैं। क्या एक राशि या लग्न के लिए लिखे गए फल करोड़ों व्यक्तियों के लिए सही हैं ? अगर लिखा गया फल सही है तो एक ही राशि के एक व्यक्ति का जिस दिन अच्छा होता है , उसी राशि के दूसरे व्यक्ति के लिए वह दिन बुरा क्यों होता है ? अगर फल सही नहीं है तो इतनी बड़ी आबादी को राशि-फल में उलझाए रखने का औचित्य क्या है ?

राहू और केतु क्‍या हैं

राहू-केतु आकाश में कोई आकाशीय पिंड या ग्रह नहीं हैं । ये दोनो महज दो विन्दु हैं ,जिनपर सूर्य और चंद्रमा का वृत्ताकार यात्रा-पथ एक-दूसरे को काटता है। ये पिंड नहीं होने के कारण ग्रहों की तरह शक्ति उत्सर्जित करनेवाले शक्ति-स्रोत नहीं हैं , फिर भी आजतक ज्योतिषी लोगों के बीच इसके भयानक प्रभाव की चर्चा करते क्यों चले आ रहें हैं ? लोग राहू-केतु को पाप-ग्रह समझकर इनसे क्यों डरते हैं ?

क्‍या ग्रह सचमुच प्रभावी है ?

करोड़ों-अरबों मील की दूरी पर स्थित ग्रह सचमुच जड़-चेतन पर प्रभाव डालता है ? अगर प्रभावित करता है तो किस विधि से प्रभावित करता है ? अगर इस दिशा में किसी प्रकार की खोज है तो उसका स्वरुप क्या है ? फलित ज्योतिष का वैज्ञानिक आधार क्या है ? क्या ग्रहों का मानव-जीवन पर प्रभाव है ?

क्‍या एक लग्‍न और समान ग्रह स्थिति में जन्‍म लेनेवालों का सबकुछ निश्चित होता है ?

क्या लग्न-सापेक्ष ग्रह-स्थिति के अनुसार जन्म लेनेवाले व्यक्ति की कार्यशैली, दृष्टिकोण, शील, स्वभाव, संसाधन और साध्य निश्चित होता है ? एक लग्न में जन्म लेनेवाले व्यक्तियों की संख्या हजारों में होती हैं, अगर सभी का स्वभाव ,कार्यक्रम और साध्य एक होता तो महात्मा गाधी और जवाहरलाल नेहरु के साथ पैदा होनेवाले व्यक्ति या व्यक्तियों से संसार अपरिचित क्यों है ?

भविष्‍य बनाया जाए या भविष्‍य देख जाए ?

गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कर्मवादी होने का उपदेश दिया है , जबकि फलित ज्योतिष भावी घटनाओं की जानकारी देकर अकर्मण्यता को बढ़ावा देता है। सवाल यह उठता है कि ग्रहों के प्रभाव और प्रारब्ध पर विश्वास किया जाए या कर्मवादी बना जाए ? उस जानकारी से क्या लाभ जो विश्व को अकर्मण्य बना दे ? भवितव्यता होकर रहेगी तो मनुष्य की इच्छाशक्ति और नैतिकता की क्या भूमिका होगी ? जो होना है, वही होगा , उसे हम बदल नहीं पाएंगे तो उस जानकारी से क्या लाभ हो सकता है ?

क्‍या भावी अनिष्‍टकर घटनाओं को टाला जा सकता है ?

क्या भावी अनिष्टकर घटनाओं को टाला जा सकता है ? राम और युधिष्ठिर को बनवासी बनकर रहना पड़ा , हरिश्चंद्र श्मशान-घाट में चैकीदारी करने को विवश हुए , महाराणा प्रताप बहुत दिनों तक जंगल में भटकते हुए घास की रोटी खाने को मजबूर हुए । अभिप्राय यह है कि बुरे ग्रह का प्रभाव हर व्यक्ति के जीवन में देखा गया। सभी के गुरु आध्यात्मिक स्तर पर काफी ऊंचाई के थे , निश्चित रुप से बुरे ग्रहों के अनिष्टकर प्रभाव से छुटकारा पाने के लिए तंत्र , मंत्र , यंत्र , पूजा-पाठ , प्रार्थना , रत्न-धारण , आदि का सहारा लिया गया होगा। आज के ज्योतिषी भले ही बुरे ग्रहों के प्रभावी समय की भविष्यवाणी करने में विफल हो जाएं , उनका इलाज करने में सफलता का दावा करते हैं। क्या ग्रहों के प्रभाव और रत्नों के प्रभाव के बीच परस्पर संबंध को सिद्ध करने के लिए एक प्रयोगशाला की आवश्यकता नहीं है ? कहीं तंत्र , मंत्र ,यंत्र , पूजा-पाठ , प्रार्थना की तरह रत्न-धारण भी स्वान्तः सुखाय मनोवैज्ञानिक इलाज तो नहीं है ?

सप्‍ताह के दिनों का ज्‍योतिष में महत्‍व

सप्ताह के अन्य दिनों की तरह रविवार को सूर्य की गति और स्थिति में कोई अंतर नहीं होता , फिर ज्योतिषी रविवार को रवि के प्रभाव से कैसे जोड़ देते हैं ? क्या सप्ताह के सात दिनों के नामकरण की ग्रहों के गुण-दोष पर आधरित होने की वैज्ञानिकता सिद्ध की जा सकती है ? यदि नही तो फिर दिन पर आधारित फलित और कर्मकाण्ड का औचित्य क्या है ?

शुभ मुहूर्त्‍त और यात्रा निकालने का महत्‍व

शुभ मुहूर्त और यात्रा निकालने के बाद भी किए गए बहुत सारे कार्य अधूरे पड़े रहते हैं या कार्यों की समाप्ति के बाद परिणाम नुकसानप्रद सिद्ध होते हैं । एक अच्छे मुहूर्त में लाखों विद्यार्थी परीक्षा में सम्मिलित होते हैं , किन्तु सभी अपनी योग्यता के अनुसार ही फल प्राप्त करते हैं , फिर मुहूर्त या यात्रा का क्या औचित्य है ?

शकुन अशकुन का औचित्‍य

बिल्ली के रास्ता काटने पर गाड़ी-चालक आकस्मिक दुर्घटना के भय से गाड़ी को कुछ क्षणों के लिए रोक देता है , किन्तु रेलवे फाटक पर चैकीदार के मना करने के बावजूद वह अपनी गाड़ी को आगे बढ़ा देता है । क्या यह उचित है ? क्या शकुन पद्धति या पशु-पक्षी की गतिविधि से भी भविष्य की जानकारी प्राप्त की जा सकती है ?

हस्‍तरेखा से भविष्‍य की जानकारी

हस्तरेखा पढ़कर भविष्य की कितनी जानकारी प्राप्त की जा सकती है ? क्या इसके द्वारा संपूर्ण जीवन की समययुक्त भविष्यवाणी की जा सकती है ? क्या हस्तरेखाओं को पढ़कर जन्मकुंडली-निर्माण संभव है या महज यह एक छलावा है ? क्या हस्ताक्षर से व्यक्ति की मानसिकता या चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डाला जा सकता है या उससे तिथियुक्त भविष्यवाणिया भी की जा सकती हैं ? क्या हस्ताक्षर बदलकर भविष्य बदला जा सकता है ?

वास्‍तुशास्‍त्र का महत्‍व

सभी व्यक्ति अपने भवन , संस्थान , औद्योगिक क्षेत्र के स्वरुप में वास्तुशास्त्र के अनुरुप परिवर्तन करने के बावजूद भाग्य के स्वरुप में कोई परिवर्तन नहीं कर पाता। आखिर वास्तुशास्त्र फलित ज्योतिष का ही अंग है या बुरे ग्रहों का इलाज या फिर प्राचीनकालीन भवन-निर्माण की विकसित तकनीक ?

प्रश्‍नकुडली से भविष्‍य

अथक परिश्रम से मूल कुंडली की व्याख्या करते हुए ज्योतिषी आजतक व्यक्ति के सही स्वरुप , चारित्रिक विशेषताओं और प्रतिफलन-काल को निर्धारित करने में सफल सिद्ध नहीं हो सके हैं। फिर प्रश्‍नकुंडली से वे किस कल्याण की अपेक्षा करते हैं ?

राजयोग का महत्‍व

फलित ज्योतिष में वर्णित राजयोग में उत्पन्न अधिकांश लोग न तो राजा होते हैं और न ही बड़े पदाधिकारी । अति सामान्य और गरीबी रेखा से नीचे रहनेवाले व्यक्तियों की कुंडलियों में कभी-कभी कई राजयोग दिखाई पड़ जाते हैं । ऐसी परिस्थितियों में इन राजयोगों का क्या महत्व रह जाता है ? इसका रहस्य कहीं अन्यत्र तो नहीं छिपा है ?

ग्रहशक्ति का असली रहस्‍य कहां छुपा है ?

ग्रहों के दशाकाल निर्धारण के लिए अनेक पद्धतियों का उल्लेख है। सभी पद्धतियां ऋषि-मुनियों की ही देन है। इनमें से किसे सही और किसे गलत समझा जाए ? इतनी सारी पद्धतियों के बावजूद क्या सालभर बाद घटनेवाली घटनाओं की तिथियुक्त भविष्यवाणी संभव है ? स्थान-बल, काल-बल, दिक-बल , नैसर्गिक-बल , चेष्टा-बल ,दृष्टि-बल , षडवर्ग-बल , अष्टकवर्ग-बल आदि विधियों से ग्रहशक्ति की पैमाइश किए जाने की व्यवस्था है। क्या सचमुच इन विधियों से किसी कुंडली में सबसे कमजोर और सबसे शक्तिवाले ग्रह को समझा जा सकता है या ग्रहशक्ति का रहस्य उसकी गतिज ऊर्जा ,स्थैतिज ऊर्जा तथा गुरूत्वाकर्षण-बल में अंतर्निहित हैं ?

जमाने के साथ ग्रह के प्रभाव में परिवर्तन

कुंडली के नवग्रह कभी बाल्यकाल में शादी का योग उपन्न करते थे, आज के युवा-युवती पूर्ण व्यस्क होने पर ही विवाह-बंधन में पड़ना उचित समझते हैं। ये ग्रह कभी बहुसंतानोत्पत्ति के लिए प्रेरित करते थे , आज भी वे ग्रह मौजूद हैं , किन्तु दम्पत्ति मात्र एक-दो संतान की इच्छा रखते हैं । पहले गर्भपात अवैध था ,आज इसे कानून का संरक्षण प्राप्त है। पहले लोग नौकरी करनेवालों को निकृष्ट समझते थे , आज लोग नौकरी के लिए लालायित रहते हैं । पहले वर्षा में नियमितता और प्रचुरता होती थी , आज अनिश्चिता और अनियमितता बनी हुई है। पहले लोगों का मेल-मिलाप और संबंध सीमित जगहों पर हुआ करता था , आज सभ्यता ,संस्कृति , राजनीति और बाजार का विश्वीकरण हो गया है। पहले लोग सरल हुआ करते थे , आज संत भी जटिल हुआ करते हैं। आखिर ग्रहों के प्रभाव में बदलाव है या अन्य कोई गोपनीय कारण है ?

इस ब्‍लाग में ज्‍योतिष के वास्‍तविक स्‍वरूप की चर्चा होगी

ज्योतिष से संबंधित उपरोक्त प्रश्न अक्सरहा पत्र-पत्रिकाओं में ज्योतिषियों के लिए चुनौतयों के रुप में उपस्थित होते रहते हैं । मैनें भी ऐसा महसूस किया है कि इन प्रश्न के उत्तर दिए बिना फलित ज्योतिष को प्रगति-पथ पर नहीं ले जाया जा सकता। मुझे किसी ज्योतिषी से कोई शिकायत नहीं है। सभी ज्योतिषी अपने ढंग से फलित ज्योतिष को विकसित करने की दिशा में निरंतर कार्यरत हैं , परंतु किसी की कार्यविधि से संसार को कोई मतलब नहीं है , उसे प्रत्यक्ष-फल चाहिए। ज्योतिष में ग्रहों के फलों को जिस ढंग से प्रस्तुत किया गया है , उसमें कार्य , कारण और फल में अधिकांश जगहों पर कोई समन्वय नहीं दिखाई पड़ता है। यही कारण है कि उपरोक्त ढेर सारे प्रश्न आम आदमी के मनमस्तिष्क में कौधते रहते हैं। इन प्रश्नो के उत्तर नहीं मिलने से ज्योतिषीय भ्रांतिया स्वाभाविक रुप से उत्पन्न हुई हैं। इस ब्लाग में विवेच्य प्रसंगों की सांगोपांग व्याख्या करके पाठकों को ज्योतिष के वास्तविक स्वरुप से परिचित कराने की चेष्टा होगी। ज्योतिष के वैज्ञानिक स्वरुप को उभारते हुए ग्रहशक्ति और दशाकाल निर्धारण से संबंधित नयी खोजों का संक्षिप्त परिचय दिया जाएगा। यह भी सिद्ध किया जाएगा कि ग्रहों का जड़-चेतन , वनस्पति, जीव-जन्तु और मानव-जीवन पर प्रभाव है। प्रस्तुत ब्लाग ज्योतिषयों ,बुद्धिजीवी वर्ग तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखनेवाले व्यक्तियों के लिए बहुत उपयोगी एवं सम्बल प्रदान करनेवाली सिद्ध होगी।

6 टिप्‍पणियां:

शिवनागले दमुआ ने कहा…

आपके ब्लाग का स्वागत है । आपने अपने ब्लाग में जो ज्योतिष के बारे में सवाल उठाये हैं उनका विज्ञान सम्मत जवाब देने की कृपा करें । शुभकामनाऐं !
धन्यवाद !

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

स्वागत है.
आपके द्वारा उठाये गए प्रश्न और आपके परिचय में थोड़ा सा अंतर्विरोध दिख रहा है - आशा है आपकी आगे की पोस्ट्स से स्थिति स्पष्ट हो जायेगी. परिवार में पिछली पीढियों में बहुत पहुंचे हुए ज्योतिषी हुए हैं. मगर आपके प्रश्नों के उत्तर में मैं एक ही बात कह सकता हूँ:
तदैव लग्नं सुदिनं तदैव, ताराबलं चंद्रबलं तदैव
विद्याबलं दैवबलं तदैव लक्ष्मिपतिम तेंघ्रियुग्मस्मरामि

Ajay singh ने कहा…

समझ नहीं आया, आप बतला रहे हैं या पूछ रहे हैं ?

Udan Tashtari ने कहा…

स्वागत एवं अभिनन्दन है आपका.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

वंदे मातरम!
स्वाधीनता दिवस की शुभकामनाएं!

Suresh Chiplunkar ने कहा…

कृपया मेरे इन लेखों को भी देखें…

ज्योतिष विज्ञान नहीं कोरी कल्पना और अनुमान
http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2007/10/astrology-science-fiction-and.html
ज्योतिष और दशा पद्धति की विसंगतियाँ
http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2007/10/contradictions-in-astrological-methods.html
ज्योतिषियों को चुनौती और अनसुलझे सवाल
http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2007/10/challenge-astrology-unanswered-astro.html

और भी कई लेख हैं जो आपको मेरे ब्लॉग के साइड बार में मिलेंगे…